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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    सुरेश एक सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र में ज़िला मजिस्ट्रेट हैं, जहाँ ईंट भट्टे, पत्थर की खदानें और छोटे विनिर्माण इकाइयाँ बड़ी संख्या में अकुशल एवं प्रवासी श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करती हैं। इनमें से कई श्रमिक उपेक्षित समुदायों से हैं और चिकित्सा व्यय, विवाह या जीवनयापन की जरूरतों के लिये ठेकेदारों से लिये गए अग्रिम ऋण के कारण भारी कर्ज में डूबे हुए हैं।

    हाल ही में, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के एक समूह ने सुरेश के कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें कई कार्यस्थलों पर बंधुआ मजदूरी की प्रथा के प्रचलन का आरोप लगाया गया है। बताया जाता है कि श्रमिकों को बेहद कम वेतन पर लंबे समय तक काम करने के लिये विवश किया जाता है, कर्ज चुकाए जाने तक उन्हें काम छोड़ने की अनुमति नहीं दी जाती है और भागने का प्रयास करने पर उन्हें धमकी तथा शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। ठेकेदार प्रायः पहचान पत्र ज़ब्त कर लेते हैं और बच्चों को भी कार्यस्थलों पर अपने माता-पिता की सहायता करने के लिये विवश किया जाता है।

    ठेकेदारों ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया है कि श्रमिकों को स्वेच्छा से काम पर रखा जाता है तथा अग्रिम भुगतान एक आम प्रथा है। कुछ स्थानीय राजनीतिक नेताओं और प्रभावशाली व्यापारियों, जिनका इन इकाइयों में आर्थिक हित है, ने सुरेश को अनौपचारिक रूप से सलाह दी है कि वे सामाजिक अशांति और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में व्यवधान से बचने के लिये "मामले को संवेदनशीलता से संभालें"।

    कार्यस्थल पर एक बंधुआ मजदूर के बचाव के बाद अमानवीय जीवन-परिस्थितियों और हिरासत में हिंसा के खुलासे से मीडिया का ध्यान लगातार बढ़ रहा है।

    प्रश्न:
    1. बंधुआ मजदूरों, नियोक्ताओं और सार्वजनिक अधिकारियों के दृष्टिकोण से इस मामले में शामिल नैतिक मुद्दों का अभिनिर्धारण कीजिये।
    2. सुरेश के पास इस स्थिति से निपटने के लिये क्या-क्या विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक विकल्प का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।
    3. ज़िला मजिस्ट्रेट के रूप में, सुरेश को संवैधानिक मूल्यों, मानवाधिकारों और नैतिक शासन को बनाए रखने के लिये क्या कदम उठाने चाहिये? अपने उत्तर का औचित्य सिद्ध कीजिये।

    09 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़

    उत्तर :

    शामिल हितधारक

    • बंधुआ मज़दूर: कर्ज़ में फॅंसे असक्षम, प्रवासी और हाशिये पर रहे मज़दूरों में महिलाएँ तथा बच्चे भी शामिल हैं।
    • कार्यस्थलों पर बच्चे: बाल श्रम के शिकार बच्चे, जिन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और बचपन से वंचित किया गया है।
    • ठेकेदार/नियोक्ता: मालिक और मध्यस्थ जो शोषक श्रम प्रथाओं से आर्थिक लाभ प्राप्त करते हैं।
    • ज़िला मजिस्ट्रेट (सुरेश): संवैधानिक प्राधिकारी, नैतिक अभिकर्त्ता और अधिकारों के गारंटर।
    • स्थानीय राजनीतिक नेता और व्यावसायिक हित: ऐसे अभिकर्त्ता जो आर्थिक और राजनीतिक हितों की रक्षा के लिये अनौपचारिक दबाव डालते हैं।
    • सामाजिक कार्यकर्त्ता/NGO: अधिकारों के समर्थक जो उल्लंघनों को उजागर करते हैं।
    • मीडिया: प्रशासनिक प्रतिक्रिया को उजागर करने वाला सार्वजनिक जवाबदेही तंत्र।
    • व्यापक समाज और राज्य: विधि के शासन, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास में हितधारक।

    प्रश्न 1. इस मामले में बंधुआ मज़दूरों, नियोक्ताओं और सरकारी अधिकारियों के दृष्टिकोण से शामिल नैतिक मुद्दों का अभिनिर्धारण कीजिये।

