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भारत के रक्षा बलों का विज़न 2047

प्रिलिम्स के लिये: क्वांटम सेंसिंग, मिशन सुदर्शन चक्र, एकीकृत थिएटर कमांड, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, रक्षा औद्योगिक गलियारा, iDEX (रक्षा उत्कृष्टता के लिये नवाचार)

मेन्स के लिये: भारत के रक्षा बलों का विज़न 2047, भारत में रक्षा आधुनिकीकरण और सैन्य सुधार।

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स

चर्चा में क्यों? 

भारत के रक्षा मंत्री ने 'रक्षा बलों का विज़न 2047: भविष्य के लिये तैयार भारतीय सेना का रोडमैप' का अनावरण किया। हेडक्वार्टर्स इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (HQ IDS) द्वारा तैयार यह विज़न दस्तावेज़, भारत की स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारतीय सेना को एक एकीकृत, गतिशील और बहु-क्षेत्रीय बल में बदलने की एक व्यापक रणनीति की रूपरेखा तैयार करता है।

सारांश

  • रक्षा बलों का विज़न 2047 भारत की सेना को एक तकनीकी रूप से उन्नत, एकीकृत और बहु-क्षेत्रीय बल में बदलने का एक दीर्घकालिक रोडमैप है। यह AI, ड्रोन, साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं के माध्यम से थलसेना, नौसेना एवं वायुसेना के बीच संयुक्तता को मज़बूत करने पर केंद्रित है।
  • यह रणनीति सैन्य आधुनिकीकरण को रक्षा स्वदेशीकरण और आर्थिक विकास से जोड़ती है, जिसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू रक्षा विनिर्माण को मज़बूत करना और वर्ष  2047 तक एक आत्मनिर्भर, विश्व-स्तरीय सैन्य बल का निर्माण करना है।

'रक्षा बलों का विज़न 2047' क्या है?

  • परिचय: यह दस्तावेज़ एक “समग्र रणनीति” के रूप में कार्य करता है, जो स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि 21वीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा केवल प्रत्यक्ष युद्धक्षेत्र क्षमताओं पर ही नहीं, बल्कि औद्योगिक क्षमता और तकनीकी पारिस्थितिक तंत्र पर भी समान रूप से निर्भर करती है।
  • तीन मुख्य स्तंभ:
    • तकनीकी उन्नति: युद्ध क्षेत्र में बढ़त बनाए रखने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वायत्त प्रणालियों, क्वांटम सेंसिंग और उन्नत निगरानी तकनीकों का लाभ उठाना।
    • संयुक्तता और तालमेल: दोहराव से बचने तथा संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने के लिये थलसेना, नौसेना एवं वायुसेना के बीच परिचालन तालमेल को गहरा करना।
    • बहु-क्षेत्रीय क्षमता: पारंपरिक (भूमि, समुद्र, वायु) और उभरते क्षेत्रों (साइबर, अंतरिक्ष, संज्ञानात्मक) में निर्बाध रूप से संचालन करने में सक्षम।
  • मुख्य प्रस्ताव और संरचनात्मक सुधार:
    • विशेषीकृत अगली पीढ़ी के बल: इस रोडमैप में स्पेस कमांड, साइबर कमांड, डेटा फोर्स, ड्रोन फोर्स और कॉग्निटिव वॉरफेयर एक्शन फोर्स सहित समर्पित संरचनाओं के निर्माण का प्रस्ताव है।
    • सिद्धांतगत बदलाव: नेट-सेंट्रिक युद्ध से डेटा-सेंट्रिक युद्ध की ओर संक्रमण का प्रस्ताव करता है। इसका उद्देश्य युद्धक्षेत्र में “सूचना श्रेष्ठता” से “निर्णय श्रेष्ठता” की स्थिति में पहुँचना है।
    • मिशन सुदर्शन चक्र: मिशन सुदर्शन चक्र के तहत, इस दृष्टि में भारत की रणनीतिक, आर्थिक और नागरिक संपत्तियों को बदलते हुए हवाई खतरों से सुरक्षित करने के लिये बैलिस्टिक मिसाइल और वायु रक्षा प्रणालियों का विस्तार करने का प्रस्ताव रखा गया है।
    • चरणबद्ध कार्यान्वयन: यह विज़न तीन-चरणीय संक्रमण की रूपरेखा तैयार करता है, जिसमें अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक प्राथमिकताओं की पहचान की गई है। इसका समापन 2040 तथा 2047 के बीच एक 'विश्व स्तरीय सैन्य शक्ति' के निर्माण के साथ होगा।
      • ‘संक्रमण का युग’ (2030 तक): सेना का पुनर्गठन, प्रभावी निवारक क्षमता का सुदृढ़ीकरण और ड्रोन जैसी स्वदेशी तकनीकों को बढ़ावा देना।
      • ‘सशक्तीकरण का युग’ (2030–2040): साइबर और अंतरिक्ष युद्ध को एकीकृत करना और परतदार वायु-मिसाइल रक्षा प्रणाली का विकास करना।
      • ‘उत्कृष्टता का युग’ (2040–2047): एक पूरी तरह एकीकृत, आत्मनिर्भर और सभी क्षेत्रों में सक्षम सैन्य बल का निर्माण करना।

