प्रारंभिक परीक्षा
पुन: प्रयोज्य लॉन्च वाहन (RLV) प्रौद्योगिकी
वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र सरकारी नेतृत्व वाले अन्वेषण से निजी-प्रेरित वाणिज्यिक गतिविधियों की ओर बदल रहा है और इस बदलाव में पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV) प्रौद्योगिकी एक प्रमुख विघटनकारी शक्ति के रूप में उभर रही है।
- जैसा कि अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह बाज़ार 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो जाएगा, पुन: प्रयोज्यता ने प्रक्षेपण लागत को 5–20 गुना तक कम कर दिया है, जिससे अंतरिक्ष तक अधिक सतत और बार-बार पहुँच संभव हो रही है।
पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV) प्रौद्योगिकी के मुख्य तथ्य क्या हैं?
- परिचय: एक RLV (पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान) एक ऐसा अंतरिक्ष प्रक्षेपण प्रणाली है जिसे इसके कुछ या सभी घटक चरणों को पुनः प्राप्त करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
- अधिक लागत वाले रॉकेटों के विपरीत, जो जलकर नष्ट हो जाते हैं या समुद्र में फेंक दिये जाते हैं, RLVs पृथ्वी पर लौटकर पुनर्निर्मित किये जाते हैं और फिर से उड़ान के लिये तैयार होते हैं।
- लक्ष्य: अंतरिक्ष उद्योग को "अधिक लागत" मॉडल से "परिवहन" मॉडल (जैसे- विमानन) की ओर ले जाना, जिससे अंतरिक्ष तक पहुँचने की लागत में महत्त्वपूर्ण कमी हो सके।
- RLVs के पीछे वैज्ञानिक चुनौती: रॉकेट की गति त्सोल्कोव्स्की (Tsiolkovsky) रॉकेट समीकरण पर आधारित है। यह बताता है कि ईंधन ले जाने से रॉकेट का वज़न बढ़ जाता है और उस अतिरिक्त वजन को ढोने के लिये फिर और अधिक ईंधन की आवश्यकता होती है।
- इसका परिणाम यह होता है कि रॉकेट के कुल द्रव्यमान का 90% से अधिक हिस्सा प्रपैलेंट और ईंधन टैंकों में होता है, जबकि पेलोड के लिये 4% से भी कम स्थान बचता है।
- RLV प्रौद्योगिकी इस अक्षमता को दूर करती है, महँगे रॉकेट हार्डवेयर को कई मिशनों में पुन: उपयोग करके प्रति प्रक्षेपण लागत को काफी कम करती है।
- स्टेजिंग की भूमिका: स्टेजिंग रॉकेट को कई प्रपल्शन इकाइयों में विभाजित करती है, जिन्हें आरोहण के दौरान क्रमशः त्याग दिया जाता है ताकि मृत भार कम किया जा सके।
- इससे प्रदर्शन में सुधार होता है क्योंकि बचे हुए रॉकेट को कम द्रव्यमान के साथ अधिक तेज़ी से गति प्राप्त करने की अनुमति मिलती है।
- पारंपरिक वाहन जैसे PSLV और LVM-3 पूरी तरह खर्चीले स्टेजिंग का उपयोग करते हैं, जबकि RLV सिस्टम महत्त्वपूर्ण चरणों, विशेष रूप से पहले चरण को पुनः प्राप्त और पुन: उपयोग करने का लक्ष्य रखते हैं, जिससे स्टेजिंग तथा पुन: प्रयोज्यता को जोड़कर अधिकतम दक्षता हासिल की जाती है।
- RLV तंत्र:
- प्रक्षेपण: RLV या पुन: प्रयोज्य चरण पारंपरिक रॉकेट की तरह प्रक्षेपित किया जाता है ताकि पेलोड को कक्षा में पहुँचाया जा सके।
- चरण पृथक्करण: ईंधन समाप्त होने के बाद, पुन: प्रयोज्य चरण ऊपरी चरण से अलग हो जाता है।
- पुनः प्रवेश नियंत्रण: यह चरण मार्गदर्शन, नेविगेशन और नियंत्रण प्रणाली का उपयोग करके वायुमंडल में लौटता है ताकि स्थिरता बनी रहे।
