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भारतीय अर्थव्यवस्था

वर्षांत समीक्षा-2025: सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय

  • 01 Jan 2026
  • 121 min read

स्रोत: पी.आई.बी

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2025 ने भारत के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र के लिये परिवर्तनकारी प्रगति का दौर चिह्नित किया, जिससे रोज़गार सृजन और समावेशी आर्थिक विकास में इसकी निर्णायक भूमिका और अधिक मज़बूत हुई।

सारांश

  • वर्ष 2025 में भारत के MSME क्षेत्र में 7.3 करोड़ पंजीकरण हुए तथा PMEGP, CGTMSE और पीएम विश्वकर्मा योजना के माध्यम से सशक्त ऋण सहायता प्रदान की गई, जिससे विकास, रोज़गार, निर्यात एवं नवाचार को गति मिली।
  • हालाँकि, ऋण की कमी, भुगतान में देरी, नियामकीय बोझ और कौशल अंतर जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, जिनके समाधान के लिये वित्तीय सुधार, डिजिटलीकरण, बाज़ार तक बेहतर पहुँच तथा सतत उद्यमिता को बढ़ावा देना आवश्यक है।

वर्ष 2025 में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या रहीं?

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs)

  • परिचय: MSMEs वे व्यवसाय हैं जिन्हें संयंत्र, मशीनरी या उपकरणों में किये गए निवेश तथा उनके वार्षिक टर्नओवर के आधार पर परिभाषित और वर्गीकृत किया जाता है।
    • ये उद्यम भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार माने जाते हैं, क्योंकि ये उद्यमिता को बढ़ावा देने, व्यापक स्तर पर रोज़गार सृजन (12 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार) और औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • MSMEs का वर्गीकरण:

रुपये (करोड़ रुपये में)

उद्यम

निवेश

कारोबार

 

पुराना

संशोधित

पुराना

संशोधित

सूक्ष्‍म

1

2.5

5

10

लघु

10

25

50

100

मध्यम

50

125

250

500


  • नियामक एवं नीतिगत ढाँचा: MSMEs को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 है। यह अधिनियम राष्ट्रीय बोर्ड की स्थापना करता है तथा ‘उद्यम’ को औपचारिक रूप से परिभाषित करता है।
    • वर्ष 2007 में स्थापित MSME मंत्रालय इस क्षेत्र के लिये सहायक नीतियाँ तैयार करता है, विकासात्मक कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाता है तथा उनके कार्यान्वयन की निगरानी करता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) का क्या महत्त्व है?

