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युवा उपयोगकर्त्ताओं की सुरक्षा हेतु भारत का डिजिटल नियामक परिदृश्य

  • 31 Mar 2026
  • 105 min read

प्रिलिम्स के लिये: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बिग डेटा, बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर, डिजिटल साक्षरता, व्यक्तिगत डेटा, डेटा फिड्युशियरी, कृत्रिम रूप से उत्पन्न सूचना (SGI), डार्क पैटर्न्स, डीपफेक, किशोर न्याय अधिनियम, 2015, पॉक्सो अधिनियम, 2012

मेन्स के लिये: युवा उपयोगकर्त्ताओं के लिये सोशल मीडिया से संबंधी प्रमुख तथ्य एवं उससे संबंधित चिंताएँ, युवा उपयोगकर्त्ताओं के लिये सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने वाला भारत का नियामक ढाँचा तथा सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिये आवश्यक उपाय।

स्रोत: बिज़नेस स्टैंडर्ड

चर्चा में क्यों?

संयुक्त राज्य अमेरिका के लॉस एंजिल्स के एक कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Meta (इंस्टाग्राम) और YouTube को प्लेटफॉर्म डिज़ाइन में लापरवाही करने तथा युवा उपयोगकर्त्ताओं को जोखिमों के बारे में पर्याप्त चेतावनी न देने का दोषी पाया है। इसके परिणामस्वरूप, इन कंपनियों को सामूहिक रूप से 6 मिलियन अमेरिकी डॉलर का हर्जाना देने का आदेश दिया गया है।

  • इस मामले में अनंत स्क्रॉलिंग, एल्गोरिद्म-आधारित अनुशंसाएँ और ऑटोप्ले वीडियो जैसी विशेषताओं को ऐसे जानबूझकर उपयोग किये गए उपकरणों के रूप में उजागर किया गया, जिनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बच्चे ‘कभी भी फोन नीचे न रखें’ (Never Put Down the Phone)।

सारांश

  • वैश्विक स्तर पर विनियम सख्त होते जा रहे हैं, क्योंकि कोर्ट स्क्रॉलिंग जैसी लत उत्पन्न करने वाली डिज़ाइन सुविधाओं के लिये सोशल मीडिया कंपनियों को उत्तरदायी ठहरा रही हैं।
  • भारत DPDP अधिनियम और आईटी नियमों का उपयोग करके अभिभावकीय सहमति और आयु-आधारित नियंत्रण (एज-गेटिंग) को अनिवार्य करता है।
  • नवाचार और बाल सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखते हुए ये ढाँचे मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों और डिजिटल शोषण को कम करने का लक्ष्य रखते हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिये Meta-YouTube निर्णय का क्या अर्थ है?

  • ‘न्यूट्रल पाइप’ डिफेंस का अंत: परंपरागत रूप से प्लेटफॉर्म्स यह तर्क देते थे कि वे केवल ‘न्यूट्रल पाइप’ (मध्यस्थ) हैं और उनके माध्यम से प्रवाहित सामग्री के लिये ज़िम्मेदार नहीं हैं, जैसा कि यूएस कम्युनिकेशंस डीसेंसी एक्ट, 1996 की धारा 230 या भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 की धारा 79 (सेफ हार्बर क्लॉज़) के अंतर्गत कहा गया है।
  • एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता: अब संभवतः प्लेटफॉर्म्स को डिज़ाइन जोखिम मूल्यांकन (Design Risk Assessments) करना अनिवार्य होगा। यदि किसी आंतरिक दस्तावेज़ (जैसे– ‘फेसबुक फाइल्स’) से यह पता चलता है कि उन्हें पता था कि कोई फीचर बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर या लत उत्पन्न कर सकता है, फिर भी उन्होंने उसे लॉन्च किया, तो इसे ‘दुराचार’ (Malice) या ‘लापरवाह उपेक्षा’ (Reckless Disregard) माना जाएगा।
  • उपयोगकर्त्ता अनुभव का रेडिकल रीडिज़ाइन: प्लेटफॉर्म्स को संभवतः नाबालिगों के लिये कई मुख्य फीचरों को अक्षम या संशोधित करना पड़ेगा, जैसे कि अनंत फीड की जगह ‘रुकें’ (Stop) पॉइंट या ‘आप सभी देख चुके हैं’  (You're All Caught Up) संदेश देना और उन डिज़ाइन ट्रिक्स को समाप्त करना जो उपयोगकर्त्ताओं के लिये लॉग ऑफ या अकाउंट डिलीट करना मुश्किल बनाते हैं।
  • वैश्विक नियामक परिवर्तन: यह निर्णय अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के साथ मेल खाता है जो नाबालिगों की सुरक्षा के लिये है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया के 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध और यूके का एक पायलट कार्यक्रम शामिल है जो आयु-आधारित प्रतिबंधों का परीक्षण कर रहा है।
  • भारत के नियामक ढाँचे पर प्रभाव: डिजिटल इंडिया एक्ट, 2023 संभवतः ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा से हटकर उत्पाद देयता (Product Liability) की दिशा में बढ़ सकता है।
    • आईटी नियम, 2026 पहले ही हानिकारक AI सामग्री के लिये स्ट्रिक्टर रिमूवल टाइमलाइंस  (3 घंटे) निर्धारित कर चुके हैं। इस निर्णय से एक नया आयाम जुड़ गया है अर्थात अब प्लेटफॉर्म्स को अपनी रिकमेंडेशन इंजनों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के लिये भी कानूनी ज़िम्मेदारी उठानी पड़ सकती है।

