दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    सुश्री लीना चटर्जी वर्तमान में एक ऐसे राज्य में प्रमुख सचिव (शहरी विकास) के रूप में कार्यरत हैं, जिसने महत्त्वाकांक्षी जलवायु-अनुकूल आधारभूत संरचना लक्ष्यों के लिये प्रतिबद्धता व्यक्त की है। एक महत्त्वपूर्ण मेट्रो रेल विस्तार परियोजना, जिसे आंशिक रूप से एक अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी ने वित्तीय सहायता प्रदान की है, अब उन्नत चरण में पहुँच चुकी है।

    एक आंतरिक ऑडिट में यह संकेत मिला है कि यद्यपि परियोजना वर्तमान पर्यावरणीय मंज़ूरी के अनुरूप है, यह हाल ही में जारी किये गए जलवायु-अनुकूलन दिशा-निर्देशों के मानदंडों को पूरा नहीं करती, जो अतिरिक्त बाढ़-रोधी उपायों की सिफारिश करते हैं। इन उपायों को शामिल करने से लागत में महत्त्वपूर्ण वृद्धि होगी और परियोजना की पूर्णता कम से कम एक वर्ष विलंबित हो जाएगी। वित्तपोषण एजेंसी ने अनौपचारिक रूप से संकेत दिया है कि निरंतर वित्तपोषण समय पर कार्य पूरा करने पर निर्भर करता है, न कि पूर्व निर्धारित समय से किये गए अनुपालन पर।

    साथ ही, जलवायु वैज्ञानिकों और नागरिक समाज समूहों ने चेतावनी दी है कि अद्यतन मानकों की अनदेखी भावी यात्रियों को गंभीर जोखिम में डाल सकती है। राजनीतिक नेतृत्व परियोजना का उद्घाटन आगामी चुनाव चक्र से पहले करने की आवश्यकता पर बल देता है, वहीं वरिष्ठ अधिकारी चेतावनी देते हैं कि अनुमोदन प्रक्रिया को पुनः खोलने से मुकदमेबाजी और प्रशासनिक ठहराव उत्पन्न हो सकता है।

    प्रश्न
    इस मामले में कौन-कौन से नैतिक मुद्दे शामिल हैं?
    सुश्री चटर्जी के पास कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक के लाभ और हानि का आकलन कीजिये।
    सार्वजनिक हित, सततता और प्रशासनिक ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने के लिये सुश्री चटर्जी को कौन-सा कार्यवाही मार्ग अपनाना चाहिये? न्यायसंगत उत्तर दीजिये।

    31 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़

    उत्तर :

    संबद्ध हितधारक

    • सुश्री लीना चटर्जी प्रमुख सचिव (शहरी विकास): वह प्रमुख निर्णयकर्त्ता हैं, जिनकी ज़िम्मेदारी विकास लक्ष्यों, नैतिक शासन, सततता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करने की है।
    • शहरी यात्री और भावी नागरिक: मेट्रो के दैनिक उपयोगकर्त्ता, जिन्हें यदि जलवायु-अनुकूल उपायों की अनदेखी की गई तो भविष्य में सुरक्षा जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।
    • बाढ़-प्रवण क्षेत्रों के निवासी: संवेदनशील समुदाय, जो अवसंरचना में पर्याप्त बाढ़-अनुकूलन न होने पर असमान रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
    • जलवायु वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ: साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण और दीर्घकालिक जलवायु-सहनशीलता का समर्थन करने वाले विशेषज्ञ।
    • नागरिक समाज संगठन (CSOs): सार्वजनिक हित, पर्यावरणीय न्याय और अंतर-पीढ़ीगत समानता का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह।
    • राजनीतिक कार्यपालिका और निर्वाचित प्रतिनिधि: चुनावों से पहले समय पर परियोजना पूर्ण होने और राजनीतिक दृश्यता पर केंद्रित।
    • वरिष्ठ नौकरशाह और कार्यान्वयन एजेंसियाँ: प्रक्रियात्मक विलंब, मुकदमेबाज़ी और प्रशासनिक व्यवहार्यता को लेकर चिंतित।
    • अंतर्राष्ट्रीय विकास वित्तपोषण एजेंसी: परियोजना की समय-सीमा और लागत-अनुशासन को प्राथमिकता देने वाला वित्तीय हितधारक।
    • करदाता और राज्य कोष: लागत बढ़ने या भविष्य की आपदा-संबंधी क्षति का वित्तीय भार वहन करने वाले।

    1:  इस मामले में कौन-कौन से नैतिक मुद्दे शामिल हैं?

