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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न 1. औपनिवेशिक भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद तथा स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने में स्वदेशी आंदोलन की भूमिका पर चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    29 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • स्वदेशी आंदोलन का उल्लेख करते हुए अपने उत्तर की शुरुआत कीजिये। 
    • मुख्य भाग चर्चा कीजिये कि इसने आर्थिक राष्ट्रवाद को किस प्रकार सुदृढ़ किया। 
    • इसने स्वदेशी उद्योगों को किस प्रकार आकार दिया, तर्क दीजिये।
    • तदनुसार उचित निष्कर्ष दीजिये। 

    परिचय:

    स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में हुई थी, जिसका उद्देश्य स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देकर ब्रिटिश आर्थिक प्रभुत्व का प्रतिरोध करना था। इसने राजनीतिक विरोध से आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को चिह्नित किया। इस आंदोलन ने औपनिवेशिक भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद की नींव रखी।

    आर्थिक राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन देने में भूमिका 

    • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार: स्वदेशी आंदोलन ने भारतीयों को ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं, विशेष रूप से वस्त्रों को अस्वीकार करने के लिये सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया, जो स्वदेशी उद्योगों के पतन के बाद भारतीय बाज़ारों में भर गए थे। 
      • विदेशी वस्त्रों की सार्वजनिक होलियाँ जलाकर केवल विदेशी वस्तुओं को नष्ट नहीं किया गया, बल्कि वे औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतीकात्मक प्रतिरोध का माध्यम भी बनीं। इस प्रकार इन प्रतीकात्मक कृत्यों ने औपनिवेशिक आयात पर निर्भरता को कम करने का प्रयास किया तथा ब्रिटिश शासन की उस आर्थिक आधारशिला को चुनौती
        • स्वदेशी वस्तुओं (भारतीय वस्तुओं) को खरीदना एक देशभक्ति का कर्त्तव्य बन गया।दी जो भारतीय बाज़ारों में विदेशी वस्तुओं की खपत पर टिकी हुई थी।
    • राष्ट्रीय कर्त्तव्य के रूप में स्वदेशी वस्तुओं का अंगीकरण: स्वदेशी का विचार आर्थिक पहलुओं से परे एक नैतिक और देशभक्तिपूर्ण दायित्व बन गया।
      • बाल गंगाधर तिलक, अरविंद घोष और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं ने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को राष्ट्रीय आत्मसम्मान से जोड़ा, जिससे रोज़मर्रा की खपत राजनीतिक भागीदारी के एक कार्य में परिवर्तित हो गई।
    • औपनिवेशिक आर्थिक शोषण के प्रति जागरूकता: इस आंदोलन ने औपनिवेशिक शोषण की समझ को लोकप्रिय बनाया विशेषतः दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रतिपादित ‘धन-निकास सिद्धांत’ के माध्यम से।
      • अखबारों, पर्चों और सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से जनता यह समझने लगी कि किस प्रकार ब्रिटिश नीतियाँ कच्चे माल के दोहन और स्थानीय उद्योगों के दमन के माध्यम से भारत को निर्धन बना रही थीं।
    • जन-आंदोलन और सामाजिक सहभागिता: स्वदेशी अभियान ने महिलाओं, छात्रों और शहरी मध्यम वर्ग सहित समाज के व्यापक वर्गों को आर्थिक प्रतिरोध में संगठित किया।
      • महिलाओं ने खादी की कताई करके, घरेलू स्तर पर स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देकर और विदेशी दुकानों के सामने धरना प्रदर्शन आयोजित करके आंदोलन में भाग लिया, जबकि छात्रों ने सरकारी संस्थानों का बहिष्कार किया, जिससे आर्थिक राष्ट्रवाद एक सीमित अभिजात वर्ग का विचार न रहकर एक जन-आधारित आंदोलन बन गया। 

