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राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे मधुमक्खी गलियारे विकसित करेगा NHAI

  • 24 Feb 2026
  • 17 min read

चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने अपनी सतत अवसंरचना विकास रणनीति के तहत भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों के कुछ हिस्सों के साथ परागण-अनुकूल ‘मधुमक्खी गलियारे’ विकसित करने की एक अग्रणी पहल की घोषणा की है।

मुख्य बिंदु:

  • अपनी तरह की पहली पहल: NHAI का ‘मधुमक्खी गलियारे’ कार्यक्रम सड़क किनारे की वृक्षारोपण पट्टियों को केवल सजावटी हरियाली से बदलकर पारिस्थितिक रूप से कार्यात्मक हरित गलियारों में परिवर्तित करेगा, जो मधुमक्खियों तथा जंगली मधुमक्खियों जैसे परागणकर्त्ताओं को समर्थन प्रदान करेंगे।
  • उद्देश्य: इस परियोजना का लक्ष्य घटती परागणकर्त्ता आबादी की समस्या का समाधान करना, जैव विविधता को बढ़ावा देना तथा कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण फसल परागण जैसी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को सुदृढ़ करना है।
    • मधुमक्खी गलियारे में निरंतर रैखिक वनस्पति पट्टियाँ विकसित की जाएंगी, जिनमें फूलदार वृक्ष, झाड़ियाँ, औषधीय पौधे और घास शामिल होंगी, जो पूरे वर्ष पराग तथा मधुरस उपलब्ध कराएंगी।
  • देशज प्रजातियाँ: नीम, करंज, महुआ, पलाश, बॉटल ब्रश, जामुन और सिरिस जैसी प्रजातियाँ, जो मधुरस तथा पराग से समृद्ध मानी जाती हैं, क्रमबद्ध (स्टैगर्ड) पुष्पन पैटर्न के साथ लगाई जाएंगी, ताकि पूरे वर्ष परागणकर्त्ताओं को निरंतर समर्थन मिल सके।
  • कार्यान्वयन रणनीति: NHAI के क्षेत्रीय कार्यालय कृषि-जलवायु परिस्थितियों और स्थानीय पारिस्थितिक उपयुक्तता के आधार पर राष्ट्रीय राजमार्गों के उपयुक्त हिस्सों तथा खाली भूमि खंडों की पहचान करेंगे।
    • वित्तीय वर्ष 2026-27 में NHAI राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे लगभग 40 लाख वृक्ष लगाने की योजना बना रहा है, जिनमें से लगभग 60% ‘मधुमक्खी गलियारे’ पहल के अंतर्गत लगाए जाएंगे।
    • इस अवधि में कम से कम तीन समर्पित परागणकर्ता गलियारों के विकास की अपेक्षा है।
  • महत्त्व: NHAI की ‘मधुमक्खी गलियारे’ पहल अवसंरचना-आधारित पारिस्थितिक पुनर्स्थापन का एक अभिनव मॉडल प्रस्तुत करती है, जिसके माध्यम से भारत के राजमार्ग नेटवर्क का उपयोग परागणकर्त्ताओं के आवास और जैव विविधता को समर्थन देने के लिये किया जाएगा।

और पढ़ें:  भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI), मधुमक्खी गलियारे, हरित गलियारे, कृषि-जलवायु, जैव विविधता

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