- धीमा करना: गति और गर्मी को कम करने के लिए एयरोडायनामिक ड्रैग और/या रेट्रो-प्रपल्शन (इंजन फिर से जलाना) का उपयोग किया जाता है।
- पुनर्प्राप्ति: वाहन पेड/बार्ज पर ऊर्ध्वाधर रूप से उतरता है या रनवे पर क्षैतिज रूप से उतरता है (पंख वाला RLV)।
- ऊर्ध्वाधर प्रक्षेपण, ऊर्ध्वाधर लैंडिंग (VTVL): रॉकेट नियंत्रित इंजन बर्न के माध्यम पेड या बार्ज पर सीधा खड़ा होकर उतरता है।
- क्षैतिज लैंडिंग (विंग्स बॉडी): विंग्स वाला RLV विमान की तरह ग्लाइड करके रनवे पर उतरता है।
- पुनर्निर्माण: उड़ान के बाद निरीक्षण, मरम्मत और परीक्षण कई बार पुन: उपयोग की अनुमति देते हैं, जिससे प्रति प्रक्षेपण लागत कम होती है।
- सीमाएँ:
- थर्मल तनाव: पुनः प्रवेश के दौरान अत्यधिक उष्णता उत्पन्न होती है। इंजन और सामग्री पर थकान एवं सूक्ष्म दरारें (Micro-fractures) पड़ती हैं, जिसके लिये महँगी थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम (TPS) की आवश्यकता होती है।
- पुनर्निर्माण लागत और समय: हर पुनः उपयोग के साथ बढ़ते हैं और किसी बिंदु के बाद आर्थिक लाभ को कम कर सकते हैं।
- जोखिम प्रबंधन की चुनौतियाँ: उच्च पुनः उपयोग के लिये विश्वसनीयता बनाए रखने हेतु सख्त निरीक्षण और परीक्षण आवश्यक होता है।
इसरो की पुन: प्रयोज्यता पहल
- रियूज़ेबल लॉन्च व्हीकल – टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर (RLV-TD) (पुष्पक): एक पंख वाला तकनीकी डेमोंस्ट्रेटर जो विमान जैसी लैंडिंग का अनुकरण करता है।
- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 'पुष्पक' वाहन का उपयोग करके LEX-01, 02, 03 शृंखला सफलतापूर्वक संचालित की, ताकि स्वायत्त क्षैतिज लैंडिंग का परीक्षण किया जा सके।
- ADMIRE: ISRO का वर्टिकल लैंडिंग तकनीक (VTVL) परीक्षण मंच, जिसका उद्देश्य Falcon 9 जैसी रेट्रो-प्रोपल्शन क्षमताएँ विकसित करना है।
- NGLV (प्रोजेक्ट सूर्य): नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल, जिसे पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) की जगह डिज़ाइन किया जा रहा है। इसमें वर्टिकल लैंडिंग तकनीक का उपयोग करके पुन:प्रयोग योग्य प्रथम चरण होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. रियूज़ेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) क्या है?
RLV एक लॉन्च सिस्टम है जिसे रॉकेट चरणों को पुनः प्राप्त और पुन: उपयोग करने के लिये डिज़ाइन किया गया है, जिससे इन्हें फेंकने की बजाय लॉन्च लागत में काफी कमी आती है।
2. व्यावसायिक अंतरिक्ष क्षेत्र में पुन:प्रयोग क्यों महत्त्वपूर्ण है?
पुन:प्रयोग लॉन्च लागत को 5–20 गुना तक कम करता है, बार-बार मिशन की सुविधा प्रदान करता है और अंतरिक्ष पहुँच को आर्थिक रूप से सतत बनाता है।
3. कौन-सा वैज्ञानिक बाधा अंतरिक्ष लॉन्च को महँगा बनाती है?
ट्सिओल्कोव्स्की रॉकेट समीकरण दिखाता है कि रॉकेट को विशाल ईंधन द्रव्यमान ले जाना पड़ता है, जिससे कुल द्रव्यमान का 4% से भी कम भाग ही पेलोड के लिये बचता है।
4. स्टेजिंग रॉकेट की दक्षता कैसे बढ़ाती है?
स्टेजिंग के दौरान मृत वज़न हट जाता है, जिससे शेष रॉकेट कम द्रव्यमान के साथ अधिक कुशलता से त्वरित हो सकता है।
5. भारत में पुन:प्रयोग योग्य लॉन्च तकनीक की प्रमुख पहलें कौन-सी हैं?