  • औद्योगिक उत्पादन का आधार स्तंभ: लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) भारत की अर्थव्यवस्था का संरचनात्मक आधार हैं, जो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 30% और विनिर्माण उत्पादन में 36% का योगदान करते हैं। वे घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देकर, स्थानीय आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण करके और बड़े पैमाने के उद्योगों के लिये आवश्यक सहायक आपूर्तिकर्त्ताओं के रूप में कार्य करके आर्थिक मज़बूती प्रदान करते हैं।
  • रोज़गार और समावेशी आजीविका का प्रेरक: भारत में गैर-कृषि क्षेत्र में सबसे बड़े रोज़गार दाता के रूप में लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र 12 करोड़ से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करता है। यह प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना और मुद्रा योजना जैसी योजनाओं के महत्त्वपूर्ण सहयोग से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अर्द्ध-कुशल और अकुशल श्रमिकों को रोज़गार देकर समावेशी विकास को बढ़ावा देता है।
  • निर्यात और वैश्विक व्यापार एकीकरण के लिये उत्प्रेरक: लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये अपरिहार्य हैं, जो इसके कुल निर्यात का लगभग 45% हिस्सा हैं। वे विशिष्ट बाज़ारों में अपनी पकड़ मज़बूत करके वैश्विक उपस्थिति को सुदृढ़ करते हैं, जिसका उदाहरण हस्तशिल्प उद्योग है जो वैश्विक हस्तनिर्मित कालीन निर्यात में लगभग 40% का योगदान प्रदान करता है तथा आगरा जूता उद्योग का भारत के जूता निर्यात में 28% का हिस्सा है।
  • ग्रामीण औद्योगिकीकरण एवं क्षेत्रीय संतुलन: MSME क्षेत्र विकेंद्रीकृत औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित कर PURA (ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएँ उपलब्ध कराना) की परिकल्पना को साकार करने में निर्णायक भूमिका निभाता है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) जैसी संस्थाएँ स्थानीय स्तर पर रोज़गार सृजन, समुदायों के सशक्तीकरण, पलायन में कमी और संतुलित क्षेत्रीय विकास को सुनिश्चित करके इस प्रक्रिया को गति देती हैं।
  • नवाचार, उद्यमिता एवं डिजिटल रूपांतरण: MSME भारत के विश्व में तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की प्रेरक शक्ति हैं, जो ई-कॉमर्स और फिनटेक जैसे प्रमुख क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा देती हैं। डिजिटल अपनाने में भी इनकी अग्रणी भूमिका है, जहाँ 72% लेन-देन अब डिजिटल हो चुके हैं। इसे ONDC (ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स) और निर्बाध ऋण के लिये सार्वजनिक तकनीकी मंच (Public Tech Platform for Frictionless Credit) जैसी पहलों से गति मिली है।
  • सामाजिक सशक्तीकरण एवं सतत विकास: MSME सामाजिक समावेशन का एक प्रभावी साधन हैं, जिनमें 20% से अधिक उद्यम महिलाओं के स्वामित्व में हैं तथा मुद्रा योजना के माध्यम से ऋण उपलब्धता से इन्हें व्यापक समर्थन मिला है। साथ ही RAMP (Raising and Accelerating MSME Performance) कार्यक्रम जैसी योजनाओं के सहयोग से स्वच्छ ऊर्जा अपनाने और परिपत्र अर्थव्यवस्था मॉडल को बढ़ावा देकर ये हरित संक्रमण का भी नेतृत्व कर रहे हैं।

भारत में लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के विकास में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • वित्तीय बाधाएँ और ऋण की कमी: मार्च 2024 तक कुल 7.34 लाख करोड़ रुपये के विलंबित भुगतानों के कारण लघु एवं मध्यम उद्यम गंभीर पूंजी संकट का सामना कर रहे हैं, जिससे कार्यशील पूंजी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इनकी औपचारिक ऋण की आवश्यकता लगभग 25 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें से केवल 19% ही औपचारिक रूप से पूरी हो पाई है, जिसके कारण इन्हें 30-60% की दरों पर महॅंगे अनौपचारिक ऋण पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
  • नियामक वातावरण: नियामक वातावरण की जटिलता, जिसमें कर, श्रम और पर्यावरण कानूनों का परस्पर जाल शामिल है, अनुपालन (Compliance) के बोझ को काफी बढ़ा देती है। यही उच्च लागत और जटिल प्रक्रियाएँ 90% से अधिक MSMEs के असंगठित या अनौपचारिक रहने का मुख्य कारण बनती हैं।
    • उद्यम पोर्टल जैसे औपचारिक प्लेटफार्मों में परिवर्तन धीमा है, पंजीकृत फर्मों में से केवल 9% ही अपंजीकृत स्थिति से पंजीकृत स्थिति में परिवर्तित हुई हैं, जो लाभों तक पहुँच और संरचित विकास को सीमित करता है।
  • अपर्याप्त अवसंरचना: खराब अवसंरचना, जिसमें अक्षम रसद व्यवस्था ( GDP का 14-18% खर्च), बार-बार बिजली कटौती और सीमित डिजिटल कनेक्टिविटी शामिल है, लघु एवं मध्यम उद्यमों की प्रतिस्पर्द्धात्मकता में बाधा डालती है। प्रौद्योगिकी के मामले में भी वे पिछड़े हुए हैं, जहाँ केवल 6% ई-कॉमर्स का उपयोग करते हैं और 45% AI को अपनाते हैं, जिससे विस्तारशीलता और वैश्विक मूल्य शृंखला एकीकरण सीमित हो जाता है।
  • वैश्विक एकीकरण में बाधाएँ: निर्यात में आने वाली चुनौतियों में अपर्याप्त ब्रांडिंग, कड़े गुणवत्ता मानक, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आने वाली समस्याओं (जैसे, लाल सागर में व्यवधान) के प्रति संवेदनशीलता और उच्च शुल्क (जैसे, अमेरिका द्वारा लगाया गया 50%) शामिल हैं। ‘मिसिंग मिडिल’ की समस्या, जहाँ 97.92% लघु उद्यम हैं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा करने की उनकी क्षमता को और सीमित कर देती है।
  • कौशल की भारी कमी और सतत विकास मानकों के अनुपालन का दबाव: कौशल में लगातार असंतुलन बना हुआ है, ज्ञान-आधारित भर्ती में 3.9% की गिरावट नवाचार और उत्पादकता को सीमित कर रही है। साथ ही, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) वैश्विक पर्यावरण, पर्यावरण और पारिस्थितिकी (ESG) मानकों को पूरा करने के बढ़ते दबाव का सामना कर रहे हैं, क्योंकि उनके अनुमानित वार्षिक 110 मिलियन टन CO₂ उत्पादन और हरित प्रौद्योगिकी को अपनाने की उच्च लागत एक महत्त्वपूर्ण वित्तीय और प्रतिस्पर्द्धी खतरा उत्पन्न करती है

