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दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025

  • 04 Apr 2026
  • 90 min read

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

लोकसभा ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 पारित किया है, जिसमें दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) में 12 प्रमुख संशोधन किये गए हैं। इनका उद्देश्य हितधारकों के मूल्य को अधिकतम करना, सख्त समाधान समय-सीमा लागू करना तथा भारतीय कानून को सीमा-पार दिवालियापन जैसे वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप बनाना है।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?

  • नए समाधान मॉडल: यह विधेयक फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया को हटाकर ऋणदाता-प्रेरित दिवालियापन ढाँचा प्रस्तुत करता है, जिसमें न्यायालय के बाहर समझौते (Out-of-Court Settlement) का विकल्प तथा ‘उधारकर्त्ता के हाथ में प्रबंधन' से 'बैंक/लेनदार के हाथ में कमान’ मॉडल शामिल है, ताकि व्यवसाय की निरंतरता बनी रहे।
  • सख्त समय-सीमा: यह परिसमापन (Liquidation) की प्रक्रिया को पूरा करने के लिये 180 दिनों की समय-सीमा निर्धारित करता है, जिसे अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। साथ ही, डिफॉल्ट स्थापित होने के बाद दिवालियापन आवेदन को 14 दिनों के भीतर स्वीकार करना अनिवार्य होगा।
  • संक्षिप्त प्रक्रिया: न्यायालय के बाहर आरंभ होने वाली नई प्रक्रिया (Out-of-Court Initiation Mechanism) में वसूली प्रक्रिया को तेज़ करने हेतु 150 दिनों की संक्षिप्त समय-सीमा निर्धारित की गई है।
  • सीमा-पार एवं समूह दिवालियापन: यह विधेयक सीमा-पार दिवालियापन और समूह दिवालियापन के लिये एक सक्षम ढाँचा प्रदान करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने तथा जटिल कॉर्पोरेट संरचनाओं से निपटने में सहायक है।
  • विवादों पर नियंत्रण (Deterrents for Litigation): अत्यधिक मुकदमेबाज़ी से होने वाली देरी को रोकने के लिये, निरर्थक या दुर्भावनापूर्ण कार्यवाही शुरू करने वाले व्यक्तियों पर ₹1 लाख से ₹2 करोड़ तक का दंड लगाया जाएगा।
  • श्रमिकों का संरक्षण: IBC की प्राथमिकता क्रम में श्रमिकों के बकाया को उच्च प्राथमिकता दी गई है, जिसे सुरक्षित ऋणदाताओं के समान स्तर पर रखा गया है और असुरक्षित वित्तीय ऋणदाताओं तथा सरकारी देयों से ऊपर स्थान दिया गया है।
  • समाधान के बाद सफलता: समाधान प्राप्त कंपनियों का बाज़ार पूंजीकरण 5 वर्षों में लगभग ₹2.8 लाख करोड़ से बढ़कर ₹9 लाख करोड़ हो गया है, जो इस ढाँचे की दीर्घकालिक प्रभावशीलता को दर्शाता है।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 क्या है?

