अंतर्राष्ट्रीय संबंध
अमेरिका और रूस के बीच भारत का संतुलन बनाने का प्रयास
- 09 Feb 2026
- 113 min read
प्रिलिम्स के लिये: ताशकंद घोषणा, महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर पहल, कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट, सामरिक पेट्रोलियम भंडार
मेन्स के लिये: शीतयुद्ध से वर्तमान तक भारत–रूस संबंधों का विकास, भारत–अमेरिका और भारत–रूस व्यापार का तुलनात्मक महत्त्व, आर्थिक दबाव और प्रतिबंधों के युग में रणनीतिक स्वायत्तता
चर्चा में क्यों?
अमेरिका का दावा है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते, 2026 के तहत भारत ने “रूसी तेल की खरीद बंद करने पर सहमति” जताई है। इस बयान ने अमेरिका की बढ़ती भू-राजनीतिक और आर्थिक दबावों के बीच रूस के साथ अपनी दीर्घकालिक साझेदारी को संतुलित करने की भारत की रणनीति पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिये हैं।
सारांश
- रूसी तेल आयात समाप्त करने को लेकर अमेरिका के दावे ने रूस के साथ गहरे रक्षा और ऊर्जा संबंधों तथा अमेरिका की ओर से बढ़ते आर्थिक, व्यापारिक एवं भू-राजनीतिक दबावों के बीच संतुलन साधने की भारत की रणनीतिक दुविधा को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।
- भारत की प्रतिक्रिया एक व्यावहारिक बहु-संरेखण नीति को दर्शाती है, जिसके तहत रूस से औपचारिक दूरी बनाए बिना ऊर्जा और रक्षा स्रोतों का धीरे-धीरे विविधीकरण किया जा रहा है, साथ ही अमेरिका के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी और इंडो-पैसिफिक साझेदारियों का लाभ उठाया जा रहा है।
भारत और रूस के संबंध कैसे विकसित हुए हैं?
- शीतयुद्धकालीन एकजुटता (1950–91): सोवियत संघ ने कश्मीर और गोवा पर भारत की संप्रभुता का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया।
- सोवियत संघ 1962 के भारत–चीन युद्ध के दौरान तटस्थ रहा और 1965 के भारत–पाकिस्तान युद्ध के बाद ताशकंद घोषणा के माध्यम से सफलतापूर्वक मध्यस्थता की।
- 1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान अमेरिका–पाकिस्तान–चीन धुरी का सामना करते हुए भारत ने सोवियत संघ के साथ ऐतिहासिक शांति, मैत्री और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किये।
- इसने भारत को अमेरिकी हस्तक्षेप के विरुद्ध वास्तविक (de-facto) सुरक्षा गारंटी (परमाणु छत्र या न्यूक्लियर अंब्रेला) प्रदान की।
- सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्त्ता बन गया, जिसने लगभग 70% हथियारों की आपूर्ति की और रुपये–रूबल व्यापार व्यवस्था के माध्यम से भारत का एक प्रमुख आर्थिक साझेदार भी रहा।
- सोवियत-पश्चात विचलन (1991–99): 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही भारत आर्थिक संकट से गुज़र रहा था।
- रूस ने पश्चिम की ओर एकीकरण की दिशा में रुख किया और हथियारों पर दी जाने वाली “मैत्रीपूर्ण कीमतें” प्रदान करना बंद कर दिया।
- भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण (LPG सुधार) किया और अमेरिका तथा इज़राइल के साथ संबंधों में सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए।
- रणनीतिक साझेदारी का दौर (2000–21): वर्ष 2000 में भारत और रूस के बीच “रणनीतिक साझेदारी की घोषणा” पर हस्ताक्षर किये गए।
- वर्ष 2010 में दोनों देशों के संबंधों को 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी' के रूप में उन्नत किया गया था।
