भारतीय अर्थव्यवस्था
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के 10 वर्ष
प्रिलिम्स के लिये: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस, इमीडिएट पेमेंट सर्विस, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, रुपे क्रेडिट कार्ड, JAM ट्रिनिटी
मेन्स के लिये: फिनटेक के माध्यम से डिजिटल अर्थव्यवस्था और वित्तीय समावेशन, शासन में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) की भूमिका
चर्चा में क्यों?
भारत ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के 10 वर्ष पूरे किये हैं, जो वर्ष 2016 में एक प्रारंभिक प्लेटफॉर्म के रूप में शुरू होकर वर्ष 2026 तक एक वैश्विक डिजिटल भुगतान नेता बन गया है। इसने भारत को ‘कतार से लेकर क्यूआर कोड (क्विक रिस्पांस कोड) तक’ की ओर अग्रसर करते हुए देश के डिजिटल वित्तीय ईकोसिस्टम की रीढ़ के रूप में कार्य किया है।
सारांश
- UPI ने पिछले 10 वर्षों में भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को तेज़, कम लागत और समावेशी भुगतान प्रणाली प्रदान कर महत्त्वपूर्ण रूप से परिवर्तित किया है। इसने वित्तीय समावेशन, अर्थव्यवस्था के औपचारिकीकरण और रियल-टाइम डिजिटल लेनदेन में वैश्विक नेतृत्व को बढ़ावा दिया है।
- हालाँकि, साइबर धोखाधड़ी, बाज़ार का अत्यधिक केंद्रीकरण, अवसंरचना पर दबाव और माइक्रो-डेट जोखिम जैसी चुनौतियाँ विद्यमान हैं, जिनके समाधान के लिये सशक्त नियमन, वित्तीय साक्षरता और सतत ईकोसिस्टम सुधार आवश्यक हैं।
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) क्या है?
- परिचय: UPI इमीडिएट पेमेंट सर्विस (IMPS) का एक उन्नत संस्करण है। यह एक 24×7 वास्तविक समय (real-time) भुगतान प्रणाली है, जो बैंक-से-बैंक, व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) और व्यक्ति-से-व्यापारी (P2M) लेनदेन को सुगम बनाती है।
- डेवलपर: इसे नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा विकसित किया गया है, जो रिटेल भुगतान और निपटान प्रणालियों के संचालन के लिये एक शीर्ष संगठन है। इसकी स्थापना भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारतीय बैंक संघ (IBA) की पहल पर की गई थी।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- इंटरऑपरेबिलिटी: एक ही मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से विभिन्न बैंक खातों तक पहुँच संभव है।
- वर्चुअल पेमेंट एड्रेस (VPA): UPI जटिल बैंक विवरणों को एक सरल और आसानी से याद रखे जाने वाले UPI ID या मोबाइल नंबर से बदल देता है, जिससे लेन-देन टेक्स्ट संदेश भेजने जितना आसान हो जाता है।
- पुश और पुल प्रणाली: यह धन भेजने और धन अनुरोध करने दोनों की सुविधा प्रदान करता है।
- UPI में नवाचार और सुरक्षा संवर्द्धन:
- UPI 2.0: NPCI द्वारा वर्ष 2018 में लॉन्च किया गया यह संस्करण उन्नत सुविधाएँ प्रदान करता है, जैसे- वन-टाइम मैंडेट (पूर्व-अनुमोदन), इनवॉइस-इन-द-इनबॉक्स (लेन-देन से पहले बिल सत्यापन) तथा साइन किये गए इंटेंट/QR कोड, जो सुरक्षा को और दृढ़ बनाते हैं।
- BHIM (भारत इंटरफेस फॉर मनी): यह NPCI द्वारा विकसित एक मोबाइल भुगतान एप्लिकेशन है, जो उपयोगकर्त्ताओं को UPI के माध्यम से तुरंत धन भेजने और प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करता है।
- उत्पाद विविधीकरण:
- UPI Lite: यह छोटे मूल्य (low-value) के त्वरित ऑफलाइन लेन-देन के लिये डिज़ाइन किया गया है, जिससे मुख्य बैंकिंग प्रणालियों पर भार कम होता है।
- UPI AutoPay: यह आवर्ती भुगतान मैंडेट्स जैसे बिल और सब्सक्रिप्शन को सरल बनाता है तथा इसमें प्रति माह 500 मिलियन से अधिक डेबिट लेन-देन होते हैं।
- UPI पर क्रेडिट सुविधा: यह वंचित वर्गों के लिये पूर्व-अनुमोदित क्रेडिट लाइनों को सक्षम करता है, जिससे अल्पकालिक ऋणों का लोकतंत्रीकरण होता है और ऋण अंतर को कम करने में सहायता मिलती है।
