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प्रश्न :
आपने हाल ही में एक अर्ध-शहरी ज़िले के ज़िलाधिकारी के रूप में कार्यभार संभाला है, जहाँ प्रशासन को प्रायः अतिक्रमण विवादों और बढ़ती जन-अपेक्षाओं का सामना करना पड़ता है। पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद आप देखते हैं कि आपके एक कनिष्ठ अधिकारी राघव, जो उप-मंडल अधिकारी (SDM) हैं, सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हो गये हैं। वे नियमित रूप से निरीक्षणों, जन-संपर्कों और प्रवर्तन कार्यवाहियों से संबंधित अपडेट पोस्ट करते हैं और स्वयं को एक ऊर्जावान व सक्रिय अधिकारी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
हालाँकि आप धीरे-धीरे देखते हैं कि उनकी पोस्ट्स में प्रायः औचक निरीक्षणों के वीडियो, उनके पीछे तनाव में खड़े कनिष्ठ कर्मचारियों की तस्वीरें तथा दुकानों को सील किये जाने जैसी दण्डात्मक कार्यवाहियों के क्लिप (कभी-कभी “कार्रवाई कथनी से अधिक मायने रखती है” जैसे कड़े कैप्शन के साथ) शामिल होते हैं। इनमें से एक वीडियो, जिसमें उन्होंने एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान को सील किया है, वायरल हो जाता है। इसे कुछ लोगों की प्रशंसा मिलती है, परंतु इस बात की आलोचना भी होती है कि प्रक्रियात्मक निष्पक्षता स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई गई।
सहकर्मी दबे स्वर में बताते हैं कि इस प्रकार सत्ता के सार्वजनिक प्रदर्शन से विश्वास की बजाय भय का वातावरण बन सकता है। दुकानदार एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को बताते हैं कि वे SDM कार्यालय जाने में हिचकते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी सामान्य शिकायतें भी रिकॉर्ड होकर ऑनलाइन पोस्ट हो सकती हैं। एक स्थानीय विधायक की अनौपचारिक शिकायत में SDM के आचरण को ‘मनमानी’ और प्रचार से प्रेरित बताया गया है। एक गुमनाम याचिका भी आपके कार्यालय तक पहुँचती है जिसमें सीलिंग कार्यवाही में अपर्याप्त सूचना का आरोप लगाया गया है, हालाँकि आधिकारिक रिकॉर्ड में इसका पालन न होने की बात दर्ज है।
आप समझते हैं कि इस मुद्दे में कोई स्पष्ट कानूनी उल्लंघन शामिल नहीं है, बल्कि इसमें सूक्ष्म नैतिक दुविधाएँ, पारदर्शिता एवं भय-सृजन की सीमा, सोशल मीडिया का जिम्मेदार उपयोग, प्रवर्तन के दौरान व्यक्तियों की गरिमा और युवा अधिकारियों के लिये उत्साह व संस्थागत औचित्य के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता शामिल है।
ज़िलाधिकारी के रूप में आपको यह तय करना है कि इस स्थिति को किस प्रकार नियंत्रित किया जाये, जिससे प्रशासनिक सत्यनिष्ठा बनी रहे, एक प्रतिभाशाली अधिकारी का मनोबल क्षीण न हो तथा नागरिक स्वयं को अपमानित या अनजाने में सत्ता-दुरुपयोग का शिकार महसूस न करें।प्रश्न
12 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़
1. इस मामले में निहित मूल नैतिक मुद्दों का अभिनिर्धारण कीजिये तथा लोक प्रशासन में उनकी प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिये।
