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झारखंड में ग्लोसोप्टेरिस के जीवाश्म मिले
चर्चा में क्यों?
झारखंड के उत्तरी करणपुरा बेसिन में स्थित ओपन-कास्ट कोयला खदानों से पौधों के जीवाश्मों का एक असाधारण संग्रह प्राप्त हुआ है। ये जीवाश्म उन प्राचीन पारिस्थितिक तंत्रों के विषय में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं जो लगभग 290 मिलियन वर्ष पूर्व अस्तित्व में थे, जब भारत दक्षिणी महाद्वीप गोंडवानालैंड का हिस्सा था।
मुख्य बिंदु:
- जीवाश्म खोज: शोधकर्त्ताओं ने अशोक कोयला खदान की 'शेल' (Shale) परतों से ग्लोसोप्टेरिस (Glossopteris) और संबंधित पौधों की कम से कम 14 प्रजातियों के जीवाश्म बरामद किये हैं।
- इनमें पत्तियाँ, जड़ें, बीजाणु (Spores) और पराग के निशान शामिल हैं, जो एक समृद्ध प्रागैतिहासिक वनस्पति समूह का संकेत देते हैं।
- गोंडवाना वनस्पति: 'पर्मियन काल' के दौरान दक्षिणी महाद्वीपों में ग्लोसोप्टेरिस बीज वाले पौधों का एक प्रमुख समूह था।
- झारखंड में इसकी प्रचुरता उन सघन दलदली वनों और परस्पर जुड़े नदी तंत्रों को दर्शाती है जो कभी इस क्षेत्र में मौजूद थे।
- जुवेनाइल मेल कोन (नर शंकु) की खोज: इस स्थल पर एक वैश्विक स्तर पर महत्त्वपूर्ण खोज दामोदर बेसिन में ग्लोसोप्टेरिस के पहले प्रलेखित 'जुवेनाइल मेल कोन' (अविकसित नर शंकु) की है।
- समुद्री संकेत: पेट्रोग्राफिक और भू-रासायनिक विश्लेषण (जिसमें फ्रैम्बोइडल पाइराइट और उच्च सल्फर सामग्री शामिल है) लवणीय जल की स्थिति और लगभग 280–290 मिलियन वर्ष पहले बेसिन में संभावित समुद्री अतिक्रमण का सुझाव देते हैं। यह प्राचीन समुद्र के स्तर में परिवर्तनों की हमारी समझ को बढ़ाता है।
- वैज्ञानिक महत्त्व: ये निष्कर्ष 'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कोल जियोलॉजी' में प्रकाशित हुए हैं और प्राचीन जलवायु तथा महाद्वीपीय वातावरण के पुनर्निर्माण में योगदान देते हैं।

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झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26
चर्चा में क्यों?
झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 को वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर द्वारा राज्य विधानसभा में प्रस्तुत किया गया, जिसमें राज्य की आर्थिक कार्यप्रणाली, संरचनात्मक परिवर्तनों, सामाजिक प्रगति तथा भावी संभावनाओं का विस्तृत मूल्यांकन किया गया है।
मुख्य बिंदु:
- सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP): वर्ष 2025-26 के लिये झारखंड का वास्तविक GSDP लगभग ₹3,21,892 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है, जिसमें लगभग 6.17% की वृद्धि दर्ज की जाएगी। यह महामारी काल से उबरने के बाद निरंतर आर्थिक विस्तार को दर्शाता है।
- वर्तमान मूल्यों पर राज्य की अर्थव्यवस्था के 2025-26 में ₹5.6 लाख करोड़ को पार करने तथा 2026-27 में लगभग ₹6.1 लाख करोड़ तक पहुँचने की संभावना है।
- ये अनुमान महामारी के बाद की प्रारंभिक तीव्र वृद्धि की तुलना में कुछ हद तक मंदी को दर्शाते हैं, फिर भी संरचनात्मक समेकन और पुनरुद्धार के अनुरूप मध्य-6% की सतत विकास दर बनाए रखते हैं।
- विकास की तुलना और संदर्भ: वर्ष 2024-25 में आर्थिक वृद्धि लगभग 7.02% आँकी गई है, जो राष्ट्रीय औसत (लगभग 6.5%) से अधिक है। यह क्रमिक चार वर्षों तक 7% से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है, जो राज्य की आर्थिक दृढ़ता और गति को रेखांकित करता है।