युवा उपयोगकर्त्ताओं द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाला नियामक ढाँचा क्या है?

  • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023: प्लेटफॉर्मों को किसी भी बच्चे (18 वर्ष से कम आयु) के व्यक्तिगत डेटा को बिना माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सत्यापित सहमति के संसाधित करने की सख्त मनाही है।
    • डेटा फिड्यूशियरी (प्लेटफॉर्म) बच्चों के लिये ट्रैकिंग, व्यवहार निगरानी या लक्षित विज्ञापन नहीं कर सकते।
    • बच्चों के डेटा से संबंधित नियमों के उल्लंघन पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्‍थानों के लिये दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021: OTT और डिजिटल मीडिया द्वारा कंटेंट/सामग्री को श्रेणियों में वर्गीकृत करना अनिवार्य है [U, U/A 7+, 13+, 16+ और A (वयस्क)]। प्लेटफॉर्मों को U/A 13+ और उससे ऊपर की श्रेणी वाली सामग्री के लिये पैरेंटल लॉक और “A” श्रेणी की सामग्री के लिये विश्वसनीय आयु सत्यापन प्रणाली प्रदान करनी होती है।
    • मध्यवर्ती संस्‍थानों को सरकारी या न्यायालय द्वारा पारित आदेश के 3 घंटे के भीतर (यौन/निज़ी सामग्री के मामले में 2 घंटे के भीतर) बच्चों के लिये हानिकारक कंटेंट/सामग्री को हटाना होता है।
    • वर्ष 2026 के संशोधनों के अनुसार प्लेटफॉर्मों को कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना (SGI) को लेबल करना अनिवार्य है ताकि बच्चों को AI-जनित भ्रामक जानकारी या बिना सहमति के बदली गई छवियों से गुमराह होने से बचाया जा सके।
  • यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012: यह अधिनियम “ऑनलाइन ग्रूमिंग” (यौन शोषण के उद्देश्य से बच्चों से मित्रता करना) और बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के भंडारण या वितरण को अपराध घोषित करता है।
    • सोशल मीडिया मध्यस्थों पर यह कानूनी दायित्व है कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर बच्चों के विरुद्ध किसी भी यौन अपराध की सूचना कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्रदान करें।
  • राज्य-स्तरीय हस्तक्षेप: कर्नाटक ने डिजिटल लत को रोकने के लिये 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध की घोषणा की है। आंध्र प्रदेश ने मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं और ऐप डिज़ाइन में “डार्क पैटर्न” का हवाला देते हुए 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये प्रतिबंध का प्रस्ताव दिया है।
  • किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015: यह अधिनियम डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से मानव तस्करी और बच्चों को बहकाकर शोषण सहित ऑनलाइन बाल शोषण से संबंधित मामलों को विशेष रूप से संबोधित करता है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000: यह मध्यस्थ दायित्व और सामग्री विनियमन के लिये व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है, जिसमें अश्लीलता, गोपनीयता और साइबर अपराधों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं, जो बच्चों के लिये हानिकारक सामग्री को भी संबोधित करते हैं।

सोशल मीडिया

  • परिचय: सोशल मीडिया उन अंतःक्रियात्मक, कंप्यूटर-आधारित प्रौद्योगिकियों को संदर्भित करता है जो आभासी समुदायों और नेटवर्क के माध्यम से सूचना, विचारों और रुचियों के निर्माण एवं साझा करने की सुविधा प्रदान करती हैं।
    • पारंपरिक मीडिया (जैसे– टेलीविज़न या समाचार-पत्र) के विपरीत, जो “एक से अनेक” प्रसारण पर आधारित है, सोशल मीडिया की विशेषता उपयोगकर्त्ता-निर्मित सामग्री और “अनेक से अनेक” अंतःक्रिया पर आधारित है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के प्रकार:

