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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: भारत में राष्ट्रवाद का विकास समान राजनीतिक चेतना के बजाय सामाजिक विभेदीकरण द्वारा निर्धारित था। विवेचना कीजिये। (250 शब्द)

    02 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान राष्ट्रवाद के विकास को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह तर्क प्रस्तुत कीजिये कि यह सामाजिक विभेदीकरण से किस प्रकार प्रभावित था।
    • इस पर विस्तार से चर्चा कीजिये कि प्रारंभ में समान राजनीतिक चेतना का अभाव था, किंतु महात्मा गांधी के नेतृत्व में इसका व्यापक विकास हुआ।
    • यह भी स्पष्ट कीजिये कि एकरूप राजनीतिक चेतना ने किस प्रकार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय 

    राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रवाद किसी एकसमान और एकरूप राजनीतिक चेतना के रूप में नहीं उभरा, बल्कि यह भारत की विविध सामाजिक संरचना से आकार लेने वाली एक बहुस्तरीय तथा निरंतर विकसित होती हुई प्रक्रिया थी।

    • औपनिवेशिक नीतियों, आर्थिक शोषण एवं आधुनिक विचारों ने इसे एक साझा ढाँचा प्रदान किया, किंतु विभिन्न सामाजिक वर्गों ने राष्ट्रवाद को अलग-अलग रूपों में अनुभव किया और अभिव्यक्त किया।
    • इस प्रकार इसका विकास सामाजिक विभेदीकरण से गहराई से प्रभावित रहा, जबकि धीरे-धीरे यह एक व्यापक राष्ट्रीय चेतना में परिवर्तित होता गया।

    मुख्य भाग: 

    सामाजिक विभेदीकरण से प्रभावित राष्ट्रवाद

    • जाति और सामाजिक पदानुक्रम: विभिन्न जाति समूहों ने अपने ऐतिहासिक बहिष्करण या विशेषाधिकार के अनुभवों के आधार पर राष्ट्रवाद से जुड़ाव स्थापित किया।
      • प्रारंभ में उच्च जाति के अभिजात वर्ग नेतृत्व में प्रमुख थे, जबकि निम्न जातियों ने राष्ट्रवाद को सामाजिक मुक्ति के साधन के रूप में देखा।
      • उदाहरण के लिये, बी.आर. आंबेडकर ने दलितों के लिये संवैधानिक संरक्षण का समर्थन किया और प्राय: कांग्रेस-नेतृत्व वाले राष्ट्रवाद की आलोचना की कि वह जाति उत्पीड़न की अनदेखी करता है।
    • वर्ग और आर्थिक हित: किसान, श्रमिक और पूंजीपति अपने-अपने भौतिक हितों के माध्यम से राष्ट्रवाद से जुड़े। राष्ट्रवाद प्रायः किसी एकीकृत राजनीतिक विचारधारा के बजाय वर्ग-विशिष्ट शिकायतों को प्रतिबिंबित करता था।
      • उदाहरण के लिये, चंपारण सत्याग्रह (1917) जैसे किसान आंदोलनों के माध्यम से औपनिवेशिक शासन के विरोध को कृषि शोषण की समस्याओं से संबद्ध किया गया।
    • क्षेत्रीय और भाषायी विविधता: औपनिवेशिक नीतियों तथा स्थानीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रवादी लामबंदी भिन्न-भिन्न रही।
      • उदाहरण के लिये, बंगाल का स्वदेशी आंदोलन ग्रामीण उत्तर भारत में हुए जन आंदोलनों से काफी अलग था, जो क्षेत्रीय सामाजिक विभेदीकरण को दर्शाता है।
    • धार्मिक और सांप्रदायिक पहचानें: धार्मिक पहचानों ने राजनीतिक लामबंदी और राष्ट्रवाद की धारणाओं को आकार दिया। यद्यपि राष्ट्रवाद का उद्देश्य एकता था, फिर भी यह अक्सर सांप्रदायिक चिंताओं से जुड़ जाता था।
      • उदाहरण के लिये, मुस्लिम लीग द्वारा सुरक्षा उपायों की मांग हिंदू-बहुल राष्ट्रवादी ढाँचे के भीतर अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व को लेकर व्याप्त आशंकाओं को दर्शाती थी।
    • लैंगिक और पितृसत्तात्मक संरचनाएँ: महिलाओं की भागीदारी प्रचलित लैंगिक मानदंडों से प्रभावित थी, जिससे उनकी राजनीतिक भूमिकाएँ सीमित रहीं, जबकि प्रतीकात्मक रूप से उन्हें राष्ट्र की कल्पना में शामिल किया गया।
      • सरोजिनी नायडू जैसी महिलाओं ने सक्रिय सहभागिता की, किंतु राष्ट्रवादी विमर्श में व्यापक लैंगिक समानता हाशिये पर ही रही।

