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भारत के रक्षा बलों का विज़न 2047

  • 16 Mar 2026
  • 86 min read

प्रिलिम्स के लिये: क्वांटम सेंसिंग, मिशन सुदर्शन चक्र, एकीकृत थिएटर कमांड, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, रक्षा औद्योगिक गलियारा, iDEX (रक्षा उत्कृष्टता के लिये नवाचार)

मेन्स के लिये: भारत के रक्षा बलों का विज़न 2047, भारत में रक्षा आधुनिकीकरण और सैन्य सुधार।

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स

चर्चा में क्यों? 

भारत के रक्षा मंत्री ने 'रक्षा बलों का विज़न 2047: भविष्य के लिये तैयार भारतीय सेना का रोडमैप' का अनावरण किया। हेडक्वार्टर्स इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (HQ IDS) द्वारा तैयार यह विज़न दस्तावेज़, भारत की स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारतीय सेना को एक एकीकृत, गतिशील और बहु-क्षेत्रीय बल में बदलने की एक व्यापक रणनीति की रूपरेखा तैयार करता है।

सारांश

  • रक्षा बलों का विज़न 2047 भारत की सेना को एक तकनीकी रूप से उन्नत, एकीकृत और बहु-क्षेत्रीय बल में बदलने का एक दीर्घकालिक रोडमैप है। यह AI, ड्रोन, साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं के माध्यम से थलसेना, नौसेना एवं वायुसेना के बीच संयुक्तता को मज़बूत करने पर केंद्रित है।
  • यह रणनीति सैन्य आधुनिकीकरण को रक्षा स्वदेशीकरण और आर्थिक विकास से जोड़ती है, जिसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू रक्षा विनिर्माण को मज़बूत करना और वर्ष  2047 तक एक आत्मनिर्भर, विश्व-स्तरीय सैन्य बल का निर्माण करना है।

'रक्षा बलों का विज़न 2047' क्या है?

  • परिचय: यह दस्तावेज़ एक “समग्र रणनीति” के रूप में कार्य करता है, जो स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि 21वीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा केवल प्रत्यक्ष युद्धक्षेत्र क्षमताओं पर ही नहीं, बल्कि औद्योगिक क्षमता और तकनीकी पारिस्थितिक तंत्र पर भी समान रूप से निर्भर करती है।
  • तीन मुख्य स्तंभ:
    • तकनीकी उन्नति: युद्ध क्षेत्र में बढ़त बनाए रखने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वायत्त प्रणालियों, क्वांटम सेंसिंग और उन्नत निगरानी तकनीकों का लाभ उठाना।
    • संयुक्तता और तालमेल: दोहराव से बचने तथा संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने के लिये थलसेना, नौसेना एवं वायुसेना के बीच परिचालन तालमेल को गहरा करना।
    • बहु-क्षेत्रीय क्षमता: पारंपरिक (भूमि, समुद्र, वायु) और उभरते क्षेत्रों (साइबर, अंतरिक्ष, संज्ञानात्मक) में निर्बाध रूप से संचालन करने में सक्षम।
  • मुख्य प्रस्ताव और संरचनात्मक सुधार:
    • विशेषीकृत अगली पीढ़ी के बल: इस रोडमैप में स्पेस कमांड, साइबर कमांड, डेटा फोर्स, ड्रोन फोर्स और कॉग्निटिव वॉरफेयर एक्शन फोर्स सहित समर्पित संरचनाओं के निर्माण का प्रस्ताव है।
    • सिद्धांतगत बदलाव: नेट-सेंट्रिक युद्ध से डेटा-सेंट्रिक युद्ध की ओर संक्रमण का प्रस्ताव करता है। इसका उद्देश्य युद्धक्षेत्र में “सूचना श्रेष्ठता” से “निर्णय श्रेष्ठता” की स्थिति में पहुँचना है।
    • मिशन सुदर्शन चक्र: मिशन सुदर्शन चक्र के तहत, इस दृष्टि में भारत की रणनीतिक, आर्थिक और नागरिक संपत्तियों को बदलते हुए हवाई खतरों से सुरक्षित करने के लिये बैलिस्टिक मिसाइल और वायु रक्षा प्रणालियों का विस्तार करने का प्रस्ताव रखा गया है।
    • चरणबद्ध कार्यान्वयन: यह विज़न तीन-चरणीय संक्रमण की रूपरेखा तैयार करता है, जिसमें अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक प्राथमिकताओं की पहचान की गई है। इसका समापन 2040 तथा 2047 के बीच एक 'विश्व स्तरीय सैन्य शक्ति' के निर्माण के साथ होगा।
      • ‘संक्रमण का युग’ (2030 तक): सेना का पुनर्गठन, प्रभावी निवारक क्षमता का सुदृढ़ीकरण और ड्रोन जैसी स्वदेशी तकनीकों को बढ़ावा देना।
      • ‘सशक्तीकरण का युग’ (2030–2040): साइबर और अंतरिक्ष युद्ध को एकीकृत करना और परतदार वायु-मिसाइल रक्षा प्रणाली का विकास करना।
      • ‘उत्कृष्टता का युग’ (2040–2047): एक पूरी तरह एकीकृत, आत्मनिर्भर और सभी क्षेत्रों में सक्षम सैन्य बल का निर्माण करना।