महत्त्व

  • युद्ध की बदलती प्रकृति: संघर्ष (अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध) दिखाते हैं कि कैसे ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन और साइबर हमले आधुनिक युद्ध के मैदानों पर हावी हैं। यह दृष्टिकोण भारत को हाइब्रिड, प्रॉक्सी और "ग्रे-ज़ोन" वॉर के लिये तैयार करता है।
  • भू-राजनीतिक वास्तविकता: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के बढ़ते सामरिक हित, निरंतर सीमा तनाव के साथ मिलकर, एक सख्त रक्षात्मक रुख से सक्रिय निरोध की ओर बदलाव की आवश्यकता रखते हैं।
  • आर्थिक-सुरक्षा संबंध: सैन्य रोडमैप को वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के साथ जोड़कर सरकार स्वीकार करती है कि सैन्य आधुनिकीकरण आयात द्वारा टिकाऊ नहीं हो सकता; इसके लिये एक उभरते घरेलू औद्योगिक आधार की आवश्यकता है।

भारत के रक्षा क्षेत्र में क्या चुनौतियाँ हैं?

  • आयात पर भारी निर्भरता: भारत विश्व के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक बना हुआ है, जो वर्ष 2021–25 के दौरान वैश्विक हथियार आयात का लगभग 8.2–8.3% हिस्सा रखता है, जो सिप्री (SIPRI) के अ+नुसार इसे विश्व का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बनाता है।
    • एकमात्र रूस अभी भी भारत के हथियार आयात का लगभग 40% आपूर्ति करता है, उसके बाद फ्राँस, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका का स्थान है।
    • भारत लगभग 70–75% रक्षा उपकरण घरेलू स्तर पर उत्पादित करता है, जिसका अर्थ है कि एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा अभी भी आयात पर निर्भर है।
  • बजट संबंधी दबाव: भारत का रक्षा व्यय सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.9–2.2% है, एक बड़ा हिस्सा आधुनिकीकरण और पूंजी अधिग्रहण के बजाय वेतन और पेंशन पर निर्भर है।
  • विलंबित संरचनात्मक सुधार: इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड (ITC) के रोलआउट को इंटर-सर्विस फ्रिक्शन और संस्थागत विरोध का सामना करना पड़ा है।
  • खरीद का कम होना और तकनीकी अंतराल: नौकरशाही की विलंब और जटिल खरीद प्रक्रिया प्रायः रक्षा अधिग्रहण को धीमा कर देती है, हालाँकि भारत के पास अभी भी जेट इंजन, उन्नत सेमीकंडक्टर और स्टील्थ सिस्टम जैसी महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों की कमी है, जो सैन्य आधुनिकीकरण को प्रभावित करती है।
  • तकनीकी असममिति: भारत अभी भी उन्नत जेट इंजन और सेमीकंडक्टर चिप्स जैसी महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिये विदेशी मूल के उपकरण निर्माताओं (OEM) पर भारी मात्रा में निर्भर है।

रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने के लिये क्या उपाय किये गए हैं?

