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शासन व्यवस्था

राजनीतिक वित्तपोषण में सुधार

प्रिलिम्स के लिये: भारत निर्वाचन आयोग (ECI), निर्वाचन न्यास, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA), FDI नीति, FCRA, 2010, सर्वोच्च न्यायालय, इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998), नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG), शेल कंपनियाँ।                

मेन्स के लिये: राजनीतिक वित्तपोषण पर ADR रिपोर्ट की मुख्य बातें, भारत में राजनीतिक चंदे से संबंधित वैधानिक प्रावधान, लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिये चुनावों में वित्तीय पारदर्शिता की आवश्यकता, भारत में पारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक सुधार।

स्रोत: मिंट

चर्चा में क्यों?

लोकतांत्रिक सुधारों के लिये संघ (ADR) की एक रिपोर्ट वित्त वर्ष 2024-25 के लिये राष्ट्रीय राजनीतिक दलों द्वारा भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को घोषित 20,000 रुपये या उससे अधिक के दान पर केंद्रित है, जो लोकतांत्रिक जवाबदेही की दिशा में प्रयासों को उजागर करती है।

  • इससे पता चला कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान 6,074 करोड़ रुपये का दान प्राप्त हुआ, जो पिछले वर्ष की तुलना में 171% की वृद्धि को दर्शाता है।

सारांश

  • वर्ष 2024-25 की ADR रिपोर्ट राष्ट्रीय दलों के दान में 161% की वृद्धि को उजागर करती है, जिसमें कॉर्पोरेट योगदान कुल का 92% से अधिक है।
  • रिपोर्ट इलेक्टोरल ट्रस्टों के प्रभुत्व और भाजपा के कुल वित्तपोषण में 91% हिस्सेदारी पर बल देती है।
  • यह डेटा लोकतांत्रिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये पारदर्शिता सुधारों और सख्त निर्वाचन आयोग (ECI) की निगरानी की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

राजनीतिक वित्तपोषण/फंडिंग पर ADR रिपोर्ट के मुख्य बिंदु क्या हैं?

  • फंडिंग में भारी वृद्धि: राष्ट्रीय दलों को (20,000 रुपये से अधिक के) कुल दान में 161% की वृद्धि हुई, जो 6,648 करोड़ रुपये हो गया, जिसमें भाजपा का कुल राशि में 91% से अधिक का हिस्सा था।

Political_Funding

  • कॉर्पोरेट फंडिंग का प्रभुत्व: व्यावसायिक क्षेत्रों ने कुल दान का 92.18% योगदान दिया, जबकि व्यक्तिगत दाताओं का हिस्सा केवल 7.61% था।
  • इलेक्टोरल ट्रस्टों की भूमिका: प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट सबसे बड़ा दाता बना हुआ है, जिसने भाजपा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) और आम आदमी पार्टी (AAP) को सामूहिक रूप से 2,413 करोड़ रुपये का योगदान दिया, जिसका एक बड़ा हिस्सा भाजपा के लिये निर्देशित था।
  • भौगोलिक संकेंद्रण: दान की सबसे अधिक मात्रा दिल्ली से आई, उसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात का स्थान था।
  • शून्य-घोषणा प्रवृत्ति: बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने 20,000 रुपये की सीमा से ऊपर शून्य दान घोषित करने का अपना 19-वर्षीय सिलसिला बनाए रखा।

राजनीतिक वित्तपोषण/फंडिंग

  • परिचय: राजनीतिक वित्तपोषण उन तरीकों और स्रोतों को संदर्भित करता है जिनके माध्यम से राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपने परिचालन संबंधी खर्चों, चुनाव अभियानों और पार्टी की गतिविधियों को कवर करने के लिये वित्तीय संसाधन एकत्रित करते हैं।
  • प्राथमिक स्रोत: भारत में राजनीतिक दल आमतौर पर निम्नलिखित चैनलों के माध्यम से धन प्राप्त करते हैं:
    • व्यक्तिगत दान: नागरिकों से स्वैच्छिक योगदान; 2,000 रुपये से अधिक के दान नॉन-कैश मोड (चेक/डिजिटल) के माध्यम से किये जाने चाहिये।
    • कॉर्पोरेट फंडिंग: कंपनियाँ पार्टियों को दान दे सकती हैं, बशर्ते वे अपने लाभ और हानि में कुल राशि का खुलासा करती हों (कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 182)।
    • इलेक्टोरल ट्रस्ट/निर्वाचन न्यास: इलेक्टोरल ट्रस्ट राजनीतिक दलों के लिये कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत दान एकत्र करते हैं (नकद लेनदेन निषिद्ध)। उन्हें वार्षिक निधियों का 95% पंजीकृत दलों को वितरित करना होगा, केवल 5% प्रशासनिक लागतों के लिये रखना होगा।
    • सार्वजनिक/राज्य वित्तपोषण: कुछ देशों में (हालाँकि भारत में पूरी तरह से नहीं), सरकार पिछले चुनावों में उनके प्रदर्शन के आधार पर दलों को धन प्रदान करती है। वर्तमान में, भारत में "अप्रत्यक्ष" राज्य वित्त पोषण है, जैसे– सार्वजनिक प्रसारकों पर मुफ्त प्रसारण समय और पार्टी कार्यालयों के लिये सब्सिडी वाली भूमि
  • पारदर्शिता संबंधी आवश्यकताएँ: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 की धारा 29C के तहत पार्टियों को टैक्स छूट का दावा करने के लिये 20,000 रुपये से अधिक के सभी दान के लिये निर्वाचन आयोग (ECI) को एक "योगदान रिपोर्ट" प्रस्तुत करनी होगी।
  • वैधानिक प्रावधान:
    • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951: धारा 29A अनिवार्य करती है कि प्रत्येक राजनीतिक दल को दान और टैक्स छूट की पात्रता के लिये ECI के साथ पंजीकृत होना चाहिये।
      • धारा 29B राजनीतिक दलों को किसी भी व्यक्ति या कंपनी (सरकारी कंपनियों और विदेशी स्रोतों को छोड़कर) से स्वैच्छिक योगदान स्वीकार करने की अनुमति देती है।
    • आयकर अधिनियम, 1961: धारा 13A पंजीकृत राजनीतिक दलों को स्वैच्छिक योगदान, गृह संपत्ति और पूंजीगत लाभ से आय पर 100% टैक्स छूट प्रदान करती है।
      • धारा 80GGC/80GGB एक पंजीकृत राजनीतिक दल या एक इलेक्टोरल ट्रस्ट को किये गए योगदान के लिये व्यक्तियों (80GGC) और कंपनियों (80GGB) को सकल आय से 100% कटौती की अनुमति देती है, बशर्ते भुगतान नकद में न हो।
    • कंपनी अधिनियम, 2013: धारा 182 के तहत केवल 3 वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में आई कंपनियाँ ही राजनीतिक योगदान कर सकती हैं। सरकारी कंपनियाँ सख्त वर्जित हैं। पहले, औसत शुद्ध लाभ के 7.5% की सीमा थी, लेकिन वित्त अधिनियम, 2017 ने इस सीमा को हटा दिया।
      • कंपनियों को अपने लाभ और हानि में योगदान की कुल राशि और प्राप्तकर्त्ता राजनीतिक दल के नाम का खुलासा करना होगा।
    • विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 2010: धारा 3 स्पष्ट रूप से चुनाव के लिये उम्मीदवारों, विधानमंडलों के सदस्यों और राजनीतिक दलों को किसी भी "विदेशी योगदान" को स्वीकार करने से प्रतिबंधित करती है।
      • हालाँकि वित्त अधिनियम, 2016 और वित्त अधिनियम, 2018 पूर्वव्यापी संशोधनों के तहत एक भारतीय कंपनी को "विदेशी स्रोत" नहीं माना जाता है, भले ही उसके 50% से अधिक शेयर पूंजी एक विदेशी इकाई के पास हो, बशर्ते वह विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA) (और इसके तहत अधिसूचित FDI नीति) के तहत निर्धारित क्षेत्रीय सीमाओं और अन्य सीमाओं का अनुपालन करती है।

