शासन व्यवस्था
राजनीतिक वित्तपोषण में सुधार
- 04 Apr 2026
- 127 min read
प्रिलिम्स के लिये: भारत निर्वाचन आयोग (ECI), निर्वाचन न्यास, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA), FDI नीति, FCRA, 2010, सर्वोच्च न्यायालय, इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998), नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG), शेल कंपनियाँ।
मेन्स के लिये: राजनीतिक वित्तपोषण पर ADR रिपोर्ट की मुख्य बातें, भारत में राजनीतिक चंदे से संबंधित वैधानिक प्रावधान, लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिये चुनावों में वित्तीय पारदर्शिता की आवश्यकता, भारत में पारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक सुधार।
चर्चा में क्यों?
लोकतांत्रिक सुधारों के लिये संघ (ADR) की एक रिपोर्ट वित्त वर्ष 2024-25 के लिये राष्ट्रीय राजनीतिक दलों द्वारा भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को घोषित 20,000 रुपये या उससे अधिक के दान पर केंद्रित है, जो लोकतांत्रिक जवाबदेही की दिशा में प्रयासों को उजागर करती है।
- इससे पता चला कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान 6,074 करोड़ रुपये का दान प्राप्त हुआ, जो पिछले वर्ष की तुलना में 171% की वृद्धि को दर्शाता है।
सारांश
- वर्ष 2024-25 की ADR रिपोर्ट राष्ट्रीय दलों के दान में 161% की वृद्धि को उजागर करती है, जिसमें कॉर्पोरेट योगदान कुल का 92% से अधिक है।
- रिपोर्ट इलेक्टोरल ट्रस्टों के प्रभुत्व और भाजपा के कुल वित्तपोषण में 91% हिस्सेदारी पर बल देती है।
- यह डेटा लोकतांत्रिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये पारदर्शिता सुधारों और सख्त निर्वाचन आयोग (ECI) की निगरानी की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।
राजनीतिक वित्तपोषण/फंडिंग पर ADR रिपोर्ट के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- फंडिंग में भारी वृद्धि: राष्ट्रीय दलों को (20,000 रुपये से अधिक के) कुल दान में 161% की वृद्धि हुई, जो 6,648 करोड़ रुपये हो गया, जिसमें भाजपा का कुल राशि में 91% से अधिक का हिस्सा था।
- कॉर्पोरेट फंडिंग का प्रभुत्व: व्यावसायिक क्षेत्रों ने कुल दान का 92.18% योगदान दिया, जबकि व्यक्तिगत दाताओं का हिस्सा केवल 7.61% था।
- इलेक्टोरल ट्रस्टों की भूमिका: प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट सबसे बड़ा दाता बना हुआ है, जिसने भाजपा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) और आम आदमी पार्टी (AAP) को सामूहिक रूप से 2,413 करोड़ रुपये का योगदान दिया, जिसका एक बड़ा हिस्सा भाजपा के लिये निर्देशित था।
- भौगोलिक संकेंद्रण: दान की सबसे अधिक मात्रा दिल्ली से आई, उसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात का स्थान था।
- शून्य-घोषणा प्रवृत्ति: बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने 20,000 रुपये की सीमा से ऊपर शून्य दान घोषित करने का अपना 19-वर्षीय सिलसिला बनाए रखा।
राजनीतिक वित्तपोषण/फंडिंग
- परिचय: राजनीतिक वित्तपोषण उन तरीकों और स्रोतों को संदर्भित करता है जिनके माध्यम से राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपने परिचालन संबंधी खर्चों, चुनाव अभियानों और पार्टी की गतिविधियों को कवर करने के लिये वित्तीय संसाधन एकत्रित करते हैं।
- प्राथमिक स्रोत: भारत में राजनीतिक दल आमतौर पर निम्नलिखित चैनलों के माध्यम से धन प्राप्त करते हैं:
- व्यक्तिगत दान: नागरिकों से स्वैच्छिक योगदान; 2,000 रुपये से अधिक के दान नॉन-कैश मोड (चेक/डिजिटल) के माध्यम से किये जाने चाहिये।
- कॉर्पोरेट फंडिंग: कंपनियाँ पार्टियों को दान दे सकती हैं, बशर्ते वे अपने लाभ और हानि में कुल राशि का खुलासा करती हों (कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 182)।
- इलेक्टोरल ट्रस्ट/निर्वाचन न्यास: इलेक्टोरल ट्रस्ट राजनीतिक दलों के लिये कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत दान एकत्र करते हैं (नकद लेनदेन निषिद्ध)। उन्हें वार्षिक निधियों का 95% पंजीकृत दलों को वितरित करना होगा, केवल 5% प्रशासनिक लागतों के लिये रखना होगा।
- सार्वजनिक/राज्य वित्तपोषण: कुछ देशों में (हालाँकि भारत में पूरी तरह से नहीं), सरकार पिछले चुनावों में उनके प्रदर्शन के आधार पर दलों को धन प्रदान करती है। वर्तमान में, भारत में "अप्रत्यक्ष" राज्य वित्त पोषण है, जैसे– सार्वजनिक प्रसारकों पर मुफ्त प्रसारण समय और पार्टी कार्यालयों के लिये सब्सिडी वाली भूमि।
- पारदर्शिता संबंधी आवश्यकताएँ: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 की धारा 29C के तहत पार्टियों को टैक्स छूट का दावा करने के लिये 20,000 रुपये से अधिक के सभी दान के लिये निर्वाचन आयोग (ECI) को एक "योगदान रिपोर्ट" प्रस्तुत करनी होगी।
- वैधानिक प्रावधान:
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951: धारा 29A अनिवार्य करती है कि प्रत्येक राजनीतिक दल को दान और टैक्स छूट की पात्रता के लिये ECI के साथ पंजीकृत होना चाहिये।
- धारा 29B राजनीतिक दलों को किसी भी व्यक्ति या कंपनी (सरकारी कंपनियों और विदेशी स्रोतों को छोड़कर) से स्वैच्छिक योगदान स्वीकार करने की अनुमति देती है।
- आयकर अधिनियम, 1961: धारा 13A पंजीकृत राजनीतिक दलों को स्वैच्छिक योगदान, गृह संपत्ति और पूंजीगत लाभ से आय पर 100% टैक्स छूट प्रदान करती है।
- धारा 80GGC/80GGB एक पंजीकृत राजनीतिक दल या एक इलेक्टोरल ट्रस्ट को किये गए योगदान के लिये व्यक्तियों (80GGC) और कंपनियों (80GGB) को सकल आय से 100% कटौती की अनुमति देती है, बशर्ते भुगतान नकद में न हो।
- कंपनी अधिनियम, 2013: धारा 182 के तहत केवल 3 वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में आई कंपनियाँ ही राजनीतिक योगदान कर सकती हैं। सरकारी कंपनियाँ सख्त वर्जित हैं। पहले, औसत शुद्ध लाभ के 7.5% की सीमा थी, लेकिन वित्त अधिनियम, 2017 ने इस सीमा को हटा दिया।
- कंपनियों को अपने लाभ और हानि में योगदान की कुल राशि और प्राप्तकर्त्ता राजनीतिक दल के नाम का खुलासा करना होगा।
- विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 2010: धारा 3 स्पष्ट रूप से चुनाव के लिये उम्मीदवारों, विधानमंडलों के सदस्यों और राजनीतिक दलों को किसी भी "विदेशी योगदान" को स्वीकार करने से प्रतिबंधित करती है।
- हालाँकि वित्त अधिनियम, 2016 और वित्त अधिनियम, 2018 पूर्वव्यापी संशोधनों के तहत एक भारतीय कंपनी को "विदेशी स्रोत" नहीं माना जाता है, भले ही उसके 50% से अधिक शेयर पूंजी एक विदेशी इकाई के पास हो, बशर्ते वह विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA) (और इसके तहत अधिसूचित FDI नीति) के तहत निर्धारित क्षेत्रीय सीमाओं और अन्य सीमाओं का अनुपालन करती है।
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951: धारा 29A अनिवार्य करती है कि प्रत्येक राजनीतिक दल को दान और टैक्स छूट की पात्रता के लिये ECI के साथ पंजीकृत होना चाहिये।
भारत में राजनीतिक वित्तपोषण/फंडिंग का परिदृश्य किस प्रकार विकसित हुआ है?