  • पूंजी बजट आवंटन: वित्त वर्ष 2026-27 में घरेलू उद्योग से खरीद के लिये पूंजी अधिग्रहण बजट का लगभग 75% घरेलू रक्षा उद्योगों के लिये आरक्षित किया गया है, जो सीधे स्थानीय विनिर्माण पारिस्थितिक तंत्र को बढ़ावा देता है।
  • संस्थागत ढाँचा: संचालन और खरीद में एकीकरण (जॉइंटनेस) को बढ़ावा देने के लिये रक्षा प्रमुख (CDS) और सैन्य मामलों के विभाग (DMA) का निर्माण।
  • सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ: खरीद को सशक्त रूप से स्वदेशी स्रोतों की ओर मोड़ने के लिये सैकड़ों हथियारों, प्लेटफॉर्मों और उप-प्रणालियों के आयात पर प्रतिबंध लगाना।
  • नवाचार पारिस्थितिक तंत्र: iDEX (रक्षा उत्कृष्टता के लिये नवाचार) और मेक-I/II फ्रेमवर्क जैसे प्लेटफॉर्म स्टार्ट-अप और निजी फर्मों को विशेष रूप से AI, ड्रोन और अंतरिक्ष-आधारित ISR (खुफिया, निगरानी और टोही) में अनुसंधान एवं विकास में भाग लेने में सक्षम बना रहे हैं।
  • डिफेंस कॉरिडोर और निर्यात: उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर स्थापित किये गए हैं। 
    • परिणामस्वरूप, रक्षा निर्यात में तेज़ी से वृद्धि हुई है, सरकार ने वित्त वर्ष 29 तक 50,000 करोड़ रुपये के निर्यात का लक्ष्य रखा है।

भारत के रक्षा बलों के 'विज़न 2047' को साकार करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • थिएटरीकरण और एकीकरण में तेज़ी लाना: संरचनात्मक सुधारों के लिये संस्थागत विरोध को कम करना सर्वोपरि है। संसाधनों को एकत्रित करने और निर्बाध अंतर-संचालन सुनिश्चित करने के लिये एकीकृत थिएटर कमांड (ITC) के फास्ट रोलआउट को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
  • तकनीकी संप्रभुता की ओर उन्मुख होना: एक असेंबलर से नवप्रवर्तक बनने के लिये भारत को रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 के तहत महत्त्वपूर्ण "चोकप्वाइंट" प्रौद्योगिकियों में आक्रामक रूप से स्वदेशी विकास को अपनाना चाहिये।
    • इसके लिये निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना और गहन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों को सुरक्षित करना आवश्यक है।
  • बेहतरीन खरीद मॉडल की स्थापना: पारंपरिक नौकरशाही अधिग्रहण चक्र उभरती प्रौद्योगिकियों के तीव्र जीवनचक्र के लिये बहुत धीमा है।
    • भारत को विशेष रूप से सॉफ्टवेयर, AI और साइबर उपकरणों के लिये डिज़ाइन किया गया एक "बेहतरीन अधिग्रहण मार्ग" (अजाइल एक्विजिशन पाथवे) लागू करना चाहिये।
  • बजट पुनर्संगठन और नवाचारपूर्ण वित्तपोषण: तत्काल ध्यान मौजूदा पूंजी का अधिकतम उपयोग करने पर होना चाहिये।
    • इसमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) जैसे वैकल्पिक वित्तपोषण मॉडल की खोज और डिफेंस बॉण्ड्स का उपयोग शामिल है।
  • विशेषीकृत मानव पूंजी का विकास: डेटा-आधारित युद्ध तकनीक की ओर संक्रमण के लिये मानव संसाधन प्रबंधन में मूलभूत बदलाव आवश्यक हैं।
    • सैनिक बल को AI और संज्ञानात्मक युद्ध में विशेषज्ञों को गतिशील रूप से भर्ती और बनाए रखने की आवश्यकता है तथा इसके लिये सिविलियन तकनीकी विशेषज्ञों के लिये पार्श्व-प्रवेश (Lateral Entry) के मार्ग भी स्थापित किये जा सकते हैं।
  • भूराजनीतिक निर्यात विस्तार: एक विकसित घरेलू औद्योगिक आधार आकार की अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भर करता है।
    • भारत को अपनी हाल की निर्यात सफलता का लाभ उठाते हुए, अपनी अनुभवी स्वदेशी सैन्य प्रणालियों का वैश्विक दक्षिण के मित्र राष्ट्रों में सक्रिय रूप से विपणन करना चाहिये।