    मामले में निहित नैतिक मुद्दे

    • सार्वजनिक सुरक्षा बनाम प्रशासनिक सुविधा: इस मामले के केंद्र में जनजीवन की रक्षा करने की नैतिक ज़िम्मेदारी है। 
      • यद्यपि परियोजना मौजूदा स्वीकृतियों को पूरा करती है, फिर भी अद्यतन जलवायु-अनुकूलन मानकों की अनदेखी करना यात्रियों को गंभीर जोखिम में डाल सकता है। 
      • नैतिक शासन की मांग है कि प्रक्रियात्मक सुविधा या समय-सीमा से ऊपर मानव सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।
    • अल्पकालिक राजनीतिक लाभ बनाम दीर्घकालिक सार्वजनिक हित: राजनीतिक कार्यपालिका चुनावों से पहले उद्घाटन पर केंद्रित है, जो अल्पदृष्टि को दर्शाता है। 
      • इसके विपरीत, नैतिक प्रशासन विशेषकर जलवायु-संवेदनशील अवसंरचना में दीर्घकालिक दृष्टि, सततता और सहनशीलता की अपेक्षा करता है।
    • कानूनी अनुपालन बनाम नैतिक दायित्व: यद्यपि परियोजना कानूनी रूप से अनुरूप है, परंतु नैतिकता केवल वैधता तक सीमित नहीं होती।
      • यह नैतिक साहस का प्रश्न उठाता है कि क्या एक लोक सेवक को केवल नियमों का पालन करने वाला होना चाहिये या सार्वजनिक कल्याण के एक न्यासी के रूप में कार्य करना चाहिये।
    • अंतर-पीढ़ीगत समानता: अद्यतन जलवायु मानकों की अनदेखी भावी पीढ़ियों पर जोखिम और लागत स्थानांतरित कर देती है। यह अंतर-पीढ़ीगत न्याय के नैतिक सिद्धांत का उल्लंघन है, जो सतत विकास का एक प्रमुख स्तंभ है।
    • अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के प्रति जवाबदेही: राज्य ने जलवायु-अनुकूल अवसंरचना के लिये प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
      • नीति-घोषणाओं और प्रशासनिक कार्यवाही के बीच नैतिक असंगति शासन में विश्वसनीयता तथा सत्यनिष्‍ठा को कमज़ोर करती है।
    • दबाव बनाम पेशेवर निष्ठा: सुश्री चटर्जी पर राजनीतिक नेतृत्व और वित्तपोषण एजेंसियों का दबाव है। ऐसे दबाव के आगे झुकना नौकरशाही की तटस्थता, सत्यनिष्‍ठा और स्वतंत्रता से समझौता कर सकता है।
    • नज़ीर स्थापित होने का जोखिम: बिना अनुकूलन के आगे बढ़ना अद्यतन मानकों को दरकिनार करने की प्रवृत्ति को सामान्य बना सकता है, जिससे भविष्य की परियोजनाओं के लिये नैतिक संकट उत्पन्न हो सकता है।

    प्रश्न 2: सुश्री चटर्जी के पास कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक के लाभ और हानि का आकलन कीजिये।

