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प्रश्न :
अनन्या शर्मा एक बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के संगठन में उप-प्रबंधक हैं, जो अवसंरचना विकास के लिये उत्तरदायी है। संगठन की तकनीकी प्रतिष्ठा सुदृढ़ है, परंतु कार्य-संस्कृति विषाक्त बनी हुई है। वरिष्ठ अधिकारी बैठकों में अधीनस्थों को प्रायः डांटते फटकारते हैं, कनिष्ठों के कार्य का श्रेय स्वयं ले लेते हैं और असहमति वाले विचारों को हतोत्साहित करते हैं। बिना किसी मान्यता के लंबी कार्य-अवधि सामान्य बात हो गये हैं, जिसके परिणामस्वरूप मनोबल में गिरावट और कर्मचारियों का उच्च पलायन देखने को मिलता है।
अनन्या देखती हैं कि प्रतिभाशाली युवा अधिकारी अपमान के भय से नवीन विचार साझा करने में हिचकिचाते हैं। विशेष रूप से महिला कर्मचारी अपनी चिंताएँ उठाने में असहज महसूस करती हैं, क्योंकि वरिष्ठ पुरुष अधिकारियों द्वारा नियंत्रित अनौपचारिक नेटवर्क निर्णय-निर्माण पर हावी हैं। यद्यपि प्रत्यक्ष उत्पीड़न नहीं है, फिर भी कार्य-पर्यावरण मनोवैज्ञानिक रूप से असुरक्षित और हतोत्साहित करने वाला है।
हाल ही में एक सक्षम कनिष्ठ अधिकारी, रवि, से परियोजना-फाइल में एक छोटी-सी प्रक्रियागत त्रुटि हो गयी। रचनात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय एक वरिष्ठ अधिकारी ने बैठक में उसे सार्वजनिक रूप से फटकार लगायी। अत्यधिक निराश होकर रवि ने ‘व्यक्तिगत कारणों’ का हवाला देते हुए स्थानांतरण के लिये आवेदन कर दिया। ऐसी घटनाएँ अब सामान्य हो गयी हैं, जिससे उत्पादकता और टीम-एकजुटता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
मध्यम-स्तरीय अधिकारी होने के नाते अनन्या को अपनी टीम का सम्मान प्राप्त है, परंतु वरिष्ठ अधिकारियों पर उनका अधिकार सीमित है। उनका मानना है कि ऐसी विषाक्त कार्य-संस्कृति न केवल कर्मचारियों के कल्याण को क्षति पहुँचाती है, बल्कि दक्षता, नवोन्मेष और सार्वजनिक सेवा-प्रदाय को भी प्रभावित करती है।
अनन्या अब एक दुविधा में हैं: क्या वह अपने करियर की प्रगति की रक्षा के लिये मौन रहे या कार्यस्थल की संस्कृति में सुधार लाने, गरिमा को बढ़ावा देने और संगठन के भीतर नैतिक मूल्यों को बनाए रखने के लिये औपचारिक या अनौपचारिक रूप से कदम उठाए।
प्रश्न 1. उपर्युक्त प्रकरण में कार्यस्थल की संस्कृति से संबंधित प्रमुख नैतिक मुद्दों का अभिनिर्धारण कीजिये। ऐसे मुद्दे कर्मचारियों के मनोबल, उत्पादकता और संगठनात्मक प्रभावशीलता को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
प्रश्न 2. विषाक्त कार्यस्थल प्रथाओं से निपटने में एक मध्यम-स्तरीय अधिकारी के रूप में अनन्या किन नैतिक दुविधाओं का सामना करती हैं? उनके लिये उपलब्ध संभावित कार्य-मार्गों पर चर्चा कीजिये तथा उनके गुण-दोष स्पष्ट कीजिये।
प्रश्न 3. नैतिक नेतृत्व और सकारात्मक संगठनात्मक संस्कृति किस प्रकार बेहतर शासन एवं कर्मचारी-कल्याण में योगदान दे सकती है? सार्वजनिक संस्थानों में एक स्वस्थ और समावेशी कार्य-पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिये उपाय सुझाइये।
26 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़उत्तर :
