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प्रश्न :
प्रश्न. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग से परे जाकर सामाजिक परिवर्तन के एक सशक्त साधन के रूप में भी कार्य किया। विवेचना कीजिये। (150 शब्द)
15 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहासउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- संक्षेप में बताइये कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन मात्र राजनीतिक स्वतंत्रता तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य गहन सामाजिक परिवर्तन भी था।
- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन - राजनीतिक स्वतंत्रता की खोज और सामाजिक परिवर्तन के शक्तिशाली साधन के रूप में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिये तर्क प्रस्तुत कीजिये।
- यह बताते हुए निष्कर्ष लिखिये कि इस आंदोलन ने एक समावेशी, लोकतांत्रिक और सामाजिक रूप से जागरूक भारतीय राष्ट्र की नींव रखी।
परिचय:
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन केवल औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष नहीं था, बल्कि एक व्यापक जुड़ाव भी था, जिसका लक्ष्य भारतीय समाज को परिवर्तित करना था। स्वराज की मांग के साथ-साथ, इसने गहराई से जमी हुई सामाजिक असमानताओं को संबोधित किया और एक नैतिक एवं सामाजिक रूप से पुनर्जीवित राष्ट्र के निर्माण का लक्ष्य रखा।
उदाहरण के लिये, गांधीजी के असहयोग आंदोलन (1920–22) ने खादी, जन समर्थन और अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान के माध्यम से सामाजिक सुधार के साथ औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष को जोड़ा, जो आंदोलन के परिवर्तनकारी सामाजिक स्वरूप को दर्शाता है।
मुख्य भाग:
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन- राजनीतिक स्वतंत्रता की खोज
- संवैधानिक सुधार और प्रतिनिधित्व: "नरमपंथी चरण" (1885–1905) के दौरान विधायी परिषदों में भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने और प्रशासन में भारतीयों को उनकी ही शासन-व्यवस्था में आह्वान करने के लिये नागरिक सेवाओं के भारतीयकरण की माँग की गई।
- स्वराज (स्व-शासन): वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के बाद, "चरमपंथियों" ने लक्ष्य को स्वराज में बदल दिया। इसका अर्थ ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर प्रशासनिक स्वायत्तता था, जो कनाडा या ऑस्ट्रेलिया के समान था।
- नागरिक स्वतंत्रताओं का दावा: यह आंदोलन दमनकारी कानूनों (जैसे रॉलेट एक्ट और वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट) के विरुद्ध एक निरंतर संघर्ष था। इसने भाषण, सभा और प्रेस की स्वतंत्रता के राजनीतिक अधिकार की मांग की—जो आधुनिक लोकतंत्र की आधारशिला हैं।
- पूर्ण स्वराज (पूर्ण स्वतंत्रता): वर्ष 1929 तक, कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन ने आधिकारिक रूप से पूर्ण स्वराज को लक्ष्य घोषित किया, जिसमें ब्रिटिश संप्रभुता के पूर्ण अंत और एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की मांग की गई।
सामाजिक परिवर्तन के एक शक्तिशाली साधन के रूप में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन
- सामाजिक सुधार एक अभिन्न घटक के रूप में
- सामाजिक बुराईयों का उन्मूलन: राजा राम मोहन राय जैसे नेताओं द्वारा सती प्रथा, बाल विवाह के विरुद्ध और विधवा पुनर्विवाह के लिये सुधारवादी प्रयासों ने एक सुधारवादी राष्ट्रीय चेतना की प्रारंभिक नींव रखी।
- जाति और सामाजिक समानता: आंदोलन ने समतावादी विचारों के प्रसार के माध्यम से जाति पदानुक्रम को चुनौती दी। अस्पृश्यता के विरुद्ध गांधीवादी अभियानों और जन आंदोलनों में दलितों को शामिल करने से सामाजिक भागीदारी व्यापक हुई।
- महिलाओं का उत्थान: असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलनों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने उनकी सार्वजनिक भूमिका को पुनर्परिभाषित किया, जिससे लैंगिक समानता और राजनीतिक जागरूकता को बढ़ावा मिला।
- सांस्कृतिक और वैचारिक परिवर्तन
- राष्ट्रीय पहचान का निर्माण: आंदोलन ने देशी प्रेस, राष्ट्रवादी साहित्य और खादी एवं राष्ट्रीय ध्वज जैसे प्रतीकों के माध्यम से एक साझा राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा दिया।
- राजनीति का लोकतंत्रीकरण: जन समर्थन, सत्याग्रह और रचनात्मक कार्यक्रमों ने भागीदारी, अनुशासन और अहिंसा के मूल्यों का संचार किया।
- आर्थिक और शैक्षिक आयाम
- स्वदेशी और आत्मनिर्भरता: स्वदेशी उद्योगों का प्रचार आर्थिक आत्मनिर्भरता और श्रम की गरिमा के उद्देश्य से था।
- शैक्षिक सुधार: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे राष्ट्रीय संस्थानों ने आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को बढ़ावा दिया।
- पंथनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव
- आंदोलन ने "सर्व धर्म समभाव" की भावना को संस्थागत बनाया। मौलाना आज़ाद और गांधी जैसे नेताओं ने ब्रिटिश "फूट डालो और शासन करो" नीति का सामना एक मिश्रित संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) को बढ़ावा देकर किया, जिससे धर्मनिरपेक्षता भविष्य के गणराज्य की एक आधारशिला बनी।
- श्रमिक और किसान अधिकार
- आंदोलन ने अभिजात वर्ग और जनता के बीच के विभाजन को समाप्त किया। वर्ष 1920 में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) और अखिल भारतीय किसान सभा के गठन ने निष्पक्ष मज़दूरी और भूमि अधिकारों के संघर्ष को राष्ट्रीय एजेंडे में एकीकृत किया, जिससे सामंत शोषण को चुनौती मिली।
- जनजातीय एकीकरण और गरिमा:
- मुंडा उलगुलान और रम्पा विद्रोह जैसे जनजातीय विद्रोहों को साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के रूप में मान्यता दी गई।
- इसने "जल, जंगल, ज़मीन" अधिकारों की भावना को बढ़ावा दिया, यह सुनिश्चित करते हुए कि जनजातीय पहचान राष्ट्रीय ढाँचे के भीतर संरक्षित रहे।
निष्कर्ष
इस प्रकार, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने सामाजिक परिवर्तन के एक व्यापक परियोजना के रूप में कार्य किया, जिसका लक्ष्य न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता, बल्कि सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक नवीनीकरण और नैतिक पुनर्जनन भी था, जिसने एक लोकतांत्रिक और समावेशी भारत की नींव रखी।
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