भारत में राजनीतिक वित्तपोषण/फंडिंग का परिदृश्य किस प्रकार विकसित हुआ है?

  • वर्ष 2017 से पूर्व का काल: वर्ष 2017 से पूर्व यह व्यवस्था काफी हद तक अनौपचारिक थी। अधिकांश दान नकद में किये जाते थे, जिसमें 20,000 रुपये की रिपोर्टिंग सीमा थी। पार्टियाँ अक्सर प्रकटीकरण से बचने के लिये बड़े दान को छोटे "बेनाम" हिस्सों में तोड़ देती थीं।
    • कंपनियों को पिछले तीन वर्षों के अपने औसत शुद्ध लाभ के 7.5% से अधिक दान करने से प्रतिबंधित किया गया था।
  • इलेक्टोरल बॉन्ड का समय (2018–24): इसने सार्वजनिक पारदर्शिता पर दाता की गोपनीयता को प्राथमिकता दी। जबकि इसने धन को बैंकिंग सिस्टम में सफलतापूर्वक स्थानांतरित कर दिया ("ब्लैक मनी" को कम कर दिया), इसने एक सूचना असममिति उत्पन्न कर दी जहाँ जनता को यह नहीं पता था कि कौन किसे वित्तपोषित कर रहा है।
    • 7.5% कॉर्पोरेट लाभ सीमा को हटा दिया गया और कंपनियों के लिये अपने लाभ और हानि में यह प्रकट करने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया था कि उन्होंने किस पार्टी को वित्तपोषित किया है।
  • सर्वोच्च न्यायालय इलेक्टोरल बॉन्ड निर्णय, 2024: लोकतांत्रिक सुधार संघ एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य मामला 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार दिया। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि बेनामी फंडिंग अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है।
    • न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि असीमित कॉर्पोरेट फंडिंग "संस्थागत भ्रष्टाचार" को जन्म दे सकती है जहाँ नीतियाँ बड़े दाताओं द्वारा प्रभावित होती हैं।
  • वर्तमान परिदृश्य (2025–26): बॉण्ड पर प्रतिबंध के बाद राजनीतिक फंडिंग फिर से तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित हो गई है:
    • चुनावी ट्रस्ट: ये मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं। कंपनियाँ इन ट्रस्टों (जैसे– प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट) को दान देती हैं, जो बाद में इस धनराशि को राजनीतिक दलों में वितरित करते हैं।
    • प्रत्यक्ष कॉर्पोरेट/व्यक्तिगत दान: राजनीतिक दल अब फिर से सीधे चेक और डिजिटल ट्रांसफर के माध्यम से धन प्राप्त कर रहे हैं।
    • डिजिटल रिपोर्टिंग (IEMS): भारत निर्वाचन आयोग (ECI) अब एकीकृत चुनाव प्रबंधन प्रणाली (IEMS) के माध्यम से योगदान रिपोर्टों को ऑनलाइन दाखिल करना अनिवार्य करता है, ताकि ऑडिट प्रक्रिया को तेज़ और अधिक पारदर्शी बनाया जा सके।

चुनावों में वित्तीय पारदर्शिता लोकतांत्रिक जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करती है?