- उन्नत सुरक्षा: बढ़ते साइबर धोखाधड़ी को नियंत्रित करने हेतु भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने डिजिटल भुगतान के लिये दो-कारक प्रमाणीकरण (Two-Factor Authentication - 2FA) को अनिवार्य किया है, जो 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी है।
- यह OTP के साथ-साथ बायोमेट्रिक्स, PIN या सिक्योर टोकन जैसी वेरिफिकेशन लेयर्स जोड़ता है, जिससे विश्वसनीयता में वृद्धि होती है।
- भारत के UPI की वैश्विक उपस्थिति:
- वैश्विक समर्थन: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने UPI को समावेशी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के लिये एक स्वर्ण मानक के रूप में सराहा है।
- अंतर्राष्ट्रीय एकीकरण: UPI अब संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, फ्राँस, मॉरिशस और कतर जैसे देशों में या तो संचालित है या वहाँ की भुगतान प्रणालियों के साथ जुड़ा हुआ है।
- यह भारतीय प्रवासी समुदाय के लिये धन प्रेषण की लागत को कम करने में मदद करता है और भारतीय पर्यटकों हेतु सीमा-पार यात्रा को अधिक सहज एवं सुगम बनाता है।
- कतार/पंक्ति से QR कोड तक:
- नकदी पर निर्भरता से डिजिटल बदलाव (2016–2018): नोटबंदी और सस्ते मोबाइल डेटा के सहयोग से UPI ने अपनी शुरुआती बड़े उपयोगकर्त्ता आधार (critical mass) को प्राप्त किया और मुख्यतः पीयर-टू-पीयर (P2P) लेन-देन के लिये इस्तेमाल होने लगा।
- व्यापारी क्रांति (2019–22): लाखों खुदरा स्थानों पर इंटरऑपरेबल QR कोड के व्यापक उपयोग ने पी2एम (व्यक्ति से व्यापारी) लेन-देन में तेज़ी से वृद्धि को बढ़ावा दिया। इस दौरान ज़ीरो MDR नीति ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- वित्तीय समावेशन का विस्तार (2022–24): UPI 123Pay (बिना इंटरनेट वाले फीचर फोन के लिये) और UPI Lite (कम मूल्य के ऑफलाइन लेन-देन हेतु) जैसे नवाचारों की शुरुआत ने इस तकनीक को ग्रामीण भारत तक गहराई से पहुँचाने में मदद की।
- क्रेडिट और वैश्विक विस्तार (2024–26): UPI पर RuPay क्रेडिट कार्ड के एकीकरण ने भुगतान और क्रेडिट के बीच की सीमाओं को धुँधला कर दिया। साथ ही, UPI भारत की "डिजिटल कूटनीति" का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण बनकर उभरा।
भारत में डिजिटल भुगतानों का ऐतिहासिक संदर्भ
- लेन-देन का विकास: भारत की वित्तीय यात्रा वस्तु-विनिमय प्रणाली और सिक्कों से शुरू होकर कागज़ी मुद्रा और चेक तक विकसित हुई।
- प्रारंभिक डिजिटल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वर्ष 2004 में रियल-टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (RTGS) और 2010 में तत्काल भुगतान सेवा (IMPS) की शुरुआत करके डिजिटल भुगतान प्रणाली की शुरुआती आधारशिला रखी।
- हालाँकि IMPS और RTGS ने तेज़ धन हस्तांतरण को संभव बनाया, लेकिन इनमें जटिल विवरण (जैसे– IFSC कोड और बैंक खाता संख्या) की आवश्यकता होती थी और ये मुख्य रूप से पहले से बैंकिंग सुविधा प्राप्त शहरी आबादी तक ही सीमित रहे। एक व्यापक, समावेशी तथा उपयोगकर्त्ता-अनुकूल डिजिटल अवसंरचना का अभाव बना हुआ था।
- JAM ट्रिनिटी ने UPI के लिये आधार तैयार किया: भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति एक बुनियादी ढाँचे पर आधारित है, जिसे JAM ट्रिनिटी (जिसे 2014–15 के आर्थिक सर्वेक्षण में प्रस्तावित किया गया था) कहा जाता है। इस ढाँचे ने नागरिकों को डिजिटल सेवाओं से जुड़ने के लिये संरचनात्मक रूप से तैयार किया:
- जन धन (प्रधानमंत्री जन धन योजना): वर्ष 2014 में शुरू की गई इस योजना ने बड़े पैमाने पर शून्य-शेष खाते खोलने में सक्षम बनाया, जिससे करोड़ों वंचित नागरिकों को औपचारिक बैंकिंग क्षेत्र से जोड़ा गया।