- वर्ष 2017 से पूर्व का काल: वर्ष 2017 से पूर्व यह व्यवस्था काफी हद तक अनौपचारिक थी। अधिकांश दान नकद में किये जाते थे, जिसमें 20,000 रुपये की रिपोर्टिंग सीमा थी। पार्टियाँ अक्सर प्रकटीकरण से बचने के लिये बड़े दान को छोटे "बेनाम" हिस्सों में तोड़ देती थीं।
- कंपनियों को पिछले तीन वर्षों के अपने औसत शुद्ध लाभ के 7.5% से अधिक दान करने से प्रतिबंधित किया गया था।
- इलेक्टोरल बॉन्ड का समय (2018–24): इसने सार्वजनिक पारदर्शिता पर दाता की गोपनीयता को प्राथमिकता दी। जबकि इसने धन को बैंकिंग सिस्टम में सफलतापूर्वक स्थानांतरित कर दिया ("ब्लैक मनी" को कम कर दिया), इसने एक सूचना असममिति उत्पन्न कर दी जहाँ जनता को यह नहीं पता था कि कौन किसे वित्तपोषित कर रहा है।
- 7.5% कॉर्पोरेट लाभ सीमा को हटा दिया गया और कंपनियों के लिये अपने लाभ और हानि में यह प्रकट करने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया था कि उन्होंने किस पार्टी को वित्तपोषित किया है।
- सर्वोच्च न्यायालय इलेक्टोरल बॉन्ड निर्णय, 2024: लोकतांत्रिक सुधार संघ एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य मामला 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार दिया। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि बेनामी फंडिंग अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है।
- न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि असीमित कॉर्पोरेट फंडिंग "संस्थागत भ्रष्टाचार" को जन्म दे सकती है जहाँ नीतियाँ बड़े दाताओं द्वारा प्रभावित होती हैं।
- वर्तमान परिदृश्य (2025–26): बॉण्ड पर प्रतिबंध के बाद राजनीतिक फंडिंग फिर से तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित हो गई है:
- चुनावी ट्रस्ट: ये मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं। कंपनियाँ इन ट्रस्टों (जैसे– प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट) को दान देती हैं, जो बाद में इस धनराशि को राजनीतिक दलों में वितरित करते हैं।
- प्रत्यक्ष कॉर्पोरेट/व्यक्तिगत दान: राजनीतिक दल अब फिर से सीधे चेक और डिजिटल ट्रांसफर के माध्यम से धन प्राप्त कर रहे हैं।
- डिजिटल रिपोर्टिंग (IEMS): भारत निर्वाचन आयोग (ECI) अब एकीकृत चुनाव प्रबंधन प्रणाली (IEMS) के माध्यम से योगदान रिपोर्टों को ऑनलाइन दाखिल करना अनिवार्य करता है, ताकि ऑडिट प्रक्रिया को तेज़ और अधिक पारदर्शी बनाया जा सके।
चुनावों में वित्तीय पारदर्शिता लोकतांत्रिक जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करती है?
- ‘क्विड प्रो क्वो’ व्यवस्थाओं को रोकना: पारदर्शिता के अभाव में बड़े कॉर्पोरेट दानदाता राजनीतिक दलों को भारी मात्रा में धन देकर सत्ता में आने के बाद अनुकूल नीतियों, लाइसेंसों या ठेकों के रूप में लाभ प्राप्त कर सकते हैं। पारदर्शिता इन लेन-देन को सार्वजनिक दृष्टि में लाकर ‘राजनीति–कॉर्पोरेट गठजोड़’ पर एक प्रकार का अंकुश लगाती है।
- समान अवसर सुनिश्चित करना: चुनाव में विचारों की प्रतिस्पर्द्धा होनी चाहिये, न कि धन के ताकत की। धन के स्रोत की जानकारी होने से भारत निर्वाचन आयोग (ECI) खर्च की सीमाओं को बेहतर ढंग से लागू कर सकता है, जिससे ‘वित्तीय होड़’ को रोका जा सके और आम नागरिक को हाशिये पर जाने से बचाया जा सके।
- राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा: विदेशी संस्थाएँ देश की नीतियों को प्रभावित करने के उद्देश्य से कुछ खास उम्मीदवारों या राजनीतिक दलों को वित्तीय सहायता देने की कोशिश कर सकती हैं। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, 2010 (FCRA, 2010) का कड़ाई से पालन और अनिवार्य पारदर्शिता यह सुनिश्चित करती है कि राजनीतिक दल विदेशी हितों के प्रभाव में न आएँ।
- ‘सूचित मतदाता’ को सशक्त बनाना: प्रत्येक मतदाता का यह अधिकार है कि वह जाने कि किसी उम्मीदवार के पीछे वित्तीय समर्थन कौन दे रहा है। यदि किसी उम्मीदवार को ऐसे उद्योगों से धन मिल रहा है, जिनसे मतदाता असहमत है (जैसे– तंबाकू या खनन क्षेत्र), तो यह जानकारी उसे सोच-समझकर और तर्कसंगत निर्णय लेने में मदद करती है।
