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भारत-फ्राँस दोहरे कराधान वंचन संधि में संशोधन

  • 24 Feb 2026
  • 17 min read

स्रोत: पीआईबी

भारत और फ्राँस ने भारत-फ्राँस दोहरे कराधान वंचन संधि (DTAC 1992) के संशोधन प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये हैं, जिसमें पूंजीगत लाभ कराधान, सर्वाधिक वरीयतापूर्ण राष्ट्र (मोस्ट-फेवर्ड नेशन- MFN) क्लॉज में महत्त्वपूर्ण बदलाव किये गए हैं तथा बहुपक्षीय आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण (BEPS) ढाँचे के प्रावधानों को शामिल किया गया है।

  • संशोधन करदाताओं को अधिक कर-निश्चितता प्रदान करने के लिये तैयार किये गए हैं और इनसे दोनों देशों के बीच निवेश, प्रौद्योगिकी तथा कर्मियों के प्रवाह को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

भारत-फ्राँस DTAC में किये गए प्रमुख संशोधन

  • पूंजीगत लाभ कराधान का प्रावधान: इस प्रोटोकॉल के तहत किसी कंपनी के शेयरों की बिक्री से होने वाले पूंजीगत लाभ पर कराधान का पूर्ण अधिकार उस क्षेत्राधिकार को दिया जाता है, जहाँ वह कंपनी मूल रूप से स्थापित है।
  • मोस्ट-फेवर्ड नेशन- MFN) क्लॉज: संशोधन प्रोटोकॉल इस प्रोटोकॉल से DTAC में तथाकथित सर्वाधिक वरीयतापूर्ण राष्ट्र (मोस्ट-फेवर्ड नेशन- MFN) क्लॉज को भी हटा देता है।
  • लाभांश पर कराधान: संशोधन प्रोटोकॉल कम-से-कम 10 प्रतिशत पूंजी रखने वालों के लिये 5 प्रतिशत की विभाजन दर और अन्य सभी मामलों के लिये 15 प्रतिशत कर रखने वालों के लिये कर के 10 प्रतिशत की एकल दर को बदलकर लाभांश से आय के कराधान को भी संशोधित करता है।
  • तकनीकी सेवाओं के लिये शुल्क (FTS): भारत-अमेरिका दोहरे कराधान वंचन संधि की परिभाषा के साथ संतुलन स्थापित कर 'तकनीकी सेवाओं के लिये शुल्क’ (FTS) की परिभाषा को भी संशोधित करता है।
  • स्थायी प्रतिष्ठान (PE): प्रोटोकॉल सर्विस पीई को जोड़कर 'स्थायी प्रतिष्ठान' के दायरे का विस्तार करता है।
  • कर सहयोग: सूचना के आदान-प्रदान के प्रावधानों को भी अद्यतन किया गया है और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार करों के संग्रह में सहायता पर एक नया अनुच्छेद पेश किया गया है ताकि निर्बाध आदान-प्रदान को सुगम बनाया जा सके और पारस्परिक कर सहयोग को मज़बूत किया जा सके।
  • BEPS संरेखण: संशोधन प्रोटोकॉल में DTAC के भीतर BEPS बहुपक्षीय लिखत (MLI) के लागू प्रावधान भी शामिल हैं, जो भारत और फ्राँस द्वारा MLI पर हस्ताक्षर और अनुसमर्थन के परिणामस्वरूप पहले से ही लागू हो गए थे।

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