- आधार: इसने एक सुरक्षित, बायोमेट्रिक-आधारित डिजिटल पहचान प्रदान की, जो प्रमाणीकरण और लक्षित सेवाओं के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- मोबाइल कनेक्टिविटी: वहनीय इंटरनेट सेवाओं और स्मार्टफोन के तीव्र विस्तार ने नागरिकों को एक वास्तविक-समय डिजिटल इंटरफेस प्रदान कर सशक्त बनाया।
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): JAM ट्रिनिटी की पहली प्रमुख सफलता DBT के रूप में सामने आई, जिसमें सरकारी सब्सिडी सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पारदर्शी और निर्बाध तरीके से भेजी गई। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल वित्त के प्रति विश्वास बढ़ा तथा UPI अपनाने की मज़बूत आधारशिला तैयार हुई।
- इंडिया स्टैक: भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) को और विकसित करते हुए JAM त्रिमूर्ति जैसे बुनियादी पहचान और भुगतान प्रणालियों से आगे बढ़कर एक व्यापक, बहु-क्षेत्रीय “इंडिया स्टैक” का निर्माण किया है, जो इंटरऑपरेबिलिटी, ओपन स्टैंडर्ड्स तथा वैश्विक स्तर पर सुरक्षित और बड़े पैमाने पर जन-उपयोगी डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं पर ज़ोर देता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में UPI का क्या महत्त्व है?
- बड़े पैमाने पर वित्तीय समावेशन: पारंपरिक बैंकिंग की जटिलताओं को दूर करके UPI ने लाखों बिना बैंक खाते वाले और कम बैंकिंग सुविधा प्राप्त नागरिकों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ा।
- वर्ष 2021 में 216 बैंकों से बढ़कर जनवरी 2026 तक 691 बैंकों तक पहुँचते हुए यह नेटवर्क एक एकीकृत भुगतान अवसंरचना बन चुका है, जो उपयोगकर्त्ताओं को उनके बैंक या प्लेटफॉर्म की परवाह किये बिना आसानी से लेन-देन करने में सक्षम बनाता है।
- अर्थव्यवस्था का औपचारिकीकरण: डिजिटल लेन-देन के रिकॉर्ड ने ‘सूचना-आधारित संपार्श्विक’ का निर्माण किया है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) तथा छोटे सड़क-व्यापारी अब अपने UPI लेन-देन इतिहास के आधार पर बैंकों से औपचारिक ऋण प्राप्त कर सकते हैं, जिससे उन्हें साहूकारों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
- शासन में लीकेज को रोकना: JAM ट्रिनिटी (जन धन, आधार, मोबाइल) के साथ सहज एकीकरण के माध्यम से UPI ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) को अधिक प्रभावी बनाया है, जिससे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) जैसी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी बिचौलिये के सीधे और तुरंत लाभार्थियों तक पहुँचता है।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के रूप में सॉफ्ट पावर: भारत ने UPI को एक स्केलेबल और ओपन-सोर्स डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के रूप में वैश्विक स्तर पर सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया है, जिससे यह पश्चिमी दुनिया की निजी स्वामित्व वाली भुगतान प्रणालियों (जैसे– Visa/Mastercard) तथा चीन के राज्य-नियंत्रित मॉडलों से अलग एक विशिष्ट पहचान बनाता है।
- उच्च-गति अर्थव्यवस्था: त्वरित निपटान व्यवसायों के लिये नकदी प्रवाह में सुधार करते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में धन के प्रवाह की गति बढ़ती है।
- जनवरी 2026 में अकेले ही UPI ने 21.70 अरब (21.70 बिलियन) लेन-देन संसाधित किये, जो भारत के सभी खुदरा डिजिटल लेन-देन का 81% हिस्सा है।
- इसके अलावा भारत अब वैश्विक रियल-टाइम भुगतान लेन-देन में 49% की विशाल हिस्सेदारी रखता है।
- रुपये का अंतर्राष्ट्रीय: सीमा-पार UPI कनेक्टिविटी रुपये में लेन-देन को बढ़ावा देती है, जिससे डॉलर-प्रधान प्रणालियों पर निर्भरता कम होती है और भारत के मुद्रा अंतर्राष्ट्रीयकरण के प्रयासों को मज़बूती मिलती है।
UPI को लेकर क्या चिंताएँ हैं?