निष्कर्ष


‘रक्षा बल विज़न 2047’ यह साहसिक और आवश्यक मान्यता है कि भविष्य की युद्ध जीत केवल युद्धक्षेत्र में नहीं बल्कि तकनीकी इनक्यूबेटरों और असेंबली लाइनों में भी तय होगी। खरीदारी में अंतराल को समाप्त करके, संयुक्त कार्य को लागू करके तथा तकनीकी स्वाधीनता सुनिश्चित करके भारत एक ऐसा सैन्य तंत्र विकसित कर सकता है जो न केवल सीमाओं की रक्षा करता है, बल्कि एक तेज़ी से बदलते बहुध्रुवीय विश्व में अपने विरोधियों को प्रभावी रूप से निरुत्साहित भी करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. रक्षा बल विज़न 2047 क्या है?
यह भारत की सेना को तकनीकी रूप से उन्नत, एकीकृत और मल्टी-डोमेन फाॅर्स में बदलने का एक रणनीतिक रोडमैप है, जिसे वर्ष 2047 में स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

2. रक्षा बल विज़न 2047 के तीन चरण कौन-से हैं?
इस रोडमैप में क्रमशः ‘संक्रमण का युग’ (2030 तक), ‘संगठन का युग’ (2030-2040) और ‘उत्कृष्टता का युग’ (2040-2047) शामिल हैं, जो धीरे-धीरे एक विश्व-स्तरीय सैन्य बल के निर्माण के लिये है।

3. मिशन सुदर्शन चक्र क्या है?
इसका उद्देश्य बैलिस्टिक मिसाइल और वायु रक्षा प्रणालियों का विस्तार करना है ताकि भारत के सामरिक ढाँचे और नागरिक केंद्रों को वायुगामी जोखिमों से बचाने के लिये बहु-स्तरीय ढाल बनाई जा सके।

4. भारत के लिये रक्षा स्वदेशीकरण क्यों महत्त्वपूर्ण है?
हथियारों के आयात पर निर्भरता कम करने से रणनीतिक स्वायत्तता, घरेलू उद्योग और दीर्घकालिक सैन्य तैयारी सुदृढ़ होती है।

5. भारत के रक्षा आधुनिकीकरण को प्रभावित करने वाली प्रमुख चुनौती क्या है?
भारत विश्व के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक बना हुआ है, जबकि जेट इंजन और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में खरीद में देरी और तकनीकी अंतर आधुनिकीकरण की गति को धीमा कर देते हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. रक्षा बल विज़न 2047 केवल सैन्य आधुनिकीकरण योजना नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा को आर्थिक विकास के साथ एकीकृत करने वाली एक उच्च-स्तरीय रणनीति है। चर्चा कीजिये।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स 

प्रश्न. S-400 हवाई रक्षा प्रणाली विश्व में इस समय उपलब्ध अन्य किसी प्रणाली की तुलना में किस प्रकार से तकनीकी रूप से श्रेष्ठ है? (2021)

प्रश्न. रक्षा क्षेत्रक में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) को अब उदारीकृत करने की तैयारी है। भारत की रक्षा और अर्थव्यवस्था पर अल्पकाल और दीर्घकाल में इसके क्या प्रभाव अपेक्षित हैं? (2014)


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

ज़ियाओकांग विलेज तथा भारत की सीमा सुरक्षा

प्रिलिम्स के लिये: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC), सलामी-स्लाइसिंग रणनीति, राजनीतिक मापदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों पर 2005 का भारत-चीन समझौता, सिलीगुड़ी कॉरिडोर, वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम, ज़ोजिला सुरंग, सेला सुरंग, सीमा सड़क संगठन (BRO), न्योमा एयरबेस, पीएम गतिशक्ति योजना                  

