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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में न्यायिक सक्रियता अनेक बार कार्यपालिका की निष्क्रियता से उत्पन्न रिक्तता को पूरा करती है, तथापि इसके साथ नीतिगत सीमाओं के अतिक्रमण का खतरा भी निहित रहता है। उपयुक्त उदाहरणों के साथ विवेचना कीजिये। (250 शब्द)

    03 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत न्यायिक सक्रियता की परिभाषा देकर कीजिये।
    • मुख्य भाग में तर्क दीजिये कि किस प्रकार न्यायिक सक्रियता, कार्यपालिका की निष्क्रियता से उत्पन्न रिक्तता को पूरा करती है, उपयुक्त उदाहरणों सहित।
    • इसके बाद बताएँ कि न्यायिक सक्रियता के अतिरेक से कौन-कौन सी चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
    • अंत में, इन चुनौतियों से निपटने के उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारत में न्यायिक सक्रियता से आशय न्यायपालिका द्वारा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने और न्याय को बढ़ावा देने में निभाई जाने वाली सक्रिय भूमिका से है, जिसमें प्राय: पारंपरिक व्याख्यात्मक सीमाओं से आगे बढ़कर कार्य किया जाता है।

    • यह संविधान के अनुच्छेद 32, 142 और 226 पर आधारित है तथा तब एक सुधारात्मक शक्ति के रूप में कार्य करती है जब विधायिका या कार्यपालिका अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने में विफल रहती है।
    • यद्यपि यह लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में कार्य करती है, फिर भी ‘सक्रियतावाद’ और ‘अतिरिक्त हस्तक्षेप’ के बीच की सूक्ष्म रेखा गहन संवैधानिक बहस का विषय बनी रहती है।

    मुख्य भाग: 

    कार्यपालिका की रिक्तता की पूर्ति: उत्प्रेरक के रूप में न्यायपालिका

    जब कार्यपालिका प्रणालीगत समस्याओं के प्रति निष्क्रिय या उदासीन रहती है, तब न्यायपालिका हस्तक्षेप कर त्वरित राहत और दीर्घकालिक ढाँचा प्रदान करती है।

    • मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन: जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से न्यायालय वंचित वर्गों की शिकायतों का समाधान करता है।
      • उदाहरण के लिये, बंधुआ मुक्ति मोर्चा मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनी तकनीकी से आगे बढ़ते हुए बंधुआ मज़दूरों की पहचान की और उन्हें मुक्त कराया, जहाँ स्थानीय प्रशासन असफल साबित हुआ था।
    • नियामक दिशा-निर्देशों का निर्माण: विशिष्ट कानून के अभाव में न्यायालय ‘अंतरिम कानून’ तैयार करता है।
      • विशाखा दिशा-निर्देश (1997) ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित एक बड़े विधायी शून्य को 16 वर्षों तक भरा, जब तक कि वर्ष 2013 में POSH अधिनियम लागू नहीं हुआ।
    • पर्यावरण संरक्षण और स्थिरता: न्यायपालिका प्राय: ‘हरित प्रहरी’ के रूप में कार्य करती है।
      • उदाहरण के लिये, एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने CNG अपनाने को अनिवार्य किया।
    • शासन में पारदर्शिता: न्यायालय ने सक्रियता के माध्यम से चुनावी और प्रशासनिक सुधारों को निरंतर प्रोत्साहित किया है।
      • ADR मामला (2002) में न्यायालय ने उम्मीदवारों को अपने आपराधिक और वित्तीय विवरण उजागर करने का निर्देश दिया, जिससे मतदाताओं के ‘जानने के अधिकार’ को सुनिश्चित किया गया, जिसे कार्यपालिका प्रदान करने में हिचक रही थी।
    • व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा: कार्यपालिका के दुरुपयोग के जवाब में न्यायालय अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार करता है।
      • हाल के पुट्टस्वामी (गोपनीयता का अधिकार) मामले में न्यायपालिका ने संभावित कार्यपालिका के अतिक्रमण पर अंकुश लगाया।