ISRO RLV-TD (पुष्पक) के माध्यम से पंख वाले RLV, ADMIRE के माध्यम से VTVL क्षमता और NGLV (प्रोजेक्ट सूर्य) के तहत पुन:प्रयोग योग्य प्रथम चरण विकसित कर रहा है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत के उपग्रह प्रक्षेपण यान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- PSLVs पृथ्वी के संसाधनों की निगरानी के लिये उपयोगी उपग्रहों को लॉन्च करते हैं, जबकि GSLVs को मुख्य रूप से संचार उपग्रहों को लॉन्च करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
- PSLVs द्वारा प्रक्षेपित उपग्रह पृथ्वी पर किसी विशेष स्थान से देखने पर आकाश में उसी स्थिति में स्थायी रूप से स्थिर प्रतीत होते हैं।
- GSLV Mk-III एक चार चरणों वाला प्रक्षेपण यान है जिसमें पहले और तीसरे चरण में ठोस रॉकेट मोटर्स का उपयोग तथा दूसरे व चौथे चरण में तरल रॉकेट इंजन का उपयोग किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 2
(d) केवल 3
उत्तर: (a)
रैपिड फायर
डुगोंग
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने तमिलनाडु के तंजावुर ज़िले के मनोरा में प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय डुगोंग संरक्षण केंद्र के डिजाइन में बड़े बदलाव की सिफारिश की है।
- प्रस्तावित केंद्र तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ)-III के अंतर्गत आने वाले विकास निषेध क्षेत्र और CRZ-I के उन क्षेत्रों में स्थित है जिनमें मैंग्रोव और समुद्री घास के मैदान शामिल हैं।
डुगोंग
- परिचय: डुगोंग एक विशालकाय समुद्री स्तनधारी जीव है जिसकी पूंछ डॉल्फिन जैसी होती है। यह 10 फीट तक लंबा और लगभग 420 किलोग्राम तक भारी हो सकता है। इसे समुद्री गाय और समुद्र का किसान भी कहा जाता है।
- पर्यावास और आहार: डुगोंग पूर्णतः शाकाहारी होते हैं तथा मुख्यतः समुद्री घास के मैदानों पर निर्भर रहते हैं। ये प्रायः खाड़ियों और लैगून जैसे उथले तथा उष्ण तटीय जल क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहाँ जल की गहराई सामान्यतः 10 मीटर से कम होती है।
- भारत में वितरण: कच्छ की खाड़ी, मन्नार की खाड़ी - पाक खाड़ी और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाया जाता है।
- व्यवहार एवं प्रजनन: ये दीर्घायु (70 वर्ष तक) वाले जीव होते हैं, आमतौर पर अकेले या छोटे जोड़ों में रहते हैं। इनका प्रजनन चक्र धीमा होता है, ये 9-10 वर्ष की आयु में परिपक्व होते हैं और हर 3-5 वर्ष में ही बच्चे को जन्म देते हैं।
- संरक्षण स्थिति: IUCN रेड लिस्ट में इसे सुभेद्य प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, CITES के परिशिष्ट-I (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध) और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत इसे संरक्षित किया गया है।
समुद्री घास
- समुद्री घास एक जल के नीचे उगने वाला फूलदार पौधा और एक महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र है जो समुद्र तल को स्थायित्व प्रदान करता है, मत्स्य पालन में सहयोग करता है, कार्बन को अवशोषित करता है तथा समुद्री जीवन को आश्रय प्रदान करता है।
- भारत के सबसे बड़े घास के मैदान, जो मन्नार की खाड़ी और पाक की खाड़ी (तमिलनाडु) में पाए जाते हैं, ये 13 से अधिक प्रजातियों के साथ इसकी उच्चतम विविधता का मूल स्थान हैं, जबकि लक्षद्वीप, कच्छ, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में आबादी सीमित है और संकट की स्थिति में है।