भारत के MSME क्षेत्र को प्रतिस्पर्द्धा और विकास बढ़ाने हेतु नया रूप कैसे दिया जा सकता है?

  • वित्तीय ढाँचे में सुधार: बड़ी अपर्याप्त क्रेडिट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये, सुधारों के तहत फिनटेक के माध्यम से बिना संपार्श्विक ऋण को बढ़ाना चाहिये और जोखिम कवरेज हेतु मुद्रा योजना तथा CGTMSE को बेहतर तरीके से एकीकृत करना चाहिये। साथ ही TReDS के माध्यम से इनवॉइस डिस्काउंटिंग को बढ़ावा देना और MSME समाधान पोर्टल पर 45 दिन की भुगतान समय सीमा को कड़ाई से लागू करना तथा स्वचालित दंड प्रणाली लागू करना, देरी से भुगतान की समस्या को दूर करने के लिये आवश्यक है।
  • प्रौद्योगिकी एकीकरण और डिजिटल परिवर्तन: AI, IoT और ऑटोमेशन को तेज़ी से अपनाने के लिये, क्षेत्र-विशेष MSME टेक क्लिनिक और इनोवेशन हब स्थापित किये जाने चाहिये, जो किफायती सलाहकार सेवाएँ प्रदान कराएँ। साथ ही डिजिटल MSME 2.0 पहल के माध्यम से ONDC एकीकरण तथा क्लाउड एक्सेस को बढ़ावा देना चाहिये।
  • बाज़ार पहुँच और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा: निर्यात को बढ़ाने हेतु लॉजिस्टिक्स तथा प्रमाणपत्रों के लिये अनुदान सहायता के साथ एक्सपोर्ट कंसोर्टियम बनाना चाहिये, साथ ही मुक्त व्यापार समझौता (FTA) एवं ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म का उपयोग करके MSME के लिये कम लागत वाले स्टोरफ्रंट तैयार करने चाहिये।
  • संस्थागत ढाँचे को मज़बूत करना: औपचारिकीकरण को प्रोत्साहित करने के लिये उद्यम पंजीकरण (Udyam Registration) को अनिवार्य किया जाना चाहिये और इसे कम GST दरों और प्राथमिकता वाले ऋण जैसे लाभों से जोड़ा जाना चाहिये। इसके साथ ही क्लस्टर-आधारित विकास को बढ़ावा देने के लिये कॉमन फैसिलिटी सेंटर (CFCs) स्थापित किये जाएँ, जो साझा परीक्षण और अनुसंधान एवं विकास (R&D) सेवाएँ प्रदान करें।
  • सतत और समावेशी उद्यमिता: हरित बदलाव को प्रोत्साहित करने के लिये कम-ब्याज वाली ग्रीन फाइनेंस, ESG-लिंक्ड क्रेडिट और पर्यावरण-मित्र प्रथाओं हेतु कर लाभ प्रदान किए जाएँ। महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने हेतु CGTMSE क्रेडिट गारंटी बढ़ाई जाए और समर्पित मुद्रा योजना फंड का विस्तार किया जाए।