- एकाधिकार जोखिम (डुओपोली रिस्क): UPI ईकोसिस्टम अत्यधिक केंद्रित है, जिसमें दो प्रमुख विदेशी स्वामित्व वाली फिनटेक कंपनियाँ (फोनपे और गूगल पे) 80% से अधिक बाज़ार की हिस्सेदारी रखती हैं।
- NPCI का प्रस्तावित 30% बाज़ार सीमा नियम बार-बार कार्यान्वयन बाधाओं का सामना कर रहा है।
- शून्य MDR दुविधा (ज़ीरो MDR डाइलेमा): सरकार इसे अपनाने को प्रोत्साहित करने के लिये UPI लेनदेन पर शून्य MDR अनिवार्य करती है।
- हालाँकि, भुगतान सेवा प्रदाता (PSP) और बैंक तर्क देते हैं कि यह उन्हें आवश्यक विशाल सर्वर अवसंरचना को उन्नत और बनाए रखने के लिये कोई राजस्व मॉडल नहीं देता है, जिससे पीक आवर्स के दौरान उच्च विफलता दर होती है।
- साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी (साइबरसिक्योरिटी एंड फ्रॉड): बड़े पैमाने पर अपनाने के साथ डिजिटल निरक्षरता (NSSO डेटा से पता चलता है कि शहरों में 66% की तुलना में केवल 24% ग्रामीण परिवारों के पास इंटरनेट की पहुँच है) का भारी शोषण किया गया है।
- फिशिंग, स्क्रीन-शेयरिंग घोटाले और कमज़ोर जनसांख्यिकी को लक्षित करने वाले सोशल इंजीनियरिंग हमलों में वृद्धि हुई है।
- प्रायः दुकानों में व्यापारी के मूल क्यूआर कोड पर कई फर्ज़ी अभिकर्त्ता अपना स्वयं का QR कोड चिपका देते हैं, जिससे भुगतान हाईजैक हो जाता है।
- अवसंरचना तनाव (इन्फ्रास्ट्रक्चर स्ट्रेन): सूक्ष्म-लेनदेन की विशाल मात्रा (जैसे 10 रुपये से कम का भुगतान) पारंपरिक बैंकों की कोर बैंकिंग सिस्टम (CBS) पर भारी दबाव डालती है, जिससे कभी-कभी सिस्टम आउटेज हो जाता है।
- लैंगिक अंतराल: विभिन्न ग्रामीण परिवारों में केवल एक स्मार्टफोन होता है, जो आमतौर पर परिवार के पुरुष मुखिया के नियंत्रण में होता है।
- प्रणालीगत डिजिटल लैंगिक विभाजन का अर्थ है कि UPI द्वारा वित्तीय सशक्तीकरण और स्वतंत्रता असमान रूप से ग्रामीण महिलाओं को नहीं मिल पाती है।
- पेन ऑफ पेइंग का समाप्त होना: पारंपरिक नकद लेनदेन स्वाभाविक रूप से एक मनोवैज्ञानिक "पेन ऑफ पेइंग" उत्पन्न करते हैं, जो अत्यधिक व्यय को रोकता है। UPI की निर्बाध प्रकृति इस मनोवैज्ञानिक बाधा को हटा देती है, जिससे आवेगी खपत होती है।
- UPI से संबंधित ऋण सीमाओं के कारण, एक माइक्रो-डेट ट्रैप का बढ़ता जोखिम, जहाँ युवा और कम आय वाले उपयोगकर्त्ता संचयी ब्याज बोझ का एहसास किये बगैर छोटी, लगातार खरीदारी पर अधिक खर्च कर सकते हैं।
आगे की राह
- अंशांकित MDR कार्यान्वयन: पारिस्थितिक तंत्र की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये RBI और NPCI एक स्तरीय MDR प्रणाली शुरू कर सकते हैं - इसे छोटे व्यापारियों के लिये मुफ्त रखना लेकिन बड़े कॉर्पोरेट खुदरा विक्रेताओं के लिये एक नाममात्र शुल्क लागू करना।
- बाज़ार सीमाओं को लागू करना: एकाधिकार प्रथाओं को रोकने और घरेलू फिनटेक प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देने के लिये 30% बाज़ार हिस्सेदारी की सीमा को लागू करने के लिये सख्त नियामक निगरानी की आवश्यकता है।
- वित्तीय साक्षरता बढ़ाना: एक राष्ट्रव्यापी, निरंतर डिजिटल साक्षरता अभियान आवश्यक है, जो केवल अपनाने के बजाय साइबर सुरक्षा संबंधी स्वच्छता पर केंद्रित हो।
- कोर बैंकिंग को उन्नत करना: बैंकों को अगले दशक में लेनदेन की अनुमानित तेज़ी से वृद्धि को सँभालने के लिये क्लाउड-नेटिव, स्केलेबल IT अवसंरचना में आक्रामक रूप से निवेश करना चाहिये।
निष्कर्ष
UPI ने बैंक वाले और बिना बैंक वाले के बीच के अंतर को समाप्त कर दिया है, जिससे संपूर्ण भारत में तीव्र, सरल और समावेशी डिजिटल लेनदेन संभव हो पाए हैं। एक स्वदेशी नवाचार से वैश्विक मानक बनकर इसने देश को कैश-कतारों से क्यूआर-आधारित भुगतानों में बदल दिया है, जो पारदर्शिता, वित्तीय समावेशन और आर्थिक प्रगति को चला रहा है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) अब केवल एक भुगतान तंत्र नहीं है, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) है जो भारत के आर्थिक औपचारिकीकरण को चला रहा है।" चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. UPI क्या है?
