प्रारंभिक परीक्षा
NCBC के अध्यक्ष की नियुक्ति
चर्चा में क्यों?
निरंजन ज्योति ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) की अध्यक्ष के रूप में पदभार ग्रहण किया है, जबकि किरण उमेश महाले ने आयोग की सदस्य के रूप में कार्यभार सँभाला है।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) क्या है?
- परिचय: NCBC एक संवैधानिक निकाय है, जो सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) के कल्याण और संरक्षण के लिये समर्पित है।
- प्रारंभ में 1993 में एक संवैधानिक निकाय के रूप में स्थापित यह आयोग 2018 के 102वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन से गुज़रा, जिसने इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
- संवैधानिक आधार: आयोग को अपनी शक्तियाँ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338B के अंतर्गत प्राप्त हैं। यह राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (अनुच्छेद 338) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338A) के साथ कार्य करता है।
- संरचना: NCBC में कुल 5 सदस्य होते हैं- एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य। इन सभी की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर एवं मुहर सहित वारंट के माध्यम से की जाती है।
- सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों से संबंधित सभी प्रमुख नीतिगत मामलों पर सरकार के लिये NCBC से परामर्श करना अनिवार्य कर दिया गया है।
- यह अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिये उपलब्ध तंत्र के समान एक अधिक सशक्त शिकायत निवारण व्यवस्था प्रदान करता है।
- इसके अतिरिक्त, सदस्यों के कार्यकाल और सेवा की शर्तों का निर्धारण करने का संवैधानिक अधिकार राष्ट्रपति के अधीन होता है।
- सदस्यों की योग्यता:
- अध्यक्ष: अध्यक्ष की नियुक्ति सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) से संबंधित प्रतिष्ठित सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं में से की जाती है। वे ऐसे व्यक्ति होने चाहिये, जिनके व्यक्तित्व और सेवा का रिकॉर्ड पिछड़े वर्गों में विश्वास उत्पन्न करता हो।
- उपाध्यक्ष एवं सदस्य: उपाध्यक्ष और अन्य तीन सदस्यों में से कम-से-कम दो का संबंध सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों से होना अनिवार्य है।
- महिला प्रतिनिधित्व: आयोग में कम-से-कम एक सदस्य महिला होना आवश्यक है।
- कार्यकाल और सेवा-शर्तें: कार्यालय की अवधि और सेवा-शर्तें (वेतन, भत्ते आदि) राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
- अध्यक्ष और सदस्य कार्यभार ग्रहण करने की तारीख से 3 वर्ष की अवधि के लिये सेवा करते हैं। सदस्य आमतौर पर दो से अधिक कार्यकाल के लिये नियुक्ति के पात्र नहीं होते हैं।
- 102वें संशोधन का महत्त्व: वर्ष 2018 से पहले NCBC की भूमिका अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की केंद्रीय सूची में जातियों को शामिल या बाहर करने की अनुशंसा तक सीमित थी। नए संवैधानिक ढाँचे के अंतर्गत:
- प्रमुख कार्य:
- जाँच: संविधान या किसी अन्य कानून के तहत पिछड़े वर्गों के लिये प्रदान किये गए संरक्षण उपायों से संबंधित सभी मामलों की निगरानी और जाँच करना।
- पूछताछ: पिछड़े वर्गों के अधिकारों और संरक्षण उपायों के अभाव से संबंधित विशिष्ट शिकायतों की जाँच करना।
- सलाहकार: इन वर्गों के सामाजिक-आर्थिक विकास में भाग लेना और उन पर सलाह देना तथा उनकी प्रगति का मूल्यांकन करना।
- रिपोर्टिंग: उन संरक्षण उपायों के कामकाज के बारे में राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
- सिविल न्यायालय की शक्तियाँ: मामलों की जाँच करते समय या शिकायतों की पूछताछ करते समय NCBC के पास वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को निम्नलिखित शक्तियाँ हैं, अर्थात् :-
- भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
- किसी दस्तावेज को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करना;
- शपथपत्रों पर साध्य ग्रहण करना;
- किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अपेक्षा करना;
- संबंधित संवैधानिक संशोधन: अनुच्छेद 342A को NCBC की संवैधानिक स्थिति (102वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2018) के साथ जोड़ा गया था, जो राष्ट्रपति को विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को निर्दिष्ट करने का अधिकार देता है।
- वर्ष 2021 में हुए 105वें संशोधन अधिनियम के बाद राज्य सरकारों को राज्य की सूचियों (OBC) की पहचान करने और उन्हें बनाए रखने की शक्ति स्पष्ट रूप से बहाल कर दी गई थी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. NCBC को संवैधानिक दर्जा देने वाला कौन-सा संवैधानिक संशोधन था?
