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चाँद एक त्योहार अनेक

  • 22 Aug, 2020

- नहीं, ऊपर आसमान में नहीं देखो, चाँद निकल गया है!
- अरे, इसीलिए तो देखने जा रहे हैं कि चाँद निकल गया है।
- आज के दिन चाँद को बिना हाथ में फल-फूल लिए नहीं देखना चाहिए, चोरी का झूठा इल्जाम लगता है। भगवान कृष्ण भी नहीं बच पाए हैं तो हम और तुम क्या चीज हैं!

दरअसल बात ऐसी है कि आज उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में मनाया जाने वाला गणेश चतुर्थी का त्योहार हमारे बिहार में चौकचंदा के रूप में मनाया जाता है। 

चाँद को केंद्र में रखने वाले कई त्योहारों,जैसे- ईद, करवाचौथ इत्यादि में से एक चौकचंदा भी है, जो भारत के पूर्वांचल प्रदेश में मनाया जाता है। इसमें चाँद की पूजा की जाती है। पर्व करने वाली महिला दिन भर उपवास रखती हैं और शाम को चाँद निकलने के बाद सूप या बाँस से बनी डलिया में सामर्थ्य के अनुसार सीज़नल फल और पकवान लेकर फिर चाँद की तरफ देखते हुए उन्हें समर्पित करती हैं। यह पूजा घर के आँगन में या छत पर (जहाँ से भी खुले आकाश में चाँद दिख जाए) होती है। मुझे याद है जब मामा (हमारे यहाँ दादी को मामा कहते हैं) चाची को ये परव (पर्व) दे रही थी तो। 

हमारे इधर ऐसा होता है कि सास जो भी परव करती है उसे सही वक़्त आने पर या तो सुमझा सकती है या अपनी बहुओं को, अगर वो करना चाहें तो ट्रांसफर कर सकती है।

पर्व से अर्थ है- वो त्योहार जिसमें उपवास रहकर पूजा पाठ करना होता है फिर प्रसाद इत्यादि मिलता है।

सही वक़्त से तात्पर्य है, जब सास इस कार्य को करने में कम सक्षम होने लगे और बहु मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हो जाए या सक्षम होते हुए भी बहु की मर्ज़ी हो तो उसे डेलिगेट कर दिया जाता है या ट्रांसफर कर दिया जाता है।

सुमझाने का अर्थ है- पर्व का विधि-विधान से समापन;  

दरअसल इस पर्व से जुड़ी एक पौराणिक कथा यह है कि इसी दिन कृष्ण भगवान ने बिना फल लिए चाँद को गलती से देख लिया था फिर क्या था उन्हें भी चोरी का इल्ज़ाम झेलना पड़ा।

हुआ यूँ कि भगवान सूर्य ने कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा के पिता सत्राजीत को एक मणि दी थी जिसका नाम स्यामंतक था। सत्राजीत यह स्यामंतक मणि अपने पूजाघर में रखते थे। एक दिन उनका भाई वो मणि पहनकर जंगल में शिकार करने गया और मणि गुम हो गया। इधर कृष्ण मेहमान बनकर ससुराल आए थे। सत्राजीत ने जब देखा कि मणि गायब है तो उन्होंने कृष्ण पर मणि चोरी का इल्ज़ाम डाल दिया।

कृष्ण अपने-आप को इस इल्ज़ाम से मुक्त करने के लिए मणि की खोज में चल दिए। 

इधर जंगल में मणि एक शेर के हाथों लग गया जिसे जामवंत जी (वही जामवंत जो राम-रावण युद्ध में भालुओं की सेना की अगुआई कर रहे थे) ने शेर को मार कर मणि अपने पास रख लिया। अपनी गुफा में आकर यह स्यामंतक मणि उन्होंने अपनी बेटी जामवंती को खेलने के लिए दे दिया।

जब कृष्ण मणि खोजते-खोजते जामवंत की गुफा तक पहुँचे और जामवंती को इससे खेलते पाया तो इस मणि को वापस ले जाने की इच्छा जताई। लेकिन बेटी की खुशी से अधिक प्रिय पिता को शायद कुछ नहीं होता इसलिए उन्होंने 27 दिन तक कृष्ण से युद्ध किया। अंतत: जब कोई उपाय नहीं बचा दोनों के पास तो पिता अपनी पुत्री जामवंती की शादी कृष्ण से करके स्यामंतक मणि कृष्ण को सौंप दिया। इस तरह कृष्ण वह मणि सत्राजीत को लौटाकर चोरी के इस झूठे इल्ज़ाम से मुक्त हुए।

कहते हैं कि मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के विंध्याचल पहाड़ी में जामगढ़ नामक जगह पर अब भी जामवंत की गुफा स्थित है। अब ये बात कोई प्रत्यक्षदर्शी या स्थानीय निवासी ही कन्फर्म कर सकेंगे।

दिलचस्प बात ये है कि केवल चौकचंदा ही नहीं छठ भी इसी तरह सास अपनी बहुओं को ट्रांसफर कर सकती हैं। यादें बड़ी सुंदर चीज है, कहीं धोखा ना दे जाए किसी दिन इसीलिए इसे लेखन के माध्यम से दर्ज़ करना जरूरी है कि हम रहे ना रहे यादें रहनी चाहिए, परंपराएँ रहनी चाहिए, कथाएँ रहनी चाहिए।

[नेहा चौधरी]

(खास विचारों वाली एक आम लड़की।)

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