- सहयोग केवल खरीदार-विक्रेता रक्षा संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संयुक्त विकास (जैसे– ब्रह्मोस मिसाइल) और ऊर्जा क्षेत्र (साखालिन तेल क्षेत्रों में निवेश) तक बढ़ गया।
- तमिलनाडु का कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट नागरिक परमाणु सहयोग का प्रतीक बन गया और उस समय रूस एकमात्र ऐसा देश था जो भारत में परमाणु रिएक्टर बना रहा था।
- आर्थिक सहयोग: द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2024–25 में 68.7 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, मुख्य रूप से भारत के ऊर्जा आयात के कारण, लेकिन यह व्यापार रूस के पक्ष में काफी असंतुलित बना रहा।
- दोनों देशों का लक्ष्य 2030 तक व्यापार को 100 अरब अमेरिकी डॉलर, वर्ष 2025 तक पारस्परिक निवेश को 50 अरब अमेरिकी डॉलर, तक बढ़ाना है।
- भारत के निर्यात: फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, लोहा और इस्पात, समुद्री उत्पाद।
- भारत के आयात: कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, सूरजमुखी तेल, उर्वरक, कोकिंग कोयला, कीमती पत्थर और धातुएँ।
- रक्षा सहयोग: यह साझेदारी की आधारशिला है, जिसे वर्ष 2021-31 के सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है।
- INDRA और Zapad-2025 जैसे नियमित सैन्य अभ्यास परस्पर संचालन-क्षमता (Interoperability) को सुदृढ़ करते हैं।
- यूक्रेन युद्ध का प्रभाव: पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते भारत ने रियायती रूसी तेल की खरीद शुरू की, जिससे भारत के आयात में उसकी हिस्सेदारी तीव्रता से बढ़ी और व्यापार रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गया।
- अमेरिका का तर्क है कि इससे परोक्ष रूप से यूक्रेन युद्ध को वित्तपोषण मिलता है और उसने दंडात्मक शुल्क लगाए थे, जिन्हें हाल में सख्त निगरानी तथा स्नैपबैक क्लॉज़ (Snap-back Clause) के साथ वापस ले लिया गया है।
- अब अमेरिका, अमेरिकी कच्चे तेल, LNG तथा वेनेज़ुएला के तेल जैसे विकल्पों को आगे बढ़ाकर, भारत के ऊर्जा साझेदार के रूप में रूस का स्थान लेने का प्रयास कर रहा है।
- अब अमेरिका, अमेरिकी कच्चे तेल, LNG तथा वेनेज़ुएला के तेल जैसे विकल्पों को आगे बढ़ाकर, भारत के ऊर्जा साझेदार के रूप में रूस का स्थान लेने का प्रयास कर रहा है।
- अमेरिका का तर्क है कि इससे परोक्ष रूप से यूक्रेन युद्ध को वित्तपोषण मिलता है और उसने दंडात्मक शुल्क लगाए थे, जिन्हें हाल में सख्त निगरानी तथा स्नैपबैक क्लॉज़ (Snap-back Clause) के साथ वापस ले लिया गया है।
भारत-अमेरिका व्यापार बनाम भारत-रूस व्यापार का महत्त्व क्या है?
- व्यापार मात्रा में अंतर:
- भारत-अमेरिका व्यापार: अमेरिका 128 अरब अमेरिकी डॉलर के कुल व्यापार के साथ भारत का सबसे बड़ा बाज़ार है।
- रूस या चीन के साथ घाटा-प्रधान व्यापार के विपरीत, भारत को अमेरिका के साथ उच्च-मूल्य वस्तुओं के निर्यात तथा बड़े पैमाने पर सेवाओं के निर्यात से प्रेरित उल्लेखनीय व्यापार अधिशेष प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के एक प्रमुख स्रोत के रूप में अमेरिका भारत के स्टार्टअप पारितंत्र और अवसंरचना को सीधे प्रोत्साहित करता है, जिससे ‘वेल्थ मल्टीप्लायर’ (धन गुणक) जैसा प्रभाव उत्पन्न होता है।
- महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर अमेरिका-भारत पहल (initiative on Critical and Emerging Technology- iCET) के तहत व्यापार वस्तुओं से हटकर रणनीतिक प्रौद्योगिकी की ओर बढ़ रहा है तथा अंतरिक्ष सहयोग 2047 तक विकसित भारत (Developed Nation) बनने के भारत के लक्ष्य के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- भारत-रूस व्यापार: वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 68.72 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचा, किंतु यह अत्यधिक असंतुलित है। भारत ने 63.84 अरब अमेरिकी डॉलर का आयात किया (मुख्यतः तेल), जबकि निर्यात मात्र 4.88 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
- वर्तमान में रूस के साथ संबंध मुख्यतः लेन-देन आधारित हैं, जिनका केंद्र वस्तुओं (तेल/उर्वरक) की खरीद और पुरानी रक्षा प्रणालियों के स्पेयर पार्ट्स तक सीमित है तथा भारत की नागरिक अर्थव्यवस्था में गहन एकीकरण का अभाव दिखाई देता है।
- भारत-अमेरिका व्यापार: अमेरिका 128 अरब अमेरिकी डॉलर के कुल व्यापार के साथ भारत का सबसे बड़ा बाज़ार है।
- भू-राजनीतिक डेरिवेटिव:
- अमेरिका का लाभ: अमेरिका के साथ व्यापार का गहराता संबंध ‘इंडो-पैसिफिक’ रणनीति के अनुरूप है।
- आर्थिक एकीकरण एक ‘सुरक्षा गारंटी’ के रूप में कार्य करता है, जो अमेरिका के लिये भारत की स्थिरता की रक्षा करने हेतु दाँव (Stakes) को बढ़ाता है, जो चीनी आक्रामकता के विरुद्ध है।
- जब वैश्विक कंपनियाँ ‘चीन प्लस वन’ रणनीति अपना रही हैं, तब भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत करने के लिये अमेरिका अपरिहार्य हो जाता है।
- रूस की दुविधा: पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस आर्थिक रूप से चीन पर बढ़ती निर्भरता की स्थिति में पहुँच रहा है।
- रूस पर निरंतर अत्यधिक निर्भरता भारत की आपूर्ति शृंखलाओं को परोक्ष रूप से चीनी दबाव (Coercion) के जोखिम में डाल सकती है।
- अमेरिका का लाभ: अमेरिका के साथ व्यापार का गहराता संबंध ‘इंडो-पैसिफिक’ रणनीति के अनुरूप है।
- ऊर्जा सुरक्षा: अमेरिका-भारत शुल्क के जोखिम ने बाज़ार पहुँच को एक हथियार के रूप में उपयोग करने की अमेरिका की तत्परता को उजागर किया, जिसके चलते भारत रूस पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने के लिये, अधिक लागत के बावजूद, अमेरिकी तथा वेनेज़ुएला के तेल की ओर रुझान बढ़ाने पर विवश हुआ।
वर्तमान भारत-अमेरिका-रूस समीकरण में भारत के लिये चुनौतियाँ क्या हैं?
- ‘रूस-चीन’ गठबंधन: जो रूस आर्थिक रूप से चीन पर निर्भर होता जा रहा है, वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत के हितों का समर्थन करने या चीन-भारत सीमा संकट के दौरान तटस्थ बने रहने की संभावना कम रखता है।
- रक्षा एवं सुरक्षा संबंधी संवेदनशीलताएँ: भारत की लगभग 60% सैन्य सूची (Su-30 MKI, T-90 टैंक, S-400 प्रणालियाँ) रूसी मूल की है।
- भारत-अमेरिका व्यापार बढ़ने के बीच रूस महत्त्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स और रख-रखाव सहायता को प्राथमिकता न दे या उसमें विलंब कर सकता है।
- ऐतिहासिक रूप से रूस ने संवेदनशील प्रौद्योगिकियाँ (परमाणु पनडुब्बियाँ, हाइपरसोनिक मिसाइलें) साझा की हैं, जिन्हें पश्चिमी देश उपलब्ध नहीं कराते। मॉस्को को पृथक् करना इस द्वार को स्थायी रूप से बंद कर सकता है।
- रूसी रक्षा उपकरणों पर निर्भरता कम करना रणनीतिक रूप से आवश्यक है, किंतु परिचालन स्तर पर कठिन है, क्योंकि पश्चिमी प्रणालियाँ उच्च लागत वाली, अधिक प्रतिबंधात्मक होती हैं और नए प्रशिक्षण व सिद्धांत की मांग करती हैं, जिससे संवेदनशील सीमा स्थितियों में अल्पकालिक तत्परता पर जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