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रैपिड फायर
विश्व का पहला ग्रैविटॉन डिटेक्टर बनाने की योजना
स्टीवंस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और येल यूनिवर्सिटी के शोधकर्त्ता एक एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य ग्रेविटॉन का पता लगाना है। ये काल्पनिक क्वांटम कण माने जाते हैं जो गुरुत्वाकर्षण को वहन करते हैं और क्वांटम यांत्रिकी तथा सामान्य सापेक्षता के बीच के अंतर को समाप्त करते हैं।
ग्रेविटॉन
- परिचय: ग्रैविटॉन एक काल्पनिक प्राथमिक कण है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह गुरुत्वाकर्षण बल को वहन करता है, ठीक वैसे ही जैसे फोटॉन विद्युतचुंबकीय बल को वहन करते हैं। ग्रैविटॉन का पता चलना गुरुत्वाकर्षण को एक क्वांटम बल के रूप में प्रमाणित करेगा, जो भौतिकी में एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
- पता लगाने की विधि: प्रस्तावित डिटेक्टर एक सुपरफ्लूइड हीलियम रेज़ोनेटर है, जिसे शोर को समाप्त करने के लिये इसके क्वांटम ग्राउंड स्टेट तक ठंडा किया जाता है। जब एक गुरुत्वाकर्षण तरंग इसमें से गुजरती है, तो यह ऊर्जा की एक क्वांटम (एक ग्रेविटॉन) स्थानांतरित कर सकती है, जिससे एक फोनोन (कंपन) उत्पन्न होता है जिसे लेजर द्वारा पता लगाया जा सकता है।
- पता लगाने में आने वाली चुनौतियाँ: गुरुत्वाकर्षण चार बलों (गुरुत्वाकर्षण, विद्युत चुम्बकीय बल, प्रबल और दुर्बल नाभिकीय बल) में सबसे कमज़ोर है, जिससे पदार्थ के साथ ग्रेविटॉन की अंतःक्रिया अत्यंत दुर्लभ हो जाती है। एक ग्रेविटॉन लगभग बिना अंतःक्रिया के पदार्थ से गुजर सकता है, जिससे इसका पता लगाने की संभावना अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है।
- सीमाएँ: यदि कोई कंपन भी पता चलता है, तब भी इसे पारंपरिक गुरुत्वाकर्षण द्वारा समझाया जा सकता है। पिछले अध्ययनों से पता चलता है कि एक ग्रेविटॉन को कैच करने में सक्षम डिटेक्टर का निर्माण व्यावहारिक रूप से असंभव है।
- महत्त्व: ग्रेविटॉन का पता लगाना एक ऐतिहासिक सफलता होगी, जो भौतिकी के एकीकृत सिद्धांत की ओर मार्ग प्रशस्त करेगा और ब्रह्मांड की गहरी समझ विकसित करेगा।
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रैपिड फायर
दूरसंचार विभाग ने 6 गीगाहर्ट्ज़ बैंड का आधा हिस्सा किया अनलाइसेंस्ड
दूरसंचार विभाग (DoT) ने आधिकारिक रूप से 6GHz फ्रीक्वेंसी बैंड के निचले हिस्से को इंडोर उपयोग के लिये डी-लाइसेंस कर दिया है, जिससे भारत में WiFi 6E और WiFi 7 तकनीकों को अपनाने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
- स्पेक्ट्रम: ये अदृश्य रेडियो फ्रीक्वेंसी हैं जो वायरलेस संचार के लिये उपयोग की जाती हैं, जिनकी सीमा 20 KHz से 300 GHz तक (व्यापक विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम का एक उपसमुच्चय) होती है।
- 2.4 GHz: यह विस्तृत कवरेज (दीवारों से गुज़रता है) प्रदान करता है हालाँकि इसकी डेटा स्पीड सीमित होती है।
- 5 GHz: यह उच्च गति प्रदान करता है हालाँकि इसकी सीमा कम होती है।
- WiFi 6: अधिक दक्षता के लिये यह 2.4 GHz और 5 GHz दोनों का एक साथ उपयोग करता है।
