अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भारत की विदेश नीति का पुनर्समायोजन
- 31 Dec 2025
- 95 min read
प्रिलिम्स के लिये: H-1B, SCO, BRICS, भारत-मध्य पूर्व आर्थिक गलियारा (IMEC), OPEC, G7, कैलाश-मानसरोवर तीर्थयात्रा, चक्रवात दितवाह, क्वाड, INSTC, सेमीकंडक्टर, महत्त्वपूर्ण खनिज, AI शिखर सम्मेलन।
मेन्स के लिये: वर्ष 2025 में भारत के समक्ष आने वाली अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियाँ और भारत पर उनके प्रभाव। भविष्य में कूटनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक कदम।
चर्चा में क्यों?
वर्ष 2025 भारतीय विदेश नीति के लिये आघात और आश्चर्य का दौर बनकर उभरा, जब भारत को अनेक मोर्चों पर अप्रत्याशित अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों का सामना करना पड़ा, वहीं दूसरी ओर उसने उल्लेखनीय कूटनीतिक सफलताएँ भी दर्ज कीं।
सारांश
- भारत को अमेरिकी नीतियों में आए बदलावों, क्षेत्रीय अस्थिरता और पश्चिम एशिया के बढ़ते संघर्षों जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जिससे रणनीतिक विश्वास और ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हुई।
- इन चुनौतियों के बावजूद, भारत ने कनाडा के साथ संबंधों को पुनर्स्थापित करने, तालिबान के साथ व्यावहारिक संवाद शुरू करने और चीन के साथ मेल-मिलाप की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की।
- भारत का वर्तमान ध्यान 'बहुध्रुवीय कूटनीति' और 'मुद्दे-आधारित सहयोग' के माध्यम से अपनी वैश्विक स्थिति मज़बूत करने पर है। आंतरिक स्तर पर अपनी आर्थिक क्षमता (Resilience) बढ़ाने के साथ-साथ, आधुनिक व्यापार नीतियों और नए आर्थिक गलियारों के निर्माण जैसे वैश्विक एजेंडों का नेतृत्व कर रहा है।
वर्ष 2025 में भारत को किन कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
- संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ तनावपूर्ण संबंध: शुरुआती आशावाद के बावजूद, भारत को दंडात्मक टैरिफ (50% तक), रूसी तेल आयात को कम करने के लिये प्रतिबंधों से जुड़े दबाव (जैसे, नायरा एनर्जी) और H-1B , छात्र वीजा और निर्वासन पर प्रतिबंधात्मक उपायों का सामना करना पड़ा।
- ट्रंप के ऑपरेशन सिंदूर में मध्यस्थता करने, पाकिस्तान के नेतृत्व के साथ बातचीत करने तथा पाकिस्तान के लिये F-16 लड़ाकू जेट के उन्नयन को मंजूरी देने के दावों ने सीमा पार आतंकवाद पर भारत के रुख को कमज़ोर तथा रणनीतिक विश्वास को कम किया।
- क्षेत्रीय अस्थिरता: पहलगाम आतंकी हमले और 'ऑपरेशन सिंदूर' के कारण उपजे सैन्य तनाव, साथ ही पाकिस्तानी सेना प्रमुख द्वारा 'फील्ड मार्शल' के रूप में सत्ता के पूर्ण केंद्रीकरण ने द्विपक्षीय कूटनीति की संभावनाओं को भी समाप्त कर दिया।
- भारत के लिये पड़ोसी देशों की परिस्थितियाँ भी चुनौतीपूर्ण रहीं, नेपाल में 'जेनरेशन जेड' (Gen-Z) के नेतृत्व वाले व्यापक जन-आंदोलन ने सत्ता पलट दी, तो वहीं बांग्लादेश में बढ़ती भारत-विरोधी भावना और अंतरिम सरकार के अधीन व्याप्त अस्थिरता ने नई रणनीतिक मुश्किलें खड़ी कर दीं।
- पश्चिम एशिया में अस्थिरता: ईरान पर इज़रायल के हमलों की आलोचना करने में भारत की अनिच्छा ने दक्षिण अफ्रीकी संघ (SCO) और BRICS (ब्रिक्स) में असहजता उत्पन्न कर दी, जहाँ ईरान एक सदस्य है। साथ ही, इस संघर्ष ने भारत-मध्य पूर्व आर्थिक गलियारे (IMCE) को भी बाधित कर दिया, जिससे पश्चिम एशिया में भारत की संचार, व्यापार और क्षेत्रीय प्रभाव प्रभावित हुआ।