इसमें शामिल हितधारक
- अनन्या शर्मा (उप प्रबंधक) - मध्य स्तर की अधिकारी जो नैतिक और व्यावसायिक दुविधाओं का सामना कर रही हैं।
- कनिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी (रवि सहित) - विषाक्त कार्यसंस्कृति, अपमान और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा की कमी के प्रत्यक्ष प्रभाव में हैं।
- वरिष्ठ अधिकारी/प्रबंधन - वे व्यक्ति जो अपने व्यवहार के माध्यम से अधिकार का प्रयोग करते हैं और कार्यस्थल की संस्कृति का निर्माण करते हैं।
- महिला कर्मचारी – अनौपचारिक शक्ति संरचनाओं और समावेशी स्थानों की कमी के कारण विशेष रूप से प्रभावित होती हैं।
- संगठन/सार्वजनिक संस्था - जिसकी कार्यकुशलता, विश्वसनीयता और सेवा वितरण क्षमता प्रभावित होती है।
- नागरिक/जनता - सार्वजनिक सेवा वितरण की कम दक्षता और निम्न गुणवत्ता से प्रभावित अप्रत्यक्ष हितधारक।
1. उपर्युक्त प्रकरण में कार्यस्थल की संस्कृति से संबंधित प्रमुख नैतिक मुद्दों का अभिनिर्धारण कीजिये। ऐसे मुद्दे कर्मचारियों के मनोबल, उत्पादकता और संगठनात्मक प्रभावशीलता को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
संलग्न नैतिक मुद्दे
- अधिकार का दुरुपयोग: वरिष्ठ अधिकारी अधीनस्थों को अपमानित करने और असहमति को हतोत्साहित करने हेतु अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं, जिससे गरिमा और सम्मान के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है।
- सहानुभूति और भावनात्मक बुद्धिमत्ता का अभाव: सार्वजनिक रूप से फटकार लगाना तथा कर्मचारियों के कल्याण की उपेक्षा करना भावनात्मक असंवेदनशीलता और दुर्बल नेतृत्व नैतिकता को दर्शाता है।
- नैतिक अभिव्यक्ति और नवाचार का दमन: उपहास का भय ईमानदार प्रतिक्रिया, रचनात्मकता और नैतिक प्रकटीकरण को हतोत्साहित करता है।
- लैंगिक असंवेदनशीलता और अपवर्जन: अनौपचारिक पुरुष-प्रधान संरचनाएँ महिलाओं को हाशिये पर धकेलती हैं और समान भागीदारी को सीमित करती हैं।
- व्यावसायिक नैतिकता का क्षरण: श्रेय लेना और दोष दूसरों पर डालना निष्पक्षता, विश्वास और सत्यनिष्ठा को कमज़ोर करता है।
मनोबल, उत्पादकता और संगठनात्मक प्रभावशीलता पर प्रभाव
- मनोबल में कमी: भय, अपमान और प्रशंसा के अभाव वाले वातावरण में कार्य करने से कर्मचारियों की प्रेरणा क्रमशः घटती जाती है। समय के साथ, इससे संगठन के प्रति उनका जुड़ाव और प्रतिबद्धता कमजोर हो जाती है।
- उत्पादकता में कमी: हतोत्साहित कार्यबल में पहल करने या कुशलतापूर्वक कार्य करने की संभावना कम हो जाती है। कर्मचारी उत्कृष्टता के लिए प्रयास करने के बजाए केवल न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये कार्य करते हैं, जिससे अंततः समग्र उत्पादकता कम हो जाती है।
- उच्च कर्मचारी स्थानांतरण और प्रतिभा हानि: आलोचना या अपमान के भय से कर्मचारी नए विचार साझा करने या सुधार सुझाने से कतराते हैं। इससे रचनात्मकता दब जाती है और संस्थानों की विकास, अनुकूलन और सेवा-वितरण में सुधार की क्षमता बाधित होती है।
