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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: संसदीय विचार-विमर्श में कमी, बैठकों की घटती संख्या एवं विधेयकों की सीमित जाँच को लेकर उठती चिंताओं के बीच, समालोचनात्मक रूप से परीक्षण कीजिये कि विधायी प्रक्रियाएँ भारत में लोकतांत्रिक जवाबदेही, पारदर्शिता और शासन की समग्र गुणवत्ता को किस प्रकार प्रभावित करती हैं। (250 शब्द)

    24 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत संसदीय विचार-विमर्श में कमी का उल्लेख करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में इसकी लोकतांत्रिक जवाबदेही, पारदर्शिता और शासन पर प्रभाव स्पष्ट कीजिये।
    • सुधारों का सुझाव दीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारतीय संसदीय प्रणाली, जिसे ‘राष्ट्र की महान जाँच-पड़ताल’ के रूप में परिकल्पित किया गया था, वर्तमान में अपनी विचार-विमर्श संबंधी कार्यप्रणाली के संरचनात्मक क्षरण का सामना कर रही है। 17वीं लोकसभा में केवल 16% विधेयकों को विस्तृत जाँच के लिये समितियों के पास भेजा गया।

    • यह परिवर्तन एक ‘विचार-विमर्श करने वाली संस्था’ से कार्यपालिका के निर्णयों के लिये मात्र ‘अनुमोदन केंद्र’ बनने की ओर संकेत करता है, जिसका भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

    मुख्य भाग: 

    लोकतांत्रिक जवाबदेही पर प्रभाव

    विधायी प्रक्रियाएँ कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराने का प्रमुख माध्यम होती हैं। जब इन प्रक्रियाओं को दरकिनार किया जाता है तो जवाबदेही समकालिक नियंत्रण के बजाय केवल ‘पश्चात विश्लेषण’ तक सीमित रह जाती है।

    • प्रश्नकाल का कमज़ोर होना: लगातार होने वाले व्यवधान और सीमित बैठक दिवसों के कारण प्रश्नकाल जो कार्यपालिका की प्रत्यक्ष जवाबदेही का सबसे प्रभावी साधन है, कमज़ोर पड़ गया है।
      • हाल के सत्रों में लोकसभा में प्रश्नकाल की उत्पादकता घटकर मात्र 23% तक रह गई, जिससे मंत्रियों को संसदीय जाँच से बचाव मिल जाता है।
    • ‘गिलोटीन’ और वित्तीय जवाबदेही: संघीय बजट का एक बड़ा हिस्सा ‘गिलोटीन’ प्रक्रिया के माध्यम से बिना किसी चर्चा के विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों पर पारित कर दिया जाता है। 
      • इससे विधायिका की ‘वित्तीय नियंत्रण की शक्ति’ कमज़ोर पड़ती है।
    • कार्यपालिका का प्रभुत्व: अध्यादेश मार्ग के बढ़ते उपयोग तथा विवादास्पद विधेयकों को धन विधेयक के रूप में वर्गीकृत करने (ताकि राज्यसभा को दरकिनार किया जा सके) से यह स्पष्ट होता है कि विधायी निगरानी के ऊपर कार्यपालिका का प्रभुत्व बढ़ रहा है।

    पारदर्शिता और जन-विश्वास पर प्रभाव

    विधि-निर्माण में पारदर्शिता यह सुनिश्चित करती है कि कानून की ‘मंशा’ स्पष्ट हो तथा हितधारकों से परामर्श किया जाए।

    • स्थायी समितियों को दरकिनार करना: समितियाँ ‘लघु संसद’ के रूप में कार्य करती हैं, जहाँ अक्सर द्विदलीय सहयोग देखने को मिलता है।
      • विधेयकों को समितियों के पास भेजने में गिरावट का अर्थ है कि विशेषज्ञों की गवाही और जन-प्रतिक्रिया अब विधायी प्रक्रिया में समुचित रूप से शामिल नहीं हो पा रही है।

    • महत्त्वपूर्ण कानूनों पर न्यूनतम विचार-विमर्श: व्यापक प्रभाव वाले कानून जैसे हाल का VB-G RAM G विधेयक (2025), जिसने MGNREGA का स्थान लिया, पर्याप्त विचार-विमर्श के अभाव में ही पारित कर दिये गए।
      • इससे सरकार की नीतिगत सोच की पारदर्शिता सीमित होती है और सार्थक सार्वजनिक बहस बाधित होती है।
    • पक्षपाती पीठासीन अधिकारी: अध्यक्ष की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न तथा उपाध्यक्ष के पद (जो अनुच्छेद 93 के अंतर्गत एक संवैधानिक आवश्यकता है) का लगातार रिक्त रहना, समय आवंटन में पक्षपात के आरोपों को जन्म देता है, जिससे कार्यवाही की निष्पक्षता में जन-विश्वास और कमज़ोर होता है।

