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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत-मलेशिया संबंध

प्रिलिम्स के लिये: भारत-मलेशिया व्यापक रणनीतिक साझेदारी, संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान, कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC), इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, दक्षिण चीन सागर

मेन्स के लिये: सभ्यतागत संबंधों से रणनीतिक साझेदारी तक भारत-मलेशिया संबंधों का विकास, भारत की एक्ट ईस्ट नीति तथा ASEAN की केंद्रीयता

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों?

भारत के प्रधानमंत्री ने मलेशिया की आधिकारिक यात्रा की। इस यात्रा ने भारत-मलेशिया व्यापक रणनीतिक साझेदारी (Comprehensive Strategic Partnership- CSP) की पुनः पुष्टि की तथा उसे क्रियान्वित रूप प्रदान किया। इस दौरान व्यापार, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रक्षा, ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा क्षेत्रीय सहयोग से जुड़े व्यापक समझौते किये गए, जो बदलते क्षेत्रीय एवं वैश्विक परिदृश्य के बीच द्विपक्षीय संबंधों को और दृढ़ करने के स्पष्ट आशय को दर्शाते हैं।

Malaysia

प्रधानमंत्री की मलेशिया यात्रा के प्रमुख परिणाम क्या रहे?

  • डिजिटल एवं फिनटेक: नेताओं ने फिनटेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, ई-गवर्नेंस तथा डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में सहयोग को बढ़ावा देने के लिये मलेशिया-भारत डिजिटल परिषद (Malaysia-India Digital Council- MIDC) को औपचारिक रूप प्रदान किया।
    • उन्होंने कम लागत वाले सीमा-पार डिजिटल भुगतान को सक्षम बनाने, व्यापार सुगमता बढ़ाने तथा आपसी संबंधों (People-to-people ties) को सुदृढ़ करने हेतु NPCI इंटरनेशनल लिमिटेड (NIPL) - PayNet साझेदारी का भी स्वागत किया। साथ ही, इनके बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किये गए।
  • व्यापार एवं वित्त: भारतीय रिज़र्व बैंक और बैंक नेगारा मलेशिया के बीच सहयोग के माध्यम से स्थानीय मुद्रा (INR-MYR) में व्यापार निपटान को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी।
  • ऊर्जा एवं सेमीकंडक्टर सहयोग: नवीकरणीय ऊर्जा तथा हरित हाइड्रोजन में सहयोग का विस्तार करने और अनुसंधान एवं विकास (R&D), कौशल विकास तथा आपूर्ति-शृंखला लचीलापन (Supply-chain Resilience) पर केंद्रित सेमीकंडक्टर मूल्य-शृंखला सहयोग को सुदृढ़ करने पर सहमति हुई।
  • लोक प्रशासन: भारत के केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और मलेशियाई भ्रष्टाचार-निरोधक आयोग (MACC) के बीच भ्रष्टाचार की रोकथाम एवं उससे निपटने पर एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये गए।
  • आपदा प्रबंधन: भारत और मलेशिया के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के बीच आपदा प्रबंधन सहयोग पर एक MoU पर हस्ताक्षर किये गए।
  • संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान: संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सहयोग के नवीनीकरण पर सहमति हुई।
  • शिक्षा एवं कौशल विकास: भारत और मलेशिया ने मलेशिया टेक्निकल कोऑपरेशन प्रोग्राम (MTCP) तथा इंडियन टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन प्रोग्राम (ITEC) के अंतर्गत छात्र और संकाय आदान-प्रदान का विस्तार करने पर सहमति व्यक्त की, साथ ही भारत ने मलेशियाई छात्रों को स्टडी इन इंडिया कार्यक्रम में आमंत्रित किया।
    • उन्होंने भविष्य की आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप कुशल कार्यबल विकसित करने तथा रोज़गार-योग्यता बढ़ाने के लिये तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण (Technical and Vocational Education and Training–TVET) में सहयोग को सुदृढ़ करने की भी प्रतिबद्धता व्यक्त की।
  • स्वास्थ्य सेवा: स्वास्थ्य और पारंपरिक चिकित्सा में सहयोग की पुनः पुष्टि की गई, जिसमें ITEC कार्यक्रम के तहत पारंपरिक भारतीय चिकित्सा विशेषज्ञों को तैनात करने की योजना भी शामिल है।
    • होम्योपैथी में अनुसंधान और प्रशिक्षण को बढ़ावा देने हेतु भारत के केंद्रीय होम्योपैथिक अनुसंधान परिषद और साइबरजया विश्वविद्यालय के बीच MoU का स्वागत किया गया।
  • सामाजिक सुरक्षा: मलेशिया में भारतीय श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा कवरेज प्रदान करने हेतु भारत के कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) और मलेशिया के सोशल सिक्योरिटी ऑर्गनाइज़ेशन के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये गए।
  • सांस्कृतिक संबंध: तमिल अध्ययन को प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु यूनिवर्सिटी ऑफ मलाया में तिरुवल्लुवर चेयर एंड सेंटर के क्रियान्वयन का स्वागत किया गया।
    • तमिल अध्ययन को बढ़ावा देने के लिये, मलेशियाई नागरिकों हेतु तिरुवल्लुवर छात्रवृत्ति (Thiruvalluvar Scholarships) शुरू की गई, जिससे सांस्कृतिक और शैक्षिक संबंध सुदृढ़ होंगे।
    • नेताओं ने मलेशिया में तमिल सिनेमा की लोकप्रियता को स्वीकार किया, विशेष रूप से एम.जी. रामचंद्रन (MGR) की विरासत का उल्लेख करते हुए।
  • कूटनीतिक विस्तार: भारत ने वाणिज्यिक पहुँच और व्यापार को बढ़ावा देने के लिये मलेशिया में नया कांसुलेट जनरल स्थापित करने का निर्णय घोषित किया।
  • वैश्विक गठबंधन: मलेशिया ने औपचारिक रूप से भारत द्वारा नेतृत्वित पहल, इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस (IBCA) में प्रवेश किया।
    • मलेशिया ने भारत की वर्ष 2026 में BRICS अध्यक्षता का स्वागत किया, जबकि भारत ने मलेशिया की BRICS के सहयोगी देश की भूमिका और उसकी सदस्यता की आकांक्षा का समर्थन किया, इस सहयोग को अधिक संतुलित एवं प्रतिनिधिमूलक वैश्विक व्यवस्था की दिशा में उठाया गया एक महत्त्वपूर्ण कदम माना।
    • दोनों नेताओं ने ASEAN की एकता और केंद्रीयता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जिसमें भारत ने वर्ष 2025 में मलेशिया की ASEAN अध्यक्षता की सराहना की।
  • आतंकवाद से सामना: दोनों नेताओं ने सीमापार आतंकवाद सहित आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता दोहराई और इसे रोकने हेतु स्थायी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
    • उन्होंने वर्ष 2024-27 की अवधि के लिये आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक (ADMM)-प्लस विशेषज्ञ कार्य समूह की बैठक (EWG) की भारत-मलेशिया सह-अध्यक्षता का भी स्वागत किया।