- नवाचार और रचनात्मकता में कमी: जब कर्मचारी आलोचना या अपमान के भय से काम लेते हैं, तो वे नए विचार साझा करने या सुधार के सुझाव देने से बचते हैं। इससे रचनात्मकता दब जाती है और संस्थानों का विकास, अनुकूलन या सेवा वितरण में सुधार बाधित होता है।
- सार्वजनिक सेवा वितरण का क्षरण: निम्न मनोबल और कम प्रेरणा सीधे तौर पर सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। विलंब, अक्षमता और अल्प प्रत्युत्तरशीलता सामान्य हो जाती है, जिसका अंतिम दुष्प्रभाव प्रभावी शासन पर निर्भर नागरिकों पर पड़ता है।
2. विषाक्त कार्यस्थल प्रथाओं से निपटने में एक मध्यम-स्तरीय अधिकारी के रूप में अनन्या किन नैतिक दुविधाओं का सामना करती हैं? उनके लिये उपलब्ध संभावित समाधानों पर चर्चा कीजिये तथा उनके गुण-दोष स्पष्ट कीजिये।
A. अनन्या द्वारा अनुभव की गई प्रमुख नैतिक दुविधाएँ
- सत्यनिष्ठा बनाम कॅरियर सुरक्षा: सत्यनिष्ठा बनाम कॅरियर सुरक्षा: अनन्या के समक्ष न्याय, गरिमा और निष्पक्षता जैसे नैतिक मूल्यों को बनाए रखने और अपनी कॅरियर उन्नति की सुरक्षा के बीच संघर्ष का सामना करना पड़ता है।
- विषाक्त प्रथाओं के विरुद्ध बोलने से प्रतिशोध का सामना करना पड़ सकता है, जबकि मौन धारण करने से व्यक्तिगत सुरक्षा बनी रहती है, किंतु नैतिक सत्यनिष्ठा से समझौता होता है।
- संगठन के प्रति दायित्व बनाम सहकर्मियों के प्रति दायित्व: यद्यपि वह संस्था के प्रति निष्ठावान है, किंतु दूसरी ओर उनका उन सहकर्मियों के प्रति भी नैतिक उत्तरदायित्व है जिन्हें अपमानित और हतोत्साहित किया जा रहा है।
- सहकर्मियों के प्रति सहानुभूति के साथ संस्थागत निष्ठा को संतुलित करना एक गंभीर नैतिक चुनौती है।
- अनुरूपता बनाम नैतिक साहस: प्रचलित संगठनात्मक संस्कृति मौन और अनुरूपता को प्रोत्साहित करती है। इसके विपरीत अनैतिक आचरण के विरुद्ध खड़े होने के लिये नैतिक साहस की आवश्यकता होती है, जो सामाजिक अलगाव, पेशेवर विरोध या कैरियर में अवरोध का कारण बन सकता है।
- अल्पकालिक स्थिरता बनाम दीर्घकालिक संगठनात्मक हित: विषाक्त व्यवहार की उपेक्षा करने से अस्थायी सामंजस्य तो बना रह सकता है, लेकिन यह दीर्घकालिक संगठनात्मक प्रभावशीलता, विश्वास और मनोबल को क्षति पहुँचाता है।
- इसके विपरीत, नैतिक हस्तक्षेप अल्पकालिक असुविधा उत्पन्न कर सकता है, परंतु सतत और उत्तरदायी शासन की आधारशिला रखता है।
- व्यक्तिगत मूल्य बनाम संस्थागत संस्कृति: अनन्या के सामने यह विकल्प है कि वह एक दोषपूर्ण व्यवस्था के अनुरूप स्वयं को ढाल ले या उसमें सुधार हेतु प्रयास करे, भले ही संस्थागत मानदंड असहमति और जवाबदेही को हतोत्साहित करते हों।
B. संभावित समाधान
- निष्क्रिय अनुपालन (यथास्थिति बनाए रखना): अनन्या अपने कॅरियर की रक्षा करने और टकराव से बचने के लिये मौन रहना चुन सकती है।
- गुण: व्यक्तिगत स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
- दोष: यह अन्याय को बढ़ावा देता है, आत्मसम्मान को क्षीण करता है और संगठनात्मक पतन में योगदान देता है।
- अनौपचारिक और प्रेरक सहभागिता: वह वरिष्ठ अधिकारियों से निजी स्तर पर संवाद स्थापित कर सकती है, सम्मानजनक व्यवहार को प्रोत्साहित कर सकती है तथा कनिष्ठों का मार्गदर्शन करते हुए सकारात्मक सूक्ष्म-कार्य संस्कृति विकसित कर सकती है।