- 6 GHz: यह 5,925–7,125 MHz की रेंज में संचालित होता है, जो 9.6 Gbps की अल्ट्रा-हाई स्पीड प्रदान करता है।
- स्पेक्ट्रम आवंटन: 5,925–6,425 MHz की 6GHz आवृति सीमा अब लाइसेंस-मुक्त है। इससे राउटर के लिये स्पेक्ट्रम की एक "एक्स्ट्रा स्ट्रैंड" उपलब्ध होगा, जिससे पारंपरिक 2.4GHz और 5GHz बैंड पर भीड़ कम होगी।
- यह कदम "मल्टी-लिंक ऑपरेशन" (MLO) को सक्षम करेगा, जो WiFi 7 की एक प्रमुख विशेषता को दर्शाता है, जो डिवाइसों को कई बैंड (2.4GHz, 5GHz, और 6GHz) पर एक साथ डेटा प्रसारित करने की अनुमति देती है, जिससे उच्च गति और कम विलंबता सुनिश्चित होती है।
- महत्त्वपूर्ण उपयोग के मामले: 6GHz बैंड वर्चुअल रियलिटी (VR), ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) और हाई-फिडेल्टी क्लाउड गेमिंग जैसे हाई-बैंडविड्थ अनुप्रयोगों के लिये आवश्यक है, क्योंकि यह न्यूनतम विलंब के साथ बड़े पैमाने पर डेटा प्रवाह की अनुमति देता है।
- वैश्विक संदर्भ: भारत ने यूरोप के समान एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें 6GHz बैंड को अनलाइसेंस्ड उपयोग (WiFi के लिये) और लाइसेंस्ड उपयोग (संभावित रूप से 5G/6G के लिये) के बीच विभाजित किया गया है। यह अमेरिका (पूरी तरह से डी-लाइसेंस्ड) या चीन (मोबाइल के लिये आरक्षित) से भिन्न है।
- संचालनात्मक प्रतिबंध: डी-लाइसेंस्ड का उपयोग केवल इंडोर वातावरण के लिये स्ट्रिक्ट है।
- यह अन्य महत्त्वपूर्ण सेवाओं के साथ हस्तक्षेप को रोकने के लिये चलते हुए वाहनों (कार, ट्रेन) और ऑइल रिग (oil rig) पर प्रतिबंधित है।
- बाज़ार का प्रभाव: इस निर्णय से नियामक अनिश्चितता दूर हो गई है, जिससे उन्नत हार्डवेयर (जैसे- सोनी का PlayStation 5 Pro) लॉन्च करने की अनुमति मिलती है, जो पूर्व में स्पेक्ट्रम प्रतिबंधों के कारण भारतीय बाज़ार से पृथक रखे गए थे।
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रैपिड फायर
INSV कौंडिन्य ओमान पहुँची
INSV कौंडिन्य ने गुजरात के पोरबंदर से अपनी प्रथम समुद्री यात्रा पूर्ण करने के पश्चात ओमान की राजधानी मस्कट स्थित पोर्ट सुल्तान काबूस पहुँचा। यह घटनाक्रम भारत और ओमान के मध्य साझा समुद्री विरासत को रेखांकित करता है।
- इस अभियान के दौरान फ्राँस की उपग्रह सेवा प्रदाता कंपनी यूटेलसैट ने अपने वनवेब सैटलाइट कौंसटेलेशन के माध्यम से INSV कौंडिन्य दल को उच्च-गति उपग्रह संपर्क उपलब्ध कराया।
INSV कौंडिन्य
- परिचय: INSV कौंडिन्य भारत का पहला सिले हुए पाल वाले से निर्मित जहाज़ है, जिसका निर्माण प्राचीन टंकाई (Tankai) जहाज़-निर्माण पद्धति से किया गया है। इसका उद्देश्य लगभग 2000 वर्ष पुरानी इस स्वदेशी एवं विस्मृत तकनीक को पुनर्जीवित करना है।
- टंकाई (Tankai) जहाज़-निर्माण पद्धति: यह एक प्राचीन जहाज़-निर्माण तकनीक है, जिसमें लकड़ी के तख्तों को नारियल रेशे (Coir) की रस्सियों से सिला जाता है तथा लोहे की कीलों जैसे मेटल फास्टनरों का प्रयोग नहीं किया जाता। यह पद्धति जहाज़ों को लोचशीलता एवं जंग-प्रतिरोधी बनती है।
- जलरोधकता के लिये कोयर, डैमर रेज़िन और पशु वसा जैसी देशज सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है।