  • ‘क्विड प्रो क्वो’ व्यवस्थाओं को रोकना: पारदर्शिता के अभाव में बड़े कॉर्पोरेट दानदाता राजनीतिक दलों को भारी मात्रा में धन देकर सत्ता में आने के बाद अनुकूल नीतियों, लाइसेंसों या ठेकों के रूप में लाभ प्राप्त कर सकते हैं। पारदर्शिता इन लेन-देन को सार्वजनिक दृष्टि में लाकर ‘राजनीति–कॉर्पोरेट गठजोड़’ पर एक प्रकार का अंकुश लगाती है।
  • समान अवसर सुनिश्चित करना: चुनाव में विचारों की प्रतिस्पर्द्धा होनी चाहिये, न कि धन के ताकत की। धन के स्रोत की जानकारी होने से भारत निर्वाचन आयोग (ECI) खर्च की सीमाओं को बेहतर ढंग से लागू कर सकता है, जिससे ‘वित्तीय होड़’ को रोका जा सके और आम नागरिक को हाशिये पर जाने से बचाया जा सके।
  • राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा: विदेशी संस्थाएँ देश की नीतियों को प्रभावित करने के उद्देश्य से कुछ खास उम्मीदवारों या राजनीतिक दलों को वित्तीय सहायता देने की कोशिश कर सकती हैं। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, 2010 (FCRA, 2010) का कड़ाई से पालन और अनिवार्य पारदर्शिता यह सुनिश्चित करती है कि राजनीतिक दल विदेशी हितों के प्रभाव में न आएँ।
  • ‘सूचित मतदाता’ को सशक्त बनाना: प्रत्येक मतदाता का यह अधिकार है कि वह जाने कि किसी उम्मीदवार के पीछे वित्तीय समर्थन कौन दे रहा है। यदि किसी उम्मीदवार को ऐसे उद्योगों से धन मिल रहा है, जिनसे मतदाता असहमत है (जैसे– तंबाकू या खनन क्षेत्र), तो यह जानकारी उसे सोच-समझकर और तर्कसंगत निर्णय लेने में मदद करती है।
    • जब फंडिंग में पारदर्शिता होती है, तब जनता का जनादेश उम्मीदवार की वास्तविक निष्ठाओं और समर्थन के स्रोतों की स्पष्ट जानकारी पर आधारित होता है।
  • संवैधानिक दृष्टिकोण: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉण्ड योजना को इसलिये रद्द कर दिया क्योंकि इससे राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता प्रभावित हो रही थी। न्यायालय के अनुसार, कालेधन पर अंकुश लगाना भले ही उचित उद्देश्य हो, लेकिन इसके नाम पर पूरी फंडिंग प्रक्रिया को गुमनाम रखना उचित नहीं है।

राजनीतिक वित्तपोषण पर प्रमुख समितियाँ/आयोग

समिति/आयोग

मुख्य केंद्र और सुझाव

तारकुंडे समिति (1974-75)

सिफारिश की गई कि राजनीतिक दलों को अपने ऑडिट किये गए खातों को प्रस्तुत करना अनिवार्य होना चाहिये और भारत निर्वाचन आयोग को एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में स्थापित किया जाना चाहिये।

दिनेश गोस्वामी समिति (1990)

प्रस्तावित आंशिक 'वस्तुगत' राज्य वित्तपोषण (जैसे– ईंधन, स्टेशनरी) और कंपनियों द्वारा दिये जाने वाले दान पर प्रतिबंध का सुझाव, ताकि 'अनुचित गठबंधन' (नेक्सस) को कम किया जा सके।

इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998)

विशेष रूप से 'चुनावों के राज्य वित्तपोषण' पर विचार किया गया। इसमें समान अवसर सुनिश्चित करने के लिये सरकारी सहायता का समर्थन किया गया, लेकिन यह केवल 'मान्यता प्राप्त' दलों हेतु है और वह भी केवल 'वस्तुगत' (In-kind) रूप में होनी चाहिये, न कि नकद (Cash) में।

विधि आयोग (170वीं रिपोर्ट, 1999)

यह तर्क दिया गया कि राज्य द्वारा चुनावी वित्तपोषण “वांछनीय” है, लेकिन केवल तब जब राजनीतिक दलों को अन्य स्रोतों से धन लेने पर सख्ती से प्रतिबंध हो और उनके भीतर आंतरिक लोकतंत्र सुनिश्चित किया जाए।

भारत में पारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण सुनिश्चित करने के लिये कौन-से सुधार आवश्यक हैं?

  • अनिवार्य और त्वरित (रियल-टाइम) प्रकटीकरण: अभी राजनीतिक दल केवल ₹20,000 से अधिक के व्यक्तिगत चंदों की ही वार्षिक रिपोर्ट देते हैं। इस सीमा को घटाकर (जैसे– ₹2,000) करना चाहिये, ताकि बड़े दान को कई छोटे, गुमनाम हिस्सों में बांटकर छिपाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके।
  • चुनावों का राज्य वित्तपोषण (वस्तु के रूप में): इंद्रजीत गुप्त समिति (1998) ने 'आंशिक राज्य वित्तपोषण' का प्रस्ताव दिया था, जिसमें नकद राशि देने के बजाय वस्तुगत सुविधाएँ प्रदान करने की बात कही गई थी। इसमें मीडिया पर मुफ्त प्रसारण समय, वाहनों के लिये ईंधन, पोस्टरों हेतु कागज़ और बिना किराए के कार्यालय स्थान जैसी सुविधाएँ शामिल थीं।
    • कुछ विशेषज्ञ एक केंद्रीकृत फंड (चुनावी ट्रस्ट के समान) की स्थापना का सुझाव देते हैं, जिसमें कॉर्पोरेट बिना किसी विशेष दल का चयन किये गुमनाम रूप से योगदान कर सकें। इसके बाद भारत निर्वाचन आयोग (ECI) इन धनराशियों का वितरण राजनीतिक दलों को उनके पिछले मत प्रतिशत के आधार पर करे।
  • पार्टी व्यय पर सीमा: वर्तमान में उम्मीदवारों के खर्च पर तो कानूनी सीमा तय है, लेकिन राजनीतिक दलों के कुल चुनावी खर्च पर कोई निश्चित सीमा नहीं है। इसलिये यह आवश्यक है कि चुनाव अवधि के दौरान दलों के कुल व्यय पर एक स्पष्ट सीमा निर्धारित की जाए, ताकि छोटे दलों के लिये भी निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित हो सके।
    • भारत के विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट (2015) में यह सिफारिश की गई है कि राजनीतिक दलों के कुल खर्च पर भी सीमा तय की जानी चाहिये, ताकि उम्मीदवारों पर लागू व्यय सीमाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
  • स्वतंत्र लेखापरीक्षा: अभी राजनीतिक दल अपने ऑडिटर स्वयं नियुक्त करते हैं। इसे बदलते हुए यह अनिवार्य किया जाना चाहिये कि दलों के खातों की जाँच भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) या भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मान्यता प्राप्त ऑडिटरों के पैनल से कराई जाए। इससे ऑडिट प्रक्रिया निष्पक्ष और कठोर सुनिश्चित हो सकेगी।
  • कॉर्पोरेट प्रभाव को अलग करना: कॉर्पोरेट दान पर लगी सीमा (जो पहले शुद्ध लाभ का 7.5% थी) को पुन: लागू करना, ताकि घाटे में चल रही 'शेल कंपनियों' का उपयोग मनी लॉन्ड्रिंग के माध्यम से चंदा देने के लिये न किया जा सके।
    • कंपनियों के लिये यह अनिवार्य किया जाए कि वे राजनीतिक चंदा देने से पहले वार्षिक आम बैठकों (AGMs) के दौरान शेयरधारकों से स्पष्ट अनुमोदन प्राप्त करें।
  • भारत निर्वाचन आयोग को अधिक अधिकार देना: वर्तमान में वित्तीय नियमों के उल्लंघन पर राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई करने की इसकी शक्तियाँ सीमित हैं। इसलिये इसे कानूनी रूप से यह अधिकार दिया जाना चाहिये कि यदि कोई दल ऑडिटेड खाते जमा नहीं करता या फंडिंग नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सके।