    यद्यपि शुरुआत में समान राजनीतिक चेतना का अभाव था, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की विशेषता इन विविधताओं को स्वीकार करने और उन्हें एक साझा धारा में समाहित करने में निहित थी।

    • गांधीवादी समन्वय: गांधीजी ने सामाजिक भेदभावों को नकारा नहीं। इसके बजाय, उन्होंने विभिन्न समूहों की विशिष्ट शिकायतों को 'स्वराज' के व्यापक लक्ष्य के साथ जोड़ दिया।
      • किसानों के लिये: स्वराज का अर्थ राम-राज्य और करों से मुक्ति था।
      • पूंजीपतियों के लिये: स्वराज का अर्थ वित्तीय स्वायत्तता था।
      • दलितों के लिये: स्वराज का अर्थ अस्पृश्यता का अंत था।

    अतः यह कहना अत्यधिक सरलीकरण होगा कि राष्ट्रवाद केवल खंडित सामाजिक हितों की उपज था। वास्तव में एक समान राजनीतिक चेतना भी विकसित हुई, जिसने इन विविध समूहों को एक साथ बाँधने वाली ‘संयोजक शक्ति’ के रूप में कार्य किया। यह साझा राजनीतिक चेतना कई परस्पर अतिव्यापी प्रक्रियाओं के माध्यम से आकार ग्रहण करती गई, जिन्होंने सामाजिक और वर्गीय विभाजनों से ऊपर उठने में सहायता की।

    • साझी औपनिवेशिक-विरोधी चेतना: सामाजिक भिन्नताओं के बावजूद औपनिवेशिक शासन का विरोध एक एकीकृत वैचारिक आधार प्रदान करता था।
      • असहयोग आंदोलन (1920–22) जैसे आंदोलनों ने स्वराज के साझा लक्ष्य के इर्द-गिर्द विभिन्न समूहों को संगठित किया।
    • राष्ट्रीय संस्थाओं का विकास: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी संस्थाओं ने सामाजिक विभाजनों के पार संवाद के मंच तैयार किये।
      • उदाहरण के लिये, कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता का प्रतिनिधित्व बढ़ता गया।
    • सांस्कृतिक प्रतीक और साझा कल्पनाएँ: राष्ट्रवाद ने एकता को बढ़ावा देने के लिये समान सांस्कृतिक प्रतीकों, मिथकों और ऐतिहासिक आख्यानों का सहारा लिया।
      • भारत माता भाषायी और क्षेत्रीय सीमाओं के पार एक एकीकृत प्रतीक के रूप में उभरीं।
    • जन-राजनीति का विस्तार: जन आंदोलनों के आगमन के साथ राष्ट्रवाद अधिक समावेशी और सहभागितापूर्ण होता गया।
      • सविनय अवज्ञा आंदोलन में शहरी अभिजात वर्ग, किसान और व्यापारी सभी की भागीदारी देखने को मिली।

    निष्कर्ष

    भारतीय राष्ट्रवाद गहरे सामाजिक विभेदीकरण से आकार ग्रहण करता हुआ विकसित हुआ, जो किसी एकरूप राजनीतिक चेतना के बजाय भारतीय समाज की बहुलता को प्रतिबिंबित करता था। फिर भी साझा औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष, समावेशी नेतृत्व और जन-आंदोलनों के माध्यम से उसने इन विभाजनों को पार भी किया। इसकी शक्ति एक साझा राष्ट्रीय ढाँचे के भीतर विविधताओं को समाहित करने में निहित थी, जिसने इसे जटिल होने के साथ-साथ सुदृढ़ भी बनाया।

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