- गुण: टकराव रहित और व्यावहारिक; क्रमिक परिवर्तन की संभावना।
- दोष: यदि शीर्ष नेतृत्व उदासीन रहे तो प्रभाव सीमित रह सकता है।
- औपचारिक संस्थागत हस्तक्षेप: मानव संसाधन प्रकोष्ठ, आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र अथवा नैतिकता समितियों जैसे औपचारिक माध्यमों से मुद्दों को उठाया जा सकता है।
- गुण: नियम आधारित और पारदर्शी तथा दस्तावेज़ी जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
- दोष: संस्थागत संरक्षण कमजोर होने पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया या उत्पीड़न का जोखिम।
- नैतिक उदाहरण द्वारा नेतृत्व करना: अपने अधीनस्थों के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार, सहभागिता को बढ़ावा और योग्यता-आधारित प्रोत्साहन के माध्यम से अनन्या नैतिक नेतृत्व का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत कर सकती है।
- गुण: अपने प्रभाव क्षेत्र में विश्वास का निर्माण और नैतिक मानकों की स्थापना।
- दोष: परिवर्तन की गति धीमी हो सकती है और प्रभाव तत्काल टीम तक सीमित रह सकता है।
- सामूहिक एवं संरचनात्मक समाधान: संरचनात्मक मुद्दों को संबोधित करने के लिये सहकर्मी सहायता, गुमनाम प्रतिक्रिया प्रणाली और कार्यस्थल संवेदीकरण कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
- लाभ: सतत् और कम टकरावकारी तथा यह ध्यान व्यक्तियों से हटाकर प्रणालियों पर केंद्रित करता है।
- दोष: इसके लिये संस्थागत इच्छाशक्ति और परिणाम परिलक्षित होने हेतु समय की आवश्यकता होती है।
संतुलित और चरणबद्ध रणनीति दृष्टिकोण:
- सर्वप्रथम, नैतिक आचरण का स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना और अनौपचारिक मार्गदर्शन के माध्यम से सकारात्मक प्रभाव डालना।
- वरिष्ठ अधिकारियों से निजी एवं रचनात्मक संवाद स्थापित कर संगठनात्मक परिणामों और सार्वजनिक सेवा वितरण पर ध्यान केंद्रित करना।
- तथ्यों, संवैधानिक मूल्यों और सामूहिक समर्थन के आधार पर संस्थागत तंत्रों के माध्यम से क्रमिक सुधार की दिशा में प्रयास करना।
यह दृष्टिकोण व्यावहारिक बुद्धिमत्ता (phronesis) को प्रतिबिंबित करता है, जिसमें नैतिक साहस और विवेक का संतुलन होता है, साथ ही सिविल सेवा के प्रमुख मूल्यों, जैसे सहानुभूति, सत्यनिष्ठा, जवाबदेही और सार्वजनिक हित के प्रति प्रतिबद्धता को बनाए रखता है।
3. नैतिक नेतृत्व और सकारात्मक संगठनात्मक संस्कृति किस प्रकार बेहतर शासन एवं कर्मचारी-कल्याण में योगदान दे सकती है? सार्वजनिक संस्थानों में एक स्वस्थ और समावेशी कार्य-पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिये उपाय सुझाइये।
- नैतिक नेतृत्व और एक सकारात्मक संगठनात्मक संस्कृति कुशल, मानवीय एवं जवाबदेह संस्थानों के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। ये कर्मचारियों के व्यवहार, आपसी संवाद और कर्त्तव्यों के निर्वहन को दिशा प्रदान करते हैं, जिससे अंततः सार्वजनिक सेवा वितरण की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
नैतिक नेतृत्व का योगदान
