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डेली न्यूज़

  • 16 Mar, 2020
  • 64 min read
भारतीय समाज

दवा प्रतिरोधी तपेदिक का सफल इलाज

प्रीलिम्स के लिये:

दवा प्रतिरोधी तपेदिक

मेन्स के लिये:

तपेदिक से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव  

चर्चा में क्यों?

हाल ही में दक्षिण अफ्रीका में दवा प्रतिरोधी तपेदिक (Drug-Resistant TB) के लिये चलाए गए एक प्रायोगिक कार्यक्रम के अंतर्गत 90% मरीज़ों के इलाज में सफलता प्राप्त हुई है।

मुख्य बिंदु:  

  • इस परीक्षण में दक्षिण अफ्रीका के तीन अलग-अलग स्थानों पर ‘निक्स टीबी’ (Nix-TB) नामक एक कार्यक्रम के तहत दवा प्रतिरोधी तपेदिक से ग्रसित 109 लोगों को शामिल किया गया था।
  • इस कार्यक्रम में ‘बहुऔषध-प्रतिरोधक तपेदिक’ (Multidrug-resistant TB or MDR-TB) और ‘व्यापक रूप से दवा प्रतिरोधी तपेदिक’ (Extensively Drug-Resistant TB or XDR-TB) से ग्रसित लोगों को शामिल किया गया था।
  • ‘बहुऔषध-प्रतिरोधक तपेदिक’ (Multidrug-resistant TB or MDR-TB): जब किसी मरीज़ पर तपेदिक के इलाज के लिये उपयोग की जाने वाली दो सबसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक्स काम नहीं करती हैं तो तपेदिक के ऐसे मामलों को MDR-TB के रूप में जाना जाता है।
  • ‘व्यापक रूप से ड्रग प्रतिरोधी तपेदिक’ (Extensively Drug-Resistant TB or XDR-TB): XDR-TB के मामलों में तपेदिक के इलाज के लिये उपयोग की जाने वाली चार सबसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक्स का असर बीमारी पर नहीं होता है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, भारत में वर्ष 2016 तक XDR के मामलों की संख्या लगभग 1,40,000 थी।  
  • इस उपचार के तहत मरीज़ों को 26 हफ़्तों तक तीन दवाएँ {बेडाक्यूलाइन (Bedaquline), प्रेटोमैनिड (Pretomanid) और लिनेज़ोलिड (Linezolid)} दी गईं और अगले 6 माह तक नियमित रूप से उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली गई।    
  • कार्यक्रम में शामिल 109 लोगों में 71 मरीज़ XDR-TB और 38 मरीज़ MDR-TB से पीड़ित थे। 

उपचार के परिणाम:

  • इस कार्यक्रम में शामिल 109 में से 98 (90%) लोगों का सफल उपचार किया गया।
  • इसमें XDR-TB के कुल 71 मरीज़ों में से 63 (89%) और 38 MDR-TB के मरीज़ों में से 35 (92%) का सफल उपचार किया गया। 
  • कार्यक्रम में शामिल 11 अन्य लोगों में से 7 की उपचार के दौरान ही मृत्यु हो गई जबकि 2 मरीज़ों में उपचार के बाद 6 माह के अंदर ही बीमारी के लक्षण पुनः देखे गए।

उपचार में प्रयुक्त दवाओं का दुष्प्रभाव:

  • कार्यक्रम में शामिल 88 ऐसे मरीज़ जिन्हें लिनेज़ोलिड (Linezolid) नामक दवा दी गई, में परिधीय तंत्रिका विकृति (कमज़ोरी, तंत्रिका क्षति के कारण हाथ व पैर दर्द) जैसी समस्याएँ देखी गईं। हालाँकि अधिकांश मामलों में ये लक्षण बहुत हल्के थे। 
  • दो अन्य मरीज़ों में ऑप्टिक न्युरैटिस (Optic Neuritis) और 40 अन्य में एनीमिया के लक्षण पाए गए। 

तपेदिक: 

  • तपेदिक ‘माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस’ नामक बैक्टीरिया से फैलने वाला संक्रामक रोग है। 
  • इस रोग को ‘क्षय रोग’ या ‘राजयक्ष्मा’ के नाम से भी जाना जाता है। 
  • तपेदिक सामान्यतः मनुष्य के फेफड़ों को प्रभावित करता है परंतु पिछले कुछ वर्षों में तपेदिक के ऐसे नए मामले सामने आए, जिनमें फेफड़ों के अलावा अन्य अंग भी टीबी से संक्रमित पाए गए। 
  • 24 मार्च, 1982 को जर्मन सूक्ष्मजीव विज्ञानी रोबर्ट कोच (Robert Koch) ने टीबी के जीवाणु की खोज की थी। 
  • प्रतिवर्ष 24 मार्च को विश्व तपेदिक दिवस मनाया जाता है। 

भारत में XDR-TB के मामले:

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन की द ग्लोबल ट्यूबरक्लोसिस रिपोर्ट (The Global Tuberculosis Report), 2019 के अनुसार, विश्व में तपेदिक और दवा प्रतिरोधी तपेदिक के सर्वाधिक मामले भारत में पाए गए हैं। 
  • एक अन्य आँकड़े के अनुसार, महँगे उपचार के कारण वर्तमान में भारत में मात्र 2.2% मरीज़ों को ही दवा प्रतिरोधी तपेदिक मामलों में सही इलाज मिल पाता है।

TB-Cases

  • भारत सरकार ने वर्ष 2019 में तपेदिक के उपचार के लिये विश्व बैंक से 400 मिलियन डॉलर के एक ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किये थे।
  • इसके साथ ही वर्ष 2016 में देश में बेडाक्यूलाइन (Bedaquline) की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी।

आगे की राह: 

  • ‘निक्स-टीबी’ कार्यक्रम के तहत दवा प्रतिरोधी तपेदिक का सफल उपचार तपेदिक उपचार के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है।
  • इस कार्यक्रम की सफलता के बाद असाध्य माने जाने वाले MDR-TB और XDR-TB के मामलों में इलाज संभव हो सकेगा।
  • भारत सरकार को अन्य देशों और WHO जैसी वैश्विक संस्थाओं के सहयोग देश में तपेदिक के उपचार के लिये शोध को बढ़ावा देना चाहिये।  

निष्कर्ष: 

भारत सरकार को अन्य देशों के सहयोग से प्राप्त होने वाली दवाओं से तपेदिक के कुछ मामलों में उपचार संभव हो सका था, परंतु इस परियोजना का प्रभाव बहुत ही सीमित रहा। तपेदिक के मामलों में उपचार के लिये शोध के साथ-साथ सामुदायिक स्तर जन-जागरूकता, क्षमता विकास और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता पर सुनिश्चित करना बहुत ही आवश्यक है।           


स्रोत: द हिंदू


शासन व्यवस्था

स्पेनिश फ्लू- एक महामारी

प्रीलिम्स के लिये:

स्पेनिश फ्लू, कोरोनावायरस (COVID-19)

मेन्स के लिये:

महामारी और उसके प्रसार संबंधी मुद्दे

चर्चा में क्यों?

