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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. “न्यायिक सक्रियता लोकतांत्रिक शासन के लिये एक सुरक्षा-कवच भी है और एक चुनौती भी।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (250 शब्द )

    23 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • लोकतांत्रिक शासन के लिये न्यायिक सक्रियता के महत्त्व को को रेखांकित करते हुए उत्तर लेखन की शुरुआत कीजिये।
    • न्यायिक सक्रियता किस प्रकार एक सुरक्षा-कवच के रूप में कार्य करता है, इस पर चर्चा कीजिये।
    • उल्लेख कीजिये कि यह लोकतांत्रिक शासन के लिये किस प्रकार चुनौती उत्पन्न करता है।
    • न्यायिक सक्रियता और लोकतांत्रिक शासन के बीच संतुलन बनाए रखने हेतु उपाय प्रस्तावित कीजिये।
    • तदनुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय

    भारत में संवैधानिक मूल्यों, मूल अधिकारों और विधि के शासन को बनाए रखने के लिये न्यायिक सक्रियता एक शक्तिशाली साधन के रूप में उभरी है। हालाँकि यह कार्यपालिका और विधायिका की विफलताओं के विरुद्ध एक सुरक्षा-कवच के रूप में कार्य करती है, परंतु इसके साथ न्यायिक अतिचार और लोकतांत्रिक संतुलन के क्षरण से जुड़ी चिंताएँ भी उत्पन्न होती हैं, जो अनुच्छेद 50 (शक्तियों का पृथक्करण) की भावना को कमज़ोर कर सकती हैं।

    मुख्य भाग:

    लोकतांत्रिक शासन की सुरक्षा के रूप में न्यायिक सक्रियता: 

    • मूल अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता का संरक्षण: जब अन्य निकाय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में विफल रहे, तब न्यायालयों ने हस्तक्षेप किया।
      • मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) मामले में अनुच्छेद 21 का विस्तार करते हुए ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ को निष्पक्षता, तर्कसंगतता एवं उचित प्रक्रिया से जोड़ा गया।
    • विधायी और कार्यकारी शून्यता के प्रति न्यायिक प्रतिक्रिया: जहाँ कानून अनुपस्थित या अप्रभावी रहे, वहाँ न्यायिक सक्रियता ने शासन संबंधी रिक्तियों की आपूर्ति की है।
      • विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) मामले में विधि के अभाव में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के संबंध में दिशानिर्देश निर्धारित किये गए थे।
    • जवाबदेही और विधि के शासन को सशक्त करना: न्यायालयों ने मनमानी कार्यपालिका कार्रवाई और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ कार्रवाई की है। 
      • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) के मामले ने मूल संरचना सिद्धांत को विकसित किया, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि संसदीय सर्वोच्चता संवैधानिक लोकतंत्र को कमज़ोर नहीं करती है।
    • जनहित याचिकाओं (PIL) के माध्यम से न्याय तक अभिगम्यता का विस्तार: जनहित याचिका ने उपेक्षित समूहों के लिये न्यायिक अभिगम्यता का लोकतंत्रीकरण किया।
      • हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) मामले में विचाराधीन कैदियों के अधिकारों पर चर्चा की गई और इसके परिणामस्वरूप कारावास सुधारों की शुरुआत हुई।
    • पर्यावरण और सामाजिक शासन संबंधी हस्तक्षेप: न्यायिक सक्रियता ने सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया है।
      • एम.सी. मेहता मामले के परिणामस्वरूप प्रदूषण नियंत्रण मानदंड, वाहन उत्सर्जन मानक और ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन का संरक्षण लागू हुआ।

    लोकतांत्रिक शासन के लिये एक चुनौती के रूप में न्यायिक सक्रियता: 

    • कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्रों में न्यायिक हस्तक्षेप: न्यायालय कई बार विस्तृत नीतिगत निर्देश जारी करते हैं, जिससे शक्तियों के पृथक्करण की परिभाषा अस्पष्ट हो जाती है।
      • कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया 2018 में निष्क्रिय इच्छामृत्यु और ‘लिविंग विल्स’ को वैध ठहराना तथा कार्यपालिका योजनाओं की निरंतर निगरानी ने ‘न्यायिक शासन’ की बहस को जन्म दिया।
    • लोकतांत्रिक जवाबदेही का क्षरण: न्यायाधीश निर्वाचित नहीं होते हैं तथा विधायकों और कार्यपालिका के विपरीत सीधे जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं।
      • न्यायिक हस्तक्षेप की अधिकता निर्वाचित प्रतिनिधियों के जनादेश को कमज़ोर कर सकती है।
      • उदाहरण के लिये, वर्ष 2024 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से चुनावी बॉण्ड योजना को रद्द कर दिया, जो राजनीतिक दलों को गुमनाम दान की अनुमति देती थी। 
        • यह जवाबदेही बनाम हस्तक्षेप की बहस का एक सूक्ष्म उदाहरण प्रस्तुत करता है।
    • संस्थागत क्षमता और विशेषज्ञता की सीमाएँ: न्यायालयों में जटिल नीतियों को तैयार करने या उनकी निगरानी करने के लिये तकनीकी विशेषज्ञता की कमी हो सकती है।
      • उदाहरण: डिविजनल मैनेजर (अरावली गोल्फ कोर्स बनाम चंदर हास, 2008) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं इस प्रवृत्ति के खिलाफ चेतावनी दी थी, यह देखते हुए कि न्यायाधीशों को विधायिका या कार्यपालिका के कार्यों को अपने हाथ में नहीं लेना चाहिये, क्योंकि उनमें शासन की तकनीकी जानकारी का अभाव होता है।
    • नीति निर्माण में असंगति और अनिश्चितता: बार-बार जारी होने वाले न्यायिक निर्देश दीर्घकालिक शासन-योजना में अनिश्चितता उत्पन्न कर सकते हैं।
      • NJAC निर्णय (2015) ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा तो की, परंतु व्यवहार्य वैकल्पिक व्यवस्था प्रस्तुत किये बिना विधायी सुधार को अवरुद्ध करने के लिये इसकी आलोचना भी हुई।
    • न्यायिक लोकलुभावनवाद का खतरा: PIL क्षेत्राधिकार के विस्तार से कभी-कभी निरर्थक याचिकाएँ और मीडिया-प्रेरित हस्तक्षेप बढ़े हैं, जिससे न्यायालयों का ध्यान उनके मूल न्यायिक कार्यों से विचलित होता है।

    न्यायिक सक्रियता और लोकतांत्रिक शासन के बीच संतुलन बनाए रखने के उपाय: 

    • स्पष्ट मानकों द्वारा निर्देशित न्यायिक संयम: न्यायालयों को केवल अधिकारों के उल्लंघन या शासन में शून्यता के मामलों में ही हस्तक्षेप करना चाहिये, जिसमें आवश्यकता एवं आनुपातिकता को लागू किया जाना चाहिये।
      • भारत के विधि आयोग ने तदर्थ न्यायिक नीति निर्माण को रोकने के लिये निरंतरता एवं संयम पर ज़ोर दिया है।
    • जनहित याचिका तंत्र में सुधार: जनहित याचिकाओं की कड़ी जाँच से दुरुपयोग और न्यायिक लोकलुभावनवाद पर अंकुश लगाया जा सकता है।
      • सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश और विधि आयोग की टिप्पणियाँ न्याय तक अभिगम्यता एवं संस्थागत सीमाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती हैं।
    • कार्यपालिका की जवाबदेही को मज़बूत करना: प्रभावी शिकायत निवारण और विनियामक प्रवर्तन न्यायिक हस्तक्षेप को कम कर सकता है।
      • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने शासन संबंधी विफलताओं को रोकने के लिये मज़बूत जवाबदेही कार्यढाँचे की अनुशंसा की।
    • न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता बढ़ाना: न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए भारत को एक सुधारित NJAC की आवश्यकता है, जो कॉलेजियम प्रणाली के भीतर अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता को स्वीकार करे।
    • संस्थागत संवाद और विधायी प्रतिक्रिया में सुधार: NCRWC द्वारा सुझाए गए अनुसार, मज़बूत संसदीय स्थायी समितियाँ नीतिगत कमियों को शीघ्र ही दूर कर सकती हैं तथा न्यायिक कानून निर्माण को कम कर सकती हैं।

    निष्कर्ष

    न्यायिक सक्रियता लोकतांत्रिक सुरक्षा कवच होने के साथ-साथ एक संरचनात्मक चुनौती भी है। इसकी वैधता आवश्यकता, समानुपातिकता और संवैधानिक उद्देश्य पर निर्भर करती है। एक संतुलित दृष्टिकोण, जिसमें न्यायालय निर्वाचित संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र का सम्मान करते हुए अधिकारों एवं संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिये हस्तक्षेप करते हैं, भारत में लोकतांत्रिक शासन को बनाए रखने के लिये अनिवार्य है।

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