- विश्वास, निष्पक्षता और सत्यनिष्ठता को प्रोत्साहित करना: नैतिक नेता सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता से कार्य करते हैं, जिससे कर्मचारियों के बीच विश्वास बढ़ता है। जब नेता निर्णय-निर्माण में निष्पक्ष और अपने कार्यों में पारदर्शी होते हैं, तो कर्मचारी स्वयं को सम्मानित और मूल्यवान महसूस करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप मनोबल और प्रतिबद्धता में वृद्धि होती है।
- मनोवैज्ञानिक रूप से सुरक्षित कार्य वातावरण का निर्माण: नैतिक नेतृत्व यह सुनिश्चित करता है कि कर्मचारी अपमान या दंड के भय के बिना विचार व्यक्त कर सकें, चिंताएँ साझा कर सकें और अपनी त्रुटियों को स्वीकार कर सकें।ऐसी मनोवैज्ञानिक सुरक्षा खुले संचार और नवाचार को प्रोत्साहित करती है।
- जवाबदेही और दायित्व को सुदृढ़ करना: नैतिक आचरण का पालन करने वाले नेता स्पष्ट अपेक्षाएँ निर्धारित करते हैं और अपने निर्णयों के प्रति जवाबदेह होते हैं, जिससे संगठन के सभी स्तरों पर साझा जवाबदेही की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।
- अधिकार की नैतिक वैधता का संवर्द्धन: निष्ठापूर्वक कार्य करने वाले नेताओं को केवल औपचारिक शक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक अधिकार भी प्राप्त होते हैं। इससे कर्मचारी संगठनात्मक निर्देशों और लक्ष्यों के प्रति अधिक प्रतिबद्ध और प्रेरित रहते हैं।
स्वस्थ और समावेशी कार्य संस्कृति को प्रोत्साहित करने के उपाय
- स्पष्ट आचार संहिता: व्यवहार, सम्मान और व्यावसायिकता से संबंधित स्पष्ट नियम कर्मचारियों के लिये अपेक्षाओं को स्पष्ट करते हैं। उत्पीड़न, भेदभाव और दुर्व्यवहार के प्रति शून्य सहिष्णुता कार्यस्थल पर गरिमा को सुदृढ़ करती है।
- नैतिकता एवं भावनात्मक बुद्धिमत्ता में प्रशिक्षण: नियमित प्रशिक्षण कर्मचारियों को सहानुभूति, आत्म-जागरूकता और संघर्ष समाधान कौशल विकसित करने में सक्षम बनाता है, जिससे स्वस्थ पारस्परिक संबंध और बेहतर निर्णय लेने की क्षमता उत्पन्न होती है।
- प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र: गोपनीय और सुलभ शिकायत प्रणाली कर्मचारियों को प्रतिशोध के भय के बिना मुद्दे उठाने हेतु प्रोत्साहित करती है, जिससे संगठन में विश्वास और पारदर्शिता बढ़ती है।
- उदाहरणात्मक नेतृत्व: वरिष्ठ अधिकारियों को अपने आचरण के माध्यम से नैतिक व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिये। जब नेता निष्पक्षता, विनम्रता और सम्मान का प्रदर्शन करते हैं, तो यह अन्य कर्मचारियों के लिये मानक स्थापित करता है।
- सकारात्मक प्रतिपुष्टि प्रणालियाँ: उत्कृष्ट प्रदर्शन और नैतिक आचरण को मान्यता देने से कर्मचारी प्रेरित होते हैं और पूरे संगठन में सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहन मिलता है।
निष्कर्ष:
नैतिक नेतृत्व और सकारात्मक कार्यस्थल संस्कृति प्रभावी तथा जन-केंद्रित शासन के लिये अनिवार्य हैं। ये कर्मचारियों के बीच विश्वास, प्रेरणा और जवाबदेही को प्रोत्साहित करते हैं। इन मूल्यों के बिना, संस्थानों में अक्षमता, मनोबल में कमी और जनता के विश्वास में कमी का खतरा रहता है।
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