  • परिचय: IBC, 2016 एक महत्त्वपूर्ण भारतीय कानून है, जिसे कंपनियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों के लिये दिवालियापन एवं शोधन अक्षमता के समाधान हेतु कानूनी ढाँचे को समेकित और सरल बनाने हेतु तैयार किया गया है।
    • 2016 से पहले यह प्रक्रिया कई कानूनों (जैसे– SARFAESI अधिनियम, 2002 और कंपनी अधिनियम, 2013) में विखंडित थी, जिससे ऋणदाताओं के लिये लंबी देरी और कम वसूली दर की समस्या उत्पन्न होती थी।
  • मुख्य उद्देश्य: शोधन अक्षमता प्रक्रिया को एक निर्धारित समय-सीमा (2025 के संशोधन विधेयक के अनुसार 180 दिन) के भीतर पूर्ण करना।
    • ऋणकर्त्ता की संपत्तियों के मूल्य को बनाए रखने के लिये यह सुनिश्चित करना कि व्यवसाय ‘जारी चिंता’  (Going Concern) के रूप में जारी रहे, न कि तत्काल परिसमापन के रूप में।
    • विफल व्यवसायों के लिये ‘क्लीन एग्जिट’ प्रदान करना, जिससे उद्यमिता और ऋण उपलब्धता को प्रोत्साहन मिले।
    • वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को किसी भी न्यायिक कार्यवाही के समय सहित अधिकतम 330 दिनों के भीतर पूरा करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। सामान्यतः यह प्रक्रिया 180 दिनों में पूर्ण करने के लिये निर्धारित है, जिसे अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।
  • संस्थागत ढाँचा: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) सुचारु कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिये चार प्रमुख स्तंभों के माध्यम से कार्य करता है।
    • दिवाला पेशेवर (IPs): ये प्रशिक्षित और लाइसेंसधारी विशेषज्ञ होते हैं, जो समाधान प्रक्रिया के दौरान देनदार कंपनी का प्रबंधन अपने हाथ में लेते हैं।
    • दिवाला पेशेवर एजेंसियाँ (IPAs): ये संस्थाएँ IPs का पंजीकरण करती हैं और उनके कार्यों व आचरण की निगरानी करती हैं।
    • सूचना उपयोगिताएँ (IUs): ये केंद्रीकृत प्लेटफॉर्म होते हैं, जहाँ देनदारों की सत्यापित वित्तीय जानकारी संगृहीत रहती है, जिससे डिफॉल्ट को जल्दी और आसानी से साबित किया जा सके।
    • न्यायनिर्णयन प्राधिकारी: नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) कॉर्पोरेट मामलों को देखता है, जबकि ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) व्यक्तिगत और साझेदारी फर्मों से जुड़े मामलों का निपटारा करता है।
  • समाधान प्रक्रिया: जब डिफॉल्ट होता है, तो वित्तीय या परिचालन लेनदार अथवा स्वयं देनदार कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को प्रारंभ कर सकता है।
    • एक बार नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) याचिका स्वीकार कर लेता है, तो एक मोरेटोरियम घोषित किया जाता है, जिसके दौरान कंपनी के खिलाफ किसी भी प्रकार के मुकदमे या संपत्ति ज़ब्ती की कार्रवाई पर रोक लग जाती है।
    • इसके बाद लेनदारों की एक समिति (CoC) का गठन किया जाता है, जो यह निर्णय लेती है कि ‘रिज़ॉल्यूशन प्लान’ के माध्यम से कर्ज़ का पुनर्गठन किया जाए या यदि कोई व्यवहार्य योजना नहीं मिलती, तो कंपनी का परिसमापन किया जाए।
  • मुख्य उपलब्धियाँ: वर्ष 2025 के अंत तक इसने लेनदारों के लिये लगभग ₹4.1 लाख करोड़ की वसूली में सहायता की और 1,300 से अधिक कंपनियों को सफलतापूर्वक पुनरुज्जीवित किया।
    • इसका सबसे बड़ा प्रभाव व्यवहार में बदलाव के रूप में देखा गया है, जहाँ ₹13.78 लाख करोड़ से जुड़े 30,310 से अधिक मामलों का निपटारा प्रवेश से पहले ही हो गया, क्योंकि प्रमोटरों को नियंत्रण खोने का डर था।
    • उच्च वसूली दक्षता—जो औसतन परिसमापन मूल्य के 170% तक रही—ने बैंकिंग प्रणाली में सकल NPA को घटाकर रिकॉर्ड निचले स्तर 2.3% तक पहुँचाने में मदद की, जिससे समग्र अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिली।
  • बैंकिंग स्वास्थ्य और रिकवरी: IBC बैंकिंग क्षेत्र के स्वास्थ्य में सुधार का एक प्राथमिक चालक है। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) द्वारा की गई कुल रिकवरी में इसका हिस्सा 52.3% है, जिसने कुल 1.04 लाख करोड़ रुपये की रिकवरी में से 54,528 करोड़ रुपये का योगदान दिया है।

IBC फ्रेमवर्क के सामने कौन-सी गंभीर चुनौतियाँ हैं?