भारत-मलेशिया के द्विपक्षीय संबंध कैसे हैं?

  • ऐतिहासिक संबंध: भारत-मलेशिया के संबंध हज़ारों वर्ष पुराने हैं, जो चोल काल (9वीं–13वीं शताब्दी) से संबंध रखते हैं, जब दक्षिण भारत और मलय प्रायद्वीप के बीच व्यापक सामुद्रिक व्यापार हुआ करता था।
    • शासकों जैसे राजराज चोल प्रथम और राजेंद्र चोल द्वितीय के शासनकाल में चोल नौसैन्य शक्ति दक्षिण-पूर्व एशिया तक विस्तृत रही, जिसमें वर्तमान मलेशिया के कुछ हिस्से भी शामिल थे, जिसने भारत–दक्षिण-पूर्व एशिया पारस्परिक संपर्क की प्रारंभिक नींव रखी।
  • आर्थिक साझेदारी: मलेशिया ASEAN में भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2024–25 में USD 19.86 बिलियन तक पहुँच गया।
    • दोनों देश स्थानीय मुद्राओं (INR और रिंगित) में व्यापार को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि US डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके।
    • आर्थिक संबंधों का मार्गदर्शन मलेशिया–भारत समग्र आर्थिक सहयोग समझौता (MICECA) और ASEAN–भारत वस्तु व्यापार समझौता (AITIGA) द्वारा किया जाता है।
  • रक्षा और सुरक्षा: भारत और मलेशिया के संयुक्त सैन्य अभ्यासों में हरिमौ शक्ति (थलसेना), समुद्र लक्ष्मण (नौसेना) और उदारशक्ति (वायुसेना) शामिल हैं।
    • मलेशिया–भारत सुरक्षा संवाद सुरक्षा मामलों में सहयोग और पारस्परिक सहायता पर चर्चा करने का एक मंच है।
    • मलेशिया भारतीय रक्षा प्लेटफॉर्म, जैसे– तेजस LCA और ब्रह्मोस मिसाइल के लिये एक महत्त्वपूर्ण संभावित बाज़ार है।
  • रणनीतिक संगम: मलेशिया भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का एक स्तंभ और इंडो-पैसिफिक ढाँचे में एक महत्त्वपूर्ण सहयोगी है। मलेशिया ASEAN–भारत संबंधों को मार्गदर्शित करने में प्रमुख भूमिका निभाता है।
    • मलेशिया जैसे प्रमुख ASEAN देशों के साथ संबंध मज़बूत करना दक्षिण चीन सागर में नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • प्रवासी समुदाय: मलेशिया में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा भारतीय मूल के व्यक्तियों (PIO) का समुदाय निवास करता है (लगभग 27 लाख), जो मुख्यतः तमिलनाडु से संबंधित है; इसके बाद अमेरिका का स्थान है।

भारत-मलेशिया संबंधों में मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?