निष्कर्ष

राजनीतिक चंदों में वृद्धि, जो कॉर्पोरेट हितों और कुछ विशेष दलों के प्रभुत्व में है, वित्त और शासन के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर्संबंध को उजागर करती है। इन असमानताओं को दूर करने के लिये दलों के व्यय पर सीमा निर्धारित करना, कॉर्पोरेट दान की सीमाओं को पुनः लागू करना तथा निर्वाचन आयोग (ECI) को पंजीकरण निरस्त करने की शक्तियाँ प्रदान करना आवश्यक है, ताकि लोकतांत्रिक अखंडता की रक्षा हो सके और समान अवसर सुनिश्चित किया जा सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. राजनीति में कालेधन के प्रभाव को कम करने के उपाय के रूप में भारत में चुनावों के राज्य वित्तपोषण की व्यवहार्यता पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29C का क्या महत्त्व है?
यह राजनीतिक दलों को ₹20,000 से अधिक के चंदों की वार्षिक जानकारी निर्वाचन आयोग (ECI) को देने के लिये बाध्य करता है; ऐसा न करने पर उन्हें आयकर अधिनियम की धारा 13A के तहत मिलने वाली कर छूट से वंचित कर दिया जाता है।

2. वित्त अधिनियम, 2017 ने कॉर्पोरेट राजनीतिक वित्तपोषण में क्या परिवर्तन किया?
इसने दान पर पूर्व निर्धारित 7.5% औसत शुद्ध लाभ की सीमा को हटा दिया, जिससे कंपनियों (यहाँ तक कि घाटे में चल रही कंपनियों) को भी राजनीतिक दलों को असीमित राशि दान करने की अनुमति मिल गई।

3. क्या भारतीय राजनीतिक दलों को विदेशी योगदान की अनुमति है?
नहीं, FCRA 2010 इसे प्रतिबंधित करता है; हालाँकि, हाल के संशोधन भारतीय कंपनियों से 50% से अधिक विदेशी शेयरधारिता वाले दान की अनुमति देते हैं यदि वे FEMA दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स 

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

  1. भारत का निर्वाचन आयोग पाँच-सदस्यीय निकाय है। 
  2. संघ का गृह मंत्रालय आम चुनाव और उप-चुनावों दोनों के लिये चुनाव कार्यक्रम तय करता है। 
  3. निर्वाचन आयोग मान्यता-प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवाद निपटाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 2 और 3

(d) केवल 3

उत्तर: (d)


मेन्स 

प्रश्न. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के इस्तेमाल संबंधी हाल के विवाद के आलोक में, भारत में चुनावों की विश्वास्यता सुनिश्चित करने के लिये भारत के निर्वाचन आयोग के समक्ष क्या-क्या चुनौतियाँ है? (2018)

प्रश्न. भारत में लोकतंत्र की गुणता को बढ़ाने के लिये भारत के चुनाव आयोग ने 2016 में चुनावी सुधारों का प्रस्ताव दिया है। सुझाए गए सुधार क्या हैं और लोकतंत्र को सफल बनाने में वे किस सीमा तक महत्त्वपूर्ण हैं? (2017)


मुख्य परीक्षा

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों? 

मार्च 2026 तक प्रधानमंत्री आवास योजना–ग्रामीण (PMAY-G)) ने लगभग 3 करोड़ मकानों का निर्माण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है, जो ग्रामीण परिवर्तन में एक प्रमुख उपलब्धि है।

  • वर्ष 2029 तक 4.95 करोड़ मकानों के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ, यह योजना समावेशी विकास को बढ़ावा देना, सामाजिक कल्याण को मज़बूत करना और ग्रामीण भारत में "हाउसिंग फॉर ऑल" के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना जारी रखती है।

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) क्या है? 

