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चीन से इकोनॉमिक डिस्टेंसिंग

  • 23 Apr, 2020

वैश्विक स्तर पर चीन के साथ द्विपक्षीय साझे व्यापार में विश्व के लगभग सभी देश चाहे अमेरिका हो या यूरोपियन यूनियन सभी घाटे की स्थिति में हैं। स्वयं भारत भी चीन के साथ  आपसी द्विपक्षीय व्यापार में लगभग 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर के घाटे की स्थिति में है।

अब जब चीन विश्व का वर्कशॉप बन चुका है जहाँ से विश्व के सभी घरों में चीन निर्मित वस्तुओं की आपूर्ति हो रही है और आज स्थिति यह है कि चाहे हम अपने घर या कार्यस्थल की 10 वस्तुओं को देख ले तो इसकी प्रबल संभावना है कि उनमें से पाँच वस्तुएँ चीन में निर्मित हुई हो।

ऐसा नहीं है कि चीन का वैश्विक विनिर्माण का केंद्र बनना कोई संयोग हो, बल्कि इसके लिये चीन ने विश्व स्तरीय आधारभूत ढाँचे का निर्माण अपने कार्यबल को कुशल मानवीय संसाधनों में परिवर्तित किया, साथ ही साम्यवादी राजनीतिक व्यवस्था में सीमित नागरिक अधिकार वाले श्रमिकों जैसी विशेषताओं ने वैश्विक उद्योगों को चीन में अपना उद्योग स्थापित करने के लिये आकर्षित किया है।

चीन में आर्थिक व्यवस्था तो पूंजीवादी है परंतु राजनीतिक व्यवस्था साम्यवादी है। और अगर हम विभिन्न आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के संदर्भ में अन्य देशों से चीन की तुलना करेंगे तो हम पाएंगे कि चीन में यह मॉडल काफी यूनिक है।

चीन की राजनीतिक व्यवस्था न केवल आर्थिक मॉडल के पूरक है बल्कि आर्थिक आवश्यकताओं से ही संचालित होती है जिससे चीन ने न केवल चार दशकों में अप्रत्याशित आर्थिक विकास किया है बल्कि चीन वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित हो गया है।

यही कारण है कि कल तक विकासशील देशों को मुक्त व्यापार के लिये बाध्य करने वाले अमेरिका जैसे देश संरक्षणवाद का सहारा ले रहे हैं ताकि वे चीन के साथ अपने व्यापारिक घाटे को कम कर सकें। पिछले तीन दशकों से आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित अमेरिका ने विकासशील देशों के बाज़ारों में अपनी पहुँच बनाने के लिये IMF एवं WTO जैसी संस्थाओं को माध्यम बनाया। आज उसी अमेरिका के समक्ष चीन ने चुनौती प्रस्तुत कर दी है जिससे वह न केवल वैश्विक संस्थाओं में अपनी भूमिका को कम कर रहा है बल्कि अपने वैश्विक दायित्वों से भी पीछे हट रहा है। 

आर्थिक हितों से संचालित होने वाले चीन ने एक बार फिर से अपने आर्थिक हितों को मानवीय जीवन से ऊपर रखा एवं आर्थिक हितों को कोई क्षति न पहुँचे इसके लिये नोवेल कोरोनावायरस से संबंधित सूचनाओं को शेष विश्व से उसने छुपाया जिससे आज विश्व के 4 अरब लोग अपने घरों में कैद हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था चौपट होने के कगार पर पहुँच गई है।

अब यह बात स्पष्ट हो गई है कि चीन ने नोवेल कोरोनावायरस के संदर्भ में अपारदर्शिता बरती है तथा पश्चिमी देशों को नैतिक कारण के साथ एक अवसर मिल गया है कि वह संरक्षणवाद को अपनाते हुए चीन के साथ अपने व्यापारिक घाटे को कम करें।