  • स्थायी व्यापार घाटा: वित्त वर्ष 2024–25 में द्विपक्षीय व्यापार लगभग USD 20 बिलियन रहा, किंतु यह मलेशिया के पक्ष में असंतुलित था।
    • भारत मुख्यतः उच्च-मूल्य की वस्तुएँ, जैसे– पाम ऑयल, इलेक्ट्रॉनिक्स, क्रूड ऑयल का आयात करता है, जबकि इसके निर्यात (माँस, एल्यूमिनियम, पेट्रोलियम उत्पाद) उस गति से नहीं बढ़ पाए हैं।
  • “पाम ऑयल” की कूटनीति और अस्थिरता: मलेशिया भारत का पाम ऑयल का प्रमुख आपूर्तिकर्त्ता है।
    • इस निर्भरता का कभी-कभी हथियार के रूप में उपयोग भी हुआ है; उदाहरण के लिये, वर्ष 2019–20 में राजनीतिक मतभेदों के कारण भारत ने मलेशियाई पाम ऑयल के आयातों को सीमित किया, जिससे व्यापारिक स्थिरता पर प्रभाव पड़ा।
    • सतत पाम ऑयल उत्पादन पर वैश्विक निगरानी बढ़ने (जैसे– वनों की कटाई के मुद्दे) से भविष्य के व्यापार में जटिलता बढ़ सकती है और भारतीय आयातकों के लिये लागत में वृद्धि हो सकती है।
  • राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौतियाँ: पूर्व मलेशियाई नेताओं की अनुच्छेद 370 और नागरिकता संशोधन अधिनियम पर टिप्पणियों ने द्विपक्षीय संबंधों में तनाव उत्पन्न किया और वर्तमान नेतृत्व के अधिक रचनात्मक रुख के बावजूद संवेदनशीलताएँ बनी हुई हैं।
    • 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में मलेशिया ने भारत पर कश्मीर पर 'आक्रमण करने और कब्ज़ा करने' का आरोप लगाया था।
  • “चीन कारक” और भू-राजनीति: चीन मलेशिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार तथा उसकी अवसंरचना (जैसे-'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के तहत 'ईस्ट कोस्ट रेल लिंक' परियोजना) में एक प्रमुख निवेशक है।
    • दोनों देश नौसैनिक मार्गों की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं, लेकिन मलेशिया दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामकता के प्रति शांतिपूर्ण और कूटनीतिक रुख अपनाता है, जबकि भारत (क्वाड के साथ) बीजिंग के विस्तारवादी कदमों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की समर्थन करता है।

भारत-मलेशिया संबंधों को बेहतर बनाने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

  • रक्षा को एक स्तंभ के रूप में: सैन्य से सैन्य सहयोग को गहरा करना और मलेशिया के लिये विश्वसनीय रक्षा आपूर्तिकर्त्ता बनना क्षेत्र में चीन के प्रभाव के खिलाफ एक रणनीतिक संतुलन के रूप में काम कर सकता है।
  • सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर: तमिल भाषा के प्रति “साझा स्नेह” और नए तिरुवल्लुवर सेंटर का उपयोग करके राज्य स्तर की कूटनीति से परे जन-संपर्क को मज़बूत किया जा सकता है।
  • समुद्री क्षेत्र जागरूकता (MDA): मलेशिया का स्थान महत्त्वपूर्ण मलक्का जलडमरूमध्य के पास होने के कारण (जहाँ से भारत के 60% व्यापार का मार्ग गुज़रता है), भारत को मलेशिया को अपने IFC-IOR (सूचना संलयन केंद्र) नेटवर्क में शामिल करना चाहिये ताकि शत्रुतापूर्ण नौसैनिक गतिविधियों पर वास्तविक समय की खुफिया जानकारी साझा की जा सके।
  • AITIGA समीक्षा को गति देना: वर्तमान व्यापार घाटा एक संरचनात्मक बाधा है। भारत को वर्ष 2026–27 तक आसियान–भारत वस्तु व्यापार समझौता (AITIGA) की समीक्षा को तेज़ी से पूरा करने के लिये प्रयास करना चाहिये, ताकि उत्क्रमी शुल्क संरचनाओं को ठीक किया जा सके, जो भारतीय विनिर्माण को प्रभावित करती हैं।
  • दीर्घकालिक अनुबंध: दोनों देशों को पाम ऑयल के लिये दीर्घकालिक G2G (सरकार-से-सरकार) आयात अनुबंध स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाने चाहिये, जिससे भारत में मूल्य स्थिरता और मलेशिया में मांग की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