NPCI द्वारा P2P और P2M लेनदेन के लिये विकसित एक वास्तविक समय, अंतर-संचालनीय डिजिटल भुगतान प्रणाली।
2. JAM ट्रिनिटी क्या है?
जन धन, आधार और मोबाइल का एकीकरण जो वित्तीय समावेशन और DBT वितरण को सक्षम बनाता है।
3. UPI वित्तीय समावेशन को कैसे बढ़ावा देता है?
यह कम लागत, त्वरित लेनदेन को सक्षम बनाता है, जिससे अनबैंक्ड आबादी को औपचारिक प्रणाली में लाया जाता है।
4. शून्य MDR मुद्दा क्या है?
UPI भुगतान पर कोई लेनदेन शुल्क नहीं, जो बैंकों और PSP के लिये स्थिरता संबंधी चिंताएँ उत्पन्न करता है।
5. UPI में माइक्रो-डेट ट्रैप जोखिम क्या है?
UPI के माध्यम से ऋण की आसान पहुँच अत्यधिक उधारी और छिपे हुए ब्याज बोझ को जन्म दे सकती है, विशेष रूप से युवाओं और कम आय वाले उपयोगकर्त्ताओं के बीच।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. डिजिटल भुगतान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- भीम (BHIM) ऐप उपयोग करने वाले के लिये यह ऐप यूपीआई (UPI) सक्षम बैंक खाते से किसी को धन का हस्तांतरण करना संभव बनाता है।
- जहाँ एक चिप-पिन डेबिट कार्ड में प्रमाणीकरण के चार घटक होते हैं, भीम ऐप में प्रमाणीकरण के सिर्फ दो घटक होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (a)
प्रश्न 2. 'एकीकृत भुगतान अंतरापृष्ठ' (यूनिफाइड पेमेंट्स इन्टरफेस/UPI) को कार्यान्वित करने से निम्नलिखित में से किसके होने की सर्वाधिक संभाव्यता है? (2017)
(a) ऑनलाइन भुगतानों के लिये मोबाइल वाॅलेट आवश्यक नहीं होंगे ।
(b) लगभग दो दशकों में पूरी तरह भौतिक मुद्रा का स्थान डिजिटल मुद्रा ले लेगी ।
(c) FDI अंतर्वाह में भारी वृद्धि होगी ।
(d) निर्धन व्यक्तियों को उपदानों (सब्सिडीज़) का प्रत्यक्ष अंतरण (डाइरेक्ट ट्रांसफर) बहुत प्रभावकारी हो जाएगा।
उत्तर: (a)
प्रश्न 3. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)
- भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया/NPCI) देश में वित्तीय समावेशन के संवर्द्धन में सहायता करता है।
- NPCI ने एक कार्ड भुगतान स्कीम RuPay प्रारंभ की है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (c)
मेन्स:
प्रश्न. प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY) बैंकरहितों को संस्थागत वित्त में लाने के लिये आवश्यक है। क्या आप सहमत हैं कि इससे भारतीय समाज के गरीब तबके के लोगों का वित्तीय समावेश होगा? अपने मत की पुष्टि के लिये तर्क प्रस्तुत कीजिये। (2016)
सामाजिक न्याय
भारत में मातृ स्वास्थ्य देखभाल
प्रिलिम्स के लिये: विश्व स्वास्थ्य संगठन, मातृ मृत्यु अनुपात, SDG लक्ष्य 3.1, स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र, एनीमिया
मेन्स के लिये: मातृ मृत्यु और SDG 3.1 लक्ष्य, सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना और शासन संबंधी चुनौतियाँ, स्वास्थ्य परिणामों में सामाजिक निर्धारकों की भूमिका
चर्चा में क्यों?
