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अंडमान सागर

स्रोत: ऑल इंडिया रेडियो

शरणार्थियों के लिये संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त (UNHCR) के अनुसार, लगभग 250 लोगों को ले जा रही एक नाव, जिसमें मुख्य रूप से रोहिंग्या शरणार्थी और बांग्लादेशी नागरिक शामिल थे, के अंडमान सागर में डूबने की आशंका है।

  • अंडमान सागर विश्व के अत्यंत जोखिमपूर्ण समुद्री प्रवासन मार्गों में से एक बन चुका है। हज़ारों रोहिंग्या शरणार्थी (म्याँमार के रखाइन राज्य से संबंधित राज्यविहीन मुस्लिम अल्पसंख्यक समूह) नियमित रूप से बांग्लादेश या म्याँमार से अंडमान सागर के पार जोखिमपूर्ण यात्राएँ करते हैं।
    • ये प्रायः नवंबर से अप्रैल के मध्य (जब समुद्र अपेक्षाकृत शांत होता है) जर्जर नौकाओं के माध्यम से इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे मुस्लिम-बहुल देशों में शरण और बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में यात्राएँ करते हैं।

अंडमान सागर  

  • अंडमान सागर उत्तर-पूर्वी हिंद महासागर का एक सीमांत सागर है, जिसके उत्तर-पूर्व में म्याँमार और थाईलैंड, दक्षिण में मलय प्रायद्वीप तथा सुमात्रा एवं पश्चिम में भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह स्थित हैं जो इसे बंगाल की खाड़ी से पृथक् करते हैं।
  • इसका दक्षिणी भाग सँकरा होकर मलक्का जलडमरूमध्य में मिलता है, जो हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक व्यापार गलियारा है। 
  • भौगोलिक दृष्टि से इसके उत्तरी भाग में मरतबन की खाड़ी सम्मिलित है तथा इसमें इरावदी, सालवीन और सितांग जैसी प्रमुख नदियाँ मिलती हैं, जबकि इसका तल बर्मा-सुंडा प्लेट सीमा के साथ विवर्तनिक रूप से सक्रिय रहता है।
  • रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से यह क्षेत्र वैश्विक नौवहन के लिये महत्त्वपूर्ण है तथा अंडमान और निकोबार कमान के माध्यम से भारत को समुद्री सामरिक बढ़त प्रदान करता है। साथ ही, यह क्षेत्र समृद्ध समुद्री जैव विविधता एवं मत्स्य संसाधनों से युक्त है, किंतु इस पर बढ़ते पर्यावरणीय दबाव गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं।

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रैपिड फायर

अमरावती क्वांटम रेफरेंस फैसिलिटी

स्रोत: द हिंदू 

भारत की डीप-टेक महत्त्वाकांक्षाओं और स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं को बढ़ावा देते हुए आंध्र प्रदेश ने भारत की पहली ओपन-एक्सेस अमरावती क्वांटम रेफरेंस फैसिलिटी (AQRF) का उद्घाटन किया है। 

  • AQRF: ट्विन सेंटर अमरावती 1S (SRM विश्वविद्यालय, नीरुकोंडा) और अमरावती 1Q (मेधा टावर्स, गन्नवरम) को आधिकारिक तौर पर विश्व क्वांटम दिवस पर लॉन्च किया गया था, जो क्वांटम विज्ञान के 100 वर्षों के उत्सव के साथ मेल खाता है।
    • AQRF को टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR), भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), DRDO और IIT बॉम्बे के साथ-साथ टेक स्टार्टअप्स क्यूबिटेक और क्यूबिट फोर्स के सहयोग से घरेलू स्तर पर विकसित किया गया था।
  • मूल उद्देश्य: फैसिलिटी की ओपन-एक्सेस प्रकृति शोधकर्त्ताओं और डीप-टेक कंपनियों को स्वदेशी क्वांटम हार्डवेयर का परीक्षण और प्रमाणन करने की अनुमति देती है, जो क्वांटम प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता के भारत के दृष्टिकोण को महत्त्वपूर्ण रूप से आगे बढ़ाती है।
  • क्षेत्रीय अनुप्रयोग: यह अवसंरचना दवाओं की खोज, कृषि एवं जलवायु मॉडलिंग जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में क्रांति लाने में सक्षम कंप्यूटिंग शक्ति प्रदान करेगी।
  • आंध्र प्रदेश का व्यापक डीप-टेक विज़न: राज्य का लक्ष्य अमरावती को 'क्वांटम वैली' के रूप में विकसित करना है।
    • अतिरिक्त टेक हब में तिरुपति में एक स्पेस सिटी, ओरवाकल में एक ड्रोन हब और अनंतपुर तथा विशाखापत्तनम में सेमीकंडक्टर एवं मेड-टेक क्लस्टर शामिल हैं।
  • विश्व क्वांटम दिवस: विश्व क्वांटम दिवस 14 अप्रैल को मनाया जाता है, जो प्लांक स्थिरांक के प्रथम पूर्णांकित अंक 4.14 के रेफेरेंस को प्रदर्शित करता है: 4.1356677×10⁻¹⁵ eV⋅s, जो ऊर्जा और समय का गुणनफल है तथा क्वांटम भौतिकी को नियंत्रित करने वाला मूलभूत स्थिरांक है।

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रैपिड फायर

दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर

स्रोत: द हिंदू

हाल ही में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिये दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर का उद्घाटन किया गया।

