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दल-बदल विरोधी कानून
- 07 Feb 2026
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चर्चा में क्यों?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने तेलंगाना विधानसभा के स्पीकर को विधायकों (MLAs) के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करने के लिये अंतिम तीन सप्ताह की समय-सीमा दी है, जो दल-बदल विरोधी कानून के तहत दायर की गई हैं और चेतावनी दी है कि अगर समय-सीमा का पालन नहीं किया गया तो अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाएगी।
दल-बदल विरोधी कानून क्या है?
- परिचय: दल-बदल विरोधी कानून को वर्ष 1985 में 52वें संशोधन के तहत संविधान में शामिल किया गया, जिसके साथ संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) भी जोड़ी गई।
- इसका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ के लिये होने वाले राजनीतिक दल-बदल (defection) को रोकना था।
- यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों पर लागू होता है। वर्ष 2003 में 91वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा इसे और अधिक प्रभावी बनाया गया। इस संशोधन के तहत, 'विभाजन' से संबंधित उस प्रावधान को हटा दिया गया जिसमें किसी दल के 1/3 सदस्य दल-बदल सकते थे, और केवल 'विलय' से संबंधित प्रावधान को ही बनाए रखा गया।
- कानून के उद्देश्य: राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और सरकारों को गिरने से रोकना, साथ ही विधायकों को प्रलोभन देकर लुभाने वाली पार्टियों को हतोत्साहित करके 'हॉर्स-ट्रेडिंग' (विधायकों की खरीद-फरोख्त) पर अंकुश लगाना।
- पार्टी अनुशासन लागू करना: पार्टी व्हिप के अनुसार मतदान करने के माध्यम से विधायकों में पार्टी अनुशासन सुनिश्चित करना।
- अयोग्यता के बिना दलों के विलय की अनुमति देना और लोकतंत्र को मज़बूत करना।
- अयोग्यता के आधार: स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ना (इसे केवल औपचारिक इस्तीफे से ही नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण/व्यवहार से भी समझा जा सकता है)।
- पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करना या मतदान से अनुपस्थित रहना अयोग्यता का कारण बन सकता है।
- यदि कोई स्वतंत्र रूप से निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो उसे भी अयोग्य ठहराया जा सकता है।
- एक मनोनीत सदस्य तब अयोग्य घोषित कर दिया जाता है, यदि वह विधायक या सांसद बनने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।
- अयोग्यता के अपवाद: यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) विधायक या सांसद किसी अन्य पार्टी में विलय करने के लिये सहमत हों, तो ऐसा विलय वैध माना जाएगा। इस स्थिति में विलय करने वाले और मूल पार्टी में बने रहने वाले सदस्य दोनों अयोग्यता से मुक्त रहेंगे।
- अयोग्यता से छूट: स्पीकर, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अगर पार्टी से इस्तीफा देकर तटस्थ बने रहते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से मुक्त रखा जाएगा।
- संचालित अधिकारी की भूमिका: अयोग्यता मामलों का निर्णय स्पीकर/अध्यक्ष द्वारा लिया जाता है।
- निर्णय पर न्यायिक समीक्षा: इस निर्णय पर न्यायालय द्वारा समीक्षा की जा सकती है, अदालतें केवल निर्णय लेने के बाद हस्तक्षेप कर सकती हैं।
- कानून की आलोचनाएँ: स्पीकर के लिये निर्णय लेने की कोई समय-सीमा कानून में निर्धारित नहीं है।
- न्यायालयों ने निर्णय में देरी की आलोचना की है, स्पीकर निर्णय लेने तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
- अक्सर, अध्यक्ष (स्पीकर) सत्ताधारी दल से होता है और उस पर सरकार के पक्ष में अयोग्यता याचिकाओं पर वर्षों तक फैसला न देकर जानबूझकर देरी करने का आरोप लगता है। ऐसा ही एक चर्चित उदाहरण 'पॉकेट वीटो' का मामला है।
- यह असहमति को रोकता है क्योंकि विधायकों को पार्टी के निर्देशों का पालन करना पड़ता है, जिससे उनकी स्वतंत्र रूप से मतदान करने की या अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।
- यह पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को भी कमज़ोर करता है, जिससे पार्टी नेतृत्व को आंतरिक आलोचना को दबाने में आसानी होती है।
दल-बदल विरोधी कानून पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख
- पाडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य (2025): सर्वोच्च न्यायालय ने दल-बदल मामलों के समयबद्ध और निष्पक्ष निपटारे के लिये संसदीय सुधारों का आग्रह किया तथा स्पीकर की भूमिका पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर ध्यान दिया।
- केशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020): न्यायालय ने निर्देश दिया कि अध्यक्ष को अयोग्यता के मामलों का निर्णय 3 माह के भीतर करना चाहिये। देरी दसवीं अनुसूची के उद्देश्य को विफल कर देती है। साथ ही, निष्पक्षता और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिये एक स्वतंत्र अधिकरण (ट्रिब्यूनल) का सुझाव दिया।
- रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अध्यक्ष को एक निष्पक्ष निर्णायक की तरह कार्य करना चाहिये। यदि किसी सांसद/विधायक का आचरण दल-बदल को दर्शाता है, तो औपचारिक इस्तीफा दिये बिना भी उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।
- किहोतो होलोहन बनाम जचिल्हु (1992): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दल-बदल विरोधी कानून के अंतर्गत अध्यक्ष के निर्णय दुर्भावनापूर्ण मंशा, प्रक्रियात्मक अनियमितता या संवैधानिक उल्लंघन की स्थिति में न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे।
दल-बदल विरोधी कानून को सशक्त बनाने के उपाय
- मज़बूत प्रवर्तन: दिनेश गोस्वामी समिति (1990), हाशिम अब्दुल हलीम समिति (1994) तथा विधि आयोग की रिपोर्टों (1999 एवं 2015) की सिफारिशों के अनुसार, दल-बदल से संबंधित कार्यवाहियों को समयबद्ध, पारदर्शी और सार्वजनिक जाँच के लिये सुलभ बनाया जाना चाहिये, ताकि विश्वास बढ़े, जवाबदेही सुनिश्चित हो और कानून के दुरुपयोग को रोका जा सके।
- निर्णय लेने की शक्ति: अयोग्यता से संबंधित मामलों का निर्णय करने का अधिकार स्पीकर से हटाकर एक स्वतंत्र संस्था (सेवानिवृत्त न्यायाधीशों द्वारा संचालित स्थायी अधिकरण या निर्वाचन आयोग) को सौंपा जाना चाहिये, ताकि राजनीतिक पक्षपात कम हो।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने भी सिफारिश की थी कि दल-बदल के मामलों का निर्णय निर्वाचन आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा किया जाना चाहिये।
- आंतरिक दलीय लोकतंत्र: 170वें विधि आयोग की रिपोर्ट के तहत राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र को मज़बूत करने की सिफारिश की गई है। इसका उद्देश्य आंतरिक बहस को बढ़ावा देना और शीर्ष-स्तरीय (Top-down) निर्णय लेने की प्रक्रिया पर निर्भरता को कम करना है।
- स्पीकर पद की निष्पक्षता: ब्रिटेन की परंपरा के अनुसार, निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिये स्पीकर पद पर निर्वाचित होने के बाद व्यक्ति अपनी राजनीतिक पार्टी से इस्तीफा दे देता है। भारत में भी इस परंपरा को अपनाया जा सकता है।
- ‘व्हिप’ के दायरे को सीमित करना: व्हिप को केवल ‘महत्त्वपूर्ण प्रस्तावों’ (जैसे– अविश्वास प्रस्ताव, धन विधेयक या सरकार के अस्तित्व को प्रभावित करने वाले प्रस्तावों) तक सीमित किया जाना चाहिये।
- अन्य सभी विधेयकों (विकासात्मक, सामाजिक आदि) पर सांसदों/विधायकों को अपने विवेक और अपने निर्वाचन क्षेत्र के हितों के अनुसार मतदान करने की स्वतंत्रता होनी चाहिये। इससे स्थिरता और प्रतिनिधि लोकतंत्र के बीच संतुलन स्थापित होगा।
निष्कर्ष:
सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी दल-बदल विरोधी कानून को लागू करने में देरी और पूर्वाग्रह को उजागर करती है। लोकतांत्रिक जवाबदेही बनाए रखने के लिये समयबद्ध निर्णय और स्वतंत्र न्यायनिर्णयन जैसे सुधारों की आवश्यकता है।
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दृष्टि अभ्यास प्रश्न "अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने में देरी से दल-बदल विरोधी कानून का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।" हाल के उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेपों के आलोक में चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. दल-बदल विरोधी कानून क्या है?
इसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम (1985) द्वारा लागू किया गया, जिसके तहत दसवीं अनुसूची शामिल की गई। इसका उद्देश्य व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिये होने वाले दल-बदल को रोकना है।
2. किन आधारों पर किसी सांसद या विधायक को अयोग्य ठहराया जा सकता है?
पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ना, पार्टी व्हिप का उल्लंघन करना, किसी निर्दलीय सदस्य का किसी पार्टी में शामिल होना या किसी नामित सदस्य का छह माह के बाद किसी पार्टी में शामिल होना।
3. क्या दल-बदल मामलों में स्पीकर के निर्णय अंतिम होते हैं?
नहीं। किहोतो होलोहन बनाम जचिल्हु (1992) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्पीकर के निर्णय दुर्भावनापूर्ण मंशा या संवैधानिक उल्लंघन की स्थिति में न्यायिक समीक्षा के अधीन होते हैं।
4. दल-बदल विरोधी कानून में सुधार के लिये क्या सुझाव दिये गए हैं?
निर्णयों को समयबद्ध बनाना, निर्णय प्रक्रिया को स्वतंत्र अधिकरण या निर्वाचन आयोग को सौंपना तथा राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र को मज़बूत करना।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. भारत के संविधान की निम्नलिखित अनुसूचियों में से किसमें दल-बदल विरोधी प्रावधान हैं? (2014)
(a) दूसरी अनुसूची
(b) पाँचवीं अनुसूची
(c) आठवीं अनुसूची
(d) दसवीं अनुसूची
उत्तर: (d)
मेन्स:
प्रश्न. कुछ वर्षों से सांसदों की व्यक्तिगत भूमिका में कमी आई है जिसके फलस्वरूप नीतिगत मामलों में स्वस्थ रचनात्मक बहस प्रायः देखने को नहीं मिलती। दल परिवर्तन विरोधी कानून, जो भिन्न उद्देश्य से बनाया गया था, को कहाँ तक इसके लिये उत्तरदायी माना जा सकता है? (2013)