द लैंसेट ऑब्स्टेट्रिक्स, गायनेकोलॉजी एंड विमेंस हेल्थ में एक अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि यद्यपि भारत ने वर्ष 1990 के बाद से मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी की है, वर्ष 2015 के बाद प्रगति धीमी हो गई है, जो मातृ स्वास्थ्य देखभाल में अंतराल संबंधी व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर चिंता उत्पन्न करती है।
सारांश
- भारत में मातृ मृत्यु दर (MMR) में महत्त्वपूर्ण गिरावट के बावज़ूद वर्ष 2015 के बाद प्रगति धीमी हो गई है, जिसमें क्षेत्रीय असमानताएँ अभी भी प्रमुख चुनौतियाँ पेश कर रही हैं।
- SDG लक्ष्य 3.1 को प्राप्त करने के लिये स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता,दाई, बुनियादी ढाँचे (Mid Wifery) को मज़बूत करना और एनीमिया तथा कम उम्र में विवाह जैसे सामाजिक निर्धारकों को संबोधित करना आवश्यक है।
मातृ स्वास्थ्य देखभाल पर किये गए अध्ययन के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- प्रगति में कमी और लगातार बोझ: यद्यपि मातृ मृत्यु दर 1990 के स्तर की एक-पाँचवीं रह गई है, वर्ष 2015 के बाद से प्रगति चिंताजनक रूप से धीमी हो गई है।
- भारत में अभी भी वैश्विक मातृ मृत्यु का दसवाँ हिस्सा पाया गया है, जिसमें रक्तस्राव, संक्रमण और रक्तचाप संबंधी विकार जैसे रोकथाम योग्य पहलू प्रमुख पहलू बने हुए हैं।
- SDG संबंधी चुनौती और क्षेत्रीय असमानताएँ: वर्ष 2030 तक मातृ मृत्यु दर को प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर 70 मौतों तक कम करने के सतत विकास लक्ष्य (SDG) 3.1 को पूरा करना गंभीर क्षेत्रीय असंतुलनों से बाधित है।
- हालाँकि केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने 70 से नीचे MMR हासिल कर लिया है, अन्य राज्य, जैसे– असम (195), मध्य प्रदेश (173), उत्तर प्रदेश (167) और बिहार (118), राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं, जो मातृ स्वास्थ्य देखभाल में क्षेत्रीय असमानताओं को दर्शाता है।
- महामारी का प्रभाव: कोविड-19 ने व्यवस्था की कमज़ोरी को उजागर किया, जिसमें फ्रंटलाइन कर्मियों को हटा दिया गया और आवश्यक प्रसवपूर्व दौरे एवं संस्थागत प्रसव में देरी की।
- स्वास्थ्य देखभाल बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करना: अध्ययन प्राथमिक एवं माध्यमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों को मज़बूत करने की दिशा में एक निर्णायक बदलाव की आवश्यकता पर बल देता है।
- यह भी प्रकाश डालता है कि अकेले चिकित्सा बुनियादी ढाँचे का विस्तार करना तब तक अपर्याप्त होगा जब तक कि स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया जाता है।
मातृ मृत्यु दर
- मातृ मृत्यु दर: इसे गर्भावस्था के दौरान या गर्भावस्था की समाप्ति के 42 दिनों के भीतर एक महिला की मृत्यु के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो गर्भावस्था या उसके प्रबंधन से संबंधित या बढ़े हुए किसी भी कारण से होती है, जिसमें आकस्मिक कारणों को शामिल नहीं किया जाता है। यह प्रसव से जुड़े जोखिमों को मापने वाला एक प्रमुख स्वास्थ्य संकेतक है।
- वैश्विक स्तर पर, 2023 में, लगभग 2,60,000 महिलाओं की मृत्यु गर्भावस्था के दौरान या उसके पश्चात् हुई, जो प्रति दिन 700 से अधिक रोकथाम योग्य मातृ मृत्यु (प्रति दो मिनट में एक मृत्यु) के बराबर है।
- मातृ मृत्यु अनुपात (MMR): यह किसी निश्चित समय अवधि में प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु की संख्या है।
- यह गर्भावस्था और प्रसव के दौरान मातृ स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता एवं चिकित्सा सेवाओं तक पहुँच का आकलन करने के लिये उपयोग किया जाने वाला एक प्रमुख संकेतक है।
- भारत का MMR: हालाँकि भारत ने इस मामले में प्रगति की है, जिसमें MMR वर्ष 2000 में 384 से गिरकर वर्ष 2020 में 103 हो गया और आगे चलकर वर्ष 2023 में 80 हो गया, जो 1990 के बाद से 86% की गिरावट को दर्शाता है, जो वैश्विक औसत में होने वाली गिरावट की तुलना में 48% से अधिक है।
भारत में गुणवत्तापूर्ण मातृ स्वास्थ्य देखभाल में बाधा डालने वाली चुनौतियाँ क्या हैं?