निष्कर्ष

भारत–मलेशिया संबंधों का भविष्य केवल लेन-देन (तेल की खरीद) तक सीमित रहने के बजाय रणनीतिक साझेदारी (साथ में चिप्स और जेट बनाना) की ओर बढ़ने में है, जिससे दोनों देश अस्थिर इंडो-पैसिफिक शताब्दी में अपनी स्वायत्तता सुरक्षित कर सकते हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. मज़बूत सभ्यतागत और रणनीतिक संबंधों के बावजूद, भारत-मलेशिया संबंधों को संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) 

1. भारत–मलेशिया समग्र रणनीतिक साझेदारी (CSP) क्या है?
यह एक उच्चस्तरीय द्विपक्षीय ढाँचा है, जिसे वर्ष 2024 में उन्नत किया गया और यह रक्षा, व्यापार, डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा तथा क्षेत्रीय सहयोग को शामिल करता है।

2. भारत की एक्ट ईस्ट नीति में मलेशिया क्यों महत्त्वपूर्ण है?
मलेशिया एक प्रमुख ASEAN साझेदार है, रणनीतिक रूप से मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है और ASEAN–भारत जुड़ाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

3. मलेशिया–भारत डिजिटल काउंसिल (MIDC) का महत्त्व क्या है?
MIDC फिनटेक, एआई, साइबर सुरक्षा और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में सहयोग को संस्थागत रूप देता है, जिससे आर्थिक और जन-संपर्क संबंध मज़बूत होते हैं।

4. भारत–मलेशिया संबंधों में प्रमुख आर्थिक चुनौतियाँ क्या हैं?
स्थायी व्यापार घाटा, पाम ऑयल आयात पर अत्यधिक निर्भरता और भारतीय निर्यातकों के सामने मौजूद गैर-शुल्कीय बाधाएँ।

5. निरंतर बना रहने वाला व्यापार घाटा, पाम ऑयल (ताड़ के तेल) के आयात पर अत्यधिक निर्भरता और भारतीय निर्यातकों द्वारा सामना की जाने वाली गैर-शुल्क बाधाएं (non-tariff barriers)।"

6. चीन कारक भारत–मलेशिया संबंधों को कैसे प्रभावित करता है?
मलेशिया के चीन के साथ गहरे आर्थिक संबंध और दक्षिण चीन सागर में सतर्क रुख भारत के अधिक सशक्त इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण के साथ रणनीतिक असमानता उत्पन्न करते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

मेन्स

प्रश्न. शीतयुद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के संदर्भ में, भारत की पूर्वोन्मुखी नीति के आर्थिक और सामरिक आयामों का मूल्याकंन कीजिये। (2016)


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

अमेरिका और रूस के बीच भारत का संतुलन बनाने का प्रयास

प्रिलिम्स के लिये: ताशकंद घोषणा, महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर पहल, कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट, सामरिक पेट्रोलियम भंडार

मेन्स के लिये: शीतयुद्ध से वर्तमान तक भारत–रूस संबंधों का विकास, भारत–अमेरिका और भारत–रूस व्यापार का तुलनात्मक महत्त्व, आर्थिक दबाव और प्रतिबंधों के युग में रणनीतिक स्वायत्तता

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों? 

अमेरिका का दावा है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते, 2026 के तहत भारत ने “रूसी तेल की खरीद बंद करने पर सहमति” जताई है। इस बयान ने अमेरिका की बढ़ती भू-राजनीतिक और आर्थिक दबावों के बीच रूस के साथ अपनी दीर्घकालिक साझेदारी को संतुलित करने की भारत की रणनीति पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिये हैं।

सारांश

  • रूसी तेल आयात समाप्त करने को लेकर अमेरिका के दावे ने रूस के साथ गहरे रक्षा और ऊर्जा संबंधों तथा अमेरिका की ओर से बढ़ते आर्थिक, व्यापारिक एवं भू-राजनीतिक दबावों के बीच संतुलन साधने की भारत की रणनीतिक दुविधा को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।
  • भारत की प्रतिक्रिया एक व्यावहारिक बहु-संरेखण नीति को दर्शाती है, जिसके तहत रूस से औपचारिक दूरी बनाए बिना ऊर्जा और रक्षा स्रोतों का धीरे-धीरे विविधीकरण किया जा रहा है, साथ ही अमेरिका के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी और इंडो-पैसिफिक साझेदारियों का लाभ उठाया जा रहा है।

भारत और रूस के संबंध कैसे विकसित हुए हैं? 