  • परिचय: यह लगभग 210 किमी. लंबा, छह-लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे है, जिसकी न्यूनतम डिज़ाइन गति 100 किमी./घंटा है। यह दिल्ली से देहरादून तक विस्तृत है, लगभग ₹11,868 करोड़ की लागत से निर्मित है और इसे चार चरणों में विकसित किया गया है।
    • इस परियोजना से यात्रा समय 5-6 घंटे से घटकर लगभग 2-2.5 घंटे होने की संभावना है, साथ ही ईंधन की खपत और लॉजिस्टिक्स लागत में भी कमी आएगी।
    • इस एक्सप्रेसवे में नियंत्रित प्रवेश एवं निकास बिंदु, स्थानीय यातायात के लिये समर्पित सर्विस रोड और FASTag-आधारित टोल संग्रह की व्यवस्था शामिल है, जिनका उद्देश्य भीड़भाड़ कम करना और समग्र ड्राइविंग अनुभव को बेहतर बनाना है।
  • कनेक्टिविटी: इस परियोजना में अक्षरधाम से खेकरा तक 31.6 किमी. का ब्राउनफील्ड एलिवेटेड खंड, बागपत से सहारनपुर तक 120 किमी. का ग्रीनफील्ड खंड, गणेशपुर तक लगभग 42 किमी. का पूर्ण खंड तथा देहरादून तक लगभग 20 किमी. का अंतिम खंड (आंशिक उन्नयन सहित) शामिल है।
    • इसमें हरिद्वार तक एक स्पर (शाखा मार्ग) शामिल है, जो चारधाम राजमार्ग से जुड़ता है। यह दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-कटरा और दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे जैसे प्रमुख कॉरिडोर से एकीकृत है तथा देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश और मसूरी तक पहुँच को बेहतर बनाता है, जिससे कनेक्टिविटी और पर्यटन को बढ़ावा मिलता है।
  • पर्यावरणीय उपाय: इस परियोजना में लगभग 10.97 किमी. लंबा वन्यजीव गलियारा शामिल है, जो कि एशिया के सबसे बड़े एलिवेटेड वन्यजीव कॉरिडोर में से एक को सम्मिलित करता है। यह शिवालिक पहाड़ियों में स्थित राजाजी राष्ट्रीय उद्यान सहित वन क्षेत्रों से होकर गुज़रता है और वन्यजीवों की सुरक्षित एवं निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करता है।
    • अतिरिक्त प्रावधानों में अनेक एनिमल क्रॉसिंग, हाथियों के लिये अंडरपास तथा डाट काली मंदिर के पास एक सुरंग शामिल है, जो इस कॉरिडोर में वन्यजीवों की निर्बाध आवाजाही को सुनिश्चित करते हैं।
    • इस परियोजना से 20 वर्षों में लगभग 240 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आने तथा लगभग 19% ईंधन की बचत होने की संभावना है।
  • आर्थिक प्रभाव: यह कॉरिडोर व्यापार, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग और उद्योग को बढ़ावा देगा, किसानों और पशुपालकों के लिये बाज़ार तक पहुँच को बेहतर बनाएगा तथा बड़े पैमाने पर रोज़गार के अवसर उत्पन्न करेगा।

Delhi_Dehradun_Economic_Corridor

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रैपिड फायर

हबल टेंशन

स्रोत: द हिंदू

हाल के अवलोकनों के अनुसार, ब्रह्मांड की स्थानीय विस्तार दर (लोकल एक्सपैंशन रेट) को लगभग 73.5 किमी./सेकंड प्रति मेगापारसेक तक सीमित किया गया है, जिससे लंबे समय से जारी “हबल टेंशन” पर विमर्श और अधिक तीव्र हो गया है।

  • परिभाषा: हबल टेंशन उस असहमति को दर्शाती है, जो भौतिकविदों के बीच ब्रह्मांड के विस्तार की सटीक दर (हबल स्थिरांक) को लेकर विद्यमान है।
    • वर्ष 1929 में एडविन हबल ने आकाशगंगाओं के अपसरण वेग तथा दूरी के मध्य संबंध (हबल का नियम) प्रतिपादित किया, जिसने सर्वप्रथम यह मात्रात्मक साक्ष्य प्रस्तुत किया कि ब्रह्मांड विस्तारशील है।
  • विमर्श के विषय: दो स्वतंत्र रूप से सत्यापित एवं अत्यंत सटीक विधियाँ परस्पर विरोधी परिणाम प्रस्तुत करती हैं, जिससे ब्रह्मांड की अनुमानित विस्तार दर में विसंगति उत्पन्न होती है।
    • स्थानीय मापन विधि: कॉस्मिक डिस्टेंस लैडर (निकटवर्ती तारों एवं सुपरनोवा के अवलोकन) के माध्यम से खगोलविद् लगभग 73–73.5 किमी./सेकंड प्रति मेगापारसेक की अपेक्षाकृत उच्च विस्तार दर का अनुमान लगाते हैं।
    • प्रारंभिक ब्रह्मांड विधि: कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड (बिग बैंग का अवशिष्ट विकिरण) तथा गणितीय मॉडलों के आधार पर वैज्ञानिक लगभग 67 किमी./सेकंड प्रति मेगापारसेक की अपेक्षाकृत निम्न विस्तार दर का अनुमान लगाते हैं।
  • निहितार्थ: यह विसंगति संकेत देती है कि ब्रह्मांड के संबंध में हमारी वर्तमान समझ अपूर्ण हो सकती है, जिससे संभावित मापन त्रुटियों अथवा डार्क एनर्जी के अज्ञात गुणों जैसी नई भौतिकी की संभावनाओं की दिशा में अनुसंधान को प्रोत्साहन मिल रहा है।

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