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कोविड-19 से कितनी बदलेगी दुनिया!

  • 06 May, 2021

कोविड-19 का प्रभाव वैश्विक राजनीति पर कितना पड़ा है या पड़ सकता है, इस आशय के सेमिनार, लेख और किताबें पिछले साल ही खूब होने-छपने शुरू हो गए थे। उस वक्त तक तो इस महामारी के बारे में ही कितनी ही बातें अनिश्चित थीं, फिर वैश्विक विन्यास पर इसके असर को जाँचने के लिये अवकाश भी तो हो! विश्व-राजनीति एक बेहद जटिल परिसंरचना है और इसके साथ ही इसमें गतिशील घटक भी खूब हैं।  इसके संरचनात्मक एवं प्रकार्यात्मक प्रभावों को एक सीमा तक समझने के लिये अब एक उचित समय है।

 वैश्विक व्यवस्था एवं वैश्विक विन्यास उपागम

अंतर्राष्ट्रीय संबंध के अनुशासन में विभिन्न समयों में देशों के परस्पर संबंधों की व्याख्या के लिये वैश्विक व्यवस्था उपागम (World System Approach) एवं वैश्विक विन्यास (World Order) प्रविधि प्रयोग में लाई जाती है। देशों के व्यवहार एवं क्षमता के आधार पर किसी काल विशेष में उन्हें श्रेणीबद्ध करना वैश्विक व्यवस्था उपागम है जैसे शीत काल के चरम पर दुनिया को द्विध्रुवीय व्यवस्था कहना-जिसमें दुनिया के देश या तो अमेरिकी गुट अथवा सोवियत गुट से सम्बद्ध थे। जैसे यह भी कि कोविड-19 के पहले तक दुनिया धीरे-धीरे बहुध्रुवीयता (Multipolarity) की तरफ बढ़ रही थी। वैश्विक विन्यास किसी खास समय में दुनिया के देश कैसी शक्ति-संरचना में हैं, पारस्परिक संबंधों के कैसे क्रम-निर्वहन में हैं- यही दिखलाता है। कोविड-19 के संदर्भ में हमें यही देखना है कि क्या इस महामारी ने अपने व्यापक प्रभाव में पूर्वस्थापित वैश्विक-विन्यास को और वैश्विक-व्यवस्था को बदला है या उसपर कोई निर्णायक प्रभाव डाला है अथवा नहीं?

कोई ऐसा जड़मूल बदलाव नहीं

अब इतना स्पष्ट है कि विश्व राजनीति में कोई ऐसा जड़मूल बदलाव नहीं होने जा रहा जो सर्वथा नवीन हो। कुछ प्रवृत्तियाँ जो पहले ही विश्व-राजनीति में विद्यमान थीं, वे उभर कर आई हैं। वैश्विक व्यवस्था की कुछ कमजोरियाँ पहले ही संज्ञान में थीं, वे अब अधिक प्रभाव के साथ प्रकट हुई हैं। कोई देश जो बहुत शक्तिशाली था, सहसा कमजोर हो गया, कोई मध्यम राष्ट्र सहसा शक्तिशाली राष्ट्रों की पंक्ति में आ मिला- ऐसा कोविड-19 के आने के बाद भी नहीं हुआ है। यह जरूर है कि इस आपदा के आने के बाद विश्व-राजनीति में कुछ नए तौर-तरीके अपनाए गए हैं और कुछ वैश्विक समझ पर भी एकराय बनती दिख रही है। साथ ही कुछ प्रभाव खासे स्पष्ट हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता।

अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

सबसे करारा असर कोविड-19 का दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। कोविड-19 के ठीक पहले भी दुनिया की लगभग सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ बहुत उत्साहजनक स्थिति में नहीं थीं और अमेरिका से शुरू होकर आर्थिक संरक्षणवाद धीरे-धीरे सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बना रहा था। कोविड-19 ने यों भी सीमाबंदी कर दी और सभी देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में व्यस्त होने लगे।पहले जहाँ वि-वैश्वीकरण (De-Globalisation) की प्रवृत्ति दबे पाँव विश्व में जगह बना रही थी, महामारी ने उसके लिये अपरिहार्यता बना दी, किन्तु सामान्य दिनों में आर्थिक संरक्षणवाद की नीति से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को पोषण मिल सकता है लेकिन आपदा के दिनों में तो इससे गरीबी, असमानता और बेरोजगारी के हालात और भी अधिक ख़राब हुए। कोविड-19 ने जिसतरह विकसित देशों के बुनियादी ढाँचों की भी कलई खोली है उससे उनके आर्थिक और कूटनीतिक साख पर भी प्रश्न उठे हैं। ध्यातव्य है कि कितने ही कूटनीतिक संबंधों की प्रस्तावना आर्थिक पहल पर टिकी होती है।