  • शीतयुद्धकालीन एकजुटता (1950–91): सोवियत संघ ने कश्मीर और गोवा पर भारत की संप्रभुता का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया।
    • सोवियत संघ 1962 के भारत–चीन युद्ध के दौरान तटस्थ रहा और 1965 के भारत–पाकिस्तान युद्ध के बाद ताशकंद घोषणा के माध्यम से सफलतापूर्वक मध्यस्थता की।
    • 1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान अमेरिका–पाकिस्तान–चीन धुरी का सामना करते हुए भारत ने सोवियत संघ के साथ ऐतिहासिक शांति, मैत्री और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किये।
      • इसने भारत को अमेरिकी हस्तक्षेप के विरुद्ध वास्तविक (de-facto) सुरक्षा गारंटी (परमाणु छत्र या न्यूक्लियर अंब्रेला) प्रदान की।
    • सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्त्ता बन गया, जिसने लगभग 70% हथियारों की आपूर्ति की और रुपये–रूबल व्यापार व्यवस्था के माध्यम से भारत का एक प्रमुख आर्थिक साझेदार भी रहा।
  • सोवियत-पश्चात विचलन (1991–99): 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही भारत आर्थिक संकट से गुज़र रहा था।
    • रूस ने पश्चिम की ओर एकीकरण की दिशा में रुख किया और हथियारों पर दी जाने वाली “मैत्रीपूर्ण कीमतें” प्रदान करना बंद कर दिया।
    • भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण (LPG सुधार) किया और अमेरिका तथा इज़राइल के साथ संबंधों में सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए।
  • रणनीतिक साझेदारी का दौर (2000–21): वर्ष 2000 में भारत और रूस के बीच “रणनीतिक साझेदारी की घोषणा” पर हस्ताक्षर किये गए।
    • वर्ष 2010 में दोनों देशों के संबंधों को 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी' के रूप में उन्नत किया गया था।
    • सहयोग केवल खरीदार-विक्रेता रक्षा संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संयुक्त विकास (जैसे– ब्रह्मोस मिसाइल) और ऊर्जा क्षेत्र (साखालिन तेल क्षेत्रों में निवेश) तक बढ़ गया।
  • आर्थिक सहयोग: द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2024–25 में 68.7 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, मुख्य रूप से भारत के ऊर्जा आयात के कारण, लेकिन यह व्यापार रूस के पक्ष में काफी असंतुलित बना रहा।
    • दोनों देशों का लक्ष्य 2030 तक व्यापार को 100 अरब अमेरिकी डॉलर, वर्ष 2025 तक पारस्परिक निवेश को 50 अरब अमेरिकी डॉलर, तक बढ़ाना है।
    • भारत के निर्यात: फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, लोहा और इस्पात, समुद्री उत्पाद।
    • भारत के आयात: कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, सूरजमुखी तेल, उर्वरक, कोकिंग कोयला, कीमती पत्थर और धातुएँ।
  • रक्षा सहयोग: यह साझेदारी की आधारशिला है, जिसे वर्ष 2021-31 के सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है।
    • INDRA और Zapad-2025 जैसे नियमित सैन्य अभ्यास परस्पर संचालन-क्षमता (Interoperability) को सुदृढ़ करते हैं।
  • यूक्रेन युद्ध का प्रभाव: पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते भारत ने रियायती रूसी तेल की खरीद शुरू की, जिससे भारत के आयात में उसकी हिस्सेदारी तीव्रता से बढ़ी और व्यापार रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गया।
    • अमेरिका का तर्क है कि इससे परोक्ष रूप से यूक्रेन युद्ध को वित्तपोषण मिलता है और उसने दंडात्मक शुल्क लगाए थे, जिन्हें हाल में सख्त निगरानी तथा स्नैपबैक क्लॉज़ (Snap-back Clause) के साथ वापस ले लिया गया है।
      • अब अमेरिका, अमेरिकी कच्चे तेल, LNG तथा वेनेज़ुएला के तेल जैसे विकल्पों को आगे बढ़ाकर, भारत के ऊर्जा साझेदार के रूप में रूस का स्थान लेने का प्रयास कर रहा है।

भारत-अमेरिका व्यापार बनाम भारत-रूस व्यापार का महत्त्व क्या है?