  • परिचय: PMAY-G का उद्देश्य सभी बेघर ग्रामीण परिवारों और कच्चे या जीर्ण-शीर्ण आवासों में रहने वालों को बुनियादी सुविधाओं के साथ एक स्थायी (पक्का) घर प्रदान करना है, जिससे जीवन स्तर में सुधार हो और ग्रामीण गरीबों के लिये गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित हो।
    • इसे ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) द्वारा कार्यान्वित किया जाता है और 2016 में लॉन्च किया गया था, जिसने "हाउसिंग फॉर ऑल" के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये पहले की इंदिरा आवास योजना का पुनर्गठन किया।
  • चयन: लाभार्थियों के चयन में तीन-चरणीय सत्यापन प्रक्रिया का प्रयोग होता है, जिसमें सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना 2011, ग्राम सभा की स्वीकृतियाँ और जियो-टैगिंग शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करता है कि सहायता सबसे योग्य व्यक्तियों तक पहुँचे।
  • लागत साझाकरण: केंद्र और राज्य मैदानी क्षेत्रों के मामले में 60:40 के अनुपात में और पूर्वोत्तर राज्यों, दो हिमालयी राज्यों (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) एवं केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के लिये 90:10 के अनुपात में व्यय साझा करते हैं।
    • केंद्र लद्दाख सहित अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के मामले में 100% लागत वहन करता है।
  • कार्यान्वयन ढाँचा और सुधार:
    • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): निर्माण निधि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेजी जाती है, जिससे बिचौलियों का काम समाप्त हो जाता है।
    • बहु-स्तरीय निरीक्षण: ब्लॉक अधिकारी 10% घरों का निरीक्षण करते हैं, जबकि ज़िला अधिकारी प्रत्येक निर्माण चरण में 2% घरों का निरीक्षण करते हैं। राष्ट्रीय स्तर के निगरानीकर्त्ता भी क्षेत्रीय दौरे करते हैं।
    • सामाजिक ऑडिट: ग्राम पंचायतें इस प्रणाली को जवाबदेह बनाने के लिये वर्ष में कम-से-कम एक बार समुदाय-नेतृत्व वाली समीक्षा करती हैं।
    • अवाससॉफ्ट MIS: एक वेब-आधारित द्विभाषी प्लेटफॉर्म जो लाभार्थी पहचान से लेकर धन जारी करने तक सब कुछ एक ही पारदर्शी डैशबोर्ड में एकीकृत करता है।
    • समर्पित स्थानीय समर्थन: प्रत्येक स्वीकृत घर के लिये एक स्थानीय कार्यकर्त्ता नियुक्त किया जाता है ताकि परिवार की सहायता की जा सके और समय पर निर्माण सुनिश्चित किया जा सके।
  • ग्रामीण आवास में AI-संचालित निगरानी:
    • AI अनुशंसा प्रणाली: कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल दीवारों, छतों और दरवाज़ों की पहचान करने के लिये अपलोड की गई तस्वीरों का विश्लेषण करते हैं, जिससे अनुमोदन के लिये अंतिम तस्वीर की स्वचालित रूप से अनुशंसा होती है।
    • विसंगति का पता लगाना: मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म एक ही इलाके में घरों की तस्वीरों की तुलना समानताओं को चिह्नित करने के लिये करते हैं, जिससे प्रभावी रूप से नकल और धोखाधड़ी को रोका जा सके।
    • चेहरा प्रमाणीकरण और ई-KYC: अवास+ 2024 मोबाइल ऐप आधार-आधारित, AI-सक्षम चेहरा प्रमाणीकरण का उपयोग करके लाभार्थियों को सत्यापित करता है।
    • जीवंतता का पता लगाना: आँख झपकना और गति का पता लगाना जैसी उन्नत सुविधाएँ यह सुनिश्चित करती हैं कि प्रमाणीकरण करने वाला व्यक्ति शारीरिक रूप से उपस्थित हो, जिससे धोखाधड़ी को रोका जा सके।
    • डिजिटल जियो-टैगिंग: वास्तविक समय में ट्रैकिंग के लिये प्रत्येक निर्माण चरण पर समय-और-तारीख-मुद्रांकित तस्वीरें अपलोड की जाती हैं।

ग्रामीण परिवारों पर प्रभाव

  • बेहतर आवासन स्थितियाँ: परिवार अब स्थायी घरों में रहते हैं जो टिकाऊ, सुरक्षित और मौसम-प्रतिरोधी हैं। अस्थायी से स्थायी आवास में यह परिवर्तन लाखों परिवारों के लिये सुरक्षा और गरिमा को बढ़ावा देता है।
  • स्वच्छता और स्वास्थ्य: स्वच्छ भारत मिशन – ग्रामीण (SBM-G) के साथ अभिसरण के माध्यम से लाभार्थियों को शौचालय निर्माण के लिये 12,000 रुपये मिलते हैं, जिससे स्वास्थ्य जोखिमों में काफी कमी आती है।
  • स्वच्छ ऊर्जा और जल: यह योजना परिवारों को LPG कनेक्शन के लिये PM उज्ज्वला योजना, सौर ऊर्जा के लिये PM सूर्य घर और पाइप से पीने के पानी के लिये जल जीवन मिशन से जोड़ती है।
  • महिला सशक्तीकरण: महिलाओं के नाम पर (या संयुक्त रूप से) गृह स्वामित्व को अनिवार्य या प्रोत्साहित करके PMAY-G सक्रिय रूप से लैंगिक समानता और संपत्ति अधिकारों को बढ़ावा देता है, जो सतत विकास लक्ष्य 5a के अनुरूप है।
  • कौशल और रोज़गार सृजन: यह योजना विकसित भारत-गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (पूर्व में मनरेगा) के तहत 90-95 दिनों की अकुशल श्रम मज़दूरी की गारंटी देती है और 3 लाख से अधिक ग्रामीण राजमिस्त्रियों को प्रमाणित किया है।

PMAY-G को प्रभावित करने वाले मुद्दे क्या हैं?

  • पुरानी लाभार्थी पहचान: संसदीय स्थायी समिति (ग्रामीण विकास) ने पाया है कि यह योजना अभी भी सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना 2011 (SECC 2011) के पुराने डेटा पर आधारित है, जो अब अद्यतन नहीं है। इसके कारण नए पात्र परिवार योजना से छूट जाते हैं, जबकि कुछ अपात्र या पहले से बेहतर स्थिति में पहुँच चुके लाभार्थी भी सूची में बने रहते हैं।
  • अपर्याप्त वित्तीय सहायता: मौजूदा वित्तीय सहायता बढ़ती निर्माण लागत और महंगाई के संदर्भ में पर्याप्त नहीं है, जिसके कारण लाभार्थियों को या तो ऋण लेना पड़ता है या फिर अपने घर अधूरे छोड़ने पड़ते हैं।
  • भू-टैगिंग और निगरानी में धोखाधड़ी: भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ने पाया है कि भू-टैगिंग प्रणाली में गड़बड़ी की गई है, जिसमें मकानों को वास्तविक स्थान से सैकड़ों किलोमीटर दूर दर्ज किया गया। इससे बिना वास्तविक निर्माण के धन के दुरुपयोग की संभावना बढ़ती है तथा निगरानी तंत्र की कमज़ोरियों का पता चलता है।
  • रिश्वत और “कट मनी”: कई लाभार्थियों ने यह रिपोर्ट किया है कि उन्हें स्वीकृति प्राप्त करने या किस्त जारी कराने के लिये अधिकारियों या बिचौलियों को रिश्वत या धन का एक हिस्सा देना पड़ता है, जिससे योजना का मूल उद्देश्य कमज़ोर हो जाता है।

