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प्रश्न :
प्रश्न: संसदीय निगरानी लोकतांत्रिक जवाबदेही का एक केंद्रीय तत्त्व है, किंतु समय के साथ इसकी प्रभावशीलता कमज़ोर हुई है। इसके कारणों पर चर्चा कीजिये तथा विधायी निगरानी को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)
10 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्थाउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- जवाबदेही बनाए रखने में संसद की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
- मुख्य भाग में संसदीय निरीक्षण के साधनों का विस्तार से विवरण दीजिये।
- निरीक्षण के कमज़ोर होने के कारणों की व्याख्या कीजिये।
- विधायी जाँच को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
संसदीय निगरानी प्रतिनिधि लोकतंत्र में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह सुनिश्चित करती है कि कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह बनी रहे।
- भारत में इस सिद्धांत को संवैधानिक रूप से अनुच्छेद 75(3) में संहिताबद्ध किया गया है, जो मंत्रिपरिषद की लोकसभा के प्रति सामूहिक ज़िम्मेदारी को अनिवार्य बनाता है।
- हालाँकि, हाल के रुझान इन जवाबदेही तंत्रों के ‘खोखले होने’ की ओर संकेत करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप संसद एक विमर्शात्मक संस्था के बजाय तर्कतः सरकार के निर्णयों की सूचना-पट्टिका (नोटिस बोर्ड) में परिवर्तित होती जा रही है।
मुख्य भाग:
संसदीय निगरानी के उपकरण
संसद शासन के विभिन्न चरणों में कार्यपालिका की निगरानी और समीक्षा के लिये अनेक उपकरणों का उपयोग करती है:
निगरानी का प्रकार
प्रमुख उपकरण
कार्य
विधायी
समितियाँ (DRSC – विभाग-संबंधी स्थायी समितियाँ):
विधेयकों की गहन जाँच, जो राजनीतिक दबावों से मुक्त और तथ्यों पर आधारित हो।
कार्यपालिका/प्रशासनिक
प्रश्नकाल
दैनिक प्रशासन और नीति कार्यान्वयन से जुड़े मुद्दों पर मंत्रियों से प्रत्यक्ष प्रश्न पूछना।
वित्तीय
लोक लेखा समिति (PAC)
सरकारी व्यय का लेखा-परीक्षण (घटनाओं के बाद का विश्लेषण/पोस्ट-मॉर्टम एनालिसिस)।
कटौती प्रस्ताव
नीतियों के प्रति असहमति व्यक्त करने के लिये विशिष्ट अनुदानों का विरोध।
राजनीतिक
अविश्वास प्रस्ताव
बहुमत समर्थन खो चुकी सरकार को पद से हटाने का अंतिम और सबसे प्रभावी साधन।
स्थगन प्रस्ताव
जनहित के तात्कालिक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार की निंदा करना।
निगरानी के कमज़ोर होने के कारण
- संसदीय कार्य दिवसों की संख्या में निरंतर कमी: 17वीं लोकसभा में संसद के औसत वार्षिक बैठक-दिन घटकर 55 रह गए हैं, जबकि पहली लोकसभा में यह संख्या 135 थी। इसके विपरीत ब्रिटेन की हाउस ऑफ कॉमन्स लगभग 150 दिनों तक बैठती है।
- इससे महत्त्वपूर्ण नीतियों और विधेयकों पर व्यापक एवं गहन बहस के लिये पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
- संसदीय समितियों को दरकिनार करना: विभाग-संबंधी स्थायी समितियाँ (DRSCs) विधायी जाँच का प्रमुख माध्यम हैं। किंतु इन समितियों को भेजे जाने वाले विधेयकों के प्रतिशत में तीव्र गिरावट आई है।
- 17वीं लोकसभा में केवल 16% विधेयकों को संसदीय जाँच हेतु स्थायी समितियों के पास भेजा गया।
- ‘मनी बिल’ का दुरुपयोग: कुछ विवादास्पद विधेयकों को कभी-कभी मनी बिल (अनुच्छेद 110) के रूप में पारित किया गया, जिससे राज्यसभा की समीक्षा से बचा जा सके। इससे द्विसदनीय निगरानी तंत्र कमज़ोर होता है।
- दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची): यद्यपि इसका उद्देश्य राजनीतिक दलबदल पर रोक लगाना था, लेकिन इसने दल के भीतर असहमति को दबा दिया है। सांसद सामान्य विधेयकों पर भी पार्टी व्हिप से बंधे रहते हैं, जिससे उनकी भूमिका केवल संख्या-गणना तक सीमित हो जाती है और सरकार से प्रश्न पूछने की उनकी व्यक्तिगत क्षमता क्षीण हो जाती है।