    • बंधुआ मज़दूरों का दृष्टिकोण: मज़दूरों के दृष्टिकोण से मुख्य नैतिक समस्या मानव गरिमा और स्वतंत्रता का ह्रास है। जबरन मज़दूरी, कर्ज़-बंधक बनाना, पहचान दस्तावेज़ों की ज़ब्ती, अत्यधिक कार्य घंटे और शारीरिक धमकियों जैसी प्रथाएँ उन्हें अपने जीवन तथा कार्य के बारे में स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार से वंचित कर देती हैं।
      • ये परिस्थितियाँ संविधान के अनुच्छेद 23 (बंधुआ और जबरन मज़दूरी का निषेध) और अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करती हैं।
      • यह समस्या संरचनात्मक अन्यायगरीबी, जातिगत हाशियाकरण, प्रवासन और शिक्षा की कमी से और अधिक गंभीर हो जाती है, जो मज़दूरों की सौदेबाज़ी शक्ति को बेहद कमज़ोर बना देती है।
      • कार्यस्थलों पर बच्चों की मौजूदगी इस नैतिक चिंता को और गहरा करती है, क्योंकि बाल श्रम परिवारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी और शोषण के चक्र में फँसा देता है।
        • जैसा कि महात्मा गांधी से प्राय: उद्धृत किया जाता है: “किसी समाज का मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि वह अपने सबसे कमज़ोर सदस्यों के साथ कैसा व्यवहार करता है।”
    • नियोक्ताओं/ठेकेदारों का दृष्टिकोण: ठेकेदारों की ओर से नैतिक समस्या शोषण को नैतिक ठहराने की प्रवृत्ति में निहित है। जबरन काम कराने जैसी प्रथाओं को ‘स्वैच्छिक रोज़गार’ या ‘स्थानीय प्रथाएँ’ कहकर उचित ठहराया जाता है, जबकि नियोक्ता और मज़दूर के बीच मौजूद असमान शक्ति संबंध को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया जाता है।
      • लाभ और निरंतर उत्पादन को मज़दूरों के अधिकारों से ऊपर रखकर नियोक्ता आर्थिक लाभ को नैतिक ज़िम्मेदारी तथा कानूनी अनुपालन पर प्राथमिकता देते हैं।
      • इस तरह की प्रथाएँ व्यावसायिक नैतिकता को कमज़ोर करती हैं, नियमों का पालन करने वाले नियोक्ताओं के लिये अनुचित प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न करती हैं और शोषण को सामान्य बनाकर स्थानीय उद्योगों की दीर्घकालिक स्थिरता को नुकसान पहुँचाती हैं।
    • लोक प्राधिकरण का दृष्टिकोण: लोक प्राधिकरणों के लिये नैतिक दुविधा नैतिक शासन की विफलता से उत्पन्न होती है। बंधुआ मज़दूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के कमज़ोर प्रवर्तन से प्रशासनिक उदासीनता और संवैधानिक कर्त्तव्यों की उपेक्षा झलकती है।
      • अधिकारी प्राय: नैतिक उत्तरदायित्व और तात्कालिक सुविधा के बीच संघर्ष का सामना करते हैं, जहाँ स्थानीय आर्थिक गतिविधियों की रक्षा का दबाव मानवाधिकारों तथा विधि के शासन को बनाए रखने के दायित्व से टकराता है।
      • मीडिया में अमानवीय परिस्थितियों के सामने आने से शासन की कमियाँ स्पष्ट हो जाती हैं और इससे जनविश्वास भी कमजोर पड़ता है।
        • भारतीय प्रशासनिक नैतिकता के अनुसार, “लोक पद एक सार्वजनिक न्यास है” और निर्णायक कार्रवाई करने में विफलता नैतिक तथा संस्थागत दोनों स्तरों पर विफलता मानी जाती है।

    2. सुरेश के पास इस स्थिति से निपटने के लिये क्या-क्या विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक विकल्प का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।