निष्कर्ष

PMAY-G ने केवल आश्रय प्रदान करने से आगे बढ़कर ग्रामीण परिवारों को गरिमा, सुरक्षा और अवसर उपलब्ध कराए हैं। हालाँकि चुनौतियों का समाधान करने के लिये लाभार्थी डेटाबेस को अद्यतन करना, महंगाई के अनुरूप वित्तीय सहायता बढ़ाना, डिजिटल तथा ज़मीनी स्तर की निगरानी को मज़बूत करना एवं पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि PMAY-G ग्रामीण भारत में “सभी के लिये आवास” के लक्ष्य को प्रभावी रूप से प्राप्त कर सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  “PMAY-G कल्याणकारी वितरण से हटकर गरिमा-आधारित विकास की ओर एक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है।” आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) क्या है?
यह 2016 में शुरू की गई एक ग्रामीण आवास योजना है, जिसका उद्देश्य बेघर और कच्चे मकानों में रहने वाले परिवारों को बुनियादी सुविधाओं सहित पक्के मकान उपलब्ध कराना है।

2. प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) के तहत लाभार्थियों का चयन कैसे किया जाता है?
चयन तीन चरणों वाली प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है: सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) 2011 का डेटा, ग्राम सभा द्वारा सत्यापन और जियो-टैगिंग।

3. प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) का फंडिंग पैटर्न क्या है?
साधारण क्षेत्रों के लिये केंद्र और राज्य सरकार के बीच लागत साझेदारी अनुपात 60:40 है, जबकि उत्तर-पूर्वी तथा हिमालयी राज्यों में यह 90:10 है और केंद्रशासित प्रदेशों में 100% वित्तपोषण केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है।

4. प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित करती है?
प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT), जियो-टैगिंग, आवाससॉफ्ट MIS प्लेटफॉर्म, सामाजिक अंकेक्षण और एआई (AI) आधारित निगरानी प्रणालियों के माध्यम से।

5. प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) के प्रमुख प्रभाव क्या हैं?
यह योजना न केवल आवास की गुणवत्ता और स्वच्छता में सुधार करती है, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा तक पहुँच, महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसरों को भी बढ़ावा देती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा,  पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स

प्रश्न. 'राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन' ग्रामीण क्षेत्रीय निर्धनों के आजीविका विकल्पों को सुधारने का किस प्रकार प्रयास करता है? (2012)

  1. ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नए विनिर्माण उद्योग तथा कृषि व्यापार केंद्र स्थापित करके
  2. 'स्वयं सहायता समूहों' को सशक्त बनाकर और कौशल विकास की सुविधाएँ प्रदान करके 
  3. कृषकों को निःशुल्क बीज, उर्वरक, डीज़ल पंप-सेट तथा लघु-सिंचाई संयंत्र देकर

निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)


मुख्य परीक्षा

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

लोकसभा ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 पारित किया है, जिसमें दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) में 12 प्रमुख संशोधन किये गए हैं। इनका उद्देश्य हितधारकों के मूल्य को अधिकतम करना, सख्त समाधान समय-सीमा लागू करना तथा भारतीय कानून को सीमा-पार दिवालियापन जैसे वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप बनाना है।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?

  • नए समाधान मॉडल: यह विधेयक फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया को हटाकर ऋणदाता-प्रेरित दिवालियापन ढाँचा प्रस्तुत करता है, जिसमें न्यायालय के बाहर समझौते (Out-of-Court Settlement) का विकल्प तथा ‘उधारकर्त्ता के हाथ में प्रबंधन' से 'बैंक/लेनदार के हाथ में कमान’ मॉडल शामिल है, ताकि व्यवसाय की निरंतरता बनी रहे।
  • सख्त समय-सीमा: यह परिसमापन (Liquidation) की प्रक्रिया को पूरा करने के लिये 180 दिनों की समय-सीमा निर्धारित करता है, जिसे अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। साथ ही, डिफॉल्ट स्थापित होने के बाद दिवालियापन आवेदन को 14 दिनों के भीतर स्वीकार करना अनिवार्य होगा।
  • संक्षिप्त प्रक्रिया: न्यायालय के बाहर आरंभ होने वाली नई प्रक्रिया (Out-of-Court Initiation Mechanism) में वसूली प्रक्रिया को तेज़ करने हेतु 150 दिनों की संक्षिप्त समय-सीमा निर्धारित की गई है।
  • सीमा-पार एवं समूह दिवालियापन: यह विधेयक सीमा-पार दिवालियापन और समूह दिवालियापन के लिये एक सक्षम ढाँचा प्रदान करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने तथा जटिल कॉर्पोरेट संरचनाओं से निपटने में सहायक है।
  • विवादों पर नियंत्रण (Deterrents for Litigation): अत्यधिक मुकदमेबाज़ी से होने वाली देरी को रोकने के लिये, निरर्थक या दुर्भावनापूर्ण कार्यवाही शुरू करने वाले व्यक्तियों पर ₹1 लाख से ₹2 करोड़ तक का दंड लगाया जाएगा।
  • श्रमिकों का संरक्षण: IBC की प्राथमिकता क्रम में श्रमिकों के बकाया को उच्च प्राथमिकता दी गई है, जिसे सुरक्षित ऋणदाताओं के समान स्तर पर रखा गया है और असुरक्षित वित्तीय ऋणदाताओं तथा सरकारी देयों से ऊपर स्थान दिया गया है।
  • समाधान के बाद सफलता: समाधान प्राप्त कंपनियों का बाज़ार पूंजीकरण 5 वर्षों में लगभग ₹2.8 लाख करोड़ से बढ़कर ₹9 लाख करोड़ हो गया है, जो इस ढाँचे की दीर्घकालिक प्रभावशीलता को दर्शाता है।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 क्या है?