जिस प्रकार कोरोनावायरस (COVID-19) वैश्विक स्तर पर तीव्र गति से फैलता जा रहा है उसे देखते हुए कई विद्वानों ने इसकी तुलना मौजूदा इतिहास की सबसे विनाशकारी महामारी स्पेनिश फ्लू (Spanish Flu-1918-19) से की है। 

स्पेनिश फ्लू (Spanish Flu)- एक महामारी

  • एक सदी पूर्व इस महामारी का केंद्रबिंदु भारत था, जहाँ तकरीबन 10-20 मिलियन लोगों की मृत्यु हुई थी। इस महामारी ने भारत को दो चरणों में प्रभावित किया जिसमें शुरुआती चरण अपेक्षाकृत काफी सीमित था, जबकि महामारी का दूसरा चरण काफी खतरनाक रूप में सामने आया।
  • अनुमानतः प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान स्वदेश लौटने वाले सैनिकों के माध्यम से इस बीमारी ने भारत में प्रवेश किया था।
  • स्पेनिश फ्लू को लेकर वर्ष 2014 में किये गए अध्ययन में निम्नलिखित तथ्य सामने आए-
    • समय के साथ महामारी की गंभीरता कम हो गई।
    • समय के साथ मृत्यु के औसत समय में कमी आई।
    • हालाँकि महामारी की अवधि काफी लंबी थी।
    • महामारी का प्रभाव भारत के पूर्वी भाग में सबसे अंत में देखने को मिला।

कैसे समाप्त हुआ स्पेनिश फ्लू

  • स्पेनिश फ्लू की समाप्ति को लेकर विभिन्न विद्वान निम्नलिखित कारण बताते हैं:
    • सरकार के प्रयासों और अनौपचारिक संचार के माध्यम से समय पर लोगों को इस संदर्भ में सूचना प्राप्त हो गई थी और इस महामारी के कलकत्ता पहुँचने तक लोग विभिन्न निवारक उपायों का प्रयोग करने लगे थे, जबकि बॉम्बे और मद्रास में इसे नहीं रोका जा सका क्योंकि तब तक लोगों को इस संदर्भ में जानकारी नहीं थी।
    • एक सिद्धांत के अनुसार, जैसे-जैसे वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है तो उसकी क्षमता में कमी आ जाती है और यह धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
    • शोध के अनुसार, गर्म मौसम में स्पेनिश फ्लू का प्रभाव काफी सीमित होता है।
  • स्पेनिश फ्लू को लेकर लगभग एक शताब्दी बाद विभिन्न प्रकार के अध्ययन किये गए ताकि भविष्य में आने वाली किसी भी संभावित महामारी से निपटने हेतु रणनीति तैयार की जा सके।

आगे की राह

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोनावायरस (COVID-19) को महामारी घोषित कर दिया है ऐसे में एक त्वरित प्रारंभिक प्रतिक्रिया के महत्त्व को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
  • स्पेनिश फ्लू पर हुए अध्ययनों में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर महामारी को फैलने से रोकने को लिये काफी कम समय मिलता है, जिसके कारण एक आपातकालीन प्रबंधन की आवश्यकता होती है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय राजनीति

रक्षा बजट के अनुमान और आवंटन में अंतराल

प्रीलिम्स के लिये:

संसदीय स्थायी समिति

मेन्स के लिये:

रक्षा बजट के अनुमान और आवंटन में अंतराल के संदर्भ में संसदीय स्थायी समिति द्वारा दी गई जानकारी

चर्चा में क्यों?

हाल ही में रक्षा क्षेत्र पर संसदीय स्थायी समिति ने इस क्षेत्र के आधुनिकीकरण को प्रभावित करने वाले बजटीय अनुमानों और आवंटन के बीच बड़े अंतराल की भरपाई न करने पर चिंता व्यक्त की है

मुख्य बिंदु:

  • इस समिति ने प्रतिबद्ध देनदारियों और अतिरिक्त रक्षा खरीद के लिये समर्पित एक कोष की सिफारिश की है।
  • रक्षा बजट के आवंटन में कमी ने तीन त्रि-सेवा संगठनों की स्थापना तथा अंडमान और निकोबार कमांड की परिचालन तत्परता को भी प्रभावित किया है।
  • रक्षा मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार समिति ने बताया कि वर्ष 2015-16 के बाद से तीनों सेवाओं में से किसी को भी अनुमान के अनुसार बजट का आवंटन नहीं किया गया है।

तीनों सेनाओं का बजटीय अंतराल:

  • थलसेना के लिये बजटीय पूंजी अनुमान आयर आवंटन में अंतराल, जो वर्ष 2015-16 में 4,596 करोड़ रुपए था, वर्ष 2020-21 में बढ़कर 17,911.22 करोड़ रुपए हो गया (14% से 36%)।
  • नौसेना के मामले में यह अंतराल वर्ष 2014-15 के 1,264.89 करोड़ रुपए से बढ़कर वर्ष 2020-21 में 18,580 करोड़ रुपए हो गया (5% से 41%)।
  • वायुसेना के मामले में यह अंतराल 2015-16 के 12,505.21 करोड़ रुपए से बढ़कर बढ़कर वर्ष 2020-21 में 22,925.38 करोड़ रुपए हो गया (27% से 35%)।

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समिति द्वारा प्रदत्त जानकारी:

  • समिति का मानना है कि इस तरह की स्थिति देश को आधुनिक युद्ध के लिये तैयार करने हेतु अनुकूल नहीं है, क्योंकि पूंजी गहन आधुनिक मशीनों की आवश्यकता किसी भी युद्ध के परिणाम को न केवल अपने पक्ष में झुकाने के लिये आवश्यक है बल्कि सुरक्षा संबंधी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिये भी अति आवश्यक है।
  • समिति ने  पूंजी आवंटन में काफी कमी का उल्लेख किया है जो कि अनुमानित पूंजी से औसतन 35% कम है।
  • समिति का मानना है कि नौसेना की लड़ने की क्षमता विमानवाहकों, पनडुब्बी, विध्वंसक और युद्धपोतों जैसे उच्च मूल्य आधारित उपकरणों पर निर्भर करती है लेकिन नौसेना के लिये पूंजीगत बजट के आवंटन में सबसे तेज़ गिरावट दर्ज की गई है।
  • अपर्याप्त पूंजी आवंटन निश्चित रूप से संविदात्मक दायित्त्वों के संदर्भ में कमी की स्थिति पैदा करेगा।
  • समिति ने कहा कि यह सुझाव देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है कि अगले बजट  से प्रतिबद्ध देनदारियों और नई योजनाओं हेतु एक समर्पित फंड की स्थापना की जाए।
  • नौसेना और भारतीय वायुसेना दोनों की ऐसी स्थिति है, जहाँ बजटीय पूंजी आवंटन के एक हिस्से से अधिक उनकी देनदारियाँ हैं।
  • इसे समान करने के लिये रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की देनदारियों के भुगतान को अन्य सेवाओं से संबंधित देनदारियों से अलग करने हेतु मजबूर किया गया है।
  • संयुक्त कर्मचारियों हेतु विविध व्यय के तहत अनुमानित बजट 4 660.94 करोड़ रुपए था, जबकि इसके लिये किया गया बजटीय आवंटन 294.00 करोड़ रुपए है स्थायी समिति को भी यह सूचित किया गया कि पिछले वर्ष का शेष बोझ केवल 32.14 करोड़ रुपए है।
  • परंतु ये आँकड़े दर्शाते हैं कि वर्तमान में बजटीय आवंटन उपलब्धता 261.86 करोड़ रुपए है और शुद्ध अंतराल 399.08 करोड़ रुपए है।
  • विविध व्यय में बजटीय आवंटन की कमी के कारण रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (Defence Space Agency- DSA) रक्षा साइबर एजेंसी (Defence Cyber Agency) और सशस्त्र बल विशेष परिचालन प्रभाग (Armed Forces Special Operations Division- AFSOD) के संचालन में असमर्थता सामने आ रही है।
  • बजटीय आवंटन में कमी से अंडमान और निकोबार कमांड के सामने जहाज़ों की वार्षिक परिचालन योजनाओं, वार्षिक मरम्मतीकरण योजनाओं, सिग्नल इंटेलिजेंस के रखरखाव, प्रशिक्षण संस्थानों और परिचालन इकाइयों के प्रशासन पर नकारात्मक प्रभाव के कारण परिचालन संबंधी बाधाएँ आ रही हैं।