- प्रति व्यक्ति आय: वर्ष 2025-26 के सर्वेक्षण का एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि झारखंड की प्रति व्यक्ति आय पहली बार ₹1 लाख के स्तर को पार कर गई है। वर्ष 2024-25 में वर्तमान मूल्यों पर यह ₹1,16,663 तक पहुँच गई।
- अनुमान: वर्तमान मूल्यों पर प्रति व्यक्ति आय के और बढ़ने का अनुमान है—
- ₹1,25,677 (2025–26) और
- ₹1,35,195 (2026–27)
- वास्तविक मूल्यों (स्थिर कीमतों) पर प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2025-26 में लगभग ₹71,944 तथा वर्ष 2026-27 में लगभग ₹65,670 तक पहुँचने का अनुमान है।
- महत्त्व: प्रति व्यक्ति आय का ₹1 लाख के स्तर को पार करना एक प्रतीकात्मक और आर्थिक उपलब्धि है, जो झारखंड की अर्थव्यवस्था में बढ़ी हुई उत्पादकता तथा परिवारों की आय में सुधार को दर्शाता है।
- अनुमान: वर्तमान मूल्यों पर प्रति व्यक्ति आय के और बढ़ने का अनुमान है—
क्षेत्रीय संरचना एवं संरचनात्मक परिवर्तन:
- सेवा क्षेत्र: सेवा क्षेत्र राज्य की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदानकर्त्ता बनकर उभरा है। सकल राज्य मूल्यवर्द्धन (GSVA) में इसकी हिस्सेदारी वर्षों के दौरान उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है और यह कृषि तथा उद्योग दोनों से आगे निकल चुका है।
- सेवा क्षेत्र के अंतर्गत निर्माण गतिविधियों में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है, जो बढ़ते शहरीकरण और अवसंरचना परियोजनाओं का प्रतिबिंब है।
- औद्योगिक क्षेत्र: औद्योगिक क्षेत्र झारखंड के विकास का एक केंद्रीय आधार बना हुआ है।
- ऐतिहासिक आँकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में औद्योगिक गतिविधियों का राज्य के GSVA में लगभग 44.1% योगदान रहा है, जिससे झारखंड छत्तीसगढ़ और ओडिशा के साथ भारत के शीर्ष तीन औद्योगीकृत राज्यों में शामिल हो गया है।
- यह राज्य की आर्थिक संरचना में खनन, भारी उद्योगों तथा मध्यम एवं लघु उद्यमों के महत्त्व को दर्शाता है।
- कृषि एवं संबद्ध गतिविधियाँ: वर्ष 2025-26 में कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों का GSVA में योगदान लगभग 12.3% रहा, जो पहले की तुलना में कम है, किंतु निरपेक्ष रूप में इसका मूल्य बढ़ा है। यह कृषि उत्पादन में विस्तार बनाए रखते हुए अर्थव्यवस्था के विविधीकरण का संकेत देता है।
- हाल के वर्षों में कृषि का निरपेक्ष GSVA ₹28,470 करोड़ से बढ़कर अनुमानित ₹38,200 करोड़ हो गया है, जो उत्पादकता में वृद्धि को दर्शाता है।
- मुद्रास्फीति एवं मूल्य स्थिरता: आर्थिक सर्वेक्षण में मुद्रास्फीति में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है जो वर्ष 2023-24 में लगभग 6% से घटकर वर्ष 2024-25 में और कम स्तर पर आ गई।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच मुद्रास्फीति का अंतर भी कम हो गया है, जिससे क्षेत्रों के बीच अधिक समान मूल्य स्थिरता परिलक्षित होती है।
- RBI की ऊपरी सहनशील सीमा के भीतर या उससे नीचे मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखना उपभोक्ता विश्वास को बढ़ावा देता है तथा नागरिकों की वास्तविक क्रय-शक्ति में वृद्धि करता है, विशेषकर ऐसे राज्य में जहाँ ग्रामीण आबादी का अनुपात अधिक है।
- बहुआयामी गरीबी में कमी: झारखंड में बहुआयामी गरीबी में तीव्र गिरावट देखी गई है—
- वर्ष 2015-16 में 42.10% से घटकर वर्ष 2019-21 में लगभग 28.81% तक अर्थात 13 प्रतिशत अंकों से अधिक की कमी।