    सुरेश के लिये उपलब्ध विकल्प और उनका महत्त्वपूर्ण मूल्यांकन

    • विकल्प 1: आरोपों को नज़रअंदाज़ करना या उन्हें कम करके आँकना: सुरेश के सामने एक विकल्प यह हो सकता है कि वह शिकायतों को अनदेखा कर दे या उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताया हुआ मान ले।
      • सकारात्मक पक्ष: इससे तत्काल राजनीतिक दबाव, स्थानीय असंतोष और आर्थिक गतिविधियों में अल्पकालिक व्यवधान से बचा जा सकता है।
      • नकारात्मक पक्ष: ऐसी निष्क्रियता संविधानिक दायित्वों और श्रम कानूनों का स्पष्ट उल्लंघन होगी। यह गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को जारी रहने देगा, नैतिक कायरता को दर्शाएगा और प्रशासन को कानूनी व नैतिक जवाबदेही के जोखिम में डालेगा।
        • अतः यह विकल्प न तो नैतिक दृष्टि से उचित है और न ही प्रशासनिक दृष्टि से ज़िम्मेदार माना जा सकता है।
    • विकल्प 2: सीमित या प्रतीकात्मक जाँच कराना: सुरेश एक सतही जाँच का आदेश दे सकता है ताकि यह प्रदर्शित हो कि प्रशासन ने मुद्दे को ‘नोटिस’ लिया है।
      • सकारात्मक पक्ष: इससे कार्रवाई का आभास होता है और कुछ समय के लिये मीडिया, कार्यकर्त्ताओं तथा राजनीतिक हितधारकों का दबाव कम हो सकता है।
      • नकारात्मक पक्ष: प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया बंधुआ मज़दूरी की मूल समस्या को संबोधित नहीं करती, शोषणकारी नियोक्ताओं को प्रोत्साहित करती है और विधि के शासन को कमज़ोर करती है। समय के साथ ऐसा औपचारिकतावादी रवैया शासन में जनविश्वास को क्षीण करता है।
        •  अत: यह विकल्प नैतिक रूप से अपर्याप्त और भ्रामक है।
    • विकल्प 3: पुनर्वास के बिना कड़े कानूनी कदम उठाना: एक अन्य विकल्प है कि छापेमारी कर, मामले दर्ज कर और ठेकेदारों पर दंड लगाकर कानून को सख्ती से लागू किया जाए।
      • सकारात्मक पक्ष: इससे एक मज़बूत निवारक संदेश जाता है, कानून का अधिकार पुनः स्थापित होता है और प्रशासन की गंभीरता स्पष्ट होती है।
      • नकारात्मक पक्ष: यदि कानूनी कार्रवाई के साथ पुनर्वास न हो तो बचाए गए मज़दूर गरीबी और आजीविका के अभाव के कारण पुनः ऋण बंधन में फँस सकते हैं। अचानक बंद के कारण आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता भी उत्पन्न हो सकती है।
        • इसलिये यह विकल्प आवश्यक तो है, परंतु अधूरा है।
    • विकल्प 4: व्यापक अधिकार-आधारित हस्तक्षेप: सबसे उपयुक्त विकल्प एक संतुलित दृष्टिकोण है, जिसमें सख्त प्रवर्तन के साथ पुनर्वास और रोकथाम को जोड़ा जाए।
      • सकारात्मक पक्ष: यह दृष्टिकोण संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखता है, मानव गरिमा की रक्षा करता है और ऋण, प्रवास, अशिक्षा तथा सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसे मूल कारणों को संबोधित करता है। यह न्याय और सामाजिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाता है तथा प्रशासन की दीर्घकालिक संस्थागत विश्वसनीयता को मज़बूत करता है।
      • अतः यह विकल्प नैतिक रूप से उचित, मानवीय और प्रशासनिक रूप से टिकाऊ है।

    3. ज़िला मजिस्ट्रेट के रूप में सुरेश को संवैधानिक मूल्यों, मानवाधिकारों और नैतिक शासन को बनाए रखने के लिये क्या कदम उठाने चाहिये? अपने उत्तर का औचित्य सिद्ध कीजिये।

    सुरेश के लिये अनुशंसित कार्यवाही

    तात्कालिक उपाय

    • बंधुआ मज़दूरों का बचाव: जहाँ बंधुआ मज़दूरी की पहचान की जाती है, वहाँ तत्काल बचाव कार्यवाही बंधुआ मज़दूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के तहत की जानी चाहिये।
      • यह जबरन श्रम के प्रति शून्य सहनशीलता का स्पष्ट संदेश देता है और मज़दूरों की बुनियादी स्वतंत्रता तथा गरिमा को पुनर्स्थापित करता है।
    • FIR का पंजीकरण: बंधुआ मज़दूरी, बाल श्रम, शारीरिक शोषण और हिरासत में हिंसा से संबंधित अपराधों के लिये तत्काल FIR दर्ज की जानी चाहिये।
      • इससे विधि का शासन मज़बूत होता है और ठेकेदारों/बिचौलियों की जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
    • संयुक्त आकस्मिक निरीक्षण: सुरेश को श्रम अधिकारियों, पुलिस तथा विश्वसनीय NGOs को शामिल करते हुए अचानक निरीक्षण कराने चाहिये।
      • ऐसी बिना पूर्व सूचना वाली कार्यवाही से ठेकेदारों को चेतावनी देने का अवसर नहीं मिलता और पहचान पत्र ज़ब्त करने, जबरन वसूली आदि जैसे छिपे हुए शोषण उजागर होते हैं।
    • मज़दूरों के लिये संरक्षण आदेश: बचाए गए मज़दूरों को प्रतिशोध या पुनः बंधन से बचाने के लिये संरक्षण आदेश, सुरक्षित आश्रय और पुलिस निगरानी की व्यवस्था करनी चाहिये।
      • यह कमज़ोर श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है और अन्य मज़दूरों को भी बिना डर आगे आने के लिये प्रोत्साहित करता है।