वर्ष 2018 में हुए 102वें संविधान संशोधन अधिनियम के अंतर्गत अनुच्छेद 338B को जोड़ा गया, जिससे NCBC एक वैधानिक निकाय से पूर्ण संवैधानिक इकाई में परिवर्तित हो गया।
2. NCBC की संरचना और कार्यकाल कैसे निर्धारित किया जाता है?
इसमें पाँच सदस्य (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तीन अन्य) होते हैं जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है, जो उनके कार्यकाल और सेवा शर्तों का भी निर्धारण करते हैं।
3. 105वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2021 का क्या प्रभाव था?
इसने स्पष्ट रूप से राज्य सरकारों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की अपनी राज्य-विशिष्ट सूचियों की पहचान और रखरखाव की शक्ति बहाल कर दी।
4. NCBC के पास कौन-सी अर्द्ध-न्यायिक शक्तियाँ हैं?
शिकायतों की जाँच करते समय NCBC के पास एक सिविल न्यायालय के अधिकार होते हैं, जिसमें गवाहों को बुलाना, दस्तावेज़ पेश करना और शपथ पत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना शामिल है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न. भारत के निम्नलिखित संगठनों/निकायों पर विचार कीजिये: (2023)
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
- राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
- राष्ट्रीय विधि आयोग
- राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग
उपर्युक्त में से कितने संवैधानिक निकाय हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) केवल तीन
(d) सभी चार
उत्तर: (a)
रैपिड फायर
राजकोषीय घाटा
भारत का राजकोषीय घाटा फरवरी 2026 के अंत तक 12.52 ट्रिलियन रुपये पर पहुँच गया, जो वार्षिक बजटीय लक्ष्य का 80.4% है। यह 2024-25 में इसी अवधि के दौरान दर्ज 85.8% से उल्लेखनीय रूप से कम है।
- वित्त वर्ष 2025-26 के लिये केंद्र ने सकल घरेलू उत्पाद का 4.4% राजकोषीय घाटा लक्ष्य निर्धारित किया है, जो 15.58 ट्रिलियन रुपये के बराबर है।
- इन्हें मासिक रूप से वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के अंतर्गत कार्य करने वाले नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CGA) द्वारा संकलित और जारी किया जाता है।
राजकोषीय घाटा
- परिचय: राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उसकी कुल प्राप्तियों (उधारियों को छोड़कर) के बीच का अंतर है। यह सरकार की कुल उधारी आवश्यकता का प्रतिनिधित्व करता है।
- समीकरण: इसकी गणना कुल व्यय (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियाँ) से प्राप्त की जाती है, जो प्रभावी रूप से उस अंतर को दर्शाता है जिसकी आपूर्ति सरकार को उधारी के माध्यम से करना होता है।
- व्यय में राजस्व व्यय (वेतन और ब्याज जैसी आवर्ती लागतें) और पूंजीगत व्यय (सड़कों और पुलों जैसे बुनियादी ढाँचे में उत्पादक निवेश) दोनों शामिल हैं।
- राजस्व में कर एवं गैर-कर राजस्व (लाभांश/शुल्क) और गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियाँ (विनिवेश प्राप्तियाँ और ऋण वसूली) शामिल हैं।
- आर्थिक प्रभाव: भारी घाटे के कारण ‘क्राउडिंग आउट’ (निजी निवेश के लिये उपलब्ध पूंजी में कमी), मुद्रास्फीति का दबाव या ‘ऋण जाल’ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसमें राजस्व का अधिकांश हिस्सा ब्याज के भुगतान में ही खर्च हो जाता है।