    शासन की गुणवत्ता पर प्रभाव

    शासन की गुणवत्ता उन कानूनों की सुदृढ़ता से अभिन्न रूप से जुड़ी होती है, जो उसे संचालित करते हैं।

    • कानूनी कमियाँ और न्यायिक हस्तक्षेप: अपर्याप्त चर्चा के साथ बनाए गए कानूनों में अक्सर तकनीकी त्रुटियाँ या संवैधानिक अस्पष्टताएँ होती हैं।
      • इससे न्यायिक सक्रियता बढ़ती है, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय को ‘विधायी शून्य’ को भरने या कानूनों को निरस्त करने के लिये हस्तक्षेप करना पड़ता है, जिससे नीतिगत अनिश्चितता उत्पन्न होती है (जैसे व्यापक असंतोष के बाद कृषि कानूनों का निरसन)।
    • ‘दलबदल विरोधी कानून’ का प्रभाव: दसवीं अनुसूची ने सांसदों को ‘व्हिप-निर्देशित मतदाता’ बना दिया है।
      • जनप्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्र के हितों या अपनी विशेषज्ञता के बजाय पार्टी लाइन का पालन करने के लिये बाध्य होते हैं, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले शासन के लिये आवश्यक विचारों की विविधता कम हो जाती है।
    • संस्थागत उदासीनता: जब विधायिका को केवल ‘रबर स्टैम्प’ के रूप में देखा जाने लगता है तो नौकरशाही पर प्रदर्शन करने या पारदर्शी बने रहने का दबाव कम हो जाता है, जिससे एक ‘ऊपर से नीचे’ शासन मॉडल विकसित होता है, जो स्थानीय स्तर की प्रतिक्रिया की अनदेखी करता है।

    विधायी प्रक्रिया की सजीवता को पुनर्स्थापित करने के लिये कई संस्थागत पुनर्संरचनाएँ आवश्यक हैं:

    • न्यूनतम वैधानिक बैठकें: एक ऐसा कानून बनाना, जो प्रति वर्ष कम-से-कम 100–120 बैठक दिवस अनिवार्य करे, जैसा कि यूके या ऑस्ट्रेलिया में प्रचलित है, ताकि विचार-विमर्श के लिये सुनिश्चित और पूर्वानुमेय समय मिल सके।
    • अनिवार्य समिति जाँच: कार्य संचालन नियमों में सुधार कर सभी महत्त्वपूर्ण विधेयकों को स्थायी समितियों के पास भेजना एक सामान्य नियम बनाया जाए, न कि कार्यपालिका के विवेक पर निर्भर।
    • दलबदल विरोधी कानून में सुधार: ‘व्हिप’ को केवल अविश्वास प्रस्ताव और धन विधेयकों तक सीमित किया जाए, जिससे अन्य नीतिगत मामलों पर सांसदों की विधायी स्वतंत्रता बहाल हो सके।
    • ‘प्रधानमंत्री प्रश्नकाल’ का संस्थानीकरण: वेस्टमिंस्टर मॉडल को अपनाते हुए एक साप्ताहिक सत्र निर्धारित किया जाए, जिसमें प्रधानमंत्री विपक्ष के नेता और अन्य सदस्यों के सीधे प्रश्नों का उत्तर दें।
    • डिजिटल लोकतंत्र का उपयोग: AI और डिजिटल पोर्टल (जैसे ‘संसद भाषिणी’ पहल) का उपयोग कर समिति रिपोर्टों और विधेयकों के मसौदे को मतदान से पहले वास्तविक समय में सार्वजनिक परामर्श के लिये उपलब्ध कराया जाए।

    निष्कर्ष:

    विधायी जवाबदेही संसदीय लोकतंत्र की ‘ऑक्सीजन’ है। यद्यपि शासन के लिये कार्यपालिका को दक्षता की आवश्यकता होती है, परंतु यह कानूनों को वैधता प्रदान करने वाली जाँच और विचार-विमर्श की प्रक्रिया की कीमत पर नहीं होना चाहिये। समिति प्रणाली को पुनर्जीवित करना और एक निश्चित विधायी कैलेंडर सुनिश्चित करना ‘विकसित भारत’ की दिशा में आवश्यक कदम है, जहाँ शासन केवल बहुमत के आधार पर नहीं, बल्कि विधि के शासन के अनुसार संचालित होता है।

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