महत्त्व

  • युद्ध की बदलती प्रकृति: संघर्ष (अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध) दिखाते हैं कि कैसे ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन और साइबर हमले आधुनिक युद्ध के मैदानों पर हावी हैं। यह दृष्टिकोण भारत को हाइब्रिड, प्रॉक्सी और "ग्रे-ज़ोन" वॉर के लिये तैयार करता है।
  • भू-राजनीतिक वास्तविकता: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के बढ़ते सामरिक हित, निरंतर सीमा तनाव के साथ मिलकर, एक सख्त रक्षात्मक रुख से सक्रिय निरोध की ओर बदलाव की आवश्यकता रखते हैं।
  • आर्थिक-सुरक्षा संबंध: सैन्य रोडमैप को वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के साथ जोड़कर सरकार स्वीकार करती है कि सैन्य आधुनिकीकरण आयात द्वारा टिकाऊ नहीं हो सकता; इसके लिये एक उभरते घरेलू औद्योगिक आधार की आवश्यकता है।

भारत के रक्षा क्षेत्र में क्या चुनौतियाँ हैं?

  • आयात पर भारी निर्भरता: भारत विश्व के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक बना हुआ है, जो वर्ष 2021–25 के दौरान वैश्विक हथियार आयात का लगभग 8.2–8.3% हिस्सा रखता है, जो सिप्री (SIPRI) के अ+नुसार इसे विश्व का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बनाता है।
    • एकमात्र रूस अभी भी भारत के हथियार आयात का लगभग 40% आपूर्ति करता है, उसके बाद फ्राँस, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका का स्थान है।
    • भारत लगभग 70–75% रक्षा उपकरण घरेलू स्तर पर उत्पादित करता है, जिसका अर्थ है कि एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा अभी भी आयात पर निर्भर है।
  • बजट संबंधी दबाव: भारत का रक्षा व्यय सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.9–2.2% है, एक बड़ा हिस्सा आधुनिकीकरण और पूंजी अधिग्रहण के बजाय वेतन और पेंशन पर निर्भर है।
  • विलंबित संरचनात्मक सुधार: इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड (ITC) के रोलआउट को इंटर-सर्विस फ्रिक्शन और संस्थागत विरोध का सामना करना पड़ा है।
  • खरीद का कम होना और तकनीकी अंतराल: नौकरशाही की विलंब और जटिल खरीद प्रक्रिया प्रायः रक्षा अधिग्रहण को धीमा कर देती है, हालाँकि भारत के पास अभी भी जेट इंजन, उन्नत सेमीकंडक्टर और स्टील्थ सिस्टम जैसी महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों की कमी है, जो सैन्य आधुनिकीकरण को प्रभावित करती है।
  • तकनीकी असममिति: भारत अभी भी उन्नत जेट इंजन और सेमीकंडक्टर चिप्स जैसी महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिये विदेशी मूल के उपकरण निर्माताओं (OEM) पर भारी मात्रा में निर्भर है।

रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने के लिये क्या उपाय किये गए हैं?