संसदीय स्थायी समिति:

  • स्थायी समितियाँ अनवरत प्रकृति की होती हैं अर्थात् इनका कार्य सामान्यतः निरंतर चलता रहता है। इस प्रकार की समितियों का पुनर्गठन वार्षिक आधार पर किया जाता है। इनमें शामिल कुछ प्रमुख समितियाँ इस प्रकार हैं :
    • लोक लेखा समिति
    • प्राक्कलन समिति
    • सार्वजनिक उपक्रम समिति
    • एस.सी. व एस.टी. समुदाय के कल्याण संबंधी समिति
    • कार्यमंत्रणा समिति
    • विशेषाधिकार समिति
    • विभागीय समिति

स्रोत- द हिंदू


सामाजिक न्याय

पर्यावरण संरक्षण और महिलाएँ

प्रीलिम्स के लिये:

यू.एन. वीमेन

मेन्स के लिये:

पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की भूमिका

चर्चा में क्यों?

‘यू.एन. वीमेन’ (UN Women) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु आपातकाल, संघर्ष और बहिष्कार की राजनीति के बढ़ते चलन ने भविष्य में लैंगिक समानता की प्रगति को खतरे में डाल दिया है।

प्रमुख बिंदु

  • रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु संकट की आर्थिक लागतों के साथ-साथ, विस्थापन तथा ज़बरन पलायन में वृद्धि, गरीबी और असुरक्षा का महिलाओं तथा लड़कियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिसके कारण दुरुपयोग और हिंसा का जोखिम काफी अधिक बढ़ जाता है।
  • आँकड़ों के अनुसार, हालाँकि वर्तमान में विश्व की 39 प्रतिशत महिलाएँ कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन क्षेत्र में कार्य कर रही हैं, किंतु फिर भी मात्र 14 प्रतिशत महिलाएँ ही कृषि भूमि धारक हैं। 
  • रिपोर्ट में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, लगभग 75 प्रतिशत सांसद पुरुष हैं, 73 प्रतिशत प्रबंधकीय पदों पर पुरुष कार्यरत हैं और तकरीबन 70 प्रतिशत जलवायु वार्ताकार भी पुरुष ही हैं।
    • इस लिहाज़ से विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति काफी चिंताजनक है।

महिलाएँ और पर्यावरण 

  • विभिन्न विद्वान महिलाओं को भूमि तथा जैव विविधता संसाधनों के प्रबंधन और स्थायी उपयोग के लिये महत्त्वपूर्ण मानते हैं।
  • लैंगिक समानता के क्षेत्र में कार्य करना सतत् विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिये काफी महत्त्वपूर्ण है।
  • UNEP के ग्लोबल जेंडर एंड एन्वायरनमेंट आउटलुक 2016 (GGEO) में लैंगिक असमानता को स्थायी विकास के पर्यावरणीय आयाम को आगे बढ़ाने हेतु मुख्य चुनौतियों में से एक के रूप में प्रस्तुत किया है।
    • GGEO में स्थायी विकास की बाधाओं को संबोधित करने में जेंडर रेस्पाॅन्सिव अप्रोच (Gender Responsive Approaches) को अपनाने की बात की गई है।
  • ‘यू.एन. वीमेन’ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, जेंडर रेस्पाॅन्सिव अप्रोच में न केवल महिलाओं के विविध और विशिष्ट हितों तथा ज़रूरतों को पहचाना जाना चाहिये, बल्कि प्रतिक्रिया कार्यों के विकास, कार्यान्वयन और निगरानी में उनकी भागीदारी तथा नेतृत्व भी सुनिश्चित करना चाहिये।
  • ‘यू.एन. वीमेन’ के अनुसार, प्रणालीगत और स्थायी परिवर्तन को प्रेरित करने के लिये लैंगिक समानता हेतु वित्तपोषण में बहुत अधिक वृद्धि करने की आवश्यकता है, ताकि प्रौद्योगिकी और नवाचार की क्षमता का दोहन किया जा सके तथा यह सुनिश्चित किया जा सके कि विकास महिलाओं के समावेशी हो।

‘यू.एन. वीमेन’ (UN Women)

  • वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा ‘यू.एन. वीमेन’ (UN Women) का गठन किया गया था। यह संस्था महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण के क्षेत्र में कार्य करती है।
  • इसके तहत संयुक्त राष्ट्र तंत्र के 4 अलग-अलग प्रभागों के कार्यों को संयुक्त रूप से संचालित किया जाता है:
    • महिलाओं की उन्नति के लिये प्रभाग (Division for the Advancement of Women -DAW)
    • महिलाओं की उन्नति के लिये अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान (International Research and Training Institute for the Advancement of Women -INSTRAW)
    • लैंगिक मुद्दों और महिलाओं की उन्नति पर विशेष सलाहकार कार्यालय (Office of the Special Adviser on Gender Issues and Advancement of Women-OSAGI)
    • महिलाओं के लिये संयुक्त राष्ट्र विकास कोष (United Nations Development Fund for Women-UNIFEM)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


शासन व्यवस्था

SAARC Covid-19 इमरजेंसी फण्ड

प्रीलिम्स के लिये:

SAARC Covid-19 इमरजेंसी फंड

मेन्स के लिये:

सार्क और भारत, Covid-19

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री ने SAARC देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान क्षेत्र में Covid-19 की चुनौती से निपटने के लिये एक SAARC Covid-19 इमरजेंसी फंड बनाने का प्रस्ताव रखा।

मुख्य बिंदु:

  • 15 मार्च, 2020 को भारतीय प्रधानमंत्री के आग्रह पर Covid-19 की चुनौती से निपटने की रणनीति पर विचार-विमर्श के लिये सार्क समूह के सदस्य देशों के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया।

Covid-19:

  • WHO के अनुसार, COVID-19 में CO का तात्पर्य कोरोना से है, जबकि VI विषाणु को, D बीमारी को तथा संख्या-19 वर्ष 2019 (बीमारी के पता चलने का वर्ष) को चिह्नित करती है।
  • कोरोना वायरस (COVID -19) के शुरुआती मामले दिसंबर 2019 में चीन के हुबेई प्रांत के वुहान शहर में अज्ञात कारण से होने वाले निमोनिया के रूप में सामने आए थे।
  • 31 दिसंबर, 2019 को चीन ने WHO को इस अज्ञात बीमारी के बारे में सूचित किया और 30 जनवरी 2020 को इसे वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया गया।
  • शीघ्र ही यह संक्रामक बीमारी चीन के साथ-साथ विश्व के अन्य देशों में भी फैल गई।   
  • इस कॉन्फ्रेंस के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने Covid-19 की चुनौती और इसकी अनिश्चितता को स्वीकार करते हुए इस समस्या से निपटने के लिये सार्क देशों को मिलकर काम करने की आवश्यकता पर बल दिया।
  • भारतीय प्रधानमंत्री ने सामूहिक प्रयास से Covid-19 की चुनौती से निपटने के लिये एक ‘SAARC Covid-19 इमरजेंसी फंड’ स्थापित किये जाने का प्रस्ताव रखा। 
  • भारतीय प्रधानमंत्री ने इस फंड के लिये भारत की तरफ से शुरुआती सहयोग के रूप में 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर देने की घोषणा की।
  • साथ ही प्रधानमंत्री ने सार्क देशों के विदेश सचिवों व अन्य अधिकारियों के बीच विचार-विमर्श से इस फंड के लिये रूप-रेखा तैयार करने का सुझाव दिया।
  • इस वीडियो कॉन्फ्रेंस में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भविष्य में दक्षिण एशिया क्षेत्र में ऐसी स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से निपटने और उनकी रोकथाम के लिये आपसी सहयोग से एक चिकित्सा संस्थान की स्थापना किये जाने का सुझाव दिया। 

सार्क (SAARC): 

  • दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (South Asian Association for Regional Cooperation-SAARC) की स्थापना 8 दिसंबर, 1985 को ढाका (बांग्लादेश) में हुई थी।
  • 17 जनवरी, 1987 को सार्क मुख्यालय की स्थापना नेपाल की राजधानी काठमांडू में की गई।
  • इस संगठन की स्थापना क्षेत्र के सात देशों (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालदीव और श्रीलंका) के सहयोग से की गई थी। 
  • अप्रैल 2007 में अफगानिस्तान आठवें सदस्य के रूप में इस संगठन में शामिल हुआ।
  • यह संगठन सदस्य देशों में कृषि, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, पर्यावरण, शिक्षा, सुरक्षा, ऊर्जा, जैव-प्रौद्योगिकी जैसे अनेक क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देता है।    
  • क्षेत्र में Covid-19 के बढ़ते प्रसार को देखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा 13 मार्च, 2020 को सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच एक वीडियो कॉन्फ्रेंस का प्रस्ताव रखा था।    
  • इस कॉन्फ्रेंस के दौरान सभी सदस्य देशों ने Covid-19 की चुनौती, अपने अनुभव और इसकी रोकथाम के लिये किये जा रहे प्रयासों के बारे में जानकारी साझा की।
  • ध्यातव्य है कि वर्ष 2014 में नेपाल में आयोजित 18वें सार्क सम्मेलन के बाद यह पहली बैठक थी जिसमें सभी सार्क देशों ने सामूहिक रूप से एक साथ हिस्सा लिया।                  

कॉन्फ्रेंस के लाभ:

  • वर्ष 2014 के बाद विभिन्न कारणों से सार्क सम्मेलनों का आयोजन नहीं किया जा सका था, ऐसे में वीडियो कॉन्फ्रेंस के लिए भारतीय प्रधानमंत्री की इस पहल से संगठन को पुनः एक नई ऊर्जा मिली है। 
  • सार्क देशों की ज्यादातर आबादी के लोग निम्न आय वर्ग के ऐसे समूहों से आते हैं जिन तक पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच नहीं है, ऐसे में संगठन के सामूहिक प्रयासों से एक बड़ी आबादी को Covid-19 से निपटने में सहायता प्रदान की जा सकेगी।
  • सार्क देशों के बीच आपसी सहयोग के माध्यम से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर Covid-19 के नकारात्मक प्रभावों को कुछ सीमा तक कम करने में सहायता प्राप्त होगी। 

स्रोत: द हिंदू


शासन व्यवस्था

वन हेल्थ माॅडल: आवश्यकता

प्रीलिम्स के लिये:

COVID-19, निपाह वायरस, KFD रोग,  वन हेल्थ माॅडल

मेन्स के लिये:

वन हेल्थ माॅडल की आवश्यकता 

चर्चा में क्यों?

COVID- 19 की भयावह स्थिति ने मानव तथा पशुओं (घरेलू एवं जंगली) के स्वास्थ्य के बीच के संबंधों को उजागर किया है, ऐसे में एकीकृत स्वास्थ्य फ्रेमवर्क- जिसे ’वन हेल्थ माॅडल’ (Onehealth Model) के रूप में भी जाना जाता है, को देश में लागू करने का यह उचित समय है।

मुख्य बिंदु: 

  • वर्ष 2018 में ‘निपाह वायरस’ के प्रकोप से निपटने के लिये केरल सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में वन हेल्थ आधारित ‘केरल मॉडल’ का सफलतापूर्वक प्रयोग किया।
  • यद्यपि ‘वन हेल्थ माॅडल’ का विचार हाल ही में सामने आया है, परंतु भारत में ‘क्यासानूर फॉरेस्ट डिज़ीज़’ (Kyasanur Forest Disease- KFD) के कर्नाटक में प्रकोप के समय प्रयोग में लाया जा चुका है।

वन हेल्थ माॅडल:

  • यह एक ऐसा समन्वित माॅडल है जिसमें पर्यावरण स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य तथा मानव स्वास्थ्य का सामूहिक रूप से संरक्षण किया जाता है। 
  • यह मॉडल महामारी विज्ञान पर अनुसंधान, उसके निदान और नियंत्रण के लिये वैश्विक स्तर पर स्वीकृत मॉडल है। 
  • वन हेल्थ मॉडल, रोग नियंत्रण में अंतःविषयक दृष्टिकोण की सुविधा प्रदान करता है ताकि उभरते या मौजूदा ज़ूनोटिक रोगों को नियंत्रित किया जा सके। 
  • इस मॉडल में सटीक परिणामों को प्राप्त के लिये स्वास्थ्य विश्लेषण और डेटा प्रबंधन उपकरण का उपयोग किया जाता है। 
  • वन हेल्थ मॉडल इन सभी मुद्दों को रणनीतिक रूप से संबोधित करेगा और विस्तृत अपडेट प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करेगा।

आवश्यकता:

  • प्राकृतिक पर्यावरण के विनाश, वैश्विक व्यापार में वृद्धि, लोगों द्वारा की जाने वाली अधिक यात्राएँ, औद्योगिक खाद्य उत्पादन प्रणाली आदि ने नवीन रोगजनकों के लिये ‘जानवरों से मनुष्यों’ में पहुँचना संभव बनाया है।
  • वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि वन्यजीव आवासों की क्षति के कारण मनुष्यों में उभरते संक्रामक रोगों के प्रसार में वृद्धि हुई है। ये वन्यजीवों से मनुष्यों में फैलते हैं, जैसे- इबोला, वेस्ट नाइल वायरस, सार्स, मारबर्ग वायरस आदि।