मेन्स के लिये: ज़ियाओकांग बॉर्डर डिफेंस विलेज और भारत को होने वाले खतरों से संबंधित प्रमुख तथ्य। सीमा अवसंरचना को सुदृढ़ करने हेतु भारत द्वारा उठाए गए आवश्यक कदम।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

भारत के सैन्य नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ तेज़ी से निर्मित किये जा रहे 628 ज़ियाओकांग विलेज, जिनमें से लगभग 90% अरुणाचल प्रदेश की दिशा में स्थित हैं, वास्तव में नागरिक बसावट के माध्यम से अपने क्षेत्रीय दावों को सुदृढ़ करने की एक सामरिक रणनीति है।

  • विवादित क्षेत्रों में निर्मित ये द्वि-उपयोगी (नागरिक–सैन्य) विलेज वस्तुतः स्थायी एवं सुदृढ़ चौकियों के रूप में कार्य करते हैं, जो दीर्घकाल में भारत की सुरक्षा तथा संप्रभुता के लिये एक गंभीर चुनौती उत्पन्न कर सकते हैं।

सारांश:

  • चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ 628 द्वि-उपयोगी ज़ियाओकांग विलेज का निर्माण कर रहा है, जिनके माध्यम से वह “सलामी-स्लाइसिंग” रणनीति द्वारा अपने क्षेत्रीय दावों को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है।
  • ये बस्तियाँ सैन्य–नागरिक उद्देश्यों के एकीकरण, निरंतर निगरानी तथा सीमा क्षेत्रों में उपस्थिति को सुदृढ़ करने में सहायक हैं, जिससे भारत की उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर दबाव बढ़ता है।
  • इसके प्रत्युत्तर में भारत वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम तथा अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे जैसी परियोजनाओं को तीव्र गति से आगे बढ़ा रहा है, ताकि अपनी सामरिक अवसंरचना और प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ किया जा सके।

ज़ियाओकांग बॉर्डर डिफेंस विलेज क्या हैं?

  • परिचय: चीनी “ज़ियाओकांग” विलेज उन विशेष सीमा बस्तियों को संदर्भित करते हैं जिन्हें मुख्यतः तिब्बत ऑटोनॉमस रीजन में विवादित सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ निर्मित अथवा उन्नत किया गया है। “ज़ियाओकांग” शब्द का अर्थ है “मध्यम रूप से समृद्ध” या “संपन्न”
  • विस्तार एवं निवेश: यह परियोजना वर्ष 2017 में तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की सरकार द्वारा प्रारंभ की गई थी। इसके अंतर्गत 21 सीमावर्ती काउंटी में कुल 628 विलेज का विकास किया जा रहा है, जिसमें लगभग 30 बिलियन युआन का सरकारी निवेश किया गया है।
  • द्वि-उपयोगी कार्यप्रणाली: यद्यपि इसे ग्रामीण क्षेत्रों के पुनरुत्थान की पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया है, किंतु ये बस्तियाँ द्वि-उपयोगी अवसंरचना के रूप में कार्य करती हैं। आवश्यकता पड़ने पर यहाँ पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के सैनिकों को ठहराया जा सकता है तथा विवादित क्षेत्रों में त्वरित सैन्य तैनाती और गतिशीलता को सुगम बनाया जा सकता है।
  • विधिक एवं सामरिक ढाँचा: इन विलेज का निर्माण चाइना लैंड बॉर्डर लॉ, 2022 द्वारा समर्थित है, जो सीमा सुरक्षा को सुदृढ़ करने तथा सीमा रक्षा को सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ समन्वित करने पर बल देता है।
    • इस प्रकार यह पहल “विलेज की दीवार” के रूप में कार्य करती है, जो ग्रे-ज़ोन रणनीतियों के माध्यम से वास्तविक नियंत्रण और क्षेत्रीय दावों को मज़बूत करने का प्रयास करती है।
  • जनसांख्यिकीय परिवर्तन: इस पहल का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के आधारभूत नियंत्रण को सुदृढ़ करना, सीमा-पार गतिविधियों की निगरानी करना तथा तिब्बत में सिनिकीकरण (चीनी संस्कृति और पहचान को बढ़ावा देना) को प्रोत्साहित करना है।
  • अवसंरचनात्मक परिष्करण: इन बस्तियों में केवल आवास ही नहीं, बल्कि आधुनिक सुविधाएँ, जैसे– सड़कें, विद्युत् आपूर्ति, जलापूर्ति और संचार नेटवर्क भी विकसित किये गए हैं, जिनकी पुष्टि प्रायः उपग्रह चित्रों के माध्यम से की जाती है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा 