  • व्यापार मात्रा में अंतर:
    • भारत-अमेरिका व्यापार: अमेरिका 128 अरब अमेरिकी डॉलर के कुल व्यापार के साथ भारत का सबसे बड़ा बाज़ार है।
      • रूस या चीन के साथ घाटा-प्रधान व्यापार के विपरीत, भारत को अमेरिका के साथ उच्च-मूल्य वस्तुओं के निर्यात तथा बड़े पैमाने पर सेवाओं के निर्यात से प्रेरित उल्लेखनीय व्यापार अधिशेष प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के एक प्रमुख स्रोत के रूप में अमेरिका भारत के स्टार्टअप पारितंत्र और अवसंरचना को सीधे प्रोत्साहित करता है, जिससे ‘वेल्थ मल्टीप्लायर’ (धन गुणक) जैसा प्रभाव उत्पन्न होता है।
      • महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर अमेरिका-भारत पहल (initiative on Critical and Emerging Technology- iCET) के तहत व्यापार वस्तुओं से हटकर रणनीतिक प्रौद्योगिकी की ओर बढ़ रहा है तथा अंतरिक्ष सहयोग 2047 तक विकसित भारत (Developed Nation) बनने के भारत के लक्ष्य के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • भारत-रूस व्यापार: वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 68.72 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचा, किंतु यह अत्यधिक असंतुलित है। भारत ने 63.84 अरब अमेरिकी डॉलर का आयात किया (मुख्यतः तेल), जबकि निर्यात मात्र 4.88 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
      • वर्तमान में रूस के साथ संबंध मुख्यतः लेन-देन आधारित हैं, जिनका केंद्र वस्तुओं (तेल/उर्वरक) की खरीद और पुरानी रक्षा प्रणालियों के स्पेयर पार्ट्स तक सीमित है तथा भारत की नागरिक अर्थव्यवस्था में गहन एकीकरण का अभाव दिखाई देता है।
  • भू-राजनीतिक डेरिवेटिव: 
    • अमेरिका का लाभ: अमेरिका के साथ व्यापार का गहराता संबंध ‘इंडो-पैसिफिक’ रणनीति के अनुरूप है।
      • आर्थिक एकीकरण एक ‘सुरक्षा गारंटी’ के रूप में कार्य करता है, जो अमेरिका के लिये भारत की स्थिरता की रक्षा करने हेतु दाँव (Stakes) को बढ़ाता है, जो चीनी आक्रामकता के विरुद्ध है।
      • जब वैश्विक कंपनियाँ ‘चीन प्लस वन’ रणनीति अपना रही हैं, तब भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत करने के लिये अमेरिका अपरिहार्य हो जाता है।
    • रूस की दुविधा: पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस आर्थिक रूप से चीन पर बढ़ती निर्भरता की स्थिति में पहुँच रहा है।
      • रूस पर निरंतर अत्यधिक निर्भरता भारत की आपूर्ति शृंखलाओं को परोक्ष रूप से चीनी दबाव (Coercion) के जोखिम में डाल सकती है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: अमेरिका-भारत शुल्क के जोखिम ने बाज़ार पहुँच को एक हथियार के रूप में उपयोग करने की अमेरिका की तत्परता को उजागर किया, जिसके चलते भारत रूस पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने के लिये, अधिक लागत के बावजूद, अमेरिकी तथा वेनेज़ुएला के तेल की ओर रुझान बढ़ाने पर विवश हुआ।

वर्तमान भारत-अमेरिका-रूस समीकरण में भारत के लिये चुनौतियाँ क्या हैं?