केरल का वन हेल्थ मॉडल:

  • केरल सरकार ने ‘निपाह वायरस’ प्रभावित लोगों की संख्या को 23 पर सीमित कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में वन-हेल्थ आधारित ‘केरल मॉडल’ का सफलतापूर्वक प्रयोग किया।
  • इस सफलता को मज़बूत सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचा, राजनीतिक इच्छाशक्ति, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों, बहु-विषयक टीम आदि के सहयोग से प्राप्त करना संभव हो सका।

कर्नाटक सरकार का प्रयोग:

भारत में वन हेल्थ मॉडल का एक प्रचलित उदाहरण वर्ष 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध में ‘क्यासानूर फॉरेस्ट डिज़ीज़’ (Kyasanur Forest Disease-KFD) से निपटने में देखा गया था।

उस समय रॉकफेलर फाउंडेशन (Rockefeller Foundation), वायरस रिसर्च सेंटर  (बाद में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी) पुणे, विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization- WHO) तथा बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (Bombay Natural History Society) जैसी विभिन्न संस्थाओं/इकाइयों ने एक साथ मिलकर कार्य किया।

इकाई या संस्था 

निभाई गई भूमिका 

रॉकफेलर फाउंडेशन

• योगशाला सुविधाओं सहित वित्तीय और तकनीकी सहायता

वायरस अनुसंधान केंद्र

• संभावित वाहक का पता लगाना, जाँच

WHO

• WHO फंड द्वारा समर्थित ‘बर्ड मैन ऑफ इंडिया’- सलीम अली ने इस बात का खंडन किया कि ‘पार महाद्वीपीय प्रवासी पक्षी इस रोग के रोगजनकों  के प्रसार के लिये ज़िम्मेदार हैं।’

  • इस पार-क्षेत्रीय सहयोग (Cross-Sectoral Collaboration) का आगे बहुत कम प्रयोग देखने को मिला तथा भारत में कई दशकों बाद भी एक वास्तविक ‘वन हेल्थ नीति’ का संचालन करना अभी बाकी है।

अनुमति संबंधी बाधाएँ (Permission Constraints):

  • भारत में वन हेल्थ नीति के निर्माण में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के अलावा अनेक विनियामक संस्थाओं के अधिकारियों से अनुमोदन प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।
  • अनुमति में देरी इन रोगों के प्रति तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करने में बाधा उत्पन्न करती है, इन संस्थाओं में शामिल हैं-  
    • भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research-ICMR) 
    • विदेश मंत्रालय तथा वित्त मंत्रालय (Ministries of External Affairs and Finance)
    • सशस्त्र बलों के महानिदेशालय
    • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority)
    • जानवरों पर नियंत्रण और परीक्षणों के पर्यवेक्षण के लिये समिति (Committee for the Purpose of Control & Supervision of Experiments on Animals)
    • राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण (State Health Authorities)
    • राज्य के वन प्राधिकारी (State Forest Authorities) 
    • जैव विविधता बोर्ड (Biodiversity Board)

सरकार की पहल:

  • भारत सरकार ने हाल ही में जैव विविधता और मानव कल्याण पर राष्ट्रीय मिशन (National Mission on Biodiversity and Human Well-being) शुरू किया है।

जैव विविधता और मानव कल्याण पर राष्ट्रीय मिशन:

  • मिशन का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन एवं संबंधित आपदाओं के प्रभावों को कम करने की दिशा में स्वास्थ्य, आर्थिक विकास, कृषि उत्पादन, आजीविका हेतु उत्पादन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में जैव विविधता विज्ञान एवं मानव कल्याण के बीच अब तक उपेक्षित किये गए संबंध का पता लगाना है।
  • वन हेल्थ इस मिशन का एक घटक है, जिसका उद्देश्य एक स्पष्ट ढाँचे  के माध्यम से मानव स्वास्थ्य एवं जैव विविधता के मध्य संबंध स्थापित करना है। 

आगे की राह:

  • ज़ूनोटिक रोगों से निपटने का भारत के पास अग्रणी ऐतिहासिक अनुभव तथा जैव चिकित्सा अनुसंधान में मज़बूत संस्थागत ढाँचे की उपलब्धता, भारत को उभरते संक्रामक रोगों से निपटने में वैश्विक नेतृत्त्वकर्त्ता बनने का अवसर प्रदान करता है।
  • जिस तेज़ी से रोगजनकों का हाल ही में उभार देखने को मिला है ऐसे में अधिक पारदर्शिता तथा अंतराष्ट्रीय सहयोग युक्त  एक एकीकृत राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के माध्यम से वन हेल्थ माडल पर कार्य करने की तत्काल आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू


शासन व्यवस्था

राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन

प्रीलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन, जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद,  मिशन का प्रमुख केंद्रबिंदु

मेन्स के लिये:

राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में लोकसभा में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Science & Technology) द्वारा राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन (National Biopharma Mission-NBM) से संबंधित सूचना जारी की गई। 

राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन

(National Biopharma Mission-NBM)