  • परिचय: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) एक अवधारणात्मक तथा वास्तविक नियंत्रण पर आधारित सीमांकन रेखा है, जो भारत के नियंत्रण वाले क्षेत्र और चीन के नियंत्रण वाले क्षेत्र को अलग करती है। औपचारिक अंतर्राष्ट्रीय सीमा के अभाव में यह मुख्यतः 1962 के भारत–चीन युद्ध के बाद की सैन्य स्थितियों के आधार पर विकसित हुई।
  • उत्पत्ति: इस अवधारणा का प्रस्ताव पहली बार वर्ष 1959 में चीन के प्रधानमंत्री झोउ एनलाई ने रखा था। प्रारंभ में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे अस्वीकार कर दिया था, परंतु बाद में क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य से भारत ने वर्ष 1993 के बॉर्डर पीस एंड ट्रैंक्विलिटी एग्रीमेंट (BPTA) के अंतर्गत इसे औपचारिक रूप से स्वीकार किया।
  • क्षेत्रीय विभाजन: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है— पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख/अक्साई चिन), जहाँ सबसे अधिक तनाव देखा जाता है; मध्य क्षेत्र (उत्तराखंड/हिमाचल प्रदेश), जो अपेक्षाकृत सबसे कम विवादित क्षेत्र है तथा पूर्वी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश/सिक्किम), जो मुख्यतः मैकमोहन रेखा का अनुसरण करता है।
    • पूर्वी क्षेत्र में भारत वर्ष 1914 के शिमला सम्मेलन में निर्धारित मैकमोहन रेखा को सीमा के रूप में स्वीकार करता है, जबकि चीन इसकी कानूनी वैधता को अस्वीकार करता है और अरुणाचल प्रदेश को “दक्षिण तिब्बत” कहकर संबोधित करता है।
  • धारणा संबंधी अंतर (परसेप्शन गैप):  संघर्ष का एक प्रमुख कारण LAC की लंबाई को लेकर मतभेद है। भारत के अनुसार इसकी लंबाई लगभग 3,488 किमी. है, जबकि चीन इसे लगभग 2,000 किमी. मानता है। इस अंतर के कारण कई क्षेत्रों में ग्रे ज़ोन में दावों का ओवरलैप होता है।
  • संघर्ष के क्षेत्र: हिमालयी क्षेत्र के दुर्गम भूभाग और अस्पष्ट सीमांकन के कारण कई स्थानों पर आमने-सामने की स्थिति उत्पन्न होती रहती है, जैसे- डेपसांग मैदान, गलवान घाटी, वान वैली, पैंगोंग त्सो झील तथा तवांग

ज़ियाओकांग बॉर्डर डिफेंस विलेज भारत के लिये किस प्रकार खतरा उत्पन्न करते हैं? 

