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सी.वी. रमन : भारत में विज्ञान के नेतृत्वकर्ता

सी.वी. रमन कहते हैं - “हमेशा सही सवाल पूछें, फिर देखना प्रकृति अपने सभी रहस्यों के द्वार खोल देगी।” वे ये भी कहते हैं कि “शिक्षा का उद्देश्य लोगों को स्वतंत्र रूप से सोचने और अपने स्वयं के निर्णय लेने के लिये  सक्षम बनाना है।” उनके विचार से यही प्रतीत होता है कि सी.वी. रमन सीखने-सिखाने व तर्कसंगत सवाल करने के पक्षधर थे। विज्ञान और वैज्ञानिक क्यों व कैसे में न पड़ें तो खोज व आविष्कार कैसे हो पाएगा? शिक्षा को मनुष्य की सबसे बड़ी ज़रूरत मानने वाले सी वी रमन का पूरा नाम ‘चंद्रशेखर वेंकटरमन’ था। खोजी प्रवृत्ति के धनी सी. वी. रमन ने वर्ष 1930 में भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीता। श्री रमन द्वारा जीते गए नोबेल पुरस्कार ने भारतीय वैज्ञानिक समुदाय की ओर पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया।

दरअसल इस संसार में इंसान अपने कार्यों से प्रभाव छोड़ता है। उनके प्रभावों से उनकी शख्सियत बनती है। इतिहास गवाह है कि सी.वी. रमन के ‘रमन प्रभाव’ ने वैश्विक पटल पर इतना उम्दा प्रभाव छोड़ा कि वे हमेशा के लिये महान वैज्ञानिकों की सूची में शामिल हो गए। भारतरत्न, भौतिकी का नोबेल पुरस्कार, फ्रेंकलिन मेडल, लेनिन शांति पुरस्कार और रॉयल सोसाइटी ने सी.वी. रमन की प्रतिष्ठा व लोकप्रियता में उत्तरोत्तर वृद्धि की। आज दुनिया जिस सी.वी. रमन को जानती है उनके बनने की प्रक्रिया तप-त्याग से होकर गुज़री है।

“अपनी नाकामयाबियों के लिये मैं खुद ज़िम्मेदार हूँ, अगर मैं नाकामयाब नहीं होता तो इतना सब कुछ कैसे सीख पाता।” इस विचार के समर्थक सी.वी. रमन का जन्म 7 नवंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में हुआ था। गणित व भौतिकी का माहौल इन्हें घर ने ही प्रदान किया था। इनके पिता चंद्रशेखर अय्यर गणित व भौतिकी के लेक्चरर थे। उन्हीं से रमन में विज्ञान व शिक्षण के प्रति लगाव पैदा हुआ। और यह लगाव अंतिम साँस तक कायम रहा। 

होनहार बिरवान के होत चिकने पात! बालक सी.वी. रमन का मन विज्ञान में खूब रमता था। वे बचपन में खेल-खेल में प्रयोग किया करते थे। विद्यालय और छात्रावास में अपने सहपाठियों के साथ जबकि घर में भाई-बहनों के साथ विज्ञान के छोटे-छोटे प्रयोग में मशगूल रहना उनकी दिनचर्या का मूल हिस्सा बन गया था। सभी घटनाओं में वे कार्य-कारण सिद्धांत को लागू किया करते थे। अंतिम जवाब मिलने तक वे स्वयं से सवाल किया करते थे। 

विज्ञान में गहरी रुचि और पिताजी के द्वारा गणित व विज्ञान में किये जा रहे शिक्षण कार्य ने बालक सी.वी. रमन के मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी। यही वजह है कि वे विज्ञान व गणित की पढ़ाई करने के लिये प्रेरित हुए। प्रतिभाशाली सी.वी. रमन ने बहुत जल्दी स्कूल की पढ़ाई पूरी की, 11 साल की आयु में अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की, 13 साल में अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की और 16 साल की आयु में स्नातक की डिग्री हासिल की। उन्होंने भौतिकी में गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद मद्रास विश्वविद्यालय से बेहतरीन अंकों के साथ गणित में स्नात्तकोत्तर की डिग्री हासिल की।

स्नात्तकोत्तर की डिग्री प्राप्त करने के बाद वे भारतीय वित्त विभाग में नौकरी करने लगे, लेकिन कलकत्ता में ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ की प्रयोगशाला में शोध करना जारी रखा। शिक्षण-अधिगम से लगाव रखने वाले सी.वी. रमन ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और वर्ष 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर बन गए। सी.वी. रमन के तमाम शोध कार्य इसी कर्मस्थली में संपन्न हुए थे।