- वैश्विक दक्षिणपंथी राजनीति का उदय: अमेरिका, यूरोप, जापान और चिली में देखी जा रही रूढ़िवादी, विदेश-विरोधी राजनीति की वैश्विक प्रवृत्ति ने एक कम पूर्वानुमानित और अधिक लेन-देन-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को जन्म दिया है, जो भारत की कूटनीतिक रणनीतियों के लिये चुनौती पेश करती है। इससे आव्रजन प्रतिबंध, विदेश-विरोधी भावना और रोजगार प्रतिस्पर्द्धा बढ़ सकती है, जिससे भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और अवसरों को खतरा उत्पन्न हो सकता है।
- ऊर्जा और जलवायु नीति की दुविधाएँ: OPEC द्वारा तेल की अधिकता के कारण तेल की कीमतों में गिरावट ने नवीकरणीय ऊर्जा के लिये वैश्विक प्रयासों को कमज़ोर करने की धमकी दी है, एक ऐसा क्षेत्र जिसमें भारत का बड़ा निवेश और प्रतिबद्धताएँ हैं।
- ऊर्जा और जलवायु संक्रमण की चुनौतियाँ: ओपेक (OPEC) द्वारा तेल की आपूर्ति में वृद्धि के कारण वैश्विक कीमतों में आई गिरावट ने नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ते प्रयासों के लिये संकट उत्पन्न कर दिया है। यह स्थिति विशेष रूप से भारत के लिये चिंताजनक है, क्योंकि भारत ने इस क्षेत्र में व्यापक निवेश किया है और अपनी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ दोहराई हैं।
वर्ष 2025 में भारत की कूटनीतिक सफलताएँ क्या थीं?
- कनाडा के साथ संबंधों में पुनःस्थापना: खालिस्तानी अलगाववादी की हत्या को लेकर उत्पन्न तनाव के बाद भारत–कनाडा संबंधों में सुधार एक प्रमुख कूटनीतिक उपलब्धि रही। भारत के प्रधानमंत्री की G7 आउटरीच के लिये यात्रा और कनाडा के नए प्रधानमंत्री के साथ उनकी वार्ता ने वीज़ा, राजनयिक कर्मचारियों और दूतों की बहाली को सुगम बनाया।
- तालिबान के साथ सामरिक संवाद: उच्च-स्तरीय वार्ताओं के परिणामस्वरूप तालिबान के विदेश मंत्री की पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ दिल्ली की आधिकारिक यात्रा हुई। भारत ने तालिबान को अफगान दूतावास का अधिग्रहण करने की अनुमति दी और काबुल को 'शत्रु का शत्रु' के रूप में पुनः परिभाषित किया, जिससे पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों में बढ़ते तनाव के बीच रणनीतिक लाभ उत्पन्न हुआ।
- चीन के साथ संबंधों में सुधार: वर्ष 2025 में, भारत और चीन ने सावधानीपूर्वक पुनः जुड़ाव का अनुसरण किया, कैलाश-मानसरोवर तीर्थयात्रा को पुनः आरंभ किया गया, वीज़ा और प्रत्यक्ष उड़ानों को बहाल किया और जलवैज्ञानिक डेटा साझाकरण को फिर से शुरू किया। भारत के प्रधानमंत्री की भेंट चीन के तियानजिन में आयोजित SCO शिखर सम्मेलन 2025 में चीन और रूस के राष्ट्रपतियों से हुई।
- पड़ोसी देशों के साथ साझेदारी का सुदृढ़ीकरण: भारत ने भूटान, श्रीलंका और मालदीव के साथ संबंधों को सफलतापूर्वक गहरा किया। एक उल्लेखनीय उपलब्धि चक्रवात दित्वाह के बाद श्रीलंका को भारत की 450 मिलियन अमरीकी डॉलर की सहायता राशि और त्वरित आपदा प्रतिक्रिया थी, जिसने इस क्षेत्र में एक विश्वसनीय प्रथम प्रतिक्रियादाता के रूप में इसकी प्रतिष्ठा को मज़बूत किया।
वर्ष 2025 में अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों के भारत पर क्या प्रभाव हैं?
