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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. वर्साय की संधि तथा प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात हुए अन्य समझौतों ने दीर्घकालिक अस्थिरता के बीज बो दिये। विश्लेषण कीजिये कि सीमाओं के पुनर्संरचन (Boundary Reconfigurations) ने यूरोप में राजनीतिक और सामाजिक तनावों में किस प्रकार योगदान दिया। (250 शब्द)

    12 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत वर्साय की संधि तथा पेरिस शांति समझौतों का उल्लेख करते हुए कीजिये।
    • यूरोप में सीमाओं के पुनर्संरचन के परिणामस्वरूप उत्पन्न राजनीतिक और सामाजिक तनावों का विश्लेषण कीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    वर्साय की संधि (1919) और प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुए पेरिस शांति समझौतों ने जर्मन, ऑस्ट्रो-हंगेरियन, ओटोमन और रूसी साम्राज्यों के पतन के पश्चात यूरोप के राजनीतिक मानचित्र को पुनः रूपांकित किया।

    • यद्यपि ये समझौते आत्मनिर्णय के सिद्धांत से प्रेरित थे, परंतु सीमाओं का पुनर्गठन विजयी शक्तियों के रणनीतिक हितों और दंडात्मक उद्देश्यों से भी गहराई से प्रभावित था।
    • इसके परिणामस्वरूप कृत्रिम सीमाएँ, जातीय विखंडन और स्थायी असंतोष उत्पन्न हुआ, जिसने यूरोप में दीर्घकालिक राजनीतिक एवं सामाजिक अस्थिरता के बीज बो दिये।

    मुख्य भाग 

    सीमाओं के पुनर्गठन से उत्पन्न राजनीतिक तनाव

    • जातीय विखंडन के साथ कृत्रिम राज्यों का निर्माण: चेकोस्लोवाकिया, यूगोस्लाविया और पोलैंड जैसे नवगठित राज्यों में बड़ी जातीय अल्पसंख्यक आबादी शामिल थी।
      • उदाहरणस्वरूप, चेकोस्लोवाकिया में सुडेटन जर्मनों ने स्वयं को राजनीतिक सत्ता से वंचित महसूस किया।
      • इन आंतरिक विभाजनों ने राज्य की एकता को कमज़ोर किया और लोकतांत्रिक शासन को कठिन बना दिया।
    • संशोधनवादी और इर्रेडेंटिस्ट राजनीति का उदय: पराजित राज्यों को भारी क्षेत्रीय क्षति उठानी पड़ी। जर्मनी ने ऐल्सैस लोरेन खो दिया, जबकि ट्रायनॉन संधि के तहत हंगरी ने अपने लगभग दो-तिहाई क्षेत्र को खो दिया।
      • इन नुकसानों ने संशोधनवादी राष्ट्रवाद को जन्म दिया, जहाँ राजनीतिक नेताओं ने सीमाओं में परिवर्तन की मांग के लिये जन-असंतोष को भड़काया, जिससे यूरोपीय व्यवस्था अस्थिर हो गई।
    • कमज़ोर बफर राज्यों और रणनीतिक अस्थिरता: पूर्वी यूरोप में छोटे बफर राज्यों के निर्माण से राजनीतिक रूप से अस्थिर और सैन्य रूप से कमज़ोर देश अस्तित्व में आए।
      • मज़बूत गठबंधनों या आर्थिक आधार के अभाव में ये राज्य जर्मनी और सोवियत संघ के दबाव के प्रति संवेदनशील बन गए, जिससे सामूहिक सुरक्षा तंत्र कमज़ोर पड़ा।
    • अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता का क्षरण: राष्ट्र संघ के तहत अल्पसंख्यक संरक्षण संधियों के असमान और चयनित अनुप्रयोग से उसकी विश्वसनीयता को क्षति पहुँची।
      • कई राज्यों ने इन व्यवस्थाओं को बाह्य हस्तक्षेप के रूप में देखा, जिससे अंतर्राष्ट्रीय शासन और शांतिपूर्ण विवाद समाधान में विश्वास कमज़ोर हुआ।

    सीमा परिवर्तन से उत्पन्न सामाजिक तनाव

    • अल्पसंख्यकों का हाशियाकरण और पहचान संघर्ष: सीमाओं में परिवर्तन के कारण लाखों लोग रातोरात जातीय अल्पसंख्यक बन गए।
      • भाषा, शिक्षा तथा रोज़गार में भेदभाव बढ़ने से पहचान-आधारित संघर्ष तीव्र हुए, विशेषकर पूर्वी यूरोप में जर्मनों और ट्रांसिल्वेनिया में हंगेरियनों के बीच।
    • बलात प्रवासन और शरणार्थी संकट: पुनर्निर्धारित सीमाओं के चलते बड़े पैमाने पर जनसंख्या विस्थापन और शरणार्थी प्रवाह उत्पन्न हुआ।
      • इन अचानक हुए जनांकिकीय परिवर्तनों ने आवास, रोज़गार और कल्याण प्रणालियों पर दबाव डाला, जिससे सामाजिक अशांति बढ़ी।
    • अतिवादी राष्ट्रवाद और फासीवाद का उदय: सामाजिक असुरक्षा, अपमान और आर्थिक कठिनाइयों ने फासीवादी तथा अति-राष्ट्रवादी आंदोलनों के लिये अनुकूल वातावरण तैयार किया, विशेषकर जर्मनी एवं इटली में, जहाँ उन्होंने क्षेत्रीय संशोधन के माध्यम से राष्ट्रीय पुनरुत्थान का वादा किया।
    •  बहु-जातीय सह-अस्तित्व का विघटन: अनुकूल साम्राज्यवादी शासन से कठोर राष्ट्र-राज्यों में संक्रमण ने विविधता के प्रति सहिष्णुता को कम कर दिया।
      • बहु-जातीय सह-अस्तित्व का स्थान बहिष्करणकारी राष्ट्रवाद ने ले लिया, जिससे सामाजिक ध्रुवीकरण और गहरा हुआ।

    निष्कर्ष

    यूरोप में अंतरयुद्धकालीन अस्थिरता केवल दंडात्मक शांति शर्तों का परिणाम नहीं थी, बल्कि सामाजिक वास्तविकताओं और राजनीतिक व्यवहार्यता से कटे हुए सीमा-पुनर्गठन का भी प्रतिफल थी। जातीय विभाजनों को औपचारिक रूप देने, संशोधनवादी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करने तथा राज्य संस्थाओं को कमज़ोर करने के कारण प्रथम विश्व युद्धोत्तर समझौतों ने एक अस्थिर और नाज़ुक शांति स्थापित की। यह अनुभव दर्शाता है कि सतत स्थिरता आरोपित मानचित्रण समाधानों से नहीं, बल्कि समावेशी राजनीतिक व्यवस्थाओं और वैध सीमाओं से सुनिश्चित होती है।

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