  • ‘रूस-चीन’ गठबंधन: जो रूस आर्थिक रूप से चीन पर निर्भर होता जा रहा है, वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत के हितों का समर्थन करने या चीन-भारत सीमा संकट के दौरान तटस्थ बने रहने की संभावना कम रखता है।
  • रक्षा एवं सुरक्षा संबंधी संवेदनशीलताएँ: भारत की लगभग 60% सैन्य सूची (Su-30 MKI, T-90 टैंक, S-400 प्रणालियाँ) रूसी मूल की है।
    • भारत-अमेरिका व्यापार बढ़ने के बीच रूस महत्त्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स और रख-रखाव सहायता को प्राथमिकता न दे या उसमें विलंब कर सकता है।
    • ऐतिहासिक रूप से रूस ने संवेदनशील प्रौद्योगिकियाँ (परमाणु पनडुब्बियाँ, हाइपरसोनिक मिसाइलें) साझा की हैं, जिन्हें पश्चिमी देश उपलब्ध नहीं कराते। मॉस्को को पृथक् करना इस द्वार को स्थायी रूप से बंद कर सकता है।
    • रूसी रक्षा उपकरणों पर निर्भरता कम करना रणनीतिक रूप से आवश्यक है, किंतु परिचालन स्तर पर कठिन है, क्योंकि पश्चिमी प्रणालियाँ उच्च लागत वाली, अधिक प्रतिबंधात्मक होती हैं और नए प्रशिक्षण व सिद्धांत की मांग करती हैं, जिससे संवेदनशील सीमा स्थितियों में अल्पकालिक तत्परता पर जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
  • आर्थिक एवं ऊर्जा संबंधी चुनौतियाँ: रूसी तेल किफायती था; जबकि अमेरिकी और वेनेज़ुएला का तेल संभवतः बाज़ार दरों पर मिलेगा।
    • इसके अतिरिक्त, अमेरिका महाद्वीप से आने वाले तेल की मालभाड़ा (Freight) लागत रूस या पश्चिम एशिया की तुलना में कहीं अधिक होती है।
    • भारतीय रिफाइनरियाँ तकनीकी रूप से रूस से यूराल्स ग्रेड के क्रूड ऑयल की विशिष्ट मध्यम‑सल्फर ग्रेड को प्रसंस्कृत करने के लिये अनुकूलित की गई हैं। हालाँकि अमेरिकी लाइट‑स्वीट क्रूड ऑयल या वेनेज़ुएला के हेवी क्रूड ऑयल पर स्थानांतरण के लिये रिफाइनरियों में तकनीकी समायोजन, कुछ समय के लिये उत्पादन‑अवरोध तथा अल्पकालिक दक्षता‑हानि को वहन करना पड़ सकता है।
    • क्रूड ऑयल की हाई लैंडेड कॉस्ट से घरेलू पेट्रोल/डीज़ल के मूल्यों में वृद्धि हो सकती है, जिससे मुद्रास्फीति को बढ़ावा मिलेगा और भारत का चालू खाता घाटा (CAD) और बढ़ सकता है।
  • भारत का ग्लोबल साउथ नेतृत्व: भारत का ग्लोबल साउथ में नेतृत्व का दावा सार्वभौमिकता, सामरिक स्वायत्तता तथा विकास‑केंद्रित कूटनीति के सिद्धांतों पर आधारित है। महाशक्ति‑प्रतिस्पर्द्धा से जुड़े संघर्षों में लंबे समय तक रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखना वैश्विक मंचों पर भारत के मानक‑निर्धारक प्रभाव और नैतिक प्राधिकार को कमज़ोर करने का जोखिम उत्पन्न करता है।

वर्तमान भारत-अमेरिका-रूस की वर्तमान गतिविधियों में संबंधों को संतुलित करने के लिये भारत क्या कदम उठा सकता है?

  • त्वरित रक्षा स्वदेशीकरण: आत्मनिर्भर भारत के तहत SU–30 और T–90 जैसे रूसी मूल के प्लेटफॉर्मों के लिये आवश्यक महत्त्वपूर्ण पुर्ज़ों और गोला‑बारूद के उत्पादन का तीव्र स्थानीयकरण करके सशस्त्र बलों को आपूर्ति‑शृंखला आघातों से सुरक्षित किया जा सकता है।
    • साथ‑साथ, अमेरिका (ड्रोन, जेट इंजन), फ्राँस (लड़ाकू विमान, पनडुब्बियाँ) और इज़राइल (सेंसर सिस्टम) से उच्च प्रौद्योगिकी वाले प्लेटफॉर्मों की खरीद जारी रखकर रूस से संबंधों को क्रमिक रूप से कमज़ोर किया जा सकता है।
    • आगामी दशक में रूसी निर्भरता को 30% से कम स्तर पर लाकर रूस को “एकमात्र आपूर्तिकर्त्ता” से घटाकर “विभिन्न विक्रेताओं में से एक” के रूप में रूपांतरित करने का लक्ष्य रखा जा सकता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: ‘पोर्टफोलियो दृष्टिकोण’: भारत को ऊर्जा सुरक्षा को निवेश पोर्टफोलियो की भाँति मानते हुए विविधीकरण‑आधारित जोखिम‑प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाना चाहिये।
    • पश्चिम अफ्रीका (नाइजीरिया, अंगोला) तथा इराक जैसे आपूर्तिकर्त्ताओं के साथ सक्रिय ऊर्जा‑संबंध बनाए रखकर क्रूड ऑयल के स्रोतों की संतुलित टोकरी सुनिश्चित की जा सकती है।
    • साथ ही अमेरिका जैसे दूरस्थ स्रोतों से आपूर्ति व्यवधानों के विरुद्ध सुरक्षा कवच के रूप में भारत की सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) क्षमता का विस्तार करना आवश्यक है।
  • आर्थिक सुरक्षा: भारत को प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) जैसे भारत–यूरोपीय संघ FTA का विस्तार कर निर्यात‑वृद्धि के लिये केवल अमेरिकी बाज़ार पर निर्भरता कम करनी चाहिये।
    • रुपया आधारित व्यापार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाते हुए ट्रांजेक्शन को इस प्रकार बेहतर किया जा सकता है कि भारतीय बैंक अमेरिकी वित्तीय प्रणाली और प्रतिबंध के जोखिमों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहें।
    • वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के हथियारों का सामना करने हेतु महत्त्वपूर्ण/रणनीतिक क्षेत्रों, जैसे– औषधीय API (सक्रिय औषधीय घटक) और हरित ऊर्जा में घरेलू क्षमता का निर्माण किया जाना आवश्यक है।
  • बहुपक्षवाद का उपयोग: भारत को अपने ग्लोबल साउथ नेतृत्व का उपयोग व्यापक कूटनीतिक समझ उत्पन्न करने के लिये करना चाहिये, ताकि वह किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता न दिखाए।
    • क्वाड की सदस्यता के माध्यम से भारत अमेरिका आदि के साथ मिलकर हिंद–प्रशांत क्षेत्र में चीन की समुद्री आक्रामकता को संतुलित कर सकता है, हालाँकि BRICS मंच पर रूस और अन्य साझेदारों के साथ मिलकर महाद्वीपीय प्रासंगिकता बनाए रखते हुए चीन–रूस धुरी को संतुलित और प्रबंधित करने का प्रयास कर सकता है।