निष्कर्ष

वर्ष 2025 में भारत का MSME क्षेत्र आर्थिक आधार स्तंभ के रूप में मजबूत हुआ, जिसमें 7.3 करोड़ उद्यमों का औपचारिकीकरण किया गया और क्रेडिट गारंटी 3.77 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई। इस सफलता को कायम रखने रखने के लिये क्रेडिट की कमी, नियामक बाधाएँ और प्रौद्योगिकी की कमी को लक्षित सुधार, डिजिटलाइजेशन और सतत, समावेशी उद्यमिता के माध्यम से दूर करना आवश्यक है, ताकि दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित किया जा सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारतीय आर्थिक आधार स्तंभ के रूप में MSME की भूमिका का विश्लेषण कीजिये और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में उनकी भागीदारी की बाधाओं पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत में MSME क्या हैं?
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) को प्लांट, मशीनरी में निवेश या कारोबार के आधार पर परिभाषित किया गया है, और ये भारत के आर्थिक आधार स्तंभ का निर्माण करते हैं।

2. MSME भारत की GDP और निर्यात में कितना योगदान देते हैं?
MSME भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 30% और कुल निर्यात में लगभग 45% का योगदान देते हैं।

3. MSME सेक्टर में 'Missing Middle' समस्या क्या है?
इसका अर्थ है कि मध्यम आकार के उद्यमों का अत्यधिक कम प्रतिनिधित्व है, जहाँ 97% से अधिक MSME सूक्ष्म वर्ग में आते हैं, जिससे उनकी निवेश, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा की क्षमता सीमित हो जाती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स

प्रश्न 1. भारत के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)

  1. ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एम.एस.एम.ई.डी.) अधिनियम 2006’ के अनुसार, ‘जिनके संयंत्र और मशीन में निवेश 15 करोड़ रुपये से 25 करोड़ रुपुए के बीच हैं, वे मध्यम उद्यम हैं’।  
  2. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को दिये गए सभी बैंक ऋण प्राथमिकता क्षेत्रक के अधीन अर्ह हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/है?

(a) केवल 1 

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों 

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर:(b)


प्रश्न 2. विनिर्माण क्षेत्र के विकास को प्रोत्साहित करने के लिये भारत सरकार ने कौन-सी नई नीतिगत पहल की है/ हैं? (2012) 

  1. राष्ट्रीय निवेश तथा विनिर्माण क्षेत्रों की स्थापना 
  2. 'एकल खिड़की मंज़ूरी' (सिंगल विंडो क्लीयरेंस) की सुविधा प्रदान करना 
  3. प्रौद्योगिकी अधिग्रहण तथा विकास कोष की स्थापना

निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)


प्रश्न 3. निम्नलिखित में से कौन सरकार के समावेशी विकास के उद्देश्य को आगे बढ़ाने में सहायता कर सकता है? (2011)

  1. स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देना 
  2. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को बढ़ावा देना
  3. शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू करना

निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)


मेन्स:

प्रश्न 1. "सुधारोत्तर अवधि में सकल-घरेलू-उत्पाद (जी.डी.पी.) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है।" कारण बताइये। औद्योगिक-नीति में हाल में किये गए परिवर्तन औद्योगिक संवृद्धि दर को बढ़ाने में कहाँ तक सक्षम हैं? (2017)

प्रश्न 2. सामान्यतः देश कृषि से उद्योग और बाद में सेवाओं को अंतरित होते हैं पर भारत सीधे ही कृषि से सेवाओं को अंतरित हो गया है। देश में उद्योग के मुकाबले सेवाओं की विशाल संवृद्धि के क्या कारण हैं? क्या भारत सशक्त औद्योगिक आधार के बिना एक विकसित देश बन सकता है? (2014)

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