  • लंबित समाधान में देरी: यद्यपि IBC के तहत CIRP को 330 दिनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित है, लेकिन व्यवहार में यह अवधि औसतन 700 दिनों से अधिक हो रही है। इसका प्रमुख कारण नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की बेंचों पर बढ़ता बोझ, बड़ी संख्या में रिक्त पद और अत्यधिक मुकदमेबाज़ी है।
  • संपत्ति मूल्य का क्षरण: लंबी चलने वाली प्रक्रियाओं के कारण वसूली दरें इष्टतम नहीं रह पातीं (जो औसतन स्वीकृत दावों का लगभग 32–36% होती हैं), जिससे लेनदारों को ‘उच्च हेयरक’ (कर्ज़ में छूट की प्रतिशतता) का सामना करना पड़ता है, जो कई मामलों में 80–95% तक पहुँच जाता है।
  • न्यायिक और अवसंरचनात्मक बाधाएँ: पूर्ववर्ती प्रमोटरों द्वारा बार-बार और कभी-कभी निरर्थक मुकदमेबाज़ी ‘लेनदारों की समिति’ (CoC) के ‘व्यावसायिक विवेक’ में हस्तक्षेप करती है, जबकि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में तकनीकी सदस्यों की कमी मामलों की स्वीकृति में देरी का कारण बनती है।
  • विशेषीकृत योजनाओं का कम उपयोग: MSMEs के लिये बनाई गई प्री-पैकेज्ड दिवाला समाधान प्रक्रिया (PIRP) अभी भी काफी हद तक अप्रभावी बनी हुई है। परिणामस्वरूप, कई संकटग्रस्त MSMEs या तो अधिक समय लेने वाली और महंगी CIRP प्रक्रिया पर निर्भर रहते हैं, या फिर समय से पहले परिसमापन का सामना करते हैं।
  • समाधान की बजाय परिसमापन: कंपनियों को ‘निरंतर चलती रहने वाली इकाई’ के रूप में बनाए रखने के उद्देश्य के विपरीत उच्च प्रतिशत मामलों का परिणाम परिसमापन में होता है, न कि सफल समाधान योजना में। इसका प्रमुख कारण यह है कि मामले दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के तहत पहुँचने तक परिसंपत्तियाँ पहले ही काफी हद तक क्षतिग्रस्त या मूल्यहीन हो चुकी होती हैं।
  • लेनदारों के बीच विवाद: वित्तीय और परिचालन लेनदारों के बीच या सुरक्षित और असुरक्षित लेनदारों के बीच होने वाले मतभेद अक्सर लंबी कानूनी लड़ाई का कारण बनते हैं। इससे ‘वाटरफॉल मैकेनिज़्म’ के तहत धन के वितरण में देरी होती है।
    • वाटरफॉल मैकेनिज़्म उस क्रम को निर्धारित करता है जिसके अनुसार परिसमापन के बाद कंपनी की संपत्तियों की बिक्री से प्राप्त धन विभिन्न हितधारकों को वितरित किया जाता है। इस “वाटरफॉल” सिद्धांत के तहत धन का वितरण उच्च प्राथमिकता वाले लेनदारों से शुरू होकर क्रमशः नीचे की श्रेणियों तक किया जाता है।

IBC फ्रेमवर्क को सुदृढ़ करने के लिये किन कदमों की आवश्यकता है?