कुछ दिन पूर्व जापान ने कोविड-19 से उत्पन्न आर्थिक संकट से निपटने के लिये 992 बिलियन अमेरिकी डॉलर के आर्थिक पैकेज की घोषणा की जो कि उसकी GDP का कुल 20% है। आर्थिक पैकेज में चीन से जापानी उद्योगों को बाहर निकालने के लिये भी धन का आवंटन किया गया है। High added value उद्योगों को चीन से जापान में तथा अन्य उद्योगों को अन्य देशों में स्थानांतरित करने के लिये 2.2  बिलियन अमेरिकी डॉलर आवंटित किये गए हैं और जापान प्रशासन के अनुसार, 37% उद्योगों ने इसके प्रति सहमति जताई है।

पिछले 1 वर्ष से अमेरिका ने चीन के साथ व्यापारिक युद्ध छेड़ रखा है। साथ ही कोविड-19 महामारी से वर्तमान में सर्वाधिक प्रभावित देश भी अमेरिका ही है जिसके लिये वह लगातार चीन को दोषी ठहरा रहा है एवं चीन से अपने उद्योगों को वापसी के लिये प्रोत्साहित कर रहा है।

वर्ष 2018 में इटली में कंज़रवेटिव सरकार का गठन हुआ जिसके बाद से ही इटली में यूरोपियन यूनियन से अलग होने की मांग ने ज़ोर पकड़ा जिससे इटली संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों को अपना सके। वहीं दूसरी ओर इटेलियन मीडिया कोरोनावायरस से हुए जान-माल के नुकसान के लिये चीन को दोषी मान रही है और चीन से क्षतिपूर्ति की मांग कर रही है।

चीन के प्रति नकारात्मकता केवल जापान, अमेरिका, इटली में नहीं है बल्कि पूरे विश्व में व्याप्त हो गई है। हालाँकि आज भी चिकित्सीय उपकरणों की आपूर्ति के लिये कई देश चीन पर निर्भर हैं, ऐसे में जब कोरोना महामारी से निपटने के लिये निर्बाध आपूर्ति आवश्यक है तो वह चीन के प्रति तात्कालिक टिप्पणी करने से बच रहे हैं। साथ ही इस बात के भी संकेत दे रहे हैं कि इस चुनौती से निपटने के पश्चात् वे चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिये ठोस कदम उठाएंगे।

परंपरागत रूप से अपनी आक्रमक आर्थिक एवं विदेश नीति के लिये विख्यात चीन ने मौके की नज़ाकत को समझते हुए चीन अमेरिका, जापान एवं अन्य देशों के विरुद्ध कोई प्रतिक्रिया न देते हुए स्वयं को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत कर रहा है जिससे वह स्वयं के प्रति नकारात्मकता को बढ़ने से रोक सकें। साथ ही वैश्विक संस्थाओं (WTO, WHO) में प्रभाव बढ़ाकर चीन, इनके माध्यम से अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित करने का भी पूरा प्रयास कर रहा है।

निश्चित रूप से कोरोना संकट से निपटने के बाद वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में संरक्षणवाद की प्रवृत्ति में तीव्रता आने की प्रबल संभावना है परंतु पूंजीवादी व्यवस्था में गुणवत्ता के साथ कीमत प्रतिस्पर्द्धा एक महत्त्वपूर्ण आयाम है। ऐसे में उच्च श्रम लागत वाले विकसित देशों में उद्योगों का स्थानांतरण लागत को बढ़ा देगा, जो उद्योगों के हितों के अनुकूल नहीं होगा। ऐसे में उनके लिये चीन का विकल्प ढूँढना बाध्यता होगी और ऐसे में भारत एक उपयुक्त विकल्प हो सकता है।

पिछले एक दशक से भारत ने कौशल विकास एवं आधारभूत संरचना निर्माण के क्षेत्र में अप्रत्याशित विकास किया है, साथ ही उच्च जननांकीय लाभांश, सस्ता श्रम एवं श्रम कानूनों में सुधार आदि के चलते भारत में औद्योगिक विकास के लिये प्रबल संभावनाएँ भी उत्पन्न हो रही है। ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत विश्व का वर्कशॉप बनने के लिये तैयार है।

[अरविंद सिंह]

(लेखक समसामयिक, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों एवं आर्थिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के साथ आर्थिक इकाई के रूप में मानव व्यवहार के अध्ययन में गहरी रुचि रखते हैं।)

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