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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: भारतीय मंदिर वास्तुकला एक साझा सभ्यतागत ढाँचे के अंतर्गत क्षेत्रीय विविधता को दर्शाती है। नागर, द्रविड़ और वेसर शैलियों के उपयुक्त उदाहरणों के साथ चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    19 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 संस्कृति

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत मंदिर वास्तुकला में क्षेत्रीय विविधता को उजागर करके कीजिये।
    • मुख्य भाग में, इन वास्तुकलाओं की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिये।
    • इसके बाद यह तर्क प्रस्तुत कीजिये कि ये क्षेत्रीय विविधताएँ व्यापक रूप से एक साझा सभ्यतागत ढाँचे के अंतर्गत आती हैं।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय 

    भारतीय मंदिर वास्तुकला में अद्भुत क्षेत्रीय विविधता देखने को मिलती है, जो भौगोलिक स्थिति, निर्माण सामग्री, राजवंशीय संरक्षण और स्थानीय सौंदर्यशास्त्र से आकार लेती है, फिर भी इसका आधार एक साझा पवित्र दृष्टिकोण में निहित रहता है।

    • उदाहरण के लिये, मध्य भारत के खजुराहो के वक्राकार शिखर, मदुरै के विशाल गोपुरम के साथ तीव्र विरोधाभास उत्पन्न करते हैं; फिर भी दोनों ही 'दिव्यता को स्थापित करने' के एक ही सभ्यतागत उद्देश्य की पूर्ति करते हैं।

    मुख्य भाग: 

    नागर, द्रविड़ और वेसर शैलियों की प्रमुख विशेषताएँ

    • नागर शैली (उत्तरी भारत)
      • वक्राकार शिखर: नागर मंदिरों की सबसे विशिष्ट विशेषता है वक्राकार शिखर, जो गर्भगृह के सीधे ऊपर उठता है और माउंट मेरु का प्रतीक है।
        • उदाहरण: खजुराहो का कंदरिया महादेव मंदिर, जिसमें समूहबद्ध ऊँचे शिखर हैं।
      • पंचायतना योजना: कई नागर मंदिर पंचायतन योजना का पालन करते हैं, जिसमें केंद्रीय मंदिर के चारों ओर चार उप-मंदिर होते हैं।
        • उदाहरण: खजुराहो का लक्ष्मण मंदिर।
      • सीमित प्राचीर दीवार: नागर मंदिरों में आमतौर पर विशाल प्राचीर दीवारें नहीं होतीं, जिससे गर्भगृह और ऊर्ध्वाधर संरचना को प्रमुखता मिलती है।
        • उदाहरण: गुजरात का मोढेरा सूर्य मंदिर।
      • समृद्ध शिल्प अलंकरण: दीवारों पर देवताओं, दैवीय प्राणियों और सामाजिक एवं धार्मिक जीवन को दर्शाने वाले कथा-पट्टों की भरपूर नक्काशी होती है।
        • उदाहरण: खजुराहो मंदिरों की कामुक और पौराणिक मूर्तियाँ।
    • द्रविड़ शैली (दक्षिण भारत)
      • पिरामिडाकार विमान: द्रविड़ मंदिरों की विशेषता है गर्भगृह के ऊपर एक सीढ़ीनुमा, पिरामिडाकार विमान, जो नागर शैली के शिखर से स्पष्ट रूप से भिन्न है।
        • उदाहरण: तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर।
      • प्रमुख गोपुरम: मंदिर के प्रवेश द्वार पर ऊँचे गोपुरम मंदिर परिसर और क्षितिज पर प्रभुत्व रखते हैं, जो प्राय: विमान से भी ऊँचे होते हैं।
        • उदाहरण: मदुरै का मीनाक्षी अम्मन मंदिर।
      • परिवेष्टित मंदिर परिसर: द्रविड़ मंदिर कई प्राकर दीवारों के भीतर बने होते हैं, जो उनके सामाजिक और धार्मिक केंद्र के रूप में महत्त्व को दर्शाते हैं।
        • उदाहरण: श्रीरंगम का रंगनाथस्वामी मंदिर।
      • शहरी जीवन के साथ एकीकरण: ये मंदिर आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में स्थापित थे, जो बाज़ार, उत्सवों तथा शाही संरक्षण से जुड़े हुए थे।
        • उदाहरण: चोल समाज में मंदिर धार्मिक जीवन, आर्थिक गतिविधियों, राजनीतिक सत्ता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करते थे।
    • वेसर शैली (डेक्कन क्षेत्र)
      • नागर और द्रविड़ तत्त्वों का मिश्रण: वेसर वास्तुकला नागर की ऊर्ध्वाधरता को द्रविड़ शैली की ठोस संरचना के साथ मिलाती है।
        • उदाहरण: पत्तदकल का विरुपाक्ष मंदिर।
      • भूमि योजनाओं में नवाचार: मंदिर प्राय: अभिनव योजनाएँ प्रदर्शित करते हैं, जिनमें सिताराकार (स्टेलाट) योजना भी शामिल है।
        • उदाहरण: हलेबिड का होयसलेश्वर मंदिर।
      • जटिल शिल्प अलंकरण: वेसर मंदिरों में सघन और बारीक नक्काशी की विशेषता होती है, जो लगभग सभी सतहों को आच्छादित कर देती है।
        • उदाहरण: बेलूर के चेन्नाकेशव मंदिर।
      • स्थानीय सामग्री और तकनीकों का उपयोग: सोपस्टोन और लेथ-टर्न किये गए स्तंभों ने सजावटी सटीकता को बढ़ावा दिया।
        • उदाहरण: कर्नाटक के होयसल मंदिर।

    साझा सभ्यतागत ढाँचा

    • साझा पवित्र ज्यामिति और ब्रह्माण्ड विज्ञान: तीनों शैलियाँ वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों का पालन करती हैं, जिसमें अक्षीय संरेखण और प्रतीकात्मकता शामिल है।
      • उदाहरण: नागर, द्रविड़ और वेसर मंदिरों में गर्भगृह को ब्रह्मांडीय केंद्र के रूप में मान्यता दी गई है।
    • साझा धार्मिक प्रतिमाशास्त्र: शैलीगत भिन्नताओं के बावजूद, देवता, पौराणिक विषय और अनुष्ठान प्रथाएँ सभी में समान रहती हैं।
      • उदाहरण: खजुराहो, तंजावुर और पत्तदकल के शिव मंदिर।
    • मंदिर ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म रूप: मंदिर ब्रह्मांडीय क्रम का प्रतीक हैं, जो कला, खगोलशास्त्र और आध्यात्मिकता को एकीकृत करते हैं।
      • उदाहरण: मोढेरा और कोणार्क मंदिरों में सूर्य संरेखण।
    • अनुष्ठान और उद्देश्य की निरंतरता: क्षेत्रीय रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन पूजा, तीर्थयात्रा और सामुदायिक जीवन का आध्यात्मिक कार्य सभी में समान रहता है।

    निष्कर्ष:

    भारतीय मंदिर वास्तुकला विविधता में एकता का प्रतीक है, जहाँ नागर, द्रविड़ और वेसर शैलियाँ क्षेत्रीय पहचान व्यक्त करती हैं, फिर भी साझा सभ्यतागत दृष्टिकोण को विभाजित नहीं करतीं। ये मिलकर एक सतत वास्तुकला परंपरा को दर्शाती हैं, जो सामान्य आध्यात्मिक आदर्शों और सांस्कृतिक निरंतरता में निहित है।

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