  • NBM देश के बायोफार्मास्यूटिकल क्षेत्र के विकास हेतु एक उद्योग-अकादमिक सहयोग मिशन (Industry-Academia Collaborative Mission) है।
  • इस मिशन के तहत सरकार ने बायोफार्मास्यूटिकल क्षेत्र में उद्यमिता और स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देने हेतु एक सक्षम तंत्र बनाने के लिये नवाचार-3 (i3) कार्यक्रम प्रारंभ किया है।
  • इस मिशन का कार्यान्वयन जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (Biotechnology Industry Research Assistance Council-BIRAC) द्वारा किया जाता है।
  • BIRAC एक ‘प्रोग्राम मैनेजमेंट यूनिट (Program Management Unit-PMU)’ के माध्यम से इस मिशन का संचालन करती है।
  • मिशन की गतिविधियों का निरीक्षण जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology-DBT) के सचिव की अध्यक्षता वाली अंतर-मंत्रालय संचालन समिति द्वारा किया जाता है।
  • तकनीकी सलाहकार समूह (Technical Advisory Group-TAG) वैज्ञानिक प्रगति की स्वीकृति के साथ ही उसकी समीक्षा करता है।
  • मिशन का प्रमुख केंद्रबिंदु:
    • किफायती उत्पादों का विकास:
      • सार्वजनिक और निजी संस्थानों, शोधकर्त्ताओं, स्टार्टअप कंपनियों तथा उद्यमियों की मदद से भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य ज़रूरतों की पूर्ति करने हेतु सस्ते एवं सुलभ बायोफार्मास्यूटिकल (टीका, बायोसिमिलर्स-Biosimilars और चिकित्सा संबंधी उपकरण) का विकास करना।
      • हैजा, इन्फ्लूएंज़ा, डेंगू, चिकनगुनिया और न्यूमोकोकल बीमारी हेतु टीके का विकास करना।
      • मधुमेह, सोरायसिस, आपातकालीन स्थिति और ऑन्कोलॉजी हेतु बायोसिमिलर्स उत्पाद का विकास करना।
      • डायलिसिस, एमआरआई और आणविक जीवविज्ञान उपकरणों के लिये मेडटेक उपकरण (MedTech Devices)  का विकास करना।
    • साझा बुनियादी ढाँचे की स्थापना और उसे मज़बूती प्रदान करना:
      • मौजूदा साझा बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करना।
      • तकनीकी विकास हेतु सहभागिता को बढ़ावा देना।
      • साझा बुनियादी ढाँचे का अभ्युत्थान एवं उसे उत्पाद की खोज एवं विनिर्माण के केंद्र के रूप में स्थापित करना।
      • 15 साझा बुनियादी ढाँचों का वित्तपोषण किया गया है, जो इस प्रकार हैं-
        • बायोफार्मास्यूटिकल विकास- 7
        • मेडटेक उपकरण- 6
        • टीकाकरण- 2
    • ज्ञान और प्रबंधन कौशल को मज़बूत करना:
      • इस मिशन का उद्देश्य मौजूदा एवं अगली पीढ़ी में अनुशासनात्मक कौशल का विकास करना है।
      • उत्पाद विकास, बौद्धिक संपदा पंजीकरण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और नियामक मानकों जैसे क्षेत्रों में उत्पाद के विकास हेतु नई जैव प्रौद्योगिकी कंपनियों को महत्त्वपूर्ण कौशल के लिये विशिष्ट प्रशिक्षण प्रदान करना भी इस मिशन का प्रमुख उद्देश्य है।
    • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का विकास करना:
      • टेक्नोलॉजी हस्तांतरण कार्यालयों की स्थापना करना।
      • टेक्नोलॉजी हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा के प्रबंधन हेतु प्रशिक्षण देना।
      • टेक्नोलॉजी के अधिग्रहण हेतु सहायता प्रदान करना।
      • शैक्षणिक क्षेत्र संबंधी उद्योगों को बढ़ाने में मदद करना एवं टेक्नोलॉजी के माध्यम से उत्पादों के विकास हेतु शिक्षाविदों, नवप्रवर्तकों और उद्यमियों को अवसर प्रदान करना।

जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद

(Biotechnology Industry Research Assistance Council-BIRAC)

  • BIRAC एक सार्वजनिक क्षेत्र का उद्यम है, जिसे जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology-DBT) द्वारा स्थापित किया गया है।
  • इसका उद्देश्य रणनीतिक अनुसंधान और नवाचार से उभरते बायोटेक उद्यम को मजबूत और सशक्त बनाना है।

स्रोत: पी.आई.बी.


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

यकृत के कार्यों को विनियमित करने में ग्लूकोज़ की भूमिका

प्रीलिम्स के लिये:

ग्लूकोज़, यकृत, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च

मेन्स के लिये:

यकृत के कार्यों को विनियमित करने में ग्लूकोज़ की भूमिका

चर्चा में क्यों?

हाल ही में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (Tata Institute of Fundamental Research- TIFR) के शोधकर्त्ताओं द्वारा किये गए एक अध्ययन में यकृत के कार्यों को विनियमित करने में ग्लूकोज़़ की भूमिका के बारे में बताया गया है। 

मुख्य बिंदु:

  • इस रिपोर्ट में SIRT1 नामक एक एंजाइम के बारे में चर्चा की गई है जिसे यकृत की गतिविधियों के विनियमन और आयु बढ़ने के एक कारण के रूप में देखा जाता है और इसलिये यह चिकित्साशास्त्र में शोध का केंद्र बन गया है

क्या है अध्ययन?

  • टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के शोधकर्त्ताओं द्वारा किये गए इस अध्ययन से पता चलता है कि ग्लूकोज़ सीधे  SIRT1 के कार्य को नियंत्रित करता है।
  • SIRT1 की कमी या अनुपस्थिति मधुमेह जैसी स्थिति पैदा कर सकती है, जबकि SIRT1 का अत्यधिक और निरंतर घटता हुआ स्तर मोटापा और बढ़ती उम्र का कारण बन सकता है
  • शोधकर्त्ताओं ने पाया है कि ग्लूकोज़ SIRT1  नामक प्रोटीन के कार्यों को नियंत्रित करता है जो बदले में प्रतिदिन फ़ीड-फास्ट साइकल (Feed-Fast cycle) को बनाए रखता है और दीर्घायु होने से भी जुड़ा हुआ है
  • सामान्यतः स्वस्थ व्यक्तियों में SIRT1 प्रोटीन के स्तर को उपवास के दौरान बढ़ने और खाने के दौरान कम होने के लिये जाना जाता है, जो ग्लूकोज़ और वसा चयापचय के बीच संतुलन बनाए रखने के लिये आवश्यक होता है

ग्लूकोज़़:

  • ग्लूकोज़़ सरल शर्करा श्रेणी का एक कार्बोहाइड्रेट है, जिसका रासायनिक सूत्र C6H12O6 है। 
  • यह एक मोनोसैकराइड (सरल कार्बोहाइड्रेट) है, जिसमें एक CHO ग्रुप (Aldehyde Group) का अणु भी होता है, इसी कारण इसे एल्डेहेक्सोज़ (Aldehexose) भी कहा जाता है।
  • ग्लूकोज़़ का प्रयोग हर जीवित प्राणी उर्जा के प्रमुख स्रोत के रूप में करता है। बैक्टीरिया से इंसानों तक हर प्राणी वायवीय श्वसन (Aerobic  Respiration) , अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration) या किण्वन (Fermentation) (बैक्टीरिया इस प्रक्रिया द्वारा ऊर्जा प्राप्त करते हैं) का उपयोग कर ग्लूकोज़़ से ऊर्जा निर्मित करके इससे अपने दैनंदिनी कार्यों को करते हैं।
  • मानव शरीर में ग्लूकोज़़ की मात्रा का नियंत्रण इंसुलिन द्वारा किया जाता है।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च:

  • 'टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान' की स्थापना भारत के ख्याति प्राप्त परमाणु वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने की थी। 
  • इस संस्थान की स्थापना 1 जून, 1945 को सर दोराबजी टाटा न्यास की सहायता से की गई। 
  • इस संस्थान ने सर्वप्रथम भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलूरू के कैंपस में ब्रह्मांड किरण  के क्षेत्र में कार्य करना प्रारंभ किया था। तत्पश्चात् वर्ष 1945 में ही अक्तूबर माह में  संस्थान को मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया।
  • वर्ष 1955-1956 में भारत सरकार, मुंबई सरकार व सर दोराबजी टाटा न्यास के मध्य एक ‘त्रिपक्षीय समझौता' हुआ।
  • इस समझौते के अनुसार संस्थान को भारत सरकार से बड़ी वित्तीय सहायता प्राप्त हुई व प्रबंध परिषद में सरकार का अधिक स्थायी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ।
  • 1960 के दशक में संस्थान ने अपने कार्य क्षेत्र का विस्तार करते हुए आण्विक जैव विज्ञान समूह (Molecular Biology Group) व रेडियो खगोल विज्ञान समूह (Radio Astronomy Group) प्रारंभ किया। 
  • अल्प तापमान सुविधा केंद्र व अर्द्धचालक समूह (A low Temperature Facility and a Semi Conductor Group) ने भी इसी समय अपना कार्य प्रारंभ किया। 
  • वर्ष 1964 में मूल दंत अनुसंधान समूह (Basic Dental Research Group) ने कार्य करना प्रारंभ किया, जो बाद में बंद हो गया। 
  • 1970 के दशक में संस्थान ने अपने कार्य क्षेत्र में सैद्धांतिक खगोल भौतिकी व होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केंद्र को शामिल किया। 
  • अगले दो दशकों में संस्थान ने अपने कार्य क्षेत्र को और अधिक विस्तृत रूप देकर नए राष्ट्रीय केंद्रों की स्थापना की। 
  • इन केंद्रों में पुणे में 'राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र', (The National Centre for Radio Astrophysics) बंगलूरु में 'अनुप्रयोज्य गणित केंद्र', (The Centre for Applicable Mathematics) बंगलूरु में 'राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र' (The National Centre for Biological Sciences) शामिल हैं। 
  • इस संस्थान का नवीनतम राष्ट्रीय केंद्र 'अंतर्राष्ट्रीय सैद्धांतिक विज्ञान केंद्र' (International Centre for Theoretical Sciences) है, जिसकी स्थापना वर्ष 2007 में हुई। 
  • TIFR का कार्य तीन स्कूलों के अंतर्गत किया जाता है-
    • गणित स्कूल
    • प्राकृतिक विज्ञान स्कूल
    • प्रौद्योगिकी एवं कंप्यूटर साइंस स्कूल
  • TIFR को वर्ष 2003 में मानद विश्वविद्यालय की मान्यता प्रदान की गई थी।

स्रोत- द हिंदू


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

लैब में RBCs का सृजन

प्रीलिम्स के लिये:

हेमटोपोइएटिक स्टेम, ब्लड सेल  

मेन्स के लिये:

ब्लड बैंक 

चर्चा में क्यों?

भारतीय शोधकर्त्ताओं की टीम ने एक ऐसी प्रक्रिया की खोज की है जो ‘हेमटोपोइएटिक स्टेम सेल’ (Haematopoietic Stem Cells- HSCs) से लाल कणिकाओं (Red Blood Cells- RBCs) का उत्पादन शरीर के बाहर प्रयोगशाला (इन विट्रो ) में करने को गति प्रदान करेगी।

मुख्य बिंदु:

  • खोजी गई प्रक्रिया, एनीमिया, प्रत्यारोपण सर्जरी, गर्भावस्था से संबंधित जटिलता, रक्त कैंसर आदि समस्याओं के उपचार में RBCs के आधान (Transfusion) की प्रक्रिया में सहायक होगी।

आवश्यकता:

  • ब्लड बैंकों को विशेष रूप से विकासशील देशों में अक्सर रक्त तथा उनके घटक यथा- लाल रक्त कणिकाओं की कमी का सामना करना पड़ता है।
  • विभिन्न समूह HSCs से प्रयोगशाला में RBCs का उत्पादन करने में सक्षम हैं, हालाँकि इस प्रक्रिया में लगभग 21 दिन लगते हैं।
    • गर्भनाल के रक्त में हेमटोपोइएटिक स्टेम सेल नामक विशेष कोशिकाएँ होती हैं जिनका उपयोग कुछ रोगों के उपचार के लिये किया जा सकता है।
    • हेमटोपोइएटिक स्टेम कोशिकाएँ विभिन्न प्रकार की रक्त कोशिकाओं के निर्माण में समर्थ होती हैं। 
  • प्रयोगशाला में कोशिकाओं को विकसित करने में अधिक समय लगने के कारण काफी मात्रा में संसाधनों की आवश्यकता होती है। 

खोजी गई प्रक्रिया:

  • प्रयोगशाला में हेमटोपोइएटिक स्टेम सेल से RBCs निर्माण प्रक्रिया को `ट्रांसफॉर्मिंग ग्रोथ फैक्टर’ β1 (TGF- β1) नामक एक छोटे प्रोटीन अणु की बहुत कम सांद्रता तथा एरिथ्रोपोइटिन (Erythropoietin- EPO) प्रोटीन को मिलाकर तेज़ किया जा सकता है एवं  इस प्रक्रिया से RBCs निर्माण में 18 दिन लगते हैं। 

rbcs

प्रकिया का महत्त्व:

  • सामान्यत: HSCs प्रक्रिया जिसमें एरिथ्रोपोइटिन का उपयोग किया जाता है, में RBCs के निर्माण में 21 दिन लगते हैं।
  • भारतीय शोधकर्त्ताओं ने पाया है कि EPO के साथ TGFβ1के जुड़ने से RBCs के निर्माण समय में तीन दिन की कमी आई है।

रक्त (Blood)

  • यह एक तरल संयोजी ऊतक होता है जिसमें प्लाज़्मा, रक्त कणिकाएँ तथा प्लेटलेट्स होते हैं। 
  • यह शरीर की विभिन्न कोशिकाओं तथा उतकों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्त्वों का संचरण करने में मदद करता है। 
  • रक्त कोशिकाओं के प्रमुख प्रकारों में शामिल हैं:

लाल रक्त कणिकाएँ (RBCs):

  • इनको एरिथ्रोसाइट (Erythrocyte) भी कहा जाता है। RBCs का रंग आयरन युक्त प्रोटीन, हीमोग्लोबिन के कारण लाल होता है।

सफेद रक्त कणिकाएँ (WBCs):

  • WBC को ल्यूकोसाइट (Leucocyte) भी कहा जाता है। ये हीमोग्लोबिन से रहित होने के कारण रंगहीन होती हैं।

स्रोत: PIB


जीव विज्ञान और पर्यावरण

पारिस्थितिक तंत्र पुनर्बहाली पर यूएन दशक: रणनीति

प्रीलिम्स के लिये:

UN दशक 2021-30 

मेन्स के लिये:

पारिस्थितिक तंत्र पुनर्बहाली हेतु रणनीति 

चर्चा में क्यों?

हाल में संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्बहाली पर संयुक्त राष्ट्र दशक’ 2021-30 में व्यापक राजनीतिक समर्थन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान एवं वित्तीय सहायता में वैश्विक सहयोग की उम्मीद जाहिर की है। 

मुख्य बिंदु:

  • मार्च 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2021–30 के दशक को ‘पारिस्थितिक तंत्र पुनर्बहाली पर यूएन दशक’ घोषित कियासंयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (United Nations Environment Programme- UNEP) एवं ‘खाद्य और कृषि संगठन’ (Food and Agriculture Organization- FAO) इसके सह-नेतृत्वकर्त्ता हैं।
  • दशक की रणनीति में विज़न, उद्देश्य, संगठनों की भूमिका और ज़िम्मेदारियाँ, सफल पुनर्बहाली का निगरानी तंत्र,  वित्तपोषण के साधन आदि को मार्च 2019 और जनवरी 2020 के बीच 25 से अधिक कार्यशालाओं, बैठकों, सम्मेलनों में विभिन्न हितधारकों के परामर्श से विकसित किया गया।

विज़न (Vision):