  • सख्त समय-सीमा का कार्यान्वयन: एक बार डिफॉल्ट स्थापित हो जाने पर दिवाला आवेदन स्वीकार करने के लिये NCLT के लिये वैधानिक 14-दिन की अवधि का सख्ती से पालन करना। अपीलों का निपटान करने के लिये NCLAT के लिये तीन माह की अनुशंसित समय-सीमा लागू करना, जिससे "मुकदमेबाज़ी के जाल" को रोका जा सके जो वर्तमान में समाधान प्रक्रियाओं में मुख्य बाधा बना हुआ है।
  • विशेष NCLT पीठों की स्थापना: लगभग 30,000 मामलों के बैकलॉग को साफ करने और जटिल वित्तीय मामलों के विशेष संचालन को सुनिश्चित करने के लिये अतिरिक्त न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की नियुक्ति में तेज़ी लाना।
  • iPIE प्लेटफॉर्म को परिचालन योग्य बनाना: रियल टाइम केस ट्रैकिंग, डिजिटल फाइलिंग और सूचना उपयोगिताओं (IU) के माध्यम से दावों के स्वचालित सत्यापन के लिये एकीकृत प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म (iPIE) लॉन्च करना।
  • UNCITRAL मॉडल कानून को अपनाना: परस्पर संबंधित  कॉर्पोरेट संपत्तियों और विदेशी लेनदारों के दावों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिये वैश्विक मानकों पर आधारित एक व्यापक सीमा पार दिवाला ढाँचे को अधिनियमित करना।

निष्कर्ष

वर्ष 2025 के संशोधन IBC को एक रिकवरी टूल से वैल्यू-मैक्सिमाइज़ेशन इंजन में बदल देते हैं। सीमा पार जटिलताओं को संबोधित करके और मुकदमेबाज़ी में विलंब के खिलाफ दंडात्मक निवारकों को लागू करके यह विधेयक सुनिश्चित करता है कि विफल व्यवसायों को "क्लीन एग्जिट" या "वायबल रीबर्थ" प्राप्त हो, अंततः भारत के बैंकिंग क्षेत्र की स्थिरता और निवेशक विश्वास की रक्षा हो।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC), 2016 क्या है? इसके मुख्य उद्देश्यों और उस संस्थागत ढाँचे की जाँच कीजिये जिसके माध्यम से यह कार्य करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. IBC (संशोधन) विधेयक, 2025 के तहत दिवाला आवेदन को स्वीकार करने की समय-सीमा क्या है?
एक बार कंपनी द्वारा डिफॉल्ट स्थापित हो जाने पर अधिकार प्राप्त प्राधिकरण (NCLT) को 14 दिनों के भीतर आवेदन को स्वीकार करना होगा।

2. IBC संशोधन विधेयक, 2025 में शुरू किया गया न्यू आउट-ऑफ-कोर्ट क्या है?
तेज़ी से वसूली के लिये "देनदार कब्ज़े में, लेनदार नियंत्रण में" (debtor-in-possession, creditor-in-control) मॉडल की विशेषता वाली एक संकुचित 150-दिवसीय समय-सीमा के साथ एक लेनदार-दीक्षित समाधान प्रक्रिया शुरू की गई है।

3. IBC फ्रेमवर्क का समर्थन करने वाले चार संस्थागत स्तंभ कौन-से हैं?
यह ढाँचा दिवाला पेशेवरों (IP), दिवाला पेशेवर एजेंसियों (IPA), सूचना उपयोगिताओं (IU) और अधिकार प्राप्त प्राधिकरणों (NCLT/DRT) पर निर्भर करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा हाल ही में समाचारों में आए 'दबावयुक्त परिसंपत्तियों के धारणीय संरचन पद्धति'  (स्कीम फॉर सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग ऑफ स्ट्रेस्ड एसेट्स /S4A) का सर्वोत्कृष्ट वर्णन करता है?  (2017)

(a) यह सरकार द्वारा निरूपित विकासपरक योजनाओं की पारिस्थितिकीय कीमतों पर विचार करने की पद्धति है।

(b) यह वास्तविक कठिनाइयों का सामना कर रही बड़ी कॉर्पोरेट इकाइयों की वित्तीय संरचना के पुनर्संरचन के लिये भारतीय रिज़र्व बैंक की स्कीम है।

(c) यह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के बारे में सरकार की विनिवेश योजना है। 

(d) यह सरकार द्वारा हाल ही में क्रियान्वित 'इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड' का एक महत्त्वपूर्ण उपबंध है।

उत्तर: (b)

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