  • क्षेत्रीय दावा: विवादित क्षेत्रों में ‘स्थायी आबादी’ स्थापित करके चीन का उद्देश्य अपने भूमि सीमा कानून (2022) के तहत कानूनी दावों को मज़बूत करना है और पूर्ण पैमाने पर संघर्ष को भड़काए बिना यथास्थिति को बदलने के लिये ‘सलामी-स्लाइसिंग’ रणनीति का उपयोग करना है।
  • द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन: इन व्याख्याओं को वर्ष 2005 के भारत-चीन राजनीतिक मापदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों पर हुए समझौते का उल्लंघन माना जाता है। विशेष रूप से ये व्याख्याएँ पारस्परिक सुरक्षा और सीमा पर शांति एवं स्थिरता बनाए रखने से संबंधित समझौते के अनुच्छेदों को कमज़ोर करती हैं।
  • द्वि-उपयोगी अवसंरचना: ज़ियाओकांग और माजिदुनकुन जैसे स्थलों पर बस्तियाँ अग्रिम परिचालन अड्डों के रूप में कार्य करती हैं, जिनमें मज़बूत रसद, संचार नेटवर्क एवं PLA की तैनाती और लामबंदी के लिये डिज़ाइन किये गए आवास शामिल हैं।
  • सैन्य-नागरिक विलय: इन बस्तियों के निवासी राज्य की “आँख और कान” के रूप में कार्य करते हैं। वे एक नागरिक सीमा-रक्षा बल का निर्माण करते हैं, जो निरंतर निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी और भारतीय गतिविधियों के विरुद्ध खुफिया जानकारी एकत्र करने का कार्य करता है।
  • स्ट्रेजिक प्रेशर पॉइंट: तवांग और सिलीगुड़ी कॉरिडोर ('चिकन नेक') जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के निकट इन गाँवों की अवस्थिति भारत के उत्तर-पूर्वी संपर्क मार्ग पर निरंतर भू-सामरिक दबाव बनाए रखती है।"
  • मनोवैज्ञानिक युद्ध: चीनी विलेज/गाँवों का प्रत्यक्ष आधुनिकीकरण भारतीय सीमावर्ती समुदायों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालने के उद्देश्य से किया गया है। यह असमानता भारतीय पक्ष में 'सापेक्ष उपेक्षा' की धारणा उत्पन्न कर सकती है, जो परोक्ष रूप से चीन के 'बेहतर शासन' के नैरेटिव (विमर्श) का समर्थन करती है।

भारत को अपनी सीमा अवसंरचना सुदृढ़ करने हेतु कौन-से कदम उठाने चाहिये?

  • स्ट्रैटेजिक लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी: सभी मौसम में सेना की तैनाती और निर्बाध लॉजिस्टिक्स/रसद सुनिश्चित करने के लिये भारत-चीन सीमा सड़क (ICBR) कार्यक्रम के तीसरे चरण और 1,840 किमी. लंबे अरुणाचल फ्रंटियर हाइवे जैसी प्रमुख परियोजनाओं को तीव्र गति से आगे बढ़ाना आवश्यक है।
  • नागरिक-प्रमुख रक्षा: 1,954 बॉर्डर विलेज को आत्मनिर्भर केंद्रों में बदलने के लिये वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम (दूसरा चरण) का विस्तार करना आवश्यक है, जिससे पलायन को प्रभावी ढंग से रोका जा सके और LAC के साथ एक ‘नागरिक निगरानी परत’  (Civilian Monitoring Layer) स्थापित की जा सके।
  • उच्च तुंगता अवसंरचना: मौसमी अलगाव को समाप्त करने और भारी हथियारों की त्वरित आवाजाही को सुगम बनाने हेतु रणनीतिक सुरंगों (जैसे– ज़ोज़िला, सेला) और सभी मौसम वाले रेल संपर्कों के निर्माण को प्राथमिकता देनी चाहिये।
  • वायवीय और बहुमाध्यमीय तत्परता: भारी परिवहन संचालन और उच्च-रिज़ॉल्यूशन वायवीय टोही का समर्थन करने के लिये न्योमा एयरबेस जैसे उन्नत लैंडिंग ग्राउंड (ALG) का उन्नयन करना और हेलिपैड नेटवर्क का विस्तार करना चाहिये।
  • प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी एकीकरण: निरंतर परिस्थितिजन्य जागरूकता बनाए रखने के लिये 150+ नए उपग्रह संसाधनों, AI-संचालित विश्लेषण और ड्रोन का उपयोग करते हुए बहु-स्तरीय ISR (इंटेलिजेंस, सर्वेक्षण और टोही) ढाँचे को लागू किया जाए।
  • ऊर्जा और संस्थागत समन्वय: अग्रिम चौकियों के लिये नवीकरणीय ऊर्जा माइक्रो-ग्रिड्स लागू करना जिससे रसद में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित हो और BRO परियोजनाओं के लिये अंतर-मंत्रालयीय अनुमोदन को तेज़ी से पूर्ण करने हेतु पीएम गति शक्ति ढाँचे का अधिकतम उपयोग किया जाए।
  • राजनयिक निरोध: अनपेक्षित घटनाओं में वृद्धि को रोकने के लिये परामर्श तथा समन्वय के कार्य तंत्र (WMCC) के माध्यम से निरंतर संवाद बनाये रखते हुए इसे भौतिक अवसंरचना के विकास के साथ समन्वित किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