  • परिचय: IBC, 2016 एक महत्त्वपूर्ण भारतीय कानून है, जिसे कंपनियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों के लिये दिवालियापन एवं शोधन अक्षमता के समाधान हेतु कानूनी ढाँचे को समेकित और सरल बनाने हेतु तैयार किया गया है।
    • 2016 से पहले यह प्रक्रिया कई कानूनों (जैसे– SARFAESI अधिनियम, 2002 और कंपनी अधिनियम, 2013) में विखंडित थी, जिससे ऋणदाताओं के लिये लंबी देरी और कम वसूली दर की समस्या उत्पन्न होती थी।
  • मुख्य उद्देश्य: शोधन अक्षमता प्रक्रिया को एक निर्धारित समय-सीमा (2025 के संशोधन विधेयक के अनुसार 180 दिन) के भीतर पूर्ण करना।
    • ऋणकर्त्ता की संपत्तियों के मूल्य को बनाए रखने के लिये यह सुनिश्चित करना कि व्यवसाय ‘जारी चिंता’  (Going Concern) के रूप में जारी रहे, न कि तत्काल परिसमापन के रूप में।
    • विफल व्यवसायों के लिये ‘क्लीन एग्जिट’ प्रदान करना, जिससे उद्यमिता और ऋण उपलब्धता को प्रोत्साहन मिले।
    • वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को किसी भी न्यायिक कार्यवाही के समय सहित अधिकतम 330 दिनों के भीतर पूरा करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। सामान्यतः यह प्रक्रिया 180 दिनों में पूर्ण करने के लिये निर्धारित है, जिसे अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।
  • संस्थागत ढाँचा: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) सुचारु कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिये चार प्रमुख स्तंभों के माध्यम से कार्य करता है।
    • दिवाला पेशेवर (IPs): ये प्रशिक्षित और लाइसेंसधारी विशेषज्ञ होते हैं, जो समाधान प्रक्रिया के दौरान देनदार कंपनी का प्रबंधन अपने हाथ में लेते हैं।
    • दिवाला पेशेवर एजेंसियाँ (IPAs): ये संस्थाएँ IPs का पंजीकरण करती हैं और उनके कार्यों व आचरण की निगरानी करती हैं।
    • सूचना उपयोगिताएँ (IUs): ये केंद्रीकृत प्लेटफॉर्म होते हैं, जहाँ देनदारों की सत्यापित वित्तीय जानकारी संगृहीत रहती है, जिससे डिफॉल्ट को जल्दी और आसानी से साबित किया जा सके।
    • न्यायनिर्णयन प्राधिकारी: नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) कॉर्पोरेट मामलों को देखता है, जबकि ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) व्यक्तिगत और साझेदारी फर्मों से जुड़े मामलों का निपटारा करता है।
  • समाधान प्रक्रिया: जब डिफॉल्ट होता है, तो वित्तीय या परिचालन लेनदार अथवा स्वयं देनदार कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को प्रारंभ कर सकता है।
    • एक बार नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) याचिका स्वीकार कर लेता है, तो एक मोरेटोरियम घोषित किया जाता है, जिसके दौरान कंपनी के खिलाफ किसी भी प्रकार के मुकदमे या संपत्ति ज़ब्ती की कार्रवाई पर रोक लग जाती है।
    • इसके बाद लेनदारों की एक समिति (CoC) का गठन किया जाता है, जो यह निर्णय लेती है कि ‘रिज़ॉल्यूशन प्लान’ के माध्यम से कर्ज़ का पुनर्गठन किया जाए या यदि कोई व्यवहार्य योजना नहीं मिलती, तो कंपनी का परिसमापन किया जाए।
  • मुख्य उपलब्धियाँ: वर्ष 2025 के अंत तक इसने लेनदारों के लिये लगभग ₹4.1 लाख करोड़ की वसूली में सहायता की और 1,300 से अधिक कंपनियों को सफलतापूर्वक पुनरुज्जीवित किया।
    • इसका सबसे बड़ा प्रभाव व्यवहार में बदलाव के रूप में देखा गया है, जहाँ ₹13.78 लाख करोड़ से जुड़े 30,310 से अधिक मामलों का निपटारा प्रवेश से पहले ही हो गया, क्योंकि प्रमोटरों को नियंत्रण खोने का डर था।
    • उच्च वसूली दक्षता—जो औसतन परिसमापन मूल्य के 170% तक रही—ने बैंकिंग प्रणाली में सकल NPA को घटाकर रिकॉर्ड निचले स्तर 2.3% तक पहुँचाने में मदद की, जिससे समग्र अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिली।
  • बैंकिंग स्वास्थ्य और रिकवरी: IBC बैंकिंग क्षेत्र के स्वास्थ्य में सुधार का एक प्राथमिक चालक है। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) द्वारा की गई कुल रिकवरी में इसका हिस्सा 52.3% है, जिसने कुल 1.04 लाख करोड़ रुपये की रिकवरी में से 54,528 करोड़ रुपये का योगदान दिया है।

IBC फ्रेमवर्क के सामने कौन-सी गंभीर चुनौतियाँ हैं?

  • लंबित समाधान में देरी: यद्यपि IBC के तहत CIRP को 330 दिनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित है, लेकिन व्यवहार में यह अवधि औसतन 700 दिनों से अधिक हो रही है। इसका प्रमुख कारण नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की बेंचों पर बढ़ता बोझ, बड़ी संख्या में रिक्त पद और अत्यधिक मुकदमेबाज़ी है।
  • संपत्ति मूल्य का क्षरण: लंबी चलने वाली प्रक्रियाओं के कारण वसूली दरें इष्टतम नहीं रह पातीं (जो औसतन स्वीकृत दावों का लगभग 32–36% होती हैं), जिससे लेनदारों को ‘उच्च हेयरक’ (कर्ज़ में छूट की प्रतिशतता) का सामना करना पड़ता है, जो कई मामलों में 80–95% तक पहुँच जाता है।
  • न्यायिक और अवसंरचनात्मक बाधाएँ: पूर्ववर्ती प्रमोटरों द्वारा बार-बार और कभी-कभी निरर्थक मुकदमेबाज़ी ‘लेनदारों की समिति’ (CoC) के ‘व्यावसायिक विवेक’ में हस्तक्षेप करती है, जबकि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में तकनीकी सदस्यों की कमी मामलों की स्वीकृति में देरी का कारण बनती है।
  • विशेषीकृत योजनाओं का कम उपयोग: MSMEs के लिये बनाई गई प्री-पैकेज्ड दिवाला समाधान प्रक्रिया (PIRP) अभी भी काफी हद तक अप्रभावी बनी हुई है। परिणामस्वरूप, कई संकटग्रस्त MSMEs या तो अधिक समय लेने वाली और महंगी CIRP प्रक्रिया पर निर्भर रहते हैं, या फिर समय से पहले परिसमापन का सामना करते हैं।
  • समाधान की बजाय परिसमापन: कंपनियों को ‘निरंतर चलती रहने वाली इकाई’ के रूप में बनाए रखने के उद्देश्य के विपरीत उच्च प्रतिशत मामलों का परिणाम परिसमापन में होता है, न कि सफल समाधान योजना में। इसका प्रमुख कारण यह है कि मामले दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के तहत पहुँचने तक परिसंपत्तियाँ पहले ही काफी हद तक क्षतिग्रस्त या मूल्यहीन हो चुकी होती हैं।
  • लेनदारों के बीच विवाद: वित्तीय और परिचालन लेनदारों के बीच या सुरक्षित और असुरक्षित लेनदारों के बीच होने वाले मतभेद अक्सर लंबी कानूनी लड़ाई का कारण बनते हैं। इससे ‘वाटरफॉल मैकेनिज़्म’ के तहत धन के वितरण में देरी होती है।
    • वाटरफॉल मैकेनिज़्म उस क्रम को निर्धारित करता है जिसके अनुसार परिसमापन के बाद कंपनी की संपत्तियों की बिक्री से प्राप्त धन विभिन्न हितधारकों को वितरित किया जाता है। इस “वाटरफॉल” सिद्धांत के तहत धन का वितरण उच्च प्राथमिकता वाले लेनदारों से शुरू होकर क्रमशः नीचे की श्रेणियों तक किया जाता है।