  • पूंजी बजट आवंटन: वित्त वर्ष 2026-27 में घरेलू उद्योग से खरीद के लिये पूंजी अधिग्रहण बजट का लगभग 75% घरेलू रक्षा उद्योगों के लिये आरक्षित किया गया है, जो सीधे स्थानीय विनिर्माण पारिस्थितिक तंत्र को बढ़ावा देता है।
  • संस्थागत ढाँचा: संचालन और खरीद में एकीकरण (जॉइंटनेस) को बढ़ावा देने के लिये रक्षा प्रमुख (CDS) और सैन्य मामलों के विभाग (DMA) का निर्माण।
  • सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ: खरीद को सशक्त रूप से स्वदेशी स्रोतों की ओर मोड़ने के लिये सैकड़ों हथियारों, प्लेटफॉर्मों और उप-प्रणालियों के आयात पर प्रतिबंध लगाना।
  • नवाचार पारिस्थितिक तंत्र: iDEX (रक्षा उत्कृष्टता के लिये नवाचार) और मेक-I/II फ्रेमवर्क जैसे प्लेटफॉर्म स्टार्ट-अप और निजी फर्मों को विशेष रूप से AI, ड्रोन और अंतरिक्ष-आधारित ISR (खुफिया, निगरानी और टोही) में अनुसंधान एवं विकास में भाग लेने में सक्षम बना रहे हैं।
  • डिफेंस कॉरिडोर और निर्यात: उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर स्थापित किये गए हैं। 
    • परिणामस्वरूप, रक्षा निर्यात में तेज़ी से वृद्धि हुई है, सरकार ने वित्त वर्ष 29 तक 50,000 करोड़ रुपये के निर्यात का लक्ष्य रखा है।

भारत के रक्षा बलों के 'विज़न 2047' को साकार करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • थिएटरीकरण और एकीकरण में तेज़ी लाना: संरचनात्मक सुधारों के लिये संस्थागत विरोध को कम करना सर्वोपरि है। संसाधनों को एकत्रित करने और निर्बाध अंतर-संचालन सुनिश्चित करने के लिये एकीकृत थिएटर कमांड (ITC) के फास्ट रोलआउट को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
  • तकनीकी संप्रभुता की ओर उन्मुख होना: एक असेंबलर से नवप्रवर्तक बनने के लिये भारत को रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 के तहत महत्त्वपूर्ण "चोकप्वाइंट" प्रौद्योगिकियों में आक्रामक रूप से स्वदेशी विकास को अपनाना चाहिये।
    • इसके लिये निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना और गहन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों को सुरक्षित करना आवश्यक है।
  • बेहतरीन खरीद मॉडल की स्थापना: पारंपरिक नौकरशाही अधिग्रहण चक्र उभरती प्रौद्योगिकियों के तीव्र जीवनचक्र के लिये बहुत धीमा है।
    • भारत को विशेष रूप से सॉफ्टवेयर, AI और साइबर उपकरणों के लिये डिज़ाइन किया गया एक "बेहतरीन अधिग्रहण मार्ग" (अजाइल एक्विजिशन पाथवे) लागू करना चाहिये।
  • बजट पुनर्संगठन और नवाचारपूर्ण वित्तपोषण: तत्काल ध्यान मौजूदा पूंजी का अधिकतम उपयोग करने पर होना चाहिये।
    • इसमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) जैसे वैकल्पिक वित्तपोषण मॉडल की खोज और डिफेंस बॉण्ड्स का उपयोग शामिल है।
  • विशेषीकृत मानव पूंजी का विकास: डेटा-आधारित युद्ध तकनीक की ओर संक्रमण के लिये मानव संसाधन प्रबंधन में मूलभूत बदलाव आवश्यक हैं।
    • सैनिक बल को AI और संज्ञानात्मक युद्ध में विशेषज्ञों को गतिशील रूप से भर्ती और बनाए रखने की आवश्यकता है तथा इसके लिये सिविलियन तकनीकी विशेषज्ञों के लिये पार्श्व-प्रवेश (Lateral Entry) के मार्ग भी स्थापित किये जा सकते हैं।
  • भूराजनीतिक निर्यात विस्तार: एक विकसित घरेलू औद्योगिक आधार आकार की अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भर करता है।
    • भारत को अपनी हाल की निर्यात सफलता का लाभ उठाते हुए, अपनी अनुभवी स्वदेशी सैन्य प्रणालियों का वैश्विक दक्षिण के मित्र राष्ट्रों में सक्रिय रूप से विपणन करना चाहिये।