- सामरिक निश्चितता का क्षरण: सबसे बड़ा सामरिक प्रभाव यह था कि यह धारणा टूट गई कि अमेरिका एक पूर्वानुमेय साझेदार होगा। ट्रंप की लेन-देन आधारित नीतियों ने सीधे भारत के मूल हितों (आर्थिक विकास, आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा) को खतरे में डाल दिया।
- इससे भारत की विदेश नीति का मौलिक पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हुआ और बहुध्रुवीय सहभागिता की दिशा में भारत के प्रयासों को गति मिली।
- सामरिक स्वायत्तता की उच्च लागत: रूस और पश्चिम के बीच भारत का संतुलन बनाने का कार्य भौतिक रूप से महँगा सिद्ध हुआ, जैसा कि नयारा एनर्जी जैसी संस्थाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों से स्पष्ट है। इसने गुटनिरपेक्षता 2.0 की सीमाओं को उजागर किया और भारत को अधिक घरेलू लचीलापन की आवश्यकता पर बल मिला।
- विदेश नीति का परिस्थितिजन्य व्यावहारीकरण: तालिबान, कनाडा और चीन के साथ भारत के कूटनीतिक संबंध सिद्धांतगत उपलब्धियों से अधिक व्यावहारिक अनुकूलन थीं। राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देकर, भारत ने मानक स्थितियों को अलग रखा - मानवाधिकार चिंताओं के बावजूद तालिबान से जुड़ना और पश्चिमी आलोचना के बावजूद पुतिन की मेज़बानी करना।
- घरेलू-अंतर्राष्ट्रीय नीति संबंध: ट्रंप की वीज़ा नीतियों ने भारत के प्रौद्योगिकी क्षेत्र और मध्यम वर्ग को प्रभावित किया, जबकि तेल मूल्य अस्थिरता ने मुद्रास्फीति और ऊर्जा लक्ष्यों को प्रभावित किया। इससे विदेश नीति का प्रभाव सीधे घरेलू जीवन पर पड़ा, जिससे सरकार की लोकप्रियता का संबंध अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाइयों से और अधिक सुदृढ़ हुआ।
- आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौतियाँ: सामरिक सिलीगुड़ी गलियारे के निकट बांग्लादेश में लालमोनिरहाट एयरफील्ड को चीन का उन्नयन और पाकिस्तान का निरंतर जुड़ाव भारत की पारंपरिक दो-मोर्चा युद्ध की चिंताओं को बढ़ाता है। सांप्रदायिक हिंसा और उग्रवादी समूह क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को प्रोत्साहित करते हैं और भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को लक्षित करने वाले अलगाववादी आंदोलनों को समर्थन दे सकते हैं।
भारत को आगे उभरती कूटनीतिक चुनौतियों का सामना कैसे करना चाहिये?
- मुद्दा-आधारित सामंजस्य पर दृढ़ता: भारत को समुद्री सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विशिष्ट मुद्दों पर अमेरिका तथा क्वाड के साथ सहयोग करना चाहिये, साथ ही इन्हें व्यापार एवं रूस संबंधी विवादों से अलग रखना चाहिये।
- यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौते (जनवरी 2026 में हस्ताक्षर की संभावना) के माध्यम से एक प्रौद्योगिकी-आर्थिक भागीदारी को मज़बूत करना चाहिये, जिसका केंद्र बिंदु हरित प्रौद्योगिकी और वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाएँ हों।
- इसके समानांतर, ब्रिक्स के भीतर, अपनी अध्यक्षता का उपयोग स्थानीय मुद्रा व्यापार और INSTC को IMEC से जोड़ने जैसे व्यावहारिक लाभ प्राप्त करने के लिये करना चाहिये।
- प्रमुख शक्ति प्रतिद्वंद्विताओं से कूटनीति का पृथक्करण: भारत को चीन के साथ सीमा वार्ता और कार्यात्मक संबंध बनाए रखते हुए, स्वयं को एक लोकतांत्रिक वैकल्पिक प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहिये। साथ ही, सेमीकंडक्टर और महत्त्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में सुदृढ़ घरेलू रणनीतियाँ विकसित करनी चाहिये।
- नेबरहुड पर ध्यान देना: नेबरहुड फर्स्ट से नेबरहुड स्टेबिलिटी की ओर स्थानांतरण। इसमें आंतरिक पड़ोसी अस्थिरता को सुरक्षा खतरे के रूप में प्राथमिकता दी जा रही है।
- इसके लिये यह आवश्यक है कि क्षेत्र में किसी भी चुनावी परिणाम के साथ व्यावहारिक रूप से संवाद किया जाए और पाकिस्तान के प्रति दो-रास्ता नीति अपनाई जाए, यानी सार्वजनिक रूप से आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख तथा गोपनीय कूटनीतिक चैनलों के माध्यम से स्थिर, गैर-हिंसात्मक स्थिति बनाए रखना।