- ग्रामीण भारत में मानव संसाधन संकट: ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (RHS) 2021-22 के अनुसार, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) पर विशेषज्ञ डॉक्टरों (सर्जन, प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ, चिकित्सक और शिशु रोग विशेषज्ञ) की लगभग 80% की चिंताजनक कमी है।
- मिडवाइफरी कैडर का कम उपयोग: स्कैंडिनेवियाई देशों या ब्रिटेन के विपरीत, जहाँ कम जोखिम वाले प्रसवों का नेतृत्व मिडवाइव्स करती हैं, भारत की स्वास्थ्य प्रणाली अभी भी अत्यधिक 'डॉक्टर-केंद्रित' बनी हुई है।
- नर्स प्रैक्टिशनर इन मिडवाइफरी (NPM) पहल अभी भी प्रारंभिक चरण में है, जिससे मौजूदा नर्सों पर अत्यधिक कार्यभार पड़ रहा है।
- इंफ्रास्ट्रक्चर और आपूर्ति शृंखला की कमी: कई नामित फर्स्ट रेफरल यूनिट्स (FRUs) में आपातकालीन प्रसूति देखभाल (EmOC) के लिये 24×7 संचालन की तैयारी का अभाव है।
- प्रसव के बाद होने वाला अत्यधिक रक्तस्राव भारत में माताओं की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। इसके बावजूद कई ज़िला या मध्यम स्तर के अस्पतालों में सही तरीके से काम करने वाले और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध ब्लड बैंक या साधारण रक्त भंडारण सुविधाएँ भी नहीं होतीं। नतीजतन मरीज़ों को बड़े शहरों के उन्नत अस्पतालों में ले जाने में देर होती है, जो कई बार जानलेवा साबित होती है।
- जीवनरक्षक और कम लागत वाली दवाओं, जैसे– मैग्नीशियम सल्फेट (एक्लेम्पसिया/दौरे के लिये) और ऑक्सीटोसिन (रक्तस्राव हेतु) की बीच-बीच में होने वाली कमी, अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों की माताओं को स्थिर करने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
- गुणवत्ता बनाम व्यवसायीकरण का अंतर: गुणवत्तापूर्ण देखभाल का अर्थ है उपयुक्त देखभाल। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत में निजी स्वास्थ्य संस्थानों में सिजेरियन डिलीवरी की दर चिंताजनक रूप से 47.4% है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुझाई गई 10–15% की आदर्श दर से कहीं अधिक है।
- अत्यधिक चिकित्सकीकरण के कारण महिलाओं को अनावश्यक सर्जरी के जोखिम, रिकवरी में अधिक समय और जेब से अधिक खर्च का सामना करना पड़ता है।
- स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों की अनदेखी: केवल क्लिनिकल गुणवत्ता उन गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं की भरपाई नहीं कर सकती, जिनका सामना महिलाओं को गर्भवती होने से पहले ही करना पड़ता है।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत में 15–49 वर्ष की 57% महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित हैं। पितृसत्तात्मक पारिवारिक व्यवस्था, जहाँ महिलाएँ अक्सर ‘सबसे अंत में और सबसे कम’ खाती हैं, के कारण दीर्घकालिक कुपोषण बना रहता है, जिससे प्रसव के दौरान होने वाला मामूली रक्तस्राव भी आसानी से जानलेवा बन सकता है।
- कानूनी प्रावधानों के बावजूद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार 20–24 वर्ष आयु वर्ग की 23.3% महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है। किशोरियों का शरीर जैविक रूप से प्रसव के लिये कम तैयार होता है, जिसके कारण सेफालोपेल्विक डिसप्रोपोर्शन (सिर और पेल्विस के आकार में असंतुलन) और लंबे समय तक प्रसव होने की संभावना बढ़ जाती है।
मातृ स्वास्थ्य देखभाल को कौन-से उपाय मज़बूत कर सकते हैं?