- इस पद्धति में जहाज़ का बाहरी ढाँचा पहले तैयार किया जाता है और उसके बाद भीतर का ढाँचा जोड़ा जाता है। यह पद्धति पश्चिमी जहाज़-निर्माण से भिन्न है, जहाँ पहले अंदर का फ्रेम बनाया जाता है और बाद में बाहरी परत जोड़ी जाती है।
- टंकाई (Tankai) जहाज़-निर्माण पद्धति: यह एक प्राचीन जहाज़-निर्माण तकनीक है, जिसमें लकड़ी के तख्तों को नारियल रेशे (Coir) की रस्सियों से सिला जाता है तथा लोहे की कीलों जैसे मेटल फास्टनरों का प्रयोग नहीं किया जाता। यह पद्धति जहाज़ों को लोचशीलता एवं जंग-प्रतिरोधी बनती है।
- डिज़ाइन एवं प्रेरणा: जहाज़ का डिज़ाइन 5वीं शताब्दी की अजंता गुफा चित्रकला में चित्रित नौकाओं पर आधारित है। इसकी संरचना को राजा भोज (9वीं शताब्दी ई.) द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ ‘युक्तिकल्पतरु’ तथा विदेशी यात्रियों के विवरणों से प्रेरणा मिली है।
- इसमें गंडभेरुंड (कदंब वंश का द्विमुखी गरुड़ प्रतीक), सूर्य-चिह्न, सिंह-याली (पौराणिक सिंह) तथा हड़प्पाकालीन शैली का पाषाण लंगर जैसे प्रतीकात्मक अलंकरण सम्मिलित हैं।
- ऐतिहासिक महत्त्व: इस जहाज़ का नाम कौंडिन्य पर रखा गया है, जो प्रथम शताब्दी के एक प्रसिद्ध भारतीय समुद्री यात्री माने जाते हैं। कौंडिन्य को मेकांग डेल्टा तक समुद्री यात्रा करने तथा फुनान साम्राज्य (आधुनिक कंबोडिया) की सह-स्थापना का श्रेय दिया जाता है, जिसे दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रारंभिक भारतीयीकृत राज्यों में से एक माना जाता है।
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रैपिड फायर
मकड़ियों में लैंगिक द्विरूपता और रेशमी धागे की गुणवत्ता
एक अध्ययन से पता चलता है कि केवल बड़ी वयस्क मादा डार्विन की बार्क मकड़ियाँ ही अब तक प्रकृति में दर्ज किया गया सबसे मज़बूत रेशमी धागा बनाती हैं, जो यह दर्शाता है कि उत्क्रांति ऊर्जा उपयोग, शरीर के आकार और पारिस्थितिक आवश्यकताओं को किस प्रकार अनुकूलित करती है।
- मेडागास्कर की मूल प्रजाति डार्विन की बार्क मकड़ी (Caerostris darwini) ऐसा रेशमी धागा उत्पन्न करती है जिसकी तन्य शक्ति लगभग 1.6 गीगापास्कल होती है, जिससे यह लोहे की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक मज़बूत बनता है।
- हालाँकि यह क्षमता केवल बड़ी वयस्क मादाओं तक सीमित है, न कि नर या किशोर मकड़ियों में।
- मकड़ियों में लैंगिक द्विरूपता और रेशमी धागे की गुणवत्ता: अध्ययन में पाया गया कि लैंगिक द्विरूपता और रेशमी धागे की गुणवत्ता के बीच स्पष्ट संबंध है, क्योंकि मादाएँ नर की तुलना में 3-5 गुना बड़ी होती हैं तथा उन्हें अधिक पारिस्थितिक आवश्यकताओं का सामना करना पड़ता है।
- शोधकर्त्ताओं ने ड्रैगलाइन (मेजर एम्पुलेट) सिल्क जो ऑर्ब जालों का मुख्य संरचनात्मक रेशमी धागा होता है, का विश्लेषण किया और पाया कि इसकी असाधारण प्रबल प्रोलाइन नामक अमीनो अम्ल की उच्च मात्रा से आती है, जो लोच (Elasticity) एवं कठोरता (Toughness) के लिये महत्त्वपूर्ण है, जिससे रेशमी धागा बनाना चयापचय की दृष्टि से महँगा पड़ता है।
- इस ऊर्जा लागत को संतुलित करने के लिये वयस्क मादाएँ केवल आवश्यकता पड़ने पर ही अत्यंत मज़बूत रेशम बनाती हैं और कम लेकिन अधिक मज़बूत धागों वाले विरल जाल तैयार करती हैं, जबकि नर एवं वयस्क मकड़ियाँ कम गुणवत्ता वाले रेशम का उपयोग करके घने और कमज़ोर जाल बुनती हैं