- वैश्विक एजेंडा निर्धारण के माध्यम से नेतृत्व: ईमानदार मध्यस्थ के रूप में AI समिट 2026 में समानतापूर्ण AI शासन ढाँचे का समर्थन करके भारत की भूमिका को वैश्विक पुल बनाने वाले के रूप में स्थापित करना। IMEC कॉरिडोर को गाज़ा की स्थिरता/स्टेबिलिटी से जुड़े आर्थिक शांति लाभ के रूप में पुनर्जीवित करना। यूक्रेन शांति वार्ता के लिये भारत को तटस्थ स्थल के रूप में प्रस्तुत करना, सभी पक्षों के साथ अपने संबंधों का लाभ उठाना।
- घरेलू क्षमता और मज़बूती का विकास: सबसे मज़बूत कूटनीतिक आधार आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था है। FTAs (जैसे, भारत और न्यूज़ीलैंड FTA) का उपयोग आयात-निर्यात को विविधीकृत करने के लिये किया जाए ताकि बाहरी झटकों से सुरक्षा मिल सके। साथ ही रणनीतिक अनिश्चितता के मद्देनजर रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को तेजी से बढ़ाना आवश्यक है, ताकि सभी प्रमुख विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम की जा सके।
निष्कर्ष
वर्ष 2025 में भारत की विदेश नीति ने अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना किया, जिससे आशावादी संपर्क से व्यावहारिक यथार्थवाद की ओर बदलाव हुआ। विभाजित विश्व में मार्गदर्शन के लिये रणनीतिक स्वायत्तता का उपयोग करना, मुद्दा-आधारित साझेदारियाँ बनाना, नेबरहुड स्टेबिलिटी को प्राथमिकता देना और घरेलू मज़बूती का निर्माण करना आवश्यक है ताकि महाशक्तियों के परिवर्तन और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा की जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “वर्ष 2025 ने भारत की विदेश नीति के लिये एक रणनीतिक मोड़ को दर्शाया।” इस कथन के संदर्भ में भारत की कूटनीति में उभरती प्रमुख चुनौतियों और अनुकूलनों का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. वर्ष 2025 में भारत के सामने मुख्य अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियाँ क्या थीं?
भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ तनावपूर्ण संबंध, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश में क्षेत्रीय अस्थिरता, पश्चिम एशिया के संघर्ष, ऊर्जा मूल्य में उतार-चढ़ाव तथा वैश्विक दक्षिणपंथी राजनीति में वृद्धि जैसी चुनौतियों का सामना किया।
2. भारत ने वर्ष 2025 में कौन से व्यापार समझौते किये?
भारत ने यू.के., ओमान और न्यूज़ीलैंड के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते फाइनल किए, जबकि EU, U.S. और EAEU के साथ बातचीत जारी रही।
3. भारत ने वर्ष 2025 में कनाडा के साथ संबंधों को सफलतापूर्वक किस प्रकार पुनर्स्थापित किया?
भारत और कनाडा के बीच प्रधानमंत्री स्तर की वार्ता के बाद संबंधों को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। रणनीतिक बदलाव के तहत जाँच प्रक्रियाओं और द्विपक्षीय संबंधों को अलग-अलग रखा गया, जिससे वीज़ा सेवाओं की बहाली और कूटनीतिक उपस्थिति को सामान्य बनाना संभव हो सका।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. 'भारत और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच संबंधों में खटास के प्रवेश का कारण वाशिंगटन का अपनी वैश्विक रणनीति में अभी तक भारत के लिये किसी ऐसे स्थान की खोज करने में विफलता है, जो भारत के आत्म-समादर और महत्त्वाकांक्षा को संतुष्ट कर सके।' उपयुक्त उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये। (2019)
प्रश्न. परियोजना 'मौसम' को भारत सरकार की अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों की सुदृढ़ करने की एक अद्वितीय विदेश नीति पहल माना जाता है। क्या इस परियोजना का एक रणनीतिक आयाम है? चर्चा कीजिये। (2015)
प्रश्न. भारत-श्रीलंका के संबंधों के संदर्भ में विवेचना कीजिये कि किस प्रकार आतंरिक (देशीय) कारक विदेश नीति को प्रभावित करते हैं। (2013)