प्रकार

उदाहरण

प्राथमिक कार्य

सोशल नेटवर्किंग

फेसबुक, लिंक्डइन

दोस्तों से जुड़ना या पेशेवर नेटवर्किंग करना।

माइक्रोब्लॉगिंग

X (पूर्व में ट्विटर), थ्रेड्स

संक्षिप्त अपडेट और रीयल-टाइम समाचार।

मीडिया शेयरिंग 

इंस्टाग्राम, यूट्यूब, टिकटॉक

तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से दृश्यात्मक कहानी कहना।

डिस्कशन फोरम

रेडिट, क्वोरा

समुदाय आधारित ज्ञान साझाकरण और वाद-विवाद।

सोशल मीडिया युवा उपयोगकर्त्ताओं के लिये चिंताएँ कैसे बढ़ाता है?

  • लत का अभियांत्रिकीकरण: प्लेटफॉर्म प्रेरक डिज़ाइन का उपयोग करते हैं, जैसे– इनफिनिट स्क्रॉलिंग और इंटरमिटेंट अवॉर्ड (लाइक/नोटिफिकेशन) डोपामिन स्राव को प्रोत्साहित करते हैं, जुआ जैसी प्रवृत्ति के समान है, जिससे नाबालिगों के लिये स्व-नियमन करना कठिन हो जाता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य एवं शारीरिक छवि: निरंतर चुनी हुई और फिल्टर की गई जीवन-शैली के प्रदर्शन के कारण “सोशल कंपेरिज़न” की प्रवृत्ति बढ़ती है। यह विशेषकर किशोरियों में बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर, चिंता और अवसाद का प्रमुख कारण बनती है।
  • साइबरबुलिंग और उत्पीड़न: इंटरनेट की अनामिकता और इसकी व्यापक पहुँच के कारण निरंतर बुलिंग (उत्पीड़न) की स्थिति बनी रहती है, जो एक बच्चे का उसके घर तक पीछा करती है। इसके परिणामस्वरूप गंभीर भावनात्मक कष्ट होता है और अत्यंत गंभीर मामलों में यह आत्म-नुकसान या आत्महत्या के विचारों का कारण बन सकता है।
  • डेटा गोपनीयता और शोषण: युवा उपयोगकर्त्ताओं में प्रायः यह समझने की “डिजिटल साक्षरता” नहीं होती कि उनका व्यक्तिगत डेटा किस प्रकार एकत्र किया जाता है। इसमें अनुशंसा एल्गोरिद्म द्वारा उत्पन्न शोषणकारी व्यवहार और यौन शोषण की आशंका भी शामिल है।
  • मस्तिष्क के विकास पर प्रभाव: स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग नींद के पैटर्न और शारीरिक गतिविधि में बाधा डाल सकता है, जो संभावित रूप से प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को प्रभावित करता है। यह मस्तिष्क का वह हिस्सा है जो आवेग नियंत्रण तथा कार्यकारी कार्यों के लिये ज़िम्मेदार होता है।
  • ‘फिल्टर बबल’ और उग्रता: एल्गोरिद्म सत्य की तुलना में उपयोगकर्त्ता की भागीदारी को अधिक प्राथमिकता देते हैं, जिसके कारण अक्सर युवा उपयोगकर्त्ताओं को चरमपंथी सामग्री या भ्रामक जानकारी की ओर धकेला जाता है, जिससे उनके सामाजिक तथा राजनीतिक दृष्टिकोण का निर्माण प्रभावित होकर विकृत हो सकता है।

