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हार और जीत जीवन की क्रियाएँ हैं जीवन नहीं

ओलंपिक खत्म हो चुका है। विजेता अपने देश लौट चुके हैं और वे भी जो विजेता की कतार में शामिल नहीं हो सके। एक से उद्यम में शामिल होने का ख्वाब देखने वाले सारे लोग उस यात्रा से लौट चुके हैं। दुनिया ने उन्हें देखा, उनकी यात्रा को देखा, पर याद किन्हें रखा? याद किन्हें रखा जाएगा? आपसे कोई पूछे कि भारत से कितने लोग इस ओलंपिक यात्रा में शामिल हुए थे तो आप शायद ही इसका जबाव दे सकें, लेकिन अगर कोई आपसे विजेताओं के नाम पूछ ले तो आप गिरते उठते नाम गिना ही देंगे। या हो सकता है कि आप कुछ नाम भूल जाएँ लेकिन आपकी सदिच्छा यही होगी कि सारे नाम आपको याद आ जाएँ, लेकिन हारे हुए लोगों के लिए ऐसा भाव मन में नहीं आता। केवल ओलंपिक ही नहीं, जीवन के किसी भी क्षेत्र में हम केवल विजेताओं को ही याद रखते हैं। भाषा के सबसे सुंदर शब्द, अलंकार के सबसे उन्नत रूप और व्याकरण की सबसे प्रभावशाली नियम इन्हीं पर खर्चते हैं। और जिनके माथे पर विजयी होने का निशान नहीं होता, उनके लिए कुछ सुंदर प्रतीत होने वाले खोखले शब्द और 'आगे जीतने' की कामना करने वाले आशीर्वचन इस्तेमाल में लाए जाते हैं। हो सकता है आप सोचें कि इसमें गलत क्या है? जब सब का प्रयास ही जीतने का है तो सफलता-असफलता का निर्धारण भी तो इसी अनुरूप होगा? इस नजरिये से जीतने की धारणा में कोई बुराई नहीं है लेकिन हारने को खारिज कर देने के समानार्थी बना देने में गंभीर दिक्कतें हैं।

दरअसल, आधुनिक समाज ने प्रगति की धारणा को जीवन के आदर्श के रूप में इस मजबूती से स्थापित कर दिया है कि इसे पाने के लिए व्यक्ति स्वयं अपने ही विरुद्ध चले जाने को तैयार हो जा रहा है। या थोड़ा आगे बढ़कर यों कहें कि व्यक्ति के मानस को सफलता/जीत आदि जैसे शब्दों को अपने अस्तित्व से बड़ा मानने के लिए तैयार कर लिया गया है और उसे प्रोत्साहित किया जाता है कि इसके लिए वो अपनी इयत्ता के पार चला जाए। आप देखिए न सफलता के लिए 'कठोर श्रम' की यंत्रणा को झेलने के लिए व्यक्ति न केवल तैयार होता है बल्कि समाज उसकी इस तैयारी को सराहता भी है। जब आप किसी ओलंपिक विजेता की इस यात्रा को जानते हैं कि वो अपने स्वजनों से दूर दुनियादारी से विलग होकर जीत के लिए 'कठिन परिश्रम' कर रहा था तो आप उसे कितना सराहते हैं। आप सोचते हैं कि व्यक्ति का यह त्याग उच्च कोटि का है और सफलता के लिए ऐसे ही प्रयासों की आवश्यकता है। क्या आप कभी इस पर विचार करते हैं कि आखिर किसी एक खेल में सफलता के लिए व्यक्ति को अपने ही विरुद्ध यंत्रणा के लिए तैयार करना कितना उचित है? आखिर यह कैसे तय हुआ कि अपनी दुनिया से अलग होकर किसी निर्वात में सफलता के लिए परिश्रम करना श्रेष्ठ है? इसका मूल्य कैसे तय होता है? इस प्रक्रिया में कौन सफल हुआ और कौन असफल इसका निर्धारण कैसे हुआ? शायद इसका कोई संतोषजनक उत्तर न मिले या हम कभी इस तरह से सोचते ही नहीं क्योंकि समाज की प्रतिक्रिया से ही सफलता-असफलता का निर्धारण तय हुआ मान लेते हैं और यह निर्धारण काफी स्पष्ट होता है। 

अपने आंतरिक संयोजनों से विरोध कर भौतिक उपलब्धियों के लिए जीने की विवशता आधुनिक जीवन की सच्चाई है। इस सच्चाई की विडंबना यह है कि इस विवशता को बहुधा आदर्श मान लिया जाता है। अपने जीवन में कैरियर की ऊंचाइयों को तलाशने वाला किसी दफ्तर का कर्मचारी जब जीने के लिए मुट्ठी भर समय नहीं पा पाता तब ऊंचाई की तलाश करते उसके कठिन तप को किस आधार पर सफलता कहा जाए? थोड़े से बेहतर भौतिक परिवेश के लिए अपनी नातेदारी से बाहर किसी अजनबी भूगोल में विसंस्कृत जीवन जी रहे लोगों को आर्थिक हैसियत बढ़ा लेने के बाद भी सफल कैसे कहा जाए? दोस्ती-प्रेम को छोड़कर एकाकी जीवन से भौतिक लक्ष्य को साध लेने की इच्छा को सार्थक कैसे कहा जाए? बिना आंतरिक शांति के, जीवन के आनंद के, इस कर्मयोग में स्वाभाविक भागीदारी के किसी प्रयास की सार्थकता का मूल्यांकन करना त्रुटिपूर्ण है। भौतिक उपलब्धियों का ढेर अंतस के खाली होने की कीमत पर भी हो सकता है। जीत हार जीवन की क्रियाएँ हैं, इसे जीवन बना देना गलत है। जीवन की गति के साथ ये क्रियाएँ स्वत: संपादित होती रहती हैं लेकिन एक क्रिया को माथे पर जगह देना और दूसरी को खारिज कर देना गलत है। हार काम्य नहीं है लेकिन जीत के लिए खुद को कष्ट के लिए तैयार करना बुरा है। और तब तो और अधिक जब इस कष्ट से लोक कल्याण पर कोई सकारात्मक हस्तक्षेप न होता हो। बाह्य जीवन और आंतरिक जीवन की सुसंगतता ही कर्मक्षेत्र के मूल में हो। जीवन का आनंद, आनंद का जीवन इसी में निहित है। 'आगे बढ़ने' , 'सफलता' और 'प्रगति' जैसे शब्दों के नए अर्थ तय करने होंगे और उसके मूल में भी आंतरिक-बाह्य की सुसंगतता ही हो।

[सन्नी कुमार]

(लेखक इतिहास के अध्येता हैं तथा दृष्टि समूह में 'क्रिएटिव हेड' के रूप में कार्यरत हैं)

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