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सुरेश एक सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र में ज़िला मजिस्ट्रेट हैं, जहाँ ईंट भट्टे, पत्थर की खदानें और छोटे विनिर्माण इकाइयाँ बड़ी संख्या में अकुशल एवं प्रवासी श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करती हैं। इनमें से कई श्रमिक उपेक्षित समुदायों से हैं और चिकित्सा व्यय, विवाह या जीवनयापन की जरूरतों के लिये ठेकेदारों से लिये गए अग्रिम ऋण के कारण भारी कर्ज में डूबे हुए हैं।
हाल ही में, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के एक समूह ने सुरेश के कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें कई कार्यस्थलों पर बंधुआ मजदूरी की प्रथा के प्रचलन का आरोप लगाया गया है। बताया जाता है कि श्रमिकों को बेहद कम वेतन पर लंबे समय तक काम करने के लिये विवश किया जाता है, कर्ज चुकाए जाने तक उन्हें काम छोड़ने की अनुमति नहीं दी जाती है और भागने का प्रयास करने पर उन्हें धमकी तथा शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। ठेकेदार प्रायः पहचान पत्र ज़ब्त कर लेते हैं और बच्चों को भी कार्यस्थलों पर अपने माता-पिता की सहायता करने के लिये विवश किया जाता है।
ठेकेदारों ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया है कि श्रमिकों को स्वेच्छा से काम पर रखा जाता है तथा अग्रिम भुगतान एक आम प्रथा है। कुछ स्थानीय राजनीतिक नेताओं और प्रभावशाली व्यापारियों, जिनका इन इकाइयों में आर्थिक हित है, ने सुरेश को अनौपचारिक रूप से सलाह दी है कि वे सामाजिक अशांति और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में व्यवधान से बचने के लिये "मामले को संवेदनशीलता से संभालें"।
कार्यस्थल पर एक बंधुआ मजदूर के बचाव के बाद अमानवीय जीवन-परिस्थितियों और हिरासत में हिंसा के खुलासे से मीडिया का ध्यान लगातार बढ़ रहा है।
प्रश्न:
सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़
1. बंधुआ मजदूरों, नियोक्ताओं और सार्वजनिक अधिकारियों के दृष्टिकोण से इस मामले में शामिल नैतिक मुद्दों का अभिनिर्धारण कीजिये।
2. सुरेश के पास इस स्थिति से निपटने के लिये क्या-क्या विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक विकल्प का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।
3. ज़िला मजिस्ट्रेट के रूप में, सुरेश को संवैधानिक मूल्यों, मानवाधिकारों और नैतिक शासन को बनाए रखने के लिये क्या कदम उठाने चाहिये? अपने उत्तर का औचित्य सिद्ध कीजिये।