    सुश्री चटर्जी के लिये उपलब्ध विकल्प

    • विकल्प 1: परियोजना को योजना के अनुसार आगे बढ़ाना (नई दिशानिर्देशों की अनदेखी करना)
    • लाभ
      • समय पर पूर्णता सुनिश्चित होती है और वित्तपोषण वापसी से बचाव होता है
      • मुकदमेबाज़ी और नौकरशाही विलंब से बचाता है
      • राजनीतिक अपेक्षाओं और प्रशासनिक निरंतरता के अनुरूप है 
    • हानियाँ
      • सार्वजनिक सुरक्षा और जलवायु-सहनशीलता से समझौता
      • सावधानी और सततता के सिद्धांतों का उल्लंघन
      • नैतिक नेतृत्व और जनविश्वास को कमज़ोर करता है
      • भविष्य की आपदा-संबंधी क्षति और प्रतिष्ठा हानि का जोखिम
    • नैतिक मूल्यांकन: कानूनी रूप से बचाव योग्य, पर नैतिक रूप से कमज़ोर।

    विकल्प 2: नए जलवायु-अनुकूलन उपायों को पूरी तरह अपनाना

    • लाभ
      • सुरक्षा, सततता और वैज्ञानिक साक्ष्यों को प्राथमिकता देना 
      • अंतर-पीढ़ीगत समानता और सावधानी के सिद्धांत को बनाए रखता है
      • नैतिक साहस और नैतिक नेतृत्व का प्रदर्शन करता है 
    • हानियाँ
      • लागत में उल्लेखनीय वृद्धि और विलंब
      • वित्तपोषण वापस लिये जाने का जोखिम
      • संभावित मुकदमेबाज़ी और प्रशासनिक अकर्मण्यता
    • नैतिक मूल्यांकन: नैतिक रूप से आदर्श, किंतु यदि अचानक किया जाए तो प्रशासनिक दृष्टि से जोखिमपूर्ण।

    विकल्प 3: मध्य मार्ग अपनाना (चरणबद्ध या चयनात्मक अनुकूलन)

    • लाभ
      •  सततता और व्यवहार्यता के बीच संतुलन
      • महत्त्वपूर्ण बाढ़-अनुकूलन विशेषताओं को तुरंत लागू करता है
      • विलंब और लागत वृद्धि को न्यूनतम करता है
      • व्यावहारिक विवेक (फ्रोनेसिस) का प्रदर्शन
    • हानियाँ
      • आंशिक अनुपालन के लिये आलोचना का सामना
      • सावधानीपूर्वक तकनीकी प्राथमिकता निर्धारण की आवश्यकता
    • नैतिक मूल्यांकन: संतुलित और व्यावहारिक, नैतिकता को प्रशासनिक यथार्थ से जोड़ता है।

    विकल्प 4: पूर्ण पारदर्शिता के साथ मामला उच्च स्तर पर उठाना

    • लाभ
      • सामूहिक निर्णय-निर्माण सुनिश्चित करता है
      • सुश्री चटर्जी को एकपक्षीय दोषारोपण से संरक्षण
      • पारदर्शिता और जवाबदेही को सुदृढ़ करता है
    • हानियाँ
      • समय-साध्य
      • राजनीतिकरण का जोखिम
    • नैतिक मूल्यांकन: संस्थागत दृष्टि से सुदृढ़, किंतु सहायक कार्रवाई के साथ अपनाना आवश्यक।

    निष्कर्ष: सुश्री चटर्जी को विकल्प 3 और विकल्प 4 को मिलाकर एक संतुलित, नैतिक रूप से औचित्यपूर्ण और प्रशासनिक रूप से विवेकपूर्ण मार्ग अपनाना चाहिये।


    3:  सार्वजनिक हित, सततता और प्रशासनिक ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने के लिये सुश्री चटर्जी को कौन-सा कार्यवाही मार्ग अपनाना चाहिये?  न्यायसंगत उत्तर दीजिये।

    • वांछित कार्यवाही का मार्ग: पारदर्शी रूप से मामला उच्च स्तर तक उठाते हुए चरणबद्ध जलवायु-अनुकूलन

    कदम:

    • महत्त्वपूर्ण अनुकूलन उपायों को प्राथमिकता देना: यात्रियों के लिये सर्वाधिक जोखिम कम करने वाली आवश्यक जलवायु-सहनशील विशेषताओं जैसे बाढ़-रोधी अवरोध या जलनिकासी सुधार की पहचान करें और पूर्ण पुनर्रचना की प्रतीक्षा किये बिना इन्हें तुरंत लागू करें।
    • चरणबद्ध उन्नयन: शेष अनुकूलन उपायों को चरणों में लागू करने की योजना बनाना, ताकि लागत वृद्धि सीमित रहे और बड़े विलंब से बचा जा सके, साथ ही दीर्घकालिक सततता से समझौता न हो।
    • पारदर्शी संवाद: राजनीतिक नेतृत्व, वित्तपोषण एजेंसी और संबंधित तकनीकी समितियों के समक्ष स्पष्ट लागत-लाभ तथा जोखिम विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए विषय को आगे बढ़ाएँ। प्रशासनिक जवाबदेही की रक्षा के लिये विस्तृत दस्तावेज़ीकरण बनाए रखें।
    • हितधारकों की सहभागिता: नागरिक समाज, जलवायु विशेषज्ञों और समुदाय प्रतिनिधियों को शामिल कर प्राथमिकताओं की पुष्टि करें, सहमति विकसित करें तथा लोक-विश्वास को मज़बूत करना।
    • निगरानी और आकस्मिक योजना: चरणबद्ध उपायों के क्रियान्वयन पर नज़र रखने के लिये निगरानी तंत्र स्थापित करें तथा संभावित जलवायु-संबंधी जोखिमों के लिये आकस्मिक योजनाएँ तैयार करना।

    तर्कसंगत औचित्य

    • जनहित की प्राथमिकता: सार्वजनिक सुरक्षा और सहनशीलता से समझौता नहीं किया जा सकता। महत्त्वपूर्ण बाढ़-अनुकूलन उपायों को चयनात्मक रूप से शामिल करने से जोखिम कम होता है और परियोजना की गति बाधित नहीं होती।
    • ज़िम्मेदारी की नैतिकता (मैक्स वेबर): यहाँ नैतिक मूल्यों और व्यावहारिक यथार्थ का संतुलन दिखता है, जहाँ कट्टर नैतिकता के लिये कोई स्थान नहीं है, फिर भी तात्कालिक लाभ के प्रलोभन में नैतिक गरिमा का त्याग नहीं किया गया है।
    • बिना जड़ता के सततता: चरणबद्ध दृष्टिकोण प्रशासनिक जड़ता को रोकता है और अवसंरचना को बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप बनाता है।
    • संस्थागत जवाबदेही: राजनीतिक नेतृत्व और वित्तपोषण एजेंसियों के समक्ष तथ्यों को पारदर्शी रूप से प्रस्तुत करके, सुश्री चटर्जी प्रक्रियात्मक सत्यनिष्‍ठा तथा साझा ज़िम्मेदारी को बनाए रखती हैं।
    • संवैधानिक मूल्यों के साथ संगति: यह दृष्टिकोण अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार), सार्वजनिक विश्वास सिद्धांत और सावधानी के सिद्धांत को दर्शाता है।
    • सही नज़ीर स्थापित करना: यह संकेत करता है कि जलवायु अनुकूलन कोई विकल्प नहीं है तथा  इसमें केवल ढाँचे या रूप में अनुकूलन हो सकता है, पर मूल भावना में नहीं।

    निष्कर्ष

    सुश्री चटर्जी को केवल एक प्रशासक के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक कल्याण और भावी पीढ़ियों के संरक्षक के रूप में कार्य करना चाहिये। चरणबद्ध, पारदर्शी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर वह विकास लक्ष्यों को नैतिक शासन, सततता तथा लोकतांत्रिक जवाबदेही के साथ सामंजस्यपूर्ण बना सकती हैं, जिससे लोक सेवा की सच्ची भावना का प्रतिनिधित्व होता है।

    To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

    Print
close
Share Page
images-2
images-2