उग्र चीन का उभार लेकिन नेतृत्वहीन विश्व

यह तो स्पष्ट था ही कि चीन की आर्थिक-सामरिक तैयारी सर्वप्रमुख वैश्विक शक्ति बनने की है। चाहे वह अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध हो, चाहे उसकी ओबोर नीति हो या फिर उसकी रूस, उत्तर-कोरिया, पाकिस्तान, ईरान, टर्की आदि देशों से बढ़ती नजदीकियाँ रही हों, और फिर दुनिया के लगभग सभी क्षेत्रों में उसकी सक्रियता, आर्थिक निवेश एवं कूटनीतिक पहल भी इसी ओर ईशारा कर रहे थे। दुनिया ने चीन को कोविड-19 से उलझते तो देखा लेकिन लड़खड़ाते या गिरते नहीं देखा। जल्द ही संभलकर चीन सहसा खासा आक्रामक हो गया। भारत के साथ सीमा-विवाद, यूरोपीय यूनियन के साथ बिगड़ते संबंध, अमेरिका के साथ द्वंद्व, हांगकांग में और सख्ती, यहाँ तक कि रूस के साथ भी कुछ तकरार। मानो वक्त के पहले ही चीन ने समझ लिया हो कि वही दुनिया की सर्वप्रमुख शक्ति है। अभी चीन के आक्रामक रुख में थोड़ी नरमी जरुर आई है। अमेरिका कोविड-19 के दौर में भी दुनिया की सर्वप्रमुख शक्ति है अन्यथा निश्चित ही वैश्विक विन्यास चीन के सापेक्ष ही बनते-बिगड़ते। आपदा के इस समय में लेकिन अमेरिका नेतृत्व दे न सका और चीन का वैश्विक रुख वैसा दिखा नहीं।

वैश्विक संस्थाओं एवं बहुपक्षतावाद पर प्रश्न

यह देखा गया कि कोविड-19 के साथ ही जैसी अपेक्षा थी वैसे ही वैश्विक संस्थाएँ अपना योग देने में नाकाम रहीं। अपितु उनकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठे। वैश्विक स्वास्थ्य संगठन की कार्यप्रणाली तो खासा संदेह में रही। दुनिया के देश अपने-अपने राष्ट्रीय क्षमताओं के अनुरूप प्रयासरत रहे और वैश्विक संस्थाएँ कम से कम प्रारम्भ में अपनी भूमिका नहीं निभा पाईं। कोविड-19 के ठीक पहले जिस बहुपक्षतावाद की वकालत सभी देश करते थे, यह देखा गया कि देशों ने इसकी जगह कई द्विपक्षीय स्तर के संबंधों को वरीयता दी। एक बार फिर से बहुपक्षतावाद पर भरोसा जगने में खासा वक्त लगने वाला है। बहुपक्षतावाद महत्त्वपूर्ण इसलिये है क्योंकि उदारवादी वैश्विक व्यवस्था के सातत्य में यह एक स्वाभाविक विकास है। वैश्विक साझेदारियाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिये अहम् हैं लेकिन इसके लिये अभी माहौल जमता दिख नहीं रहा। इन्हीं समयों में यह भी देखा गया कि कई लोकतांत्रिक देशों ने आपदा का सहारा लेकर नागरिकों के ऊपर या तो नए नियंत्रण लगाए अथवा कई प्रतिबंध ही आरोपित कर दिए। ऐसा करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा एवं स्वास्थ्य का हवाला दिया गया। इसके प्रभाव निश्चित ही आने वाले समय में स्पष्ट होंगे।

दुनिया के देशों के सामने यह अब स्पष्ट हो गया है कि वैश्विक समस्याओं का निदान वैश्विक साझेदारियों में ही है। भारत ने इस आपदा में जैसी मदद दुनिया के देशों की, की है उससे इसकी कूटनीतिक साख में वृद्धि हुई है। भारत का अपनी विदेश नीति में बहुध्रुवीय संकल्प को दुहराना प्रशंसनीय है। हालॉंकि एक बार फिर से जिस तरह संकट गहराता जा रहा है, उससे इस बात की ही संभावना प्रबल हो रही है कि राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति ही प्राथमिक रहेंगी।

डॉ. श्रीश पाठक

(लेखक अंतर्राष्ट्रीय संबंध के प्राध्यापक हैं)

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