- FRBM अधिनियम, 2003 का लक्ष्य: मार्च 2021 तक राजकोषीय घाटे को 3% तक लाने के FRBM अधिनियम (2003) के मूल लक्ष्य में महामारी के कारण ढील दी गई थी, जिसके बाद वर्ष 2021 के बाद के लिये एक 'कंसोलिडेशन ग्लाइड पाथ' तैयार किया गया। वर्ष 2025-26 तक घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.5% से नीचे लाने की इस प्रतिबद्धता को अब सफलतापूर्वक हासिल कर लिया गया है।
- राजकोषीय घाटा बनाम राजस्व घाटा: जहाँ राजकोषीय घाटा सरकार की कुल उधारी को दर्शाता है, वहीं राजस्व घाटा विशेष रूप से सरकार की वर्तमान आय की तुलना में उसके दैनिक परिचालन व्यय में होने वाली कमी को मापता है।
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और पढ़ें: राजकोषीय घाटा और इसका प्रबंधन |
रैपिड फायर
जापान ने भारतीय निवेश हेतु एक विशेष केंद्र स्थापित किया
जापान भारतीय बाज़ार में विस्तार कर रही जापानी कंपनियों के लिये प्रक्रियाओं को सरल बनाने और आवश्यक सहयोग प्रदान करने हेतु एक विशेष केंद्र स्थापित कर रहा है।
- संस्थागत सहयोग: नया केंद्र एक सहायक (फैसिलिटेटर) के रूप में कार्य करेगा, जो कंपनियों को भारत की जटिल कर प्रणाली, राज्य-स्तरीय विनियमों तथा विधिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कथित कमी से निपटने में सहायता प्रदान करेगा।
- यह पहल आगामी दशक के लिये अगस्त 2025 में नई दिल्ली और टोक्यो द्वारा निर्धारित 10 ट्रिलियन येन (62.6 अरब अमेरिकी डॉलर) के निजी क्षेत्र निवेश लक्ष्य को समर्थन प्रदान करती है।
- लक्षित क्षेत्र: पारंपरिक विनिर्माण से आगे बढ़ते हुए, फोकस अब उच्च प्रौद्योगिकी और रणनीतिक क्षेत्रों जैसे- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्टार्टअप्स और महत्त्वपूर्ण खनिज पर भी केंद्रित किया जाएगा।
- तुलनात्मक स्थिति: मज़बूत राजनीतिक संबंधों के बावजूद वर्ष 2024 में भारत में केवल 1,434 जापानी कंपनियाँ सक्रिय थीं, जो थाईलैंड (लगभग 6,000) और सिंगा
- पुर (लगभग 4,500) के मुकाबले काफी कम संख्या है।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्थिति: वर्तमान में जापान भारत में FDI का पाँचवा सबसे बड़ा स्रोत है, जिसका कुल निवेश 2000 से दिसंबर 2024 के बीच 43.2 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच चुका है। यह निवेश मुख्य रूप से ऑटोमोबाइल और दूरसंचार क्षेत्रों में हुआ है।
- रणनीतिक सामंजस्य: साझा लोकतांत्रिक मूल्यों तथा क्वाड (चतुर्भुज सुरक्षा संवाद) के प्रति समान प्रतिबद्धता इस साझेदारी को और सुदृढ़ बनाती है, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार के रूप में उभरती है।
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और पढ़ें: भारत-जापान CEPA बैठक |
रैपिड फायर
दूनागिरि प्रोजेक्ट 17A का पाँचवा जहाज़
भारतीय नौसेना को ‘दूनागिरि’ (यार्ड 3023) की प्राप्ति हुई है, जो उन्नत युद्धपोत डिज़ाइन और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (स्व-निर्भरता) की दिशा में भारत की एक महत्त्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है।