    न्यायिक अतिक्रमण से उत्पन्न चुनौतियाँ

    अतिक्रमण तब होता है जब न्यायपालिका नीति-निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश करती है, जहाँ उसके पास आवश्यक अधिकार, विशेषज्ञता या जवाबदेही का अभाव होता है।

    • शक्तियों के पृथक्करण का क्षरण: ‘आवश्यक कार्यकारी कार्यों’ का निर्वहन करके न्यायालय संवैधानिक शक्तियों के संतुलन को बाधित करता है।
      • उदाहरण के लिये, वर्ष 2016 में राजमार्गों के पास शराब बिक्री पर प्रतिबंध को एक ऐसी नीतिगत निर्णय के रूप में आलोचना मिली, जिसने आर्थिक प्रभावों और प्रशासनिक व्यवहार्यता की अनदेखी की।
    • तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव: आलोचकों का तर्क है कि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, जटिल सामाजिक-आर्थिक या वैज्ञानिक क्षेत्रों के नहीं।
      • क्रिकेट प्रबंधन (BCCI सुधार) या जटिल पर्यावरणीय इंजीनियरिंग में न्यायालय का हस्तक्षेप प्राय: ‘अनपेक्षित परिणामों’ को जन्म देता है, जिन्हें लागू करना कठिन होता है।
    • मामलों का लंबित रहना और न्यायिक बैकलॉग: जब न्यायपालिका ‘कार्यपालिका की निगरानी’ में अत्यधिक समय व्यतीत करती है तो उसका मुख्य कार्य ‘विवादों का निपटारा’ प्रभावित होता है।
      • इससे भारतीय न्यायिक प्रणाली में 5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों की समस्या और गंभीर हो जाती है।

    संतुलन बनाए रखने के उपाय

    यह सुनिश्चित करने के लिये कि न्यायिक सक्रियता न्याय का साधन बनी रहे, न कि टकराव का कारण, कई सुधारात्मक उपाय आवश्यक हैं।

    • न्यायिक संयम का पालन: न्यायाधीशों को ‘आत्म-अनुशासन’ का पालन करना चाहिये और यह समझना चाहिये कि न्यायालय सभी सामाजिक समस्याओं का ‘सर्व-उपचार’ नहीं है।
    • ‘केवल आवश्यकता’ का सिद्धांत: हस्तक्षेप को केवल गंभीर संवैधानिक उल्लंघन या पूर्ण प्रशासनिक विफलता के मामलों तक सीमित रखना चाहिये, न कि सामान्य नीतिगत असहमतियों तक।
    • कार्यपालिका की जवाबदेही को सुदृढ़ करना: संसदीय निगरानी और स्वतंत्र नियामकों को मज़बूत करने से उस ‘रिक्तता’ को कम किया जा सकता है, जो न्यायपालिका के हस्तक्षेप की आवश्यकता उत्पन्न करती है।
    • संरचित PIL ढाँचा: निरर्थक या राजनीतिक रूप से प्रेरित जनहित याचिकाओं को छाँटने के लिये कड़े दिशा-निर्देश लागू करने से न्यायिक समय और ध्यान की गरिमा बनी रहेगी।
    • नियमित अंतर-संस्थागत संवाद: तीनों अंगों के बीच औपचारिक तथा अनौपचारिक संवाद को बढ़ावा देने से अधिकार-क्षेत्र संबंधी टकराव कम होंगे और नीतिगत उद्देश्यों को स्पष्ट किया जा सकेगा।

    निष्कर्ष:

    भारतीय न्यायपालिका को राष्ट्र के ‘अंतरात्मा के संरक्षक’ की अपनी भूमिका और संवैधानिक मर्यादा के सिद्धांत के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिये। यद्यपि अराजकता या अन्याय को रोकने के लिये कार्यपालिका की रिक्तता को भरना आवश्यक है, फिर भी न्यायपालिका को अपनी संस्थागत वैधता बनाए रखने हेतु ‘नीतिगत जटिलताओं (Thicket of Policy)’ से दूर रहना चाहिये। अंततः शक्तियों के पृथक्करण का सामंजस्यपूर्ण समन्वय भारतीय गणराज्य की कार्यात्मक परिपक्वता हेतु अत्यंत आवश्यक है।

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