    दीर्घकालिक उपाय:

    • रिलीज़ सर्टिफिकेट और मुआवज़ा जारी करना: सुरेश को सुनिश्चित करना चाहिये कि सभी मुक्त किये गए मज़दूरों को तुरंत रिलीज़ सर्टिफिकेट जारी किये जाएँ, जिससे उनकी बंधुआ स्थिति औपचारिक रूप से समाप्त हो जाए।
      • कानूनी मुआवज़े का समय पर भुगतान उनकी गरिमा बहाल करने और त्वरित आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिये  आवश्यक है।
    • कर्ज़ समाप्ति: सभी बंधुआ कर्ज़ों को कानूनी रूप से शून्य और अवैध घोषित किया जाना चाहिये ताकि मज़दूर दोबारा ठेकेदारों के चंगुल में न फँसें।
      • यह कदम जबरन नियंत्रण और मानसिक निर्भरता के चक्र को तोड़ने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • बचाए गए बच्चों का पुनर्वास: कारखानों/कार्यस्थलों से मुक्त किये गए बच्चों को बाल कल्याण समिति (CWC) के माध्यम से स्कूलों में दाखिल करवाया जाना चाहिये तथा आँगनवाड़ी (ICDS) की सहायता से पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ और काउंसलिंग उपलब्ध कराई जानी चाहिये।
      • शिक्षा-आधारित पुनर्वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी होने वाले शोषण को रोकता है।
    • मज़दूरों को कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ना: मुक्त मज़दूरों को MGNREGA, PDS, स्वास्थ्य बीमा और कौशल विकास योजनाओं से जोड़ा जाना चाहिये ताकि उन्हें स्थायी आजीविका मिल सके।
      • सामाजिक सुरक्षा उनकी संवेदनशीलता कम करती है और उन्हें दोबारा बंधुआ बनने से रोकती है।
    • विजिलेंस कमेटियों को सक्रिय करना: सुरेश को बंधुआ मज़दूरी अधिनियम के अनुसार ज़िला और ब्लॉक स्तर पर विजिलेंस कमेटियों को सक्रिय करना तथा उनकी नियमित निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिये।
      • स्थानीय अधिकारियों, NGOs और समुदाय के प्रतिनिधियों को शामिल करने से उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों पर सतत निगरानी बनी रहती है।
    • श्रम अधिकारों पर जागरूकता अभियान: स्थानीय भाषाओं में जागरूकता अभियान चलाकर मज़दूरों को उनके कानूनी अधिकारों, न्यूनतम मज़दूरी और शिकायत निवारण तंत्र के बारे में जानकारी दी जानी चाहिये।
      • मज़दूर धोखे और दबाव का शिकार कम होते हैं।
    • नियोक्ताओं के लिये संवेदनशीलता कार्यक्रम: नियोक्ताओं और ठेकेदारों के लिये नियमित संवेदनशीलता कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिये ताकि नैतिक श्रम प्रथाओं और कानूनी अनुपालन को बढ़ावा मिले।
      • इससे शोषणकारी सोच बदलकर ज़िम्मेदारी और सतत व्यावसायिक आचरण को बढ़ावा मिलता है।
    • मज़दूर रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण: मज़दूरों के रिकॉर्ड और पहचान दस्तावेज़ों का डिजिटलीकरण किया जाना चाहिये ताकि ठेकेदार उन्हें ज़ब्त न कर सकें तथा पारदर्शिता बढ़े।
      • ऐसी प्रणालियाँ बेहतर निगरानी, लाभों की पोर्टेबिलिटी और जवाबदेही सुनिश्चित करने में सहायक होती हैं।

    निष्कर्ष:

    इस मामले में प्रशासनिक सुविधा से अधिक नैतिक साहस की आवश्यकता है। दृढ़ता और करुणा के साथ कार्रवाई करके सुरेश न केवल संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करता है, बल्कि मानव गरिमा को पुनर्स्थापित करता है और शासन में नागरिकों के विश्वास को मज़बूत भी बनाता है। ऐसा नेतृत्व प्रशासन को केवल नियम लागू करने वाली व्यवस्था नहीं रहने देता, बल्कि उसे नैतिक शासन-कला का स्वरूप प्रदान करता है।

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