IBC फ्रेमवर्क को सुदृढ़ करने के लिये किन कदमों की आवश्यकता है?

  • सख्त समय-सीमा का कार्यान्वयन: एक बार डिफॉल्ट स्थापित हो जाने पर दिवाला आवेदन स्वीकार करने के लिये NCLT के लिये वैधानिक 14-दिन की अवधि का सख्ती से पालन करना। अपीलों का निपटान करने के लिये NCLAT के लिये तीन माह की अनुशंसित समय-सीमा लागू करना, जिससे "मुकदमेबाज़ी के जाल" को रोका जा सके जो वर्तमान में समाधान प्रक्रियाओं में मुख्य बाधा बना हुआ है।
  • विशेष NCLT पीठों की स्थापना: लगभग 30,000 मामलों के बैकलॉग को साफ करने और जटिल वित्तीय मामलों के विशेष संचालन को सुनिश्चित करने के लिये अतिरिक्त न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की नियुक्ति में तेज़ी लाना।
  • iPIE प्लेटफॉर्म को परिचालन योग्य बनाना: रियल टाइम केस ट्रैकिंग, डिजिटल फाइलिंग और सूचना उपयोगिताओं (IU) के माध्यम से दावों के स्वचालित सत्यापन के लिये एकीकृत प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म (iPIE) लॉन्च करना।
  • UNCITRAL मॉडल कानून को अपनाना: परस्पर संबंधित  कॉर्पोरेट संपत्तियों और विदेशी लेनदारों के दावों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिये वैश्विक मानकों पर आधारित एक व्यापक सीमा पार दिवाला ढाँचे को अधिनियमित करना।

निष्कर्ष

वर्ष 2025 के संशोधन IBC को एक रिकवरी टूल से वैल्यू-मैक्सिमाइज़ेशन इंजन में बदल देते हैं। सीमा पार जटिलताओं को संबोधित करके और मुकदमेबाज़ी में विलंब के खिलाफ दंडात्मक निवारकों को लागू करके यह विधेयक सुनिश्चित करता है कि विफल व्यवसायों को "क्लीन एग्जिट" या "वायबल रीबर्थ" प्राप्त हो, अंततः भारत के बैंकिंग क्षेत्र की स्थिरता और निवेशक विश्वास की रक्षा हो।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC), 2016 क्या है? इसके मुख्य उद्देश्यों और उस संस्थागत ढाँचे की जाँच कीजिये जिसके माध्यम से यह कार्य करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. IBC (संशोधन) विधेयक, 2025 के तहत दिवाला आवेदन को स्वीकार करने की समय-सीमा क्या है?
एक बार कंपनी द्वारा डिफॉल्ट स्थापित हो जाने पर अधिकार प्राप्त प्राधिकरण (NCLT) को 14 दिनों के भीतर आवेदन को स्वीकार करना होगा।

2. IBC संशोधन विधेयक, 2025 में शुरू किया गया न्यू आउट-ऑफ-कोर्ट क्या है?
तेज़ी से वसूली के लिये "देनदार कब्ज़े में, लेनदार नियंत्रण में" (debtor-in-possession, creditor-in-control) मॉडल की विशेषता वाली एक संकुचित 150-दिवसीय समय-सीमा के साथ एक लेनदार-दीक्षित समाधान प्रक्रिया शुरू की गई है।

3. IBC फ्रेमवर्क का समर्थन करने वाले चार संस्थागत स्तंभ कौन-से हैं?
यह ढाँचा दिवाला पेशेवरों (IP), दिवाला पेशेवर एजेंसियों (IPA), सूचना उपयोगिताओं (IU) और अधिकार प्राप्त प्राधिकरणों (NCLT/DRT) पर निर्भर करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा हाल ही में समाचारों में आए 'दबावयुक्त परिसंपत्तियों के धारणीय संरचन पद्धति'  (स्कीम फॉर सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग ऑफ स्ट्रेस्ड एसेट्स /S4A) का सर्वोत्कृष्ट वर्णन करता है?  (2017)

(a) यह सरकार द्वारा निरूपित विकासपरक योजनाओं की पारिस्थितिकीय कीमतों पर विचार करने की पद्धति है।

(b) यह वास्तविक कठिनाइयों का सामना कर रही बड़ी कॉर्पोरेट इकाइयों की वित्तीय संरचना के पुनर्संरचन के लिये भारतीय रिज़र्व बैंक की स्कीम है।

(c) यह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के बारे में सरकार की विनिवेश योजना है। 

(d) यह सरकार द्वारा हाल ही में क्रियान्वित 'इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड' का एक महत्त्वपूर्ण उपबंध है।

उत्तर: (b)


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