  • दशक के लिये एक ऐसे विश्व का निर्माण करना, जहाँ वर्तमान तथा भविष्य में पृथ्वी के सभी जीवों के स्वास्थ्य और कल्याण हेतु मनुष्यों और प्रकृति के बीच संबंधों को बहाल करना तथा स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र के क्षेत्र में वृद्धि करना, पर्यावरण के नुकसान व गिरावट में कमी लाना है।

मुख्य लक्ष्य (Goals):

  • वैश्विक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय प्रतिबद्धताओं को बढ़ाना ताकि पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण के निरोध, ठहराव तथा उत्क्रमित करने ( Prevent, Halt and Reverse) में मदद मिल सके।
  •  शिक्षा प्रणालियों तथा सभी सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों की निर्णय प्रक्रिया में पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्बहाली की समझ विकसित करना तथा लागू करना।

उठाए जाने वाले कदम:

  • इस विज़न को पूरा करने के लिये संपूर्ण वैश्विक समुदाय के बीच सहयोग की आवश्यकता है। ऐसे में विभिन्न देशों की सरकारों से अपेक्षा की जाती है कि वे पुनर्बहाली प्रयासों को लागू करने के लिये राष्ट्रीय बजट बनाएँ।
  • गैर-सरकारी संगठनों को स्थानीय समुदायों की क्षमता-निर्माण की दिशा में कार्य करना होगा।
  • संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियाँ विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय तथा पुनर्बहाली उपायों को राष्ट्रीय लेखांकन एवं स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने का कार्य करेंगी।
  • शिक्षाविदों से पुनर्बहाली उपायों की निगरानी के लिये ऑन-द-ग्राउंड डेटा एकत्रित करने के लिये रिमोट सेंसिंग आधारित प्रणाली की दिशा में शोध कार्य करने हेतु कहा जाएगा।
  • स्थानीय लोगों, महिलाओं, युवाओं के समूहों तथा नागरिक समाज से व्यापक स्तर पर परामर्श किया जाएगा तथा पारिस्थितिक तंत्र में पुनर्बहाली प्रयासों को ज़मीनी स्तर पर तैयार करके लागू किया जाएगा।
  • अन्य पहलों में स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को बहाल करना, कृषि-पारिस्थितिक प्रणालियों को लागू करना, स्थानीय गैर-सरकारी संगठन बनाना आदि कार्य शामिल होंगे।

स्रोत: द हिंदू


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 16 मार्च, 2020

विश्‍व उपभोक्‍ता अधिकार दिवस

प्रत्येक वर्ष 15 मार्च को विश्‍व उपभोक्‍ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। विश्‍व उपभोक्‍ता अधिकार दिवस संपूर्ण विश्व में उपभोक्‍ताओं के अधिकारों के संरक्षण के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने हेतु मनाया जाता है। इस दिवस की शुरुआत वर्ष 1983 में कंज्यूमर्स इंटरनेशनल (Consumers International) नामक संस्था द्वारा की गई थी। इस दिवस के आयोजन का मुख्य उद्देश्य ग्राहकों को उनके अधिकारों के संदर्भ में जागरूक करना है। सर्वप्रथम उपभोक्‍ता आंदोलन की शुरुआत अमेरिका में रल्प नाडेर द्वारा की गई थी, जिसके परिणामस्‍वरूप 15 मार्च, 1962 को अमेरिकी कांग्रेस में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी द्वारा उपभोक्ता संरक्षण का विधेयक पेश किया गया। अमेरिका के पश्चात् भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1966 में मुंबई से हुई थी। वर्ष 1974 में पुणे में ग्राहक पंचायत की स्थापना के पश्चात् विभिन्न राज्यों में उपभोक्ता कल्याण के लिये संस्थाओं का गठन किया गया और यह आंदोलन तेज़ होता गया जिसके पश्चात् 9 दिसंबर, 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर उपभोक्ता संरक्षण विधेयक प्रस्तुत किया गया। ध्यातव्य है कि भारत में प्रत्येक वर्ष 24 दिसंबर को राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण दिवस मनाया जाता है।

दक्षिण अफ्रीका में राष्‍ट्रीय आपातकाल

दक्षिण अफ्रीका में कोरोनावायरस से पीड़ित लोगों की संख्‍या 61 तक पहुँचने के कारण वहाँ राष्‍ट्रीय आपात की घोषणा की गई है। राष्‍ट्रपति सिरिल रामफोसा (Cyril Ramaphosa) ने राष्‍ट्रीय टेलीविज़न पर लाइव प्रसारण में यह घोषणा की। इसके साथ ही दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय का सबसे बड़ा वार्षिक चैरिटी और सांस्‍कृतिक कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है।  कोरोनावायरस (COVID-19) के कारण देश में राष्‍ट्रीय आपदा घोषित किये जाने की वजह से यह फैसला लिया गया है। COVID-19 वायरस मौजूदा समय में भारत समेत दुनिया भर में स्वास्थ्य और जीवन के लिये गंभीर चुनौती बना है। अब संपूर्ण विश्व में इसका प्रभाव स्पष्ट तौर पर दिखने लगा है। WHO के अनुसार, COVID-19 में CO का तात्पर्य कोरोना से है, जबकि VI विषाणु को, D बीमारी को तथा संख्या 19 वर्ष 2019 (बीमारी के पता चलने का वर्ष) को चिह्नित करता है। 

रणजी ट्रॉफी

वर्ष 2020 में सौराष्ट्र ने रणजी ट्रॉफी का खिताब जीता है। सौराष्ट्र की टीम ने फाइनल मैच की पहली पारी में बंगाल के खिलाफ लीड हासिल की थी जिसके आधार पर सौराष्ट्र को विजेता घोषित किया गया। ध्यातव्य है कि सौराष्ट्र की टीम को पहले नवानगर और पश्चिमी भारत के रूप में जाना जाता था। सौराष्ट्र की टीम ने इससे पूर्व वर्ष 1936-37 और वर्ष 1943-44 में ट्रॉफी जीती थी। वर्ष 1950 में इसका नाम बदलकर सौराष्ट्र कर दिया गया और इसने घरेलू टूर्नामेंट में भाग लेना शुरू कर दिया। रणजी ट्रॉफी भारत की प्रथम श्रेणी घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिता है। यह प्रतियोगिता भारत के क्षेत्रीय (राज्य) क्रिकेट टीमों के बीच आयोजित की जाती है। इस प्रतियोगिता का नाम भारतीय क्रिकेटर रणजीत सिंह के नाम पर रखा गया है जिन्हें रणजी के नाम से भी जाना जाता था। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) की निगरानी में यह प्रतियोगिता पहली बार 1934 में शुरू की गई थी।

बशीर अहमद खान

IAS अधिकारी बशीर अहमद खान को जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल जी.सी. मुर्मू का सलाहकार नियुक्त किया गया है। बशीर अहमद खान 2000 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी हैं और वर्तमान में कश्मीर के संभागीय आयुक्त के पद पर तैनात हैं। इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय में उप सचिव (जम्मू-कश्मीर और लदाख विभाग) आनंदी वेंकटेश्वरन द्वारा यह आदेश जारी किया गया।


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