    स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने में भूमिका 

    • हथकरघा, खादी और लघु उद्योगों का पुनरुत्थान: स्वदेशी आंदोलन ने पारंपरिक शिल्पों और ग्राम उद्योगों को पुनर्जीवित किया, जो औपनिवेशिक औद्योगिक नीतियों के तहत पतन का शिकार हो गए थे।
      • खादी आर्थिक साधन के साथ-साथ प्रतीकात्मक माध्यम बनी, जिसने ग्रामीण रोज़गार को बढ़ावा दिया तथा स्वदेशी श्रम की गरिमा को पुनर्स्थापित किया।
        • इस पुनरुद्धार से ग्रामीण आजीविकाओं को सुरक्षित रखने में सहायता मिली तथा आयातित निर्मित वस्तुओं पर निर्भरता कम हुई।  
      • स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है।
    • स्वदेशी उद्यमों और संस्थानों का विकास: इस आंदोलन ने बंगाल केमिकल्स, स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी और कई स्वदेशी बैंकों एवं बीमा कंपनियों जैसे भारतीय स्वामित्व वाले उद्यमों की स्थापना को प्रेरित किया।
      • इसके अलावा, जमशेदजी टाटा ने वर्ष 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना की। यह भारतीय औद्योगिक शक्ति और तकनीकी क्षमता का प्रतीक बन गई।
      • इन संस्थानों का उद्देश्य आत्मनिर्भर औद्योगिक क्षमता का निर्माण करना और देश के भीतर पूंजी को बनाए रखकर ब्रिटिश आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती देना था। 
    • तकनीकी शिक्षा और उद्यमिता को प्रोत्साहन: स्वदेशी उद्योगों को चलाने में सक्षम कुशल मानव संसाधन तैयार करने के लिये तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा पर ज़ोर दिया गया।
      • शैक्षणिक संस्थानों ने वैज्ञानिक शिक्षा, उद्यमिता और नवाचार को प्रोत्साहित किया, जिससे औपनिवेशिक नियंत्रण से स्वतंत्र एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की नींव रखी गई।
      • उदाहरण के लिये, स्वदेशी आंदोलन के दौरान स्थापित राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (1906) ने राष्ट्रीय, तकनीकी और औद्योगिक शिक्षा प्रदान करने का प्रयास किया, जिससे आत्मनिर्भर एवं आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की नींव रखी जा सके।
    • भविष्य की औद्योगिक नीति की नींव: स्वदेशी के आदर्शों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाद के आर्थिक चिंतन को गहनता से प्रभावित किया।
      • महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने आत्मनिर्भरता, राज्य के नेतृत्व वाले विकास एवं संतुलित औद्योगिक विकास पर केंद्रित स्वतंत्रता-उपरांत औद्योगिक नीतियों को आकार देने के लिये इसके सिद्धांतों का उपयोग किया।

    आंदोलन की सीमाएँ

    • मूल्य असमानता: स्वदेशी वस्तुएँ (जैसे खादी) प्रायः बड़े पैमाने पर उत्पादित ब्रिटिश सामानों की तुलना में अधिक महंगी और कम परिष्कृत होती थीं, जिससे सबसे गरीब किसानों के लिये उन्हें खरीदना मुश्किल हो जाता था।
    • राज्य के समर्थन का अभाव: यूरोपीय देशों के विपरीत, औपनिवेशिक सरकार ने भारतीय उद्योगों को संरक्षणात्मक शुल्क प्रदान नहीं किये। परिणामस्वरूप स्वदेशी उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्द्धा के प्रति सुभेद्य हो गए।

    निष्कर्ष: 

    स्वदेशी आंदोलन ने आत्मनिर्भरता और स्वदेशी उद्यम को बढ़ावा देकर आर्थिक प्रतिरोध को एक व्यापक राष्ट्रवादी शक्ति में परिवर्तित कर दिया। स्वदेशी उद्यमिता के माध्यम से इसने भारत के भावी आर्थिक राष्ट्रवाद और औद्योगिक विकास की वैचारिक एवं संस्थागत नींव स्थापित की।

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