- यह असाधारण रूप से मज़बूत रेशम नदियों और झीलों के ऊपर फैले विशाल जालों को सँभालता है, जिससे मादा मकड़ियाँ उन शिकारों को पकड़ सकती हैं जो अन्य मकड़ियों की पहुँच से बाहर होते हैं। अध्ययन का निष्कर्ष है कि रेशम की गुणवत्ता अनुकूलन के अनुसार नियंत्रित होती है और इसकी असाधारण मज़बूती तभी विकसित होती है जब वह जीवित रहने के लिये स्पष्ट लाभ प्रदान करती है।
- विशेष रूप से, रेशम की लोच सभी व्यक्तियों में समान पाई जाती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह एक आनुवंशिक रूप से संरक्षित गुण है।
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रैपिड फायर
कोडागु की जम्मा बने भूमि
कर्नाटक ने कोडागु (कूर्ग) में विशिष्ट जम्मा बने भूमि के लिये शताब्दी पुरानी भूमि रिकॉर्ड प्रणाली को आधुनिक बनाने हेतु कर्नाटक भूमि राजस्व (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 2025 पारित किया है।
- यह अधिनियम जम्मा बने भूमि पर विरासत संबंधी विवादों का समाधान करने का प्रयास करता है, इसके लिये इनके रिकॉर्ड को कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम, 1964 के अनुरूप बनाया गया है, ताकि वर्तमान धारकों, निवासियों और मालिकों का सही दस्तावेज़ीकरण सुनिश्चित किया जा सके।
जम्मा बने भूमि
- परिचय: जम्मा बने एक विशिष्ट, वंशानुगत भूमि स्वामित्व प्रणाली है, जो कोडागु ज़िले (कूर्ग) में प्रचलित है। ये भूमि मूल रूप से कोर्ग के पूर्व राजा और ब्रिटिशों द्वारा स्थानीय समुदायों, विशेष रूप से कोडावा समुदाय को सैनिक सेवा के बदले 1600-1800 के बीच प्रदान की गई थी।
- भूमि का स्वरूप: इन भूखंडों में दोनों प्रकार की भूमि शामिल है- आर्द्रभूमि (धान की खेती के लिये उपयोग की जाती है) और वनयुक्त ऊँचाई वाली भूमि, जिन्हें अधिकांशतः क्षेत्र के प्रसिद्ध कॉफी बागानों में बदल दिया गया है।
- पारंपरिक अभिलेख प्रणाली: स्वामित्व मूल अनुदानकर्त्ता (पैटेदार) के नाम पर पंजीकृत होता है और पीढ़ियों तक हस्तांतरण के बावजूद, नए मालिकों के नाम केवल पैटेदार के नाम के साथ जोड़ दिये जाते थे, उन्हें प्रतिस्थापित नहीं किया जाता था।
- इस प्रणाली के कारण गंभीर कानूनी और आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न हुईं, जिनमें बिक्री, खरीद, विरासत, म्यूटेशन और बैंक ऋण तक पहुँच में कठिनाइयाँ शामिल हैं, क्योंकि स्पष्ट शीर्षक का अभाव था।
कोडागु (कूर्ग)
- परिचय: कोडागु, जिसे आमतौर पर कूर्ग के नाम से जाना जाता है, कर्नाटक के पश्चिमी घाट में स्थित एक खूबसूरत, उच्च-ऊँचाई वाला ज़िला है। यह अपनी कोहरे वाली पहाड़ियों और हरे-भरे कॉफी बागानों के लिये विश्वविख्यात है तथा इसे ‘भारत का स्कॉटलैंड’ कहा जाता है। यहाँ कावेरी नदी (तालकावेरी) का उद्गम स्थल है, जो प्रायद्वीपीय भारत के लिये महत्त्वपूर्ण नदी है।
- अर्थव्यवस्था: कोडागु की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है, जिसमें मुख्यतः कॉफी का उत्पादन होता है (यह भारत का प्रमुख रोबस्टा/अरबिका कॉफी क्षेत्र है)। अन्य प्रमुख फसलें काली मिर्च, इलायची और रबर हैं।
- संस्कृति: यह कोडावा लोगों का आवास है, जो अपनी योद्धा परंपरा, विशिष्ट उत्सवों (जैसे- कैलपोध, पुथारी) और अलग-अलग परिधान व रीति-रिवाज़ों के लिये जाने जाते हैं।
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