निष्कर्ष 

  • भारत को 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने, रोज़गार सृजित करने तथा इक्कीसवीं सदी की उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुँच बनाने के लिये अमेरिका की आवश्यकता है।
  • वर्तमान में होने वाले परिवर्तनों में ऊर्जा बिलों को नियंत्रित रखने और रक्षा सेनाओं की युद्ध–तत्परता बनाए रखने के लिये भारत को रूस की भी आवश्यकता है, विशेषतः क्रूड ऑयल और रूसी मूल के रक्षा प्लेटफॉर्मों के निरंतर अनुरक्षण के लिये।

अतः भारत की नीति “पक्ष लेने” की नहीं है, बल्कि इन संबंधों को डि-हाइफेनेट करने की है अर्थात आर्थिक समृद्धि के लिये संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संलग्न रहते हुए रणनीतिक सुरक्षा के लिये रूस के साथ कार्यात्मक संबंध बनाए रखना।

दृष्टि मेंस प्रश्न:

प्रश्न.  भारत-अमेरिका और भारत-रूस के व्यापार संबंधों की तुलना कीजिये और भारत की दीर्घकालीन रणनीतिक स्वायत्तता पर उनके प्रभाव का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. भारत ने वर्ष 2022 के बाद रूसी तेल आयात में वृद्धि क्यों की?
पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस को तेल की कीमतों में छूट देनी पड़ी, जिसे भारत ने मुद्रास्फीति नियंत्रण एवं ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु खरीदा।

2. अमेरिका भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने का विरोध क्यों कर रहा है?
अमेरिका का तर्क है कि इससे यूक्रेन युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से वित्तपोषण मिलता है तथा भारत द्वारा परिष्कृत ईंधन निर्यात के माध्यम से एक "रिफाइनिंग लूपहोल" का लाभ उठाया जा रहा है।

3. भारत-अमेरिका व्यापार भारत-रूस व्यापार से अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है?
भारत-अमेरिका व्यापार आकार में वृहद्, विविधीकृत, अधिशेष उत्पन्न करने वाला तथा रोज़गार, प्रौद्योगिकी, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश एवं आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़ा हुआ है।

4. भारत-रूस रक्षा संबंधों में वर्तमान में प्रमुख चुनौती क्या है?
प्रतिबंधों तथा रूस के चीनी रुझान के मध्य रूसी मूल के प्लेटफॉर्मों एवं पुर्ज़ों पर अधिक निर्भरता।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रारंभिक परीक्षा

प्रश्न. हाल ही में भारत ने निम्नलिखित में से किस देश के साथ ‘नाभिकीय क्षेत्र में सहयोग क्षेत्राें के प्राथमिकीकरण और कार्यान्वयन हेतु कार्ययोजना’ नामक सौदे पर हस्ताक्षर किये हैं? (2019)

(a) जापान

(b) रूस

(c) यूनाइटेड किंगडम

(d) संयुक्त राज्य अमेरिका

उत्तर: (b)


मुख्य परीक्षा

प्रश्न. भारत-रूस रक्षा सौदों की तुलना में भारत-अमेरिका रक्षा सौदों के महत्त्व का भारत-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता के संदर्भ में विवेचना कीजिये। (2020)


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