- ऐतिहासिक विरासत: यह पोत मूल INS दूनागिरि (लींडर-श्रेणी फ्रिगेट) का पुनर्जन्म है, जिसने 1977 से 2010 तक 33 वर्षों तक भारतीय नौसेना में सेवा दी।
- स्वदेशी डिज़ाइन एवं प्रोत्साहन: यह परियोजना पूरी तरह से युद्धपोत डिज़ाइन ब्यूरो (WDB) द्वारा डिज़ाइन की गई है और इसमें 75% स्वदेशी सामग्री का समावेश है।
- इससे 200 से अधिक MSMEs की भागीदारी के माध्यम से घरेलू रक्षा पारिस्थितिक तंत्र को उल्लेखनीय प्रोत्साहन प्राप्त हुआ है और बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोज़गार सृजित हुए हैं।
- उन्नत प्रणोदन रणनीति: यह फ्रिगेट युद्धपोत संयुक्त डीज़ल या गैस (CODOG) प्रणोदन प्रणाली पर कार्य करता है, जिसमें प्रत्येक शाफ्ट पर कंट्रोलेबल पिच प्रोपेलर (CPP) लगा है, जिसे अत्याधुनिक एकीकृत प्लेटफॉर्म प्रबंधन प्रणाली (IPMS) द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
- रणनीतिक युद्धक क्षमताएँ: यह अत्यंत शक्तिशाली हथियार एवं सेंसर प्रणाली से सुसज्जित है, जिसमें ब्रह्मोस सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलें (SSM), MFSTAR रडार, MRSAM कॉम्प्लेक्स तथा पनडुब्बी-रोधी युद्ध (ASW) के लिये विशेष रॉकेट और टॉरपीडो शामिल हैं।
- प्रोजेक्ट 17A (नीलगिरि श्रेणी): ‘दूनागिरि’ प्रोजेक्ट 17A के फ्रिगेट्स का पाँचवा पोत है तथा कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (GRSE) द्वारा निर्मित दूसरा पोत है।
- प्रोजेक्ट 17A भारत का कार्यक्रम है, जिसके अंतर्गत शिवालिक श्रेणी के उन्नत उत्तराधिकारी के रूप में सात नीलगिरि-श्रेणी के स्टील्थ फ्रिगेट्स का निर्माण किया जा रहा है।
- इन सात फ्रिगेट्स में से चार (नीलगिरि, उदयगिरि, तारागिरि, महेंद्रगिरि) का निर्माण मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) द्वारा किया जा रहा है, जबकि तीन (हिमगिरि, दूनागिरि, विंध्यगिरि) का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (GRSE) द्वारा किया जा रहा है।
रैपिड फायर
भारत की शुद्ध अंतर्राष्ट्रीय देनदारी कम हुई
वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही के दौरान शेष विश्व के प्रति भारत की शुद्ध वित्तीय देनदारियों में उल्लेखनीय रूप से 10.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर की गिरावट देखी गई।
- शुद्ध दावों में कमी: भारत में अनिवासियों के शुद्ध दावे घटकर 260.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गए, क्योंकि भारतीय निवासियों की विदेशी वित्तीय संपत्तियों में वृद्धि (12.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर) भारत में विदेशी स्वामित्व वाली संपत्तियों में वृद्धि (1.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर) से काफी अधिक थी।
- शुद्ध दावा भारत में कुल विदेशी-स्वामित्व वाली संपत्तियों और भारत के स्वामित्व वाली विदेशी संपत्तियों के बीच का अंतर है।
- संपत्ति-से-देनदारी अनुपात: भारत की अंतर्राष्ट्रीय संपत्तियों का देनदारियों से अनुपात वर्ष 2024-25 में 74.6% से सुधरकर 82.1% हो गया, जो मज़बूत होती एक्सटर्नल बैलेंस शीट का संकेत देता है।
- संपत्ति-से-देनदारी अनुपात एक वित्तीय मीट्रिक है, जिसका उपयोग किसी इकाई (कंपनी, देश, या यहाँ तक कि व्यक्ति) की सॉल्वेंसी और वित्तीय स्वास्थ्य का आकलन करने के लिये किया जाता है। यह स्वामित्व वाली संपत्तियों (संपत्ति) और देय राशियों (देनदारियों) के बीच संबंध को मापता है।