- बार-बार होने वाले व्यवधान और ‘गिलोटिन’ प्रक्रिया: विपक्ष द्वारा बढ़ते व्यवधानों के कारण कई बार पूरे सत्र बाधित हो जाते हैं।
- परिणामस्वरूप, सरकार ‘गिलोटिन’ प्रक्रिया का सहारा लेकर बजट और महत्त्वपूर्ण विधेयकों को बिना चर्चा के पारित कर देती है।
- उदाहरण के लिये, लोकसभा ने वर्ष 2023–24 का लगभग 45 लाख करोड़ रुपये का बजट बिना बहस के पारित किया, जिससे ‘वित्तीय नियंत्रण’ (Power of the Purse) मात्र औपचारिकता बनकर रह गया।
- परिणामस्वरूप, सरकार ‘गिलोटिन’ प्रक्रिया का सहारा लेकर बजट और महत्त्वपूर्ण विधेयकों को बिना चर्चा के पारित कर देती है।
- अध्यादेशों पर अत्यधिक निर्भरता: अध्यादेश जारी करने की शक्ति (अनुच्छेद 123) का बार-बार प्रयोग नियमित विधायी प्रक्रिया को दरकिनार करता है और संसद को पूर्व जाँच के अवसर के बजाय एक पहले से तय तथ्य के रूप में प्रस्तुत करता है।
विधायी जाँच को सुदृढ़ करने के उपाय
- DRSC को अनिवार्य रूप से संदर्भित करना: संसद के नियमों में संशोधन कर सभी प्रमुख विधायी विधेयकों को अनिवार्य रूप से विभाग-संबंधी स्थायी समितियों (DRSC) के पास भेजने का प्रावधान किया जाना चाहिये। केवल अत्यंत गंभीर राष्ट्रीय आपात स्थितियों में ही इससे अपवाद की अनुमति दी जाए।
- संसदीय सत्रों के लिये न्यूनतम कार्य दिवसों का अनिवार्य निर्धारण: संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) ने लोकसभा के लिये न्यूनतम 120 और राज्यसभा के लिये 100 बैठक-दिनों की सिफारिश की है।
- एक निश्चित संसदीय कैलेंडर को संस्थागत रूप देने से निगरानी के लिये पर्याप्त समय सुनिश्चित किया जा सकता है।
- दलबदल विरोधी कानून में संशोधन: इस कानून को केवल सरकार के अस्तित्व से जुड़े मतों (जैसे—अविश्वास प्रस्ताव या मनी बिल) तक सीमित किया जाना चाहिये।
- अन्य सभी विधेयकों पर सांसदों को अपने विवेक और अपने निर्वाचन क्षेत्र के हितों के अनुसार मतदान करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिये।
- पूर्व-विधायी जाँच को संस्थागत बनाना: वर्ष 2014 की पूर्व-विधायी परामर्श नीति (PLCP) को सख्ती से लागू किया जाना चाहिये। संसद में पेश किये जाने से पहले मसौदा विधेयकों को कम-से-कम 30 दिनों के लिये सार्वजनिक डोमेन में रखा जाए, ताकि जनता और विशेषज्ञों से सुझाव प्राप्त किये जा सकें।
- विपक्ष की भूमिका को सशक्त बनाना: विपक्ष को कार्यसूची तय करने के लिये विशेष दिन समर्पित करने जैसी सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाया जा सकता है, ताकि कार्यपालिका से कठोर और प्रभावी प्रश्न पूछे जा सकें।
- राज्यसभा को सशक्त करना: किसी विधेयक को मनी बिल घोषित करने में अध्यक्ष की शक्ति को लेकर स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ दिशानिर्देश और न्यायिक निगरानी स्थापित की जानी चाहिये, ताकि उच्च सदन को अनुचित रूप से दरकिनार न किया जा सके।
निष्कर्ष
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने ‘दैनिक मूल्यांकन’ (संसदीय निरीक्षण) और ‘आवधिक मूल्यांकन’ (चुनाव) के बीच अंतर स्पष्ट किया था। जहाँ भारत ने दूसरे (चुनाव) में महारत हासिल कर ली है, वहीं पहला (संसदीय निरीक्षण) वर्तमान में संकट के दौर से गुजर रहा है। निरीक्षण को मज़बूत करने का उद्देश्य सरकार के कार्य में बाधा डालना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि नीतियाँ मज़बूत, आम सहमति पर आधारित और संवैधानिक रूप से सुदृढ़ हों। एक ‘मज़बूत सरकार’ को लोकतांत्रिक बने रहने के लिये एक ‘मज़बूत संसद’ की आवश्यकता होती है।
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