- सम्मानजनक मातृत्व देखभाल (RMC) को अपनाना: केवल क्लिनिकल परिणामों से आगे बढ़कर माँ की गरिमा को प्राथमिकता देना। इसमें स्वास्थ्यकर्मियों को ‘सॉफ्ट स्किल्स’ का प्रशिक्षण देना शामिल है, ताकि प्रसूति हिंसा को समाप्त किया जा सके, प्रसव के दौरान गोपनीयता सुनिश्चित की जा सके और महिला की पसंद के अनुसार ‘बर्थ कंपैनियन’ (साथ रहने वाला व्यक्ति) की अनुमति दी जा सके, जो तनाव तथा जटिलताओं को कम करने में सहायक साबित होता है।
- मिडवाइफरी-नेतृत्व वाली देखभाल इकाइयाँ (MLCUs): मिडवाइफरी में नर्स प्रैक्टिशनर्स (NPM) का एक समर्पित वर्ग स्थापित करना। मिडवाइफरी कम जोखिम वाले प्राकृतिक प्रसव को सँभाल सकती हैं, जिससे तृतीयक अस्पतालों पर दबाव कम होता है और अनावश्यक सिजेरियन ऑपरेशनों की ‘महामारी’ में भी कमी आती है।
- रक्त भंडारण और परिवहन: रक्त बैंकों के लिये ‘हब एंड स्पोक’ मॉडल का विस्तार।
- हर अधिक प्रसव-भार वाली स्वास्थ्य सुविधा में प्रसवोत्तर रक्तस्राव (PPH) का ‘गोल्डन आवर’ के भीतर उपचार करने के लिये एक कार्यशील रक्त भंडारण इकाई होना अनिवार्य है।
- डिजिटल निगरानी: प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के पोर्टलों का उपयोग कर ‘उच्च-जोखिम गर्भावस्था’ (जैसे– गंभीर एनीमिया या उच्च रक्तचाप) की शुरुआती पहचान करना और यह सुनिश्चित करना कि प्रसव से पहले ही उन्हें समय पर विशेषज्ञों के पास भेज दिया जाए।
- मातृ एनीमिया से मुकाबला: एनीमिया मुक्त भारत रणनीति को मज़बूत बनाना, जिसमें आयरन-फोलिक एसिड (IFA) की अनिवार्य खुराक सुनिश्चित करना और उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण, सामुदायिक स्तर पर पोषण संबंधी परामर्श के माध्यम से ‘महिलाएँ सबसे अंत में खाती हैं’ जैसी पारिवारिक प्रवृत्ति को बदलना शामिल है।
- आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं को सशक्त बनाना: इन अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्त्ताओं को बेहतर जाँच उपकरण (जैसे- डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर) प्रदान करना तथा केवल प्रसव ही नहीं, बल्कि प्रसवोत्तर देखभाल की निगरानी के लिये भी उन्हें अधिक प्रोत्साहन देना।
निष्कर्ष
भारत ने मातृ स्वास्थ्य देखभाल में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अंतिम चरण अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। सतत विकास लक्ष्य 3.1 को हासिल करने के लिये बुनियादी ढाँचे से आगे बढ़कर गुणवत्तापूर्ण और समान स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करना होगा, साथ ही महिलाओं की सामाजिक तथा पोषण संबंधी स्थिति में सुधार भी आवश्यक है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. ‘भारत ने मातृ स्वास्थ्य परिणामों में सुधार किया है, फिर भी संरचनात्मक और सामाजिक चुनौतियाँ बनी हुई हैं।’ आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. मातृ मृत्यु दर क्या है?
गर्भावस्था के दौरान या उसके समाप्त होने के 42 दिनों के भीतर, गर्भावस्था से संबंधित कारणों से किसी महिला की मृत्यु — यह एक महत्त्वपूर्ण जन स्वास्थ्य सूचकांक है।
2. मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) क्या है?
मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु की संख्या को दर्शाता है, यह मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को प्रतिबिंबित करता है।
3. मातृ स्वास्थ्य के लिये SDG लक्ष्य क्या है?
सतत विकास लक्ष्य (SDG) 3.1 का उद्देश्य 2030 तक वैश्विक MMR को प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 70 से नीचे लाना है।
4. भारत में मातृ मृत्यु के प्रमुख कारण क्या हैं?
रक्तस्राव, संक्रमण और उच्च रक्तचाप संबंधी विकार प्रमुख रोके जा सकने वाले कारण हैं।
5. सम्मानजनक मातृत्व देखभाल (RMC) क्या है?
सम्मानजनक मातृत्व देखभाल (RMC) प्रसव के दौरान महिलाओं की गरिमा, गोपनीयता, सूचित सहमति और भावनात्मक सहयोग सुनिश्चित करती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. सामाजिक विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के क्रम में, विशेषकर जराचिकित्सा एवं मातृ स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सुदृढ़ और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नीतियों की आवश्यकता है। विवेचन कीजिये। (2020)