सीमावर्ती क्षेत्रों में चीन के शियाओकांग विलेज नागरिक बसावट, अवसंरचना विकास तथा सैन्य तैयारियों के एक रणनीतिक संयोजन को दर्शाते हैं, जिसका उद्देश्य वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ क्षेत्रीय दावों को प्रबल करना है। भारत के लिये यह विकास सीमा अवसंरचना, निगरानी और स्थानीय जनसंख्या की सुभेद्यता को सुदृढ़ करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है, ताकि संप्रभुता की रक्षा की जा सके और संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में रणनीतिक संतुलन बनाए रखा जा सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. चीन के ‘शियाओकांग’ बॉर्डर विलेज के भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय संप्रभुता पर रणनीतिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. शियाओकांग बॉर्डर डिफेंस विलेज क्या हैं?
शियाओकांग विलेज तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में बनाए गए विलेज हैं, जिनका उद्देश्य आर्थिक विकास को बढ़ावा देना और सीमा रक्षा को सुदृढ़ करना है। ये अक्सर नागरिक-सैनिक दोनों उद्देश्यों के लिये कार्य करते हैं।

2. शियाओकांग विलेज के निर्माण का समर्थन कौन-सा कानून करता है?
चीन भूमि सीमा कानून, 2022 सीमा रक्षा को दृढ़ करने, अवसंरचना विकसित करने और सीमावर्ती क्षेत्रों में नागरिक बसावट को प्रोत्साहित करने का निर्देश देता है।

3. चीन की बॉर्डर विलेज रणनीति पर भारत की प्रतिक्रिया क्या है?
भारत ने वाइब्रेंट विलेजेज़ प्रोग्राम शुरू किया, जिसका उद्देश्य बॉर्डर विलेज का विकास करना, अवसंरचना सुदृढ़ करना और सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या बनाए रखना है।

4. सीमा विवादों में ‘ग्रे-ज़ोन रणनीति’ का क्या अर्थ है?
ग्रे-ज़ोन रणनीति में क्रमिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं, जैसे– अवसंरचना विकास या नागरिक बसावट जो क्षेत्रीय नियंत्रण को बदल देती हैं लेकिन खुले संघर्ष को उत्पन्न नहीं करतीं।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में देखा जाने वाला ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’  का उल्लेख किसके संदर्भ में किया जाता है? (2016) 

(a) अफ्रीकी संघ

(b) ब्राज़ील

(c) यूरोपीय संघ

(d) चीन

उत्तर: (d)


प्रश्न. भारतीय सेना के अधिकारियों और निम्नलिखित में से किस देश की सेना के अधिकारियों द्वारा संयुक्त आतंकवाद-रोधी सैन्य प्रशिक्षण 'हैंड-इन-हैंड 2007' आयोजित किया गया था? (2008)

(a) चीन

(b) जापान

(c) रूस

(d) अमेरिका

उत्तर: (a)


मेन्स 

प्रश्न. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) को चीन की बड़ी 'वन बेल्ट वन रोड' पहल के मुख्य उपसमुच्चय के रूप में देखा जाता है। CPEC का संक्षिप्त विवरण दीजिये और उन कारणों का उल्लेख कीजिये जिनकी वज़ह से भारत ने खुद को इससे दूर किया है। (2018)


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