- जब फंडिंग में पारदर्शिता होती है, तब जनता का जनादेश उम्मीदवार की वास्तविक निष्ठाओं और समर्थन के स्रोतों की स्पष्ट जानकारी पर आधारित होता है।
- संवैधानिक दृष्टिकोण: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉण्ड योजना को इसलिये रद्द कर दिया क्योंकि इससे राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता प्रभावित हो रही थी। न्यायालय के अनुसार, कालेधन पर अंकुश लगाना भले ही उचित उद्देश्य हो, लेकिन इसके नाम पर पूरी फंडिंग प्रक्रिया को गुमनाम रखना उचित नहीं है।
राजनीतिक वित्तपोषण पर प्रमुख समितियाँ/आयोग
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समिति/आयोग |
मुख्य केंद्र और सुझाव |
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तारकुंडे समिति (1974-75) |
सिफारिश की गई कि राजनीतिक दलों को अपने ऑडिट किये गए खातों को प्रस्तुत करना अनिवार्य होना चाहिये और भारत निर्वाचन आयोग को एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में स्थापित किया जाना चाहिये। |
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दिनेश गोस्वामी समिति (1990) |
प्रस्तावित आंशिक 'वस्तुगत' राज्य वित्तपोषण (जैसे– ईंधन, स्टेशनरी) और कंपनियों द्वारा दिये जाने वाले दान पर प्रतिबंध का सुझाव, ताकि 'अनुचित गठबंधन' (नेक्सस) को कम किया जा सके। |
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इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) |
विशेष रूप से 'चुनावों के राज्य वित्तपोषण' पर विचार किया गया। इसमें समान अवसर सुनिश्चित करने के लिये सरकारी सहायता का समर्थन किया गया, लेकिन यह केवल 'मान्यता प्राप्त' दलों हेतु है और वह भी केवल 'वस्तुगत' (In-kind) रूप में होनी चाहिये, न कि नकद (Cash) में। |
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विधि आयोग (170वीं रिपोर्ट, 1999) |
यह तर्क दिया गया कि राज्य द्वारा चुनावी वित्तपोषण “वांछनीय” है, लेकिन केवल तब जब राजनीतिक दलों को अन्य स्रोतों से धन लेने पर सख्ती से प्रतिबंध हो और उनके भीतर आंतरिक लोकतंत्र सुनिश्चित किया जाए। |
भारत में पारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण सुनिश्चित करने के लिये कौन-से सुधार आवश्यक हैं?
- अनिवार्य और त्वरित (रियल-टाइम) प्रकटीकरण: अभी राजनीतिक दल केवल ₹20,000 से अधिक के व्यक्तिगत चंदों की ही वार्षिक रिपोर्ट देते हैं। इस सीमा को घटाकर (जैसे– ₹2,000) करना चाहिये, ताकि बड़े दान को कई छोटे, गुमनाम हिस्सों में बांटकर छिपाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके।
- चुनावों का राज्य वित्तपोषण (वस्तु के रूप में): इंद्रजीत गुप्त समिति (1998) ने 'आंशिक राज्य वित्तपोषण' का प्रस्ताव दिया था, जिसमें नकद राशि देने के बजाय वस्तुगत सुविधाएँ प्रदान करने की बात कही गई थी। इसमें मीडिया पर मुफ्त प्रसारण समय, वाहनों के लिये ईंधन, पोस्टरों हेतु कागज़ और बिना किराए के कार्यालय स्थान जैसी सुविधाएँ शामिल थीं।
- कुछ विशेषज्ञ एक केंद्रीकृत फंड (चुनावी ट्रस्ट के समान) की स्थापना का सुझाव देते हैं, जिसमें कॉर्पोरेट बिना किसी विशेष दल का चयन किये गुमनाम रूप से योगदान कर सकें। इसके बाद भारत निर्वाचन आयोग (ECI) इन धनराशियों का वितरण राजनीतिक दलों को उनके पिछले मत प्रतिशत के आधार पर करे।
- पार्टी व्यय पर सीमा: वर्तमान में उम्मीदवारों के खर्च पर तो कानूनी सीमा तय है, लेकिन राजनीतिक दलों के कुल चुनावी खर्च पर कोई निश्चित सीमा नहीं है। इसलिये यह आवश्यक है कि चुनाव अवधि के दौरान दलों के कुल व्यय पर एक स्पष्ट सीमा निर्धारित की जाए, ताकि छोटे दलों के लिये भी निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित हो सके।