- बाह्य निवेश के कारक: विदेशी संपत्तियों में उछाल बाह्य प्रत्यक्ष निवेशों में 7.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि और मुद्रा एवं जमाओं में 9.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि से प्रेरित था।
- आरक्षित संपत्तियों के रुझान: आरक्षित संपत्तियाँ (कुल विदेशी संपत्तियों का 57.4% हिस्सा) तिमाही के दौरान 12.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर घटकर 687.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर पर पहुँच गईं, उन्होंने 8.2% की वार्षिक वृद्धि बनाए रखी।
- देनदारियों में बदलाव: आवक के प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेशों में कमी आई, लेकिन इसे व्यापार ऋण में 11.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि से संतुलित किया गया; परिणामस्वरूप कुल बाह्य देनदारियों में ऋण देनदारियों का हिस्सा बढ़कर 55.3% हो गया।
रैपिड फायर
खेलो इंडिया ट्राइबल गेम (KITG) 2026
पहला खेलो इंडिया जनजातीय खेल 25 मार्च से 3 अप्रैल 2026 तक आयोजित किया जा रहा है, जो जनजातीय एथलीटों के लिये भारत का पहला राष्ट्रीय बहु-खेल आयोजन है। छत्तीसगढ़ के रायपुर, जगदलपुर और सरगुजा में आयोजित हो रहे इस खेल ने भारत भर के जनजातीय एथलीटों को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया है।
- परिचय: ये खेल युवा मामले एवं खेल मंत्रालय, SAI, IOA, राष्ट्रीय खेल महासंघ और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किये जा रहे हैं, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तकनीकी मानकों का पालन किया जा रहा है।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य जनजातीय प्रतिभाओं को मुख्यधारा के खेलों में एकीकृत करना है, जिससे उन्हें प्रदर्शन, संरचित प्रतिस्पर्द्धा और भविष्य के विकास के मार्ग उपलब्ध हो सकें।
- ये खेल खेलो इंडिया कार्यक्रम का हिस्सा हैं, जो ज़मीनी स्तर पर भागीदारी, प्रतिभा पहचान और भारत के खेल पारिस्थितिक तंत्र के समावेशी विस्तार को प्रोत्साहित करता है।
- शुभंकर: "मोरवीर" जनजातीय गौरव, पहचान और वीरता का प्रतीक है।
- शामिल खेल: इन खेल प्रतियोगिताओं में सात पदक श्रेणियों वाले प्रमुख खेल — एथलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, भारोत्तोलन, तीरंदाजी, तैराकी और कुश्ती — साथ ही कबड्डी और मलखंब जैसे स्वदेशी खेल शामिल हैं, जिसमें 338 पदकों के लिये 60,000 से अधिक एथलीट प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं।
- चयन प्रक्रिया: एथलीटों के चयन के लिये दो चरणों की प्रक्रिया अपनाई जाती है—पहले राज्य/केंद्रशासित प्रदेश स्तर पर परीक्षण, और उसके बाद खेल महासंघों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षण—जिससे योग्यता के आधार पर भागीदारी सुनिश्चित होती है।
- एक समर्पित प्रतिभा पहचान एवं विकास समिति (TIDC) खेलो इंडिया फ्रेमवर्क के तहत आगे के प्रशिक्षण के लिये होनहार एथलीटों की खोज करती है।
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और पढ़ें: जनजातीय विकास दृष्टिकोण |
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