निष्कर्ष


‘रक्षा बल विज़न 2047’ यह साहसिक और आवश्यक मान्यता है कि भविष्य की युद्ध जीत केवल युद्धक्षेत्र में नहीं बल्कि तकनीकी इनक्यूबेटरों और असेंबली लाइनों में भी तय होगी। खरीदारी में अंतराल को समाप्त करके, संयुक्त कार्य को लागू करके तथा तकनीकी स्वाधीनता सुनिश्चित करके भारत एक ऐसा सैन्य तंत्र विकसित कर सकता है जो न केवल सीमाओं की रक्षा करता है, बल्कि एक तेज़ी से बदलते बहुध्रुवीय विश्व में अपने विरोधियों को प्रभावी रूप से निरुत्साहित भी करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. रक्षा बल विज़न 2047 क्या है?
यह भारत की सेना को तकनीकी रूप से उन्नत, एकीकृत और मल्टी-डोमेन फाॅर्स में बदलने का एक रणनीतिक रोडमैप है, जिसे वर्ष 2047 में स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

2. रक्षा बल विज़न 2047 के तीन चरण कौन-से हैं?
इस रोडमैप में क्रमशः ‘संक्रमण का युग’ (2030 तक), ‘संगठन का युग’ (2030-2040) और ‘उत्कृष्टता का युग’ (2040-2047) शामिल हैं, जो धीरे-धीरे एक विश्व-स्तरीय सैन्य बल के निर्माण के लिये है।

3. मिशन सुदर्शन चक्र क्या है?
इसका उद्देश्य बैलिस्टिक मिसाइल और वायु रक्षा प्रणालियों का विस्तार करना है ताकि भारत के सामरिक ढाँचे और नागरिक केंद्रों को वायुगामी जोखिमों से बचाने के लिये बहु-स्तरीय ढाल बनाई जा सके।

4. भारत के लिये रक्षा स्वदेशीकरण क्यों महत्त्वपूर्ण है?
हथियारों के आयात पर निर्भरता कम करने से रणनीतिक स्वायत्तता, घरेलू उद्योग और दीर्घकालिक सैन्य तैयारी सुदृढ़ होती है।

5. भारत के रक्षा आधुनिकीकरण को प्रभावित करने वाली प्रमुख चुनौती क्या है?
भारत विश्व के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक बना हुआ है, जबकि जेट इंजन और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में खरीद में देरी और तकनीकी अंतर आधुनिकीकरण की गति को धीमा कर देते हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. रक्षा बल विज़न 2047 केवल सैन्य आधुनिकीकरण योजना नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा को आर्थिक विकास के साथ एकीकृत करने वाली एक उच्च-स्तरीय रणनीति है। चर्चा कीजिये।

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