- भारत के विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट (2015) में यह सिफारिश की गई है कि राजनीतिक दलों के कुल खर्च पर भी सीमा तय की जानी चाहिये, ताकि उम्मीदवारों पर लागू व्यय सीमाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
- स्वतंत्र लेखापरीक्षा: अभी राजनीतिक दल अपने ऑडिटर स्वयं नियुक्त करते हैं। इसे बदलते हुए यह अनिवार्य किया जाना चाहिये कि दलों के खातों की जाँच भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) या भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मान्यता प्राप्त ऑडिटरों के पैनल से कराई जाए। इससे ऑडिट प्रक्रिया निष्पक्ष और कठोर सुनिश्चित हो सकेगी।
- कॉर्पोरेट प्रभाव को अलग करना: कॉर्पोरेट दान पर लगी सीमा (जो पहले शुद्ध लाभ का 7.5% थी) को पुन: लागू करना, ताकि घाटे में चल रही 'शेल कंपनियों' का उपयोग मनी लॉन्ड्रिंग के माध्यम से चंदा देने के लिये न किया जा सके।
- कंपनियों के लिये यह अनिवार्य किया जाए कि वे राजनीतिक चंदा देने से पहले वार्षिक आम बैठकों (AGMs) के दौरान शेयरधारकों से स्पष्ट अनुमोदन प्राप्त करें।
- भारत निर्वाचन आयोग को अधिक अधिकार देना: वर्तमान में वित्तीय नियमों के उल्लंघन पर राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई करने की इसकी शक्तियाँ सीमित हैं। इसलिये इसे कानूनी रूप से यह अधिकार दिया जाना चाहिये कि यदि कोई दल ऑडिटेड खाते जमा नहीं करता या फंडिंग नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सके।
निष्कर्ष
राजनीतिक चंदों में वृद्धि, जो कॉर्पोरेट हितों और कुछ विशेष दलों के प्रभुत्व में है, वित्त और शासन के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर्संबंध को उजागर करती है। इन असमानताओं को दूर करने के लिये दलों के व्यय पर सीमा निर्धारित करना, कॉर्पोरेट दान की सीमाओं को पुनः लागू करना तथा निर्वाचन आयोग (ECI) को पंजीकरण निरस्त करने की शक्तियाँ प्रदान करना आवश्यक है, ताकि लोकतांत्रिक अखंडता की रक्षा हो सके और समान अवसर सुनिश्चित किया जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. राजनीति में कालेधन के प्रभाव को कम करने के उपाय के रूप में भारत में चुनावों के राज्य वित्तपोषण की व्यवहार्यता पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29C का क्या महत्त्व है?
यह राजनीतिक दलों को ₹20,000 से अधिक के चंदों की वार्षिक जानकारी निर्वाचन आयोग (ECI) को देने के लिये बाध्य करता है; ऐसा न करने पर उन्हें आयकर अधिनियम की धारा 13A के तहत मिलने वाली कर छूट से वंचित कर दिया जाता है।
2. वित्त अधिनियम, 2017 ने कॉर्पोरेट राजनीतिक वित्तपोषण में क्या परिवर्तन किया?
इसने दान पर पूर्व निर्धारित 7.5% औसत शुद्ध लाभ की सीमा को हटा दिया, जिससे कंपनियों (यहाँ तक कि घाटे में चल रही कंपनियों) को भी राजनीतिक दलों को असीमित राशि दान करने की अनुमति मिल गई।
3. क्या भारतीय राजनीतिक दलों को विदेशी योगदान की अनुमति है?
नहीं, FCRA 2010 इसे प्रतिबंधित करता है; हालाँकि, हाल के संशोधन भारतीय कंपनियों से 50% से अधिक विदेशी शेयरधारिता वाले दान की अनुमति देते हैं यदि वे FEMA दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)
- भारत का निर्वाचन आयोग पाँच-सदस्यीय निकाय है।
- संघ का गृह मंत्रालय आम चुनाव और उप-चुनावों दोनों के लिये चुनाव कार्यक्रम तय करता है।
- निर्वाचन आयोग मान्यता-प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवाद निपटाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 3
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के इस्तेमाल संबंधी हाल के विवाद के आलोक में, भारत में चुनावों की विश्वास्यता सुनिश्चित करने के लिये भारत के निर्वाचन आयोग के समक्ष क्या-क्या चुनौतियाँ है? (2018)
प्रश्न. भारत में लोकतंत्र की गुणता को बढ़ाने के लिये भारत के चुनाव आयोग ने 2016 में चुनावी सुधारों का प्रस्ताव दिया है। सुझाए गए सुधार क्या हैं और लोकतंत्र को सफल बनाने में वे किस सीमा तक महत्त्वपूर्ण हैं? (2017)

