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दवा प्रतिरोधी तपेदिक का सफल इलाज

  • 16 Mar 2020
  • 7 min read

प्रीलिम्स के लिये:

दवा प्रतिरोधी तपेदिक

मेन्स के लिये:

तपेदिक से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव  

चर्चा में क्यों?

हाल ही में दक्षिण अफ्रीका में दवा प्रतिरोधी तपेदिक (Drug-Resistant TB) के लिये चलाए गए एक प्रायोगिक कार्यक्रम के अंतर्गत 90% मरीज़ों के इलाज में सफलता प्राप्त हुई है।

मुख्य बिंदु:  

  • इस परीक्षण में दक्षिण अफ्रीका के तीन अलग-अलग स्थानों पर ‘निक्स टीबी’ (Nix-TB) नामक एक कार्यक्रम के तहत दवा प्रतिरोधी तपेदिक से ग्रसित 109 लोगों को शामिल किया गया था।
  • इस कार्यक्रम में ‘बहुऔषध-प्रतिरोधक तपेदिक’ (Multidrug-resistant TB or MDR-TB) और ‘व्यापक रूप से दवा प्रतिरोधी तपेदिक’ (Extensively Drug-Resistant TB or XDR-TB) से ग्रसित लोगों को शामिल किया गया था।
  • ‘बहुऔषध-प्रतिरोधक तपेदिक’ (Multidrug-resistant TB or MDR-TB): जब किसी मरीज़ पर तपेदिक के इलाज के लिये उपयोग की जाने वाली दो सबसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक्स काम नहीं करती हैं तो तपेदिक के ऐसे मामलों को MDR-TB के रूप में जाना जाता है।
  • ‘व्यापक रूप से ड्रग प्रतिरोधी तपेदिक’ (Extensively Drug-Resistant TB or XDR-TB): XDR-TB के मामलों में तपेदिक के इलाज के लिये उपयोग की जाने वाली चार सबसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक्स का असर बीमारी पर नहीं होता है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, भारत में वर्ष 2016 तक XDR के मामलों की संख्या लगभग 1,40,000 थी।  
  • इस उपचार के तहत मरीज़ों को 26 हफ़्तों तक तीन दवाएँ {बेडाक्यूलाइन (Bedaquline), प्रेटोमैनिड (Pretomanid) और लिनेज़ोलिड (Linezolid)} दी गईं और अगले 6 माह तक नियमित रूप से उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली गई।    
  • कार्यक्रम में शामिल 109 लोगों में 71 मरीज़ XDR-TB और 38 मरीज़ MDR-TB से पीड़ित थे। 

उपचार के परिणाम:

  • इस कार्यक्रम में शामिल 109 में से 98 (90%) लोगों का सफल उपचार किया गया।
  • इसमें XDR-TB के कुल 71 मरीज़ों में से 63 (89%) और 38 MDR-TB के मरीज़ों में से 35 (92%) का सफल उपचार किया गया। 
  • कार्यक्रम में शामिल 11 अन्य लोगों में से 7 की उपचार के दौरान ही मृत्यु हो गई जबकि 2 मरीज़ों में उपचार के बाद 6 माह के अंदर ही बीमारी के लक्षण पुनः देखे गए।

उपचार में प्रयुक्त दवाओं का दुष्प्रभाव:

  • कार्यक्रम में शामिल 88 ऐसे मरीज़ जिन्हें लिनेज़ोलिड (Linezolid) नामक दवा दी गई, में परिधीय तंत्रिका विकृति (कमज़ोरी, तंत्रिका क्षति के कारण हाथ व पैर दर्द) जैसी समस्याएँ देखी गईं। हालाँकि अधिकांश मामलों में ये लक्षण बहुत हल्के थे। 
  • दो अन्य मरीज़ों में ऑप्टिक न्युरैटिस (Optic Neuritis) और 40 अन्य में एनीमिया के लक्षण पाए गए। 

तपेदिक: 

  • तपेदिक ‘माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस’ नामक बैक्टीरिया से फैलने वाला संक्रामक रोग है। 
  • इस रोग को ‘क्षय रोग’ या ‘राजयक्ष्मा’ के नाम से भी जाना जाता है। 
  • तपेदिक सामान्यतः मनुष्य के फेफड़ों को प्रभावित करता है परंतु पिछले कुछ वर्षों में तपेदिक के ऐसे नए मामले सामने आए, जिनमें फेफड़ों के अलावा अन्य अंग भी टीबी से संक्रमित पाए गए। 
  • 24 मार्च, 1982 को जर्मन सूक्ष्मजीव विज्ञानी रोबर्ट कोच (Robert Koch) ने टीबी के जीवाणु की खोज की थी। 
  • प्रतिवर्ष 24 मार्च को विश्व तपेदिक दिवस मनाया जाता है। 

भारत में XDR-TB के मामले:

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन की द ग्लोबल ट्यूबरक्लोसिस रिपोर्ट (The Global Tuberculosis Report), 2019 के अनुसार, विश्व में तपेदिक और दवा प्रतिरोधी तपेदिक के सर्वाधिक मामले भारत में पाए गए हैं। 
  • एक अन्य आँकड़े के अनुसार, महँगे उपचार के कारण वर्तमान में भारत में मात्र 2.2% मरीज़ों को ही दवा प्रतिरोधी तपेदिक मामलों में सही इलाज मिल पाता है।

TB-Cases

  • भारत सरकार ने वर्ष 2019 में तपेदिक के उपचार के लिये विश्व बैंक से 400 मिलियन डॉलर के एक ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किये थे।
  • इसके साथ ही वर्ष 2016 में देश में बेडाक्यूलाइन (Bedaquline) की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी।

आगे की राह: 

  • ‘निक्स-टीबी’ कार्यक्रम के तहत दवा प्रतिरोधी तपेदिक का सफल उपचार तपेदिक उपचार के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है।
  • इस कार्यक्रम की सफलता के बाद असाध्य माने जाने वाले MDR-TB और XDR-TB के मामलों में इलाज संभव हो सकेगा।
  • भारत सरकार को अन्य देशों और WHO जैसी वैश्विक संस्थाओं के सहयोग देश में तपेदिक के उपचार के लिये शोध को बढ़ावा देना चाहिये।  

निष्कर्ष: 

भारत सरकार को अन्य देशों के सहयोग से प्राप्त होने वाली दवाओं से तपेदिक के कुछ मामलों में उपचार संभव हो सका था, परंतु इस परियोजना का प्रभाव बहुत ही सीमित रहा। तपेदिक के मामलों में उपचार के लिये शोध के साथ-साथ सामुदायिक स्तर जन-जागरूकता, क्षमता विकास और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता पर सुनिश्चित करना बहुत ही आवश्यक है।           


स्रोत: द हिंदू

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