- आर्थिक एवं ऊर्जा संबंधी चुनौतियाँ: रूसी तेल किफायती था; जबकि अमेरिकी और वेनेज़ुएला का तेल संभवतः बाज़ार दरों पर मिलेगा।
- इसके अतिरिक्त, अमेरिका महाद्वीप से आने वाले तेल की मालभाड़ा (Freight) लागत रूस या पश्चिम एशिया की तुलना में कहीं अधिक होती है।
- भारतीय रिफाइनरियाँ तकनीकी रूप से रूस से यूराल्स ग्रेड के क्रूड ऑयल की विशिष्ट मध्यम‑सल्फर ग्रेड को प्रसंस्कृत करने के लिये अनुकूलित की गई हैं। हालाँकि अमेरिकी लाइट‑स्वीट क्रूड ऑयल या वेनेज़ुएला के हेवी क्रूड ऑयल पर स्थानांतरण के लिये रिफाइनरियों में तकनीकी समायोजन, कुछ समय के लिये उत्पादन‑अवरोध तथा अल्पकालिक दक्षता‑हानि को वहन करना पड़ सकता है।
- क्रूड ऑयल की हाई लैंडेड कॉस्ट से घरेलू पेट्रोल/डीज़ल के मूल्यों में वृद्धि हो सकती है, जिससे मुद्रास्फीति को बढ़ावा मिलेगा और भारत का चालू खाता घाटा (CAD) और बढ़ सकता है।
- भारत का ग्लोबल साउथ नेतृत्व: भारत का ग्लोबल साउथ में नेतृत्व का दावा सार्वभौमिकता, सामरिक स्वायत्तता तथा विकास‑केंद्रित कूटनीति के सिद्धांतों पर आधारित है। महाशक्ति‑प्रतिस्पर्द्धा से जुड़े संघर्षों में लंबे समय तक रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखना वैश्विक मंचों पर भारत के मानक‑निर्धारक प्रभाव और नैतिक प्राधिकार को कमज़ोर करने का जोखिम उत्पन्न करता है।
वर्तमान भारत-अमेरिका-रूस की वर्तमान गतिविधियों में संबंधों को संतुलित करने के लिये भारत क्या कदम उठा सकता है?
- त्वरित रक्षा स्वदेशीकरण: आत्मनिर्भर भारत के तहत SU–30 और T–90 जैसे रूसी मूल के प्लेटफॉर्मों के लिये आवश्यक महत्त्वपूर्ण पुर्ज़ों और गोला‑बारूद के उत्पादन का तीव्र स्थानीयकरण करके सशस्त्र बलों को आपूर्ति‑शृंखला आघातों से सुरक्षित किया जा सकता है।
- साथ‑साथ, अमेरिका (ड्रोन, जेट इंजन), फ्राँस (लड़ाकू विमान, पनडुब्बियाँ) और इज़राइल (सेंसर सिस्टम) से उच्च प्रौद्योगिकी वाले प्लेटफॉर्मों की खरीद जारी रखकर रूस से संबंधों को क्रमिक रूप से कमज़ोर किया जा सकता है।
- आगामी दशक में रूसी निर्भरता को 30% से कम स्तर पर लाकर रूस को “एकमात्र आपूर्तिकर्त्ता” से घटाकर “विभिन्न विक्रेताओं में से एक” के रूप में रूपांतरित करने का लक्ष्य रखा जा सकता है।
- ऊर्जा सुरक्षा: ‘पोर्टफोलियो दृष्टिकोण’: भारत को ऊर्जा सुरक्षा को निवेश पोर्टफोलियो की भाँति मानते हुए विविधीकरण‑आधारित जोखिम‑प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाना चाहिये।
- पश्चिम अफ्रीका (नाइजीरिया, अंगोला) तथा इराक जैसे आपूर्तिकर्त्ताओं के साथ सक्रिय ऊर्जा‑संबंध बनाए रखकर क्रूड ऑयल के स्रोतों की संतुलित टोकरी सुनिश्चित की जा सकती है।
- साथ ही अमेरिका जैसे दूरस्थ स्रोतों से आपूर्ति व्यवधानों के विरुद्ध सुरक्षा कवच के रूप में भारत की सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) क्षमता का विस्तार करना आवश्यक है।
- आर्थिक सुरक्षा: भारत को प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) जैसे भारत–यूरोपीय संघ FTA का विस्तार कर निर्यात‑वृद्धि के लिये केवल अमेरिकी बाज़ार पर निर्भरता कम करनी चाहिये।
- रुपया आधारित व्यापार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाते हुए ट्रांजेक्शन को इस प्रकार बेहतर किया जा सकता है कि भारतीय बैंक अमेरिकी वित्तीय प्रणाली और प्रतिबंध के जोखिमों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहें।
- वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के हथियारों का सामना करने हेतु महत्त्वपूर्ण/रणनीतिक क्षेत्रों, जैसे– औषधीय API (सक्रिय औषधीय घटक) और हरित ऊर्जा में घरेलू क्षमता का निर्माण किया जाना आवश्यक है।
- बहुपक्षवाद का उपयोग: भारत को अपने ग्लोबल साउथ नेतृत्व का उपयोग व्यापक कूटनीतिक समझ उत्पन्न करने के लिये करना चाहिये, ताकि वह किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता न दिखाए।
निष्कर्ष
- भारत को 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने, रोज़गार सृजित करने तथा इक्कीसवीं सदी की उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुँच बनाने के लिये अमेरिका की आवश्यकता है।
- वर्तमान में होने वाले परिवर्तनों में ऊर्जा बिलों को नियंत्रित रखने और रक्षा सेनाओं की युद्ध–तत्परता बनाए रखने के लिये भारत को रूस की भी आवश्यकता है, विशेषतः क्रूड ऑयल और रूसी मूल के रक्षा प्लेटफॉर्मों के निरंतर अनुरक्षण के लिये।
अतः भारत की नीति “पक्ष लेने” की नहीं है, बल्कि इन संबंधों को डि-हाइफेनेट करने की है अर्थात आर्थिक समृद्धि के लिये संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संलग्न रहते हुए रणनीतिक सुरक्षा के लिये रूस के साथ कार्यात्मक संबंध बनाए रखना।
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दृष्टि मेंस प्रश्न: प्रश्न. भारत-अमेरिका और भारत-रूस के व्यापार संबंधों की तुलना कीजिये और भारत की दीर्घकालीन रणनीतिक स्वायत्तता पर उनके प्रभाव का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. भारत ने वर्ष 2022 के बाद रूसी तेल आयात में वृद्धि क्यों की?
पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस को तेल की कीमतों में छूट देनी पड़ी, जिसे भारत ने मुद्रास्फीति नियंत्रण एवं ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु खरीदा।
2. अमेरिका भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने का विरोध क्यों कर रहा है?
अमेरिका का तर्क है कि इससे यूक्रेन युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से वित्तपोषण मिलता है तथा भारत द्वारा परिष्कृत ईंधन निर्यात के माध्यम से एक "रिफाइनिंग लूपहोल" का लाभ उठाया जा रहा है।
3. भारत-अमेरिका व्यापार भारत-रूस व्यापार से अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है?
भारत-अमेरिका व्यापार आकार में वृहद्, विविधीकृत, अधिशेष उत्पन्न करने वाला तथा रोज़गार, प्रौद्योगिकी, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश एवं आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़ा हुआ है।
4. भारत-रूस रक्षा संबंधों में वर्तमान में प्रमुख चुनौती क्या है?
प्रतिबंधों तथा रूस के चीनी रुझान के मध्य रूसी मूल के प्लेटफॉर्मों एवं पुर्ज़ों पर अधिक निर्भरता।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा
प्रश्न. हाल ही में भारत ने निम्नलिखित में से किस देश के साथ ‘नाभिकीय क्षेत्र में सहयोग क्षेत्राें के प्राथमिकीकरण और कार्यान्वयन हेतु कार्ययोजना’ नामक सौदे पर हस्ताक्षर किये हैं? (2019)
(a) जापान
(b) रूस
(c) यूनाइटेड किंगडम
(d) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर: (b)
मुख्य परीक्षा
प्रश्न. भारत-रूस रक्षा सौदों की तुलना में भारत-अमेरिका रक्षा सौदों के महत्त्व का भारत-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता के संदर्भ में विवेचना कीजिये। (2020)