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राजकोषीय घाटा

  • 01 Apr 2026
  • 17 min read

स्रोत: बिजनेस स्टैंडर्ड

भारत का राजकोषीय घाटा फरवरी 2026 के अंत तक 12.52 ट्रिलियन रुपये पर पहुँच गया, जो वार्षिक बजटीय लक्ष्य का 80.4% है। यह 2024-25 में इसी अवधि के दौरान दर्ज 85.8% से उल्लेखनीय रूप से कम है।

  • वित्त वर्ष 2025-26 के लिये केंद्र ने सकल घरेलू उत्पाद का 4.4% राजकोषीय घाटा लक्ष्य निर्धारित किया है, जो 15.58 ट्रिलियन रुपये के बराबर है।
  • इन्हें मासिक रूप से वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के अंतर्गत कार्य करने वाले नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CGA) द्वारा संकलित और जारी किया जाता है।

राजकोषीय घाटा

  • परिचय: राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उसकी कुल प्राप्तियों (उधारियों को छोड़कर) के बीच का अंतर है। यह सरकार की कुल उधारी आवश्यकता का प्रतिनिधित्व करता है।
  • समीकरण: इसकी गणना कुल व्यय (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियाँ) से प्राप्त की जाती है, जो प्रभावी रूप से उस अंतर को दर्शाता है जिसकी आपूर्ति सरकार को उधारी के माध्यम से करना होता है।
    • व्यय में राजस्व व्यय (वेतन और ब्याज जैसी आवर्ती लागतें) और पूंजीगत व्यय (सड़कों और पुलों जैसे बुनियादी ढाँचे में उत्पादक निवेश) दोनों शामिल हैं।
    • राजस्व में कर एवं गैर-कर राजस्व (लाभांश/शुल्क) और गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियाँ (विनिवेश प्राप्तियाँ और ऋण वसूली) शामिल हैं।
  • आर्थिक प्रभाव: भारी घाटे के कारण ‘क्राउडिंग आउट’ (निजी निवेश के लिये उपलब्ध पूंजी में कमी), मुद्रास्फीति का दबाव या ‘ऋण जाल’ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसमें राजस्व का अधिकांश हिस्सा ब्याज के भुगतान में ही खर्च हो जाता है।
  • FRBM अधिनियम, 2003 का लक्ष्य: मार्च 2021 तक राजकोषीय घाटे को 3% तक लाने के FRBM अधिनियम (2003) के मूल लक्ष्य में महामारी के कारण ढील दी गई थी, जिसके बाद वर्ष 2021 के बाद के लिये एक 'कंसोलिडेशन ग्लाइड पाथ' तैयार किया गया। वर्ष 2025-26 तक घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.5% से नीचे लाने की इस प्रतिबद्धता को अब सफलतापूर्वक हासिल कर लिया गया है।
  • राजकोषीय घाटा बनाम राजस्व घाटा: जहाँ राजकोषीय घाटा सरकार की कुल उधारी को दर्शाता है, वहीं राजस्व घाटा विशेष रूप से सरकार की वर्तमान आय की तुलना में उसके दैनिक परिचालन व्यय में होने वाली कमी को मापता है।

और पढ़ें: राजकोषीय घाटा और इसका प्रबंधन

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