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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. भारत में जनसंख्या वृद्धि अब एक समान राष्ट्रीय चुनौती नहीं रही, बल्कि यह एक क्षेत्र-विशिष्ट परिघटना बन चुकी है। विभिन्न राज्यों में विद्यमान जनांकिकीय विविधता तथा शासन एवं संघीय नीति-निर्माण पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    12 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाज

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत क्षेत्रीय विशिष्ट असमान विकास को उजागर करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में, राज्यों के बीच जनांकिकीय विविधता पर चर्चा कीजिये।
    • शासन के लिये जनांकिकीय विविधता के प्रभाव पर चर्चा कीजिये।
    • इसके बाद संघीय नीति-निर्माण पर इसके प्रभाव की चर्चा कीजिये।
    • कुछ उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 2.0 हो गई है, जिससे देश प्रभावी रूप से प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे आ गया है।

    हालाँकि, यह राष्ट्रीय औसत एक स्पष्ट ‘जनांकिकीय असमानता’ को छुपा देता है: जहाँ दक्षिणी और पश्चिमी राज्य दशकों पहले ही कम प्रजनन दर की ओर चले गए थे, वहीं उत्तरी और मध्य भारतीय राज्य (EAG राज्य) अभी भी जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा दे रहे हैं।

    मुख्य भाग: 

    राज्यों में जनांकिकीय विविधता

    • ‘पिछड़े राज्य’ (उत्तर और मध्य भारत): बिहार (TFR ~3.0) और उत्तर प्रदेश (2.4) जैसे राज्यों में अभी भी उच्च प्रजनन दर है। इन राज्यों में एक विशाल ‘युवाओं की जनसंख्या’ मौजूद है और अगले दो दशकों तक ये भारत के श्रम बल का मुख्य स्रोत बने रहेंगे।
    • ‘सफल राज्य’ (दक्षिण और पश्चिम भारत): केरल (1.8) और तमिलनाडु (1.4) जैसे राज्यों की प्रजनन दर विकसित यूरोपीय देशों के अनुरूप है।
      • दक्षिणी राज्यों का भारत की कुल जनसंख्या में हिस्सा वर्ष 1971 में 24.8% से घटकर वर्ष 2021 में 19.9% तक पहुँच गया है।
      • ये राज्य तेज़ी से ‘वृद्ध समाज’ में परिवर्तित हो रहे हैं, जहाँ वृद्धों पर निर्भरता अनुपात बढ़ रहा है।

    शासन पर प्रभाव

    • मानव विकास सेवाओं पर दबाव: उच्च प्रजनन वाले राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और आवास प्रणालियों पर दबाव रहता है।
      • उदाहरण के लिये, बिहार और उत्तर प्रदेश मातृ मृत्यु दर में वृद्धि तथा शिक्षा के परिणामों में कमी दर्ज करते हैं, क्योंकि तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या प्रति व्यक्ति सार्वजनिक व्यय को कम करती है। यहाँ शासन का ध्यान मात्रा और पहुँच पर केंद्रित होता है, जो प्राय: गुणवत्ता की कीमत पर होता है।
    • रोज़गार और कौशल असंगति: युवा जनसंख्या वाले राज्यों को जनांकिकीय संकट से बचने के लिये बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन करना आवश्यक है।
      • हालाँकि, आवधिक श्रम सर्वेक्षणों से पता चलता है कि औपचारिक रोज़गार सृजन मुख्यतः महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात जैसे कम प्रजनन वाले राज्यों में केंद्रित है।
      • यह असमानता असंगठित रोज़गार, प्रवासन और अधूरी रोज़गार की समस्याओं को बढ़ावा देती है, जिससे स्थानीय शासन की कार्यक्षमता पर दबाव पड़ता है।
    • प्रवासन प्रबंधन और शहरी शासन: जनांकिकीय असमानता के कारण उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा से दक्षिणी एवं पश्चिमी राज्यों की ओर बड़े पैमाने पर अंतर-राज्यीय प्रवासन हो रहा है।
      • गंतव्य राज्य शहरी अवसंरचना, आवास, परिवहन तथा नागरिक सेवाओं पर दबाव महसूस करते हैं, जबकि प्रवासी प्राय: दस्तावेज़ और भाषा संबंधी बाधाओं के कारण स्थानीय कल्याण योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते।
    • वृद्ध और सामाजिक क्षेत्रीय शासन: कम प्रजनन वाले राज्य पहले ही वृद्ध जनसंख्या के चरण में प्रवेश कर रहे हैं। केरल में पहले से ही 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या 16% से अधिक है, जिससे वृद्ध स्वास्थ्य देखभाल, पेंशन और दीर्घकालीन देखभाल की मांग बढ़ रही है।
      • इस स्थिति में शासन की प्राथमिकताएँ विस्तार पर नहीं बल्कि स्थिरता और उत्पादकता बढ़ाने पर केंद्रित हो जाती हैं।