विज्ञान सी.वी. रमन की रगों में दौड़ता था। यही कारण है कि उनका अधिकतर समय लैब में बीतने लगा। जब लैब में मस्तिष्क थक जाता तब भौतिकशास्त्री सी.वी. रमन संगीत का रुख करते थे। विद्यार्थियों को पढ़ाना, लैब में प्रयोग करना और वीणा में लीन हो जाना उनकी दिनचर्या थी। उन्होंने संसाधनों की कमी को कभी समस्या नहीं माना, उनका कहना था - “गरीबी और निर्धन प्रयोगशालाओं ने मुझे मेरे सर्वोत्तम कार्य करने के लिये और भी दृढ़ता दी।” सी.वी. रमन के अनुसार उनके जीवन का स्वर्ण समय वर्ष 1919 का था जब उन्हें इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस में ‘मानद प्रोफेसर’ व ‘मानद सचिव’ के रूप में दो पद हासिल हुए।

सी.वी. रमन ने स्नात्तकोत्तर के दौरान प्रकाश के व्यवहार पर आधारित अपना पहला शोध-पत्र लिखा। उन्होंने अपने एक प्रोफेसर को शोध-पत्र पढ़ने के लिये भेजा लेकिन व्यस्तता के कारण उनके प्रोफेसर शोध-पत्र को नहीं पढ़ पाए! इसके बाद रमन ने एक प्रसिद्ध मैगज़ीन को अपना शोध-पत्र भेज दिया। उनका शोध-पत्र प्रकाशित हुआ और ब्रिटेन के जाने-माने वैज्ञानिक ‘बैरन रेले’ ने उसे पढ़ा। बैरन रेले गणित और भौतिकी के महान वैज्ञानिक थे। वे रमन के शोध-पत्र से काफी प्रभावित हुए, उन्होंने रमन को पत्र लिखकर उनकी प्रशंसा की। बैरन रेले रमन को प्रोफेसर समझ बैठे थे, उन्होंने रमन को लिखे पत्र में रमन को प्रोफेसर कहकर संबोधित किया था। दरअसल वे शोध-पत्र की मौलिकता एवं निष्कर्ष से इतना प्रभावित हुए थे कि उन्हें लगा- ऐसा शोध-पत्र कोई शानदार प्रोफेसर ही लिख सकता है।

सी.वी. रमन की स्पेक्ट्रोस्कोपी का ज़िक्र डॉ. अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने वर्ष 1929 में रॉयल सोसाइटी के अपने अध्यक्षीय भाषण में किया था। रमन को रॉयल सोसाइटी के द्वारा एकनॉलेज्ड किया गया और उन्हें नाइटहुड की उपाधि भी प्रदान की गई। यानी रमन के कार्यों एवं शोधों की स्वीकार्यता वैश्विक स्तर पर होने लगी थी। इसका लाभ भारत को भी मिला। 

वर्ष 1921 में सी.वी. रमन जहाज़ से ब्रिटेन जा रहे थे। उन्होंने भूमध्य सागर में पानी के सुंदर नीले रंग को देखा। उस समय उनको समुद्र के पानी के नीले रंग पर शक हुआ। जब वह भारत वापस आने लगे तो अपने साथ कुछ उपकरण लेकर आए। सी.वी. रमन ने उन उपकरणों की मदद से आसमान और समुद्र का अध्ययन किया। वह इस नतीजे पर पहुँचे कि समुद्र भी सूर्य के प्रकाश का प्रकीर्णन करता है, जिससे समुद्र के पानी का रंग नीला दिखाई पड़ता है। उन्होंने ठोस, द्रव और गैस में प्रकाश के विभाजन पर शोध जारी रखा। अंततः वह जिस नतीजे पर पहुँचे- वह रमन प्रभाव कहलाया। जिससे पूरी दुनिया प्रभावित हुई। 

रमन प्रभाव बताता है कि जब प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ से होकर गुज़रता है तो इस प्रक्रिया में प्रकाश का कुछ हिस्सा स्कैटर कर जाता है। यानी, बिखर जाता है। बिखरे हुए (मार्ग से विक्षेपित) प्रकाश की तरंगदैर्ध्‍य समान रहती है किंतु उनमें से कुछ हिस्से की प्रकाश की तरंगदैर्ध्य बदल जाती है। इसे रमन प्रभाव से जाना गया। प्रकाश के क्षेत्र में उनके इस कार्य के लिये वर्ष 1930 में उन्हें ‘भौतिकी का नोबेल’ पुरस्कार मिला। प्रकाश के क्षेत्र में किये गए उनके कार्य का आज भी कई क्षेत्रों में उपयोग हो रहा है। सी.वी. रमन कहते हैं - “मैंने विज्ञान के अध्ययन के लिये  कभी भी किसी कीमती उपकरण का उपयोग नहीं किया, मैंने रमन प्रभाव की खोज के लिये शायद ही किसी उपकरण पर 200 रुपए से ज़्यादा खर्च किया हो।” 

रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल दुनिया भर की केमिकल लैब्स में होता है, इसकी मदद से पदार्थ की पहचान की जाती है। औषधि के क्षेत्र में कोशिका और ऊतकों पर शोध के लिये व कैंसर का पता लगाने के लिये भी इसका इस्तेमाल होता है। मिशन चंद्रयान के दौरान चाँद पर पानी का पता लगाने में भी रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी का उपयोग किया गया था। यानी रमन की खोज की प्रासंगिकता आज भी कायम है। 

वर्ष 1986 में भारत सरकार ने रमन प्रभाव की खोज की घोषणा के उपलक्ष्य में 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में नामित किया। ‘अमेरिकन केमिकल सोसाइटी’ और ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ ने रमन प्रभाव को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक मील के पत्थर के रूप में मान्यता दी। दरअसल विज्ञान और वैज्ञानिक दोनों का रास्ता मानव कल्याण से होकर गुज़रता है। जब कोई खोज व आविष्कार मानव सभ्यता के लिये हितकर हो तब उन्हें अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित करना नई पीढ़ी को प्रेरणा  देने जैसा होता है। 

सी.वी. रमन को प्रकाश के प्रकीर्णन व रमन प्रभाव की खोज तक सीमित नहीं करना चाहिये। वर्ष 1932 में उन्होंने सूरी भगवंतम के साथ मिलकर क्वांटम फोटॉन स्पिन की खोज की, तबला व मृदंगम जैसे भारतीय ढोल की ध्वनि की हार्मोनिक प्रकृति की भी उन्होंने जाँच की। वे वर्ष 1933 में भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु में प्रोफेसर बने, जहाँ उन्होंने 15 वर्षों तक कार्य किया। वह वर्ष 1948 में भारतीय विज्ञान संस्थान से सेवानिवृत्त हुए और वर्ष 1949 में बेंगलुरु में ‘रमन अनुसंधान संस्थान’ बनाया। उनका संपूर्ण जीवन विज्ञान व शिक्षण को समर्पित रहा। 

दरअसल कोई भी देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति तभी प्राप्त करता है जब वहाँ आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक विकास के साथ-साथ तकनीकी व वैज्ञानिक विकास भी हो। वर्षों से शोध, प्रयोग, खोज, आविष्कार इत्यादि के बलबूते मानव कल्याण की अवधारणा को फलीभूत किया जाता रहा है। “हमें कक्षा में सक्षम शिक्षक, सीमा पर निडर सैनिक व खेत में मेहनती किसान चाहिये तो प्रयोगशाला को जीवन समझने वाले सी.वी. रमन जैसे चुनिंदा वैज्ञानिक भी चाहिये।” विज्ञान देश को ठोस विश्वास देता है। जब कोई वैज्ञानिक विज्ञान में नया सिद्धांत गढ़ता है और उन सिद्धांतों को अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति मिलती है तो उनकी सफलता राष्ट्र की सफलता बन जाती है। आज भी जब-जब रमन प्रभाव का ज़िक्र होता है तब-तब भारत के नाम का ज़िक्र होता है।

भारत को दूसरा सी.वी. रमन नहीं मिल सकता है- किंतु सी.वी. रमन के जीवन से सीख हासिल कर रमन परंपरा अथवा वैज्ञानिक खोजों को आगे बढ़ाया जा सकता है। “जितनी जल्दी नई पीढ़ी के प्रेरणास्रोत वैज्ञानिक, चिकित्सक, शिक्षक, सैनिक और किसान बनने लगेंगे उतनी जल्दी भारत विकसित देशों की सूची में शामिल होगा।” हमें समझना पड़ेगा कि - कोई भी अनुसंधान करने में कठिन परिश्रम और लगन की आवश्यकता होती है, कीमती उपकरण की नहीं।

विज्ञान में शोधरत नई पीढ़ी को सी.वी. रमन के एक बहुमूल्य प्रासंगिक विचार को आत्मसात कर लेना चाहिये -

“सही व्यक्ति, सही सोच और सही उपकरण मतलब सही नतीजे।”

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