- यह गिरावट राष्ट्रीय औसत से अधिक है और आर्थिक वृद्धि तथा लक्षित सामाजिक हस्तक्षेपों के संयुक्त प्रभाव को दर्शाती है, जिनमें विद्युत उपलब्धता, स्वच्छता, स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन तथा पेयजल जैसी आवश्यक सेवाएँ शामिल हैं।
- प्रमुख योजनाएँ:
- मैया सम्मान योजना: 18-50 वर्ष की महिलाओं को ₹2,500 मासिक सहायता प्रदान करने हेतु ₹13,363 करोड़ (बजटीय राजस्व प्राप्तियों का 11%) का प्रावधान किया गया है।
- शिक्षा: झारखंड छात्र अनुसंधान एवं नवाचार नीति 2025 पर विशेष ज़ोर दिया गया है, साथ ही कौशल और फिन-टेक के लिये दो नए विश्वविद्यालयों की स्थापना का प्रस्ताव है।
- सामाजिक प्रगति: शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और ग्रामीण संपर्क जैसी सामाजिक अवसंरचना में निरंतर सुधार व्यापक मानव विकास परिणामों की नींव रखता है, जो प्रायः सतत आर्थिक विस्तार के साथ जुड़े होते हैं।
- MSME का विस्तार: राज्य में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) की संख्या में तीव्र वृद्धि देखी गई है।
- वर्ष 2025-26 के पहले नौ महीनों में 83,000 से अधिक नए उद्यम पंजीकरण दर्ज किये गए, जिनसे 3.34 लाख से अधिक लोगों को रोज़गार मिला। इनमें से 99% से अधिक इकाइयाँ सूक्ष्म उद्यमों की हैं।
- एक सशक्त MSME पारितंत्र रोज़गार सृजन के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, विशेषकर अर्द्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में तथा यह स्थानीय आपूर्ति शृंखलाओं को भी मज़बूत करता है।
- औद्योगिक विविधीकरण: सेवा और उद्योग क्षेत्रों में विस्तार कृषि पर निर्भरता से हटकर विविधीकृत आर्थिक संरचना की ओर संरचनात्मक बदलाव को दर्शाता है, जो दीर्घकालिक रोज़गार सृजन हेतु आवश्यक है।
- राजकोषीय परिप्रेक्ष्य: यद्यपि विस्तृत राजकोषीय तालिकाओं के लिये आधिकारिक राज्य आर्थिक सर्वेक्षण दस्तावेज़ ही प्रमुख स्रोत है, स्वतंत्र रिपोर्टों से यह संकेत मिलता है कि—
- बजट आवंटनों में समय के साथ उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और राज्य के गठन के बाद से कुल राजकोषीय आकार में लगभग 20 गुना विस्तार हुआ है।
- स्वयं के राजस्व स्रोतों में औसत वार्षिक दर से सुदृढ़ वृद्धि हुई है, जो बेहतर राजस्व संग्रहण को दर्शाती है।
- विकास की संभावनाएँ: अगले वित्तीय वर्ष (2026-27) के लिये झारखंड की अर्थव्यवस्था में लगभग 5.96% की वृद्धि का अनुमान है, जो चालू वर्ष की तुलना में थोड़ा कम है, किंतु यह मध्यम अवधि की सतत विकास पथ के भीतर बनी हुई है।
- विकास दर में यह नरमी महामारी-पश्चात तीव्र उछाल से संरचनात्मक समेकन और दीर्घकालिक स्थिरता की ओर संक्रमण के रूप में देखी जा रही है।
- दीर्घकालिक लक्ष्य: पूर्ववर्ती आर्थिक सर्वेक्षणों में महत्त्वाकांक्षी आर्थिक विस्तार लक्ष्यों का अनुमान लगाया गया है, जैसे वर्ष 2029-30 तक झारखंड को ₹10 लाख करोड़ (₹10 ट्रिलियन) की अर्थव्यवस्था बनाना, जो निरंतर नीतिगत समर्थन और निवेश प्रवाह पर निर्भर करेगा।
- बैंकिंग: 2025 तक राज्य में बैंक शाखाओं की संख्या बढ़कर 3,449 और ATM की संख्या 3,338 हो गई।
- विद्युत क्षेत्र: अगस्त 2025 तक स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता 3,212.95 मेगावाट तक पहुँच गई। वित्त वर्ष 2026 के बजट में उपभोक्ताओं को विद्युत सब्सिडी देने के लिये ₹5,005 करोड़ का प्रावधान किया गया है।

राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स Switch to English
उत्तर पूर्व में नवाचार को बढ़ावा देने हेतु NEST को स्वीकृति दी गई
चर्चा में क्यों?