    संघीय नीति निर्माण पर प्रभाव

    • राजकोषीय संघवाद और संसाधन आवंटन: वित्त आयोग द्वारा जनसंख्या-आधारित मानदंड उन राज्यों को दंडित कर सकते हैं जिन्होंने जल्दी ही जनसंख्या स्थिरीकरण हासिल किया है।
      • दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि तेज़ी से बढ़ते राज्यों को अधिक वित्तीय अनुदान देने से जनसंख्या नियंत्रण के लिये प्रोत्साहन कम हो जाता है, जिससे न्याय और आवश्यकता-आधारित आवंटन पर बहस उत्पन्न होती है।
    • राजनीतिक प्रतिनिधित्व और परिसीमन: केवल जनसंख्या के आधार पर भविष्य में संसदीय परिसीमन उच्च प्रजनन वाले राज्यों के लिये सीटों की संख्या बढ़ा सकता है, जिससे संघीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।
      • इसका प्रभाव राजनीतिक समानता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और सहयोगात्मक संघवाद पर पड़ता है तथा इसके लिये सहमति-आधारित सुधारों की आवश्यकता होती है।
    • श्रम और कल्याण की पोर्टेबिलिटी: संघीय योजना को गतिशील जनसंख्या के अनुसार अनुकूलित करना चाहिये।
      • वन नेशन, वन राशन कार्ड और ई-श्रम पोर्टल जैसी पहलें कल्याण को स्थायी निवास स्थान से अलग करने के प्रयास हैं, लेकिन राज्यों में असमान कार्यान्वयन इसकी प्रभावशीलता को सीमित करता है।
    • राष्ट्रीय विकास रणनीति का संरेखण: स्वास्थ्य, शिक्षा या रोज़गार में समान राष्ट्रीय नीतियाँ जनांकिकीय रूप से विविध देश में अकुशल हो सकती हैं।
      • उदाहरण के लिये, कौशल विकास की नीतियाँ रोज़गारहीन, युवा-प्रधान राज्यों और वृद्ध आबादी वाले तथा श्रम-सीमित राज्यों में भिन्न होनी चाहिये, जिसके लिये अनुकूल संघीय ढाँचे की आवश्यकता है।

    सुझाए गए उपाय

    • बहु-आयामी, राज्य-विशेष जनांकिकीय रणनीतियाँ अपनाना: भारत को एकरूप जनसंख्या नियंत्रण दृष्टिकोण से हटकर संदर्भ-संवेदी जनांकिकीय शासन की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
      • उच्च प्रजनन दर वाले राज्यों में परिवार नियोजन और प्रजनन स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिये, जबकि कम प्रजनन दर तथा वृद्ध होती आबादी वाले राज्यों को सक्रिय वृद्धावस्था नीतियों, श्रम बल में अधिक भागीदारी (विशेषकर महिलाओं और वृद्ध जनों की) तथा सुव्यवस्थित प्रवासन को प्राथमिकता देनी चाहिये।
    • राजकोषीय वितरण सूत्रों में सुधार: जनसंख्या के आकार के साथ-साथ प्रजनन दर में गिरावट, वृद्धावस्था का बोझ, स्वास्थ्य परिणाम और प्रवासन प्रवाह जैसे मानदंडों को वित्त आयोगों द्वारा शामिल किया जाना चाहिये।
      • इससे उन राज्यों के साथ राजकोषीय अन्याय नहीं होगा जिन्होंने शुरुआती चरण में ही जनसंख्या स्थिरीकरण प्राप्त कर लिया था।
    • प्रवासन और श्रम कल्याण पर अंतर-राज्यीय समन्वय को सुदृढ़ करना: अंतर-राज्यीय श्रम गतिशीलता बढ़ने के साथ, शासन को निवास-आधारित ढाँचों से आगे बढ़ना होगा।
      • राज्यों को पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा, साझा कौशल प्रमाणन, प्रवासी आवास तथा शहरी सेवा वितरण जैसे विषयों पर आपसी समन्वय स्थापित करना चाहिये।
    • महिलाओं की शिक्षा में निवेश करना: साक्ष्य दर्शाते हैं कि महिला शिक्षा और कार्यबल में भागीदारी प्रजनन दर में कमी के सबसे प्रभावी निर्धारक हैं।
      • बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में माध्यमिक शिक्षा, प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण तथा महिलाओं के लिये सुरक्षित रोज़गार के अवसरों का विस्तार जनांकिकीय संक्रमण को तीव्र कर सकता है।
    • वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहे राज्यों में आजीवन कौशल विकास को सशक्त बनाना: दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में कार्यबल वृद्धि धीमी होने के साथ, आर्थिक गति बनाए रखने के लिये श्रम की मात्रा के बजाय श्रम उत्पादकता बढ़ाना आवश्यक होगा।
      • नीतियों को स्वचालन, डिजिटल प्रौद्योगिकियों, मध्य-करियर श्रमिकों के कौशल उन्नयन, सेवानिवृत्ति में विलंब के विकल्प तथा प्रवासी श्रम के एकीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिये।

    निष्कर्ष

    भारत की जनसंख्या चुनौती अब ‘कितनी है’ की नहीं, बल्कि ‘कहाँ है और किस चरण में है’ की बन चुकी है। इस जनांकिकीय विविधता के प्रभावी प्रबंधन के लिये असममित शासन व्यवस्था, अनुकूलन संघीय नीति योजना और सहयोगात्मक संघवाद की आवश्यकता है। जनसंख्या को राष्ट्रीय समष्टि के बजाय क्षेत्र-विशेष विकासात्मक चर के रूप में पहचानना अनिवार्य है, ताकि भारत की जनांकिकीय विविधता को सतत जनांकिकीय लाभांश में परिवर्तित किया जा सके।

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