सोशल मीडिया का युवा उपयोगकर्त्ताओं पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम करने हेतु कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • अभिभावकीय और गृह-आधारित हस्तक्षेप: केवल सामग्री को ‘ब्लॉक’ (अवरुद्ध) करने से आगे बढ़कर ‘सह-अवलोकन’ (Co-viewing) की दिशा में बढ़ें। बच्चों के साथ डिजिटल सामग्री पर चर्चा करने से उन्हें अवास्तविक सौंदर्य मानकों या गलत सूचनाओं के प्रति एक तार्किक और आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद मिलती है।
    • बच्चे अक्सर अपने माता-पिता का अनुकरण करते हैं। स्वस्थ डिजिटल मानकों को स्थापित करने के लिये यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि अभिभावक स्वयं अपने ‘डूमस्क्रॉलिंग’ को सीमित करके एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करें।
  • शैक्षिक और स्कूल-आधारित उपाय: छात्रों को ‘डार्क पैटर्न्स’ अर्थात डिजिटल लत को बढ़ावा देने वाली डिज़ाइन तकनीकों की पहचान करना तथा डीपफेक से बचने के लिये सूचनाओं की सत्यता की जाँच करना सिखाया जाना चाहिये।
    • स्कूलों में ‘फोन लॉकर’ लागू करना ताकि एकाग्रता युक्त शिक्षण वातावरण सुनिश्चित हो सके और अवकाश के दौरान आमने-सामने सामाजिक बातचीत को बढ़ावा दिया जा सके।
  • तकनीकी एवं डिज़ाइन समाधान: गोपनीयता-संरक्षण करने वाले आयु-आधारित नियंत्रण (जैसे– AI आधारित चेहरे के अनुमान) को लागू करना, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चों को वयस्क सामग्री का सामना न करना पड़े।
    • नाबालिगों के खातों के लिये अनिवार्य उपयोग को बढ़ावा देने वाली विशेषताओं, जैसे कि 'इन्फिनिट स्क्रॉल' और 'ऑटोप्ले' को हटाया जाना चाहिये। साथ ही ऐसे सिस्टम-स्तरीय प्रॉम्प्ट्स शामिल किये जाने चाहिये जो निरंतर उपयोग की एक निश्चित अवधि के बाद उपयोगकर्त्ताओं को 'ब्रेक' लेने हेतु प्रोत्साहित करें।
  • ‘भूल जाने का अधिकार’ का उपयोग: युवा उपयोगकर्त्ताओं को अपनी डिजिटल गतिविधियों के पुराने रिकॉर्ड को हटाने के लिये एक सरल तंत्र प्रदान करना, ताकि उनके विकासशील वर्षों में की गई गलतियाँ उनके व्यक्तिगत या व्यावसायिक भविष्य पर स्थायी रूप से प्रभाव न डाल सकें।
  • शोषण के विरुद्ध कानूनी संरक्षण का उपयोग: ऑनलाइन ग्रूमिंग या मानव तस्करी के लिये सोशल मीडिया के उपयोग को रोकने हेतु किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 तथा POCSO अधिनियम, 2012 का सख्ती से पालन आवश्यक है। मिशन शक्ति सुरक्षा, संरक्षा और महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देता है।

निष्कर्ष

यह निर्णय सोशल मीडिया के व्यसनी डिज़ाइन के कारण युवाओं पर पड़ रहे प्रभावों को लेकर वैश्विक स्तर पर हो रहे पुनर्विचार की ओर संकेत करता है। भारत का नियामक ढाँचा, जिसमें DPDP अधिनियम और आईटी नियम शामिल हैं, इन चिंताओं को संबोधित करता है, लेकिन इसके सख्त प्रवर्तन की आवश्यकता है। माता-पिता का मार्गदर्शन, शिक्षा और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को मिलाकर एक बहु-हितधारक दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. सोशल मीडिया एल्गोरिद्म, सटीकता के बजाय एंगेजमेंट को अधिक महत्त्व देकर, युवा उपयोगकर्त्ताओं पर किस प्रकार प्रभाव डालते हैं?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. DPDP अधिनियम, 2023 के तहत 'बच्चे' की परिभाषा और सहमति की आवश्यकता क्या है?
DPDP अधिनियम के तहत एक बच्चा वह व्यक्ति माना जाता है जिसकी आयु 18 वर्ष से कम हो; प्लेटफॉर्म को उनके व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण से पहले सत्यापन योग्य माता-पिता की सहमति प्राप्त करनी आवश्यक होती है।

2. IT नियम, 2021 नाबालिगों के लिये आयु-उपयुक्त सामग्री के मुद्दे को किस प्रकार संबोधित करते हैं?
नियमों के अनुसार सामग्री का वर्गीकरण (U/A 7+, 13+, 16+) अनिवार्य किया गया है तथा मध्यस्थों को माता-पिता के लिये लॉक और विश्वसनीय आयु-प्रमाणीकरण तंत्र उपलब्ध कराना आवश्यक है।

3. 2026 के IT संशोधनों के तहत 'सिंथेटिक रूप से जेनरेट की गई जानकारी' (SGI) क्या है?
SGI (AI-जनित सामग्री या डीपफेक) को संदर्भित करता है, प्लेटफॉर्म को इन्हें लेबल करना आवश्यक है ताकि बच्चों को विकृत छवियों या भ्रामक जानकारी के माध्यम से गुमराह होने से रोका जा सके।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

मेन्स

प्रश्न. सोशल नेटवर्किंग साइट क्या हैं और इन साइट से क्या सुरक्षा निहितार्थ सामने आते हैं? (2013)

प्रश्न. बच्चों को दुलारने की जगह अब मोबाइल फोन ने ले ली है। बच्चों के समाजीकरण पर इसके प्रभाव पर चर्चा कीजिये। (2023)

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