भारत सरकार ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (NER) में अनुसंधान, नवाचार, कौशल विकास और उद्यमिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नॉर्थ ईस्टर्न साइंस एंड टेक्नोलॉजी क्लस्टर (NEST) की स्थापना हेतु एक परियोजना को स्वीकृति प्रदान की है।
मुख्य बिंदु:
- परियोजना स्वीकृति: NEST परियोजना को जुलाई 2025 में उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) तथा उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय (DoNER) की योजनाओं के अंतर्गत स्वीकृति दी गई। लगभग ₹22.98 करोड़ के परिव्यय के साथ इसका उद्देश्य उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (NER) में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अवसंरचना को सुदृढ़ करना है।
- कार्यान्वयन एजेंसी: इस परियोजना का क्रियान्वयन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी द्वारा किया जाएगा।
- चार विषयगत स्तंभ: NEST निम्नलिखित चार प्रमुख फोकस क्षेत्रों के माध्यम से कार्य करेगा—
- ग्रासरूट्स प्रौद्योगिकियों पर नवाचार केंद्र: स्थानीय समस्याओं के लिये तकनीकी समाधान को बढ़ावा देने हेतु।
- सेमीकंडक्टर एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिये प्रौद्योगिकी हब: भावी प्रौद्योगिकी प्रवृत्तियों के अनुरूप।
- बाँस-आधारित प्रौद्योगिकी के लिये उत्कृष्टता केंद्र: क्षेत्रीय संसाधनों का उपयोग करते हुए उत्पाद एवं प्रक्रिया नवाचार को प्रोत्साहित करने हेतु।
- जैव-अवक्रमणीय एवं पर्यावरण-अनुकूल प्लास्टिक के लिये कौशल विकास एवं नवाचार केंद्र: सतत प्रौद्योगिकी और उद्यमिता को बढ़ावा देने हेतु।
- उद्देश्य:NEST क्लस्टर का उद्देश्य उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के युवाओं विशेष रूप से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति, महिलाओं और दिव्यांगजनों को स्वरोज़गार तथा उद्यमिता के लिये सशक्त बनाना है। साथ ही क्षमता निर्माण, अनुसंधान हस्तक्षेप और उत्पादों के व्यावसायीकरण के माध्यम से MSMEs को सुदृढ़ करना है।
- यह अकादमिक संस्थानों, अनुसंधान संगठनों, उद्योग भागीदारों और सरकारी एजेंसियों को जोड़ने के लिये हब-एंड-स्पोक मॉडल अपनाएगा, जिससे स्थानीय स्तर पर R&D हस्तक्षेप, नवोन्मेषी पारिस्थितिकी प्रणाली तथा कौशल विकास को बढ़ावा मिल सके।
- महत्त्व: नॉर्थ ईस्टर्न साइंस एंड टेक्नोलॉजी क्लस्टर (NEST) की स्वीकृति भारत सरकार की एक रणनीतिक पहल है, जिसका उद्देश्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार का उपयोग कर उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में समावेशी विकास, रोज़गार सृजन तथा उद्यमशील वृद्धि को प्रोत्साहित करना है। यह क्षेत्रीय सशक्तीकरण और प्रौद्योगिकी-आधारित आर्थिक रूपांतरण के व्यापक लक्ष्यों के अनुरूप है।
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और पढ़ें: उत्तर पूर्वी क्षेत्र (NER), उत्तर पूर्वी परिषद (NEC), सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, MSME |

राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स Switch to English
थान्या नाथन केरल की पहली दृष्टिहीन महिला न्यायाधीश बनेंगी
चर्चा में क्यों?
थान्या नाथन इतिहास रचने जा रही हैं, क्योंकि वे केरल की पहली दृष्टिबाधित (पूर्णतः दृष्टिहीन) महिला न्यायाधीश बनने वाली हैं।
मुख्य बिंदु:
- ऐतिहासिक उपलब्धि: थान्या नाथन केरल की न्यायपालिका में न्यायाधीश नियुक्त होने वाली पहली पूर्णतः दृष्टिहीन महिला होंगी।
- सफलता: उन्होंने केरल न्यायिक सेवा में प्रवेश हेतु आयोजित सिविल जज (जूनियर डिवीजन) प्रतियोगी परीक्षा में बेंचमार्क दिव्यांग श्रेणी में शीर्ष स्थान प्राप्त किया।
- दृष्टिबाधा के बावजूद उन्होंने सुलभ शिक्षण उपकरणों और डिजिटल सहायता प्रणालियों के सहयोग से विधि शिक्षा पूरी की।
- न्यायिक समावेशन: उनकी उपलब्धि वर्ष 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक निर्णय के बाद संभव हुई, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों को न्यायिक सेवा की पात्रता से वंचित नहीं किया जा सकता।
- उनकी नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के अंतर्गत समता तथा भेदभाव-निषेध के सिद्धांतों को प्रतिबिंबित करती है, जो लोक सेवाओं में समान अवसर सुनिश्चित करते हैं।
- महत्त्व: थान्या की सफलता न केवल दिव्यांग व्यक्तियों के लिये प्रेरणास्रोत है, बल्कि भारत के विधि पेशे को अधिक सुलभ और समावेशी बनाने के सतत प्रयासों को भी सशक्त बनाती है।
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और पढ़ें: सर्वोच्च न्यायालय, भारतीय संविधान, दिव्यांगजन |



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