2. क्या आपको लगता है कि SDM का सोशल मीडिया उपयोग यद्यपि विधिक है, फिर भी इससे नैतिक चिंताएँ उत्पन्न होती हैं? लोक सेवा, मर्यादा तथा व्यक्तियों की गरिमा के सिद्धांतों के आधार पर अपने उत्तर की पुष्टि कीजिये।
3. ज़िलाधिकारी के रूप में आप इस स्थिति को निष्पक्ष, संतुलित तथा रचनात्मक ढंग से निपटने के लिये क्या कदम उठाएँगे? इस दिशा में अल्पकालिक और दीर्घकालिक उपाय सुझाइये।
4. सोशल मीडिया के प्रयोग के लिये ऐसे दिशा-निर्देश या आचार-संहिता प्रस्तावित कीजिये जो पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिक संयम तीनों के बीच संतुलन बनाये रखें।उत्तर :
परिचय:
यह मामला लोक प्रशासन में उभरती एक नैतिक चुनौती को उजागर करता है, जो लोक सेवकों द्वारा सत्ता प्रयोग में सोशल मीडिया के उपयोग से संबंधित है। पारदर्शिता और जनभागीदारी वांछनीय हैं, लेकिन प्रवर्तन कार्रवाइयों का अत्यधिक सार्वजनिक प्रदर्शन धमकी, गरिमा का हनन एवं जनविश्वास की हानि का जोखिम उत्पन्न करता है। दुविधा दृश्यता और संयम के बीच संतुलन बनाने में तथा व्यक्तिगत उत्साह एवं संस्थागत मर्यादा के बीच संतुलन स्थापित करने में निहित है।
इसमें शामिल हितधारक:
- ज़िला कलेक्टर (स्वयं): प्रशासनिक शुचिता और संस्थागत संस्कृति के लिये जिम्मेदार।
- SDM (राघव): एक युवा, उत्साही अधिकारी जो प्रभाव और लोकप्रियता हासिल करना चाहता है।
- नागरिक और दुकानदार: प्रवर्तन कार्रवाइयों के विषय और जनता की धारणा।
- कनिष्ठ कर्मचारी: वे अधीनस्थ कर्मचारी जिनकी गरिमा और मनोबल प्रभावित हो सकता है।
- राजनीतिक कार्यपालिका (विधायक): आचरण और जन आक्रोश को लेकर चिंतित।
- मीडिया और सोशल मीडिया दर्शक: प्रशासनिक कार्यों के प्रवर्तक।
- एक संस्था के रूप में ज़िला प्रशासन: प्रतिष्ठा, विश्वास और वैधता।
1. इस मामले में निहित मूल नैतिक मुद्दों का अभिनिर्धारण कीजिये तथा लोक प्रशासन में उनकी प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिये।
- पारदर्शिता बनाम धमकी: प्रशासनिक कार्रवाइयों को साझा करने से पारदर्शिता को बढ़ावा मिलता है, लेकिन निरंतर औचक निरीक्षण और दंडात्मक कार्रवाइयों को प्रदर्शित करने से विश्वास के बजाय भय उत्पन्न हो सकता है।
- लोक प्रशासन को सुलभ और नागरिक-हितैषी रहना चाहिये, न कि दमनकारी।
- अधिकार के प्रयोग में औचित्य: अधिकार का सार्वजनिक प्रदर्शन, विशेष रूप से तनावपूर्ण अधीनस्थों के सशक्त कैप्शन और दृश्यों के साथ, शासन को तमाशा में बदलने का जोखिम उत्पन्न करता है।
- यह सरकारी कर्मचारियों से अपेक्षित शिष्टाचार के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
- व्यक्तियों की गरिमा: दुकानों को सील करने या चिंतित कर्मचारियों को दिखाने वाले वायरल वीडियो व्यक्तियों को अपमानित कर सकते हैं।
- यह कांट के उस सिद्धांत के विपरीत है, जिसमें लोगों को प्रचार के साधन के रूप में नहीं, बल्कि स्वयं में एक लक्ष्य के रूप में माना जाना चाहिये।
- व्यक्तिगत ब्रांडिंग बनाम संस्थागत तटस्थता: व्यक्तिगत कार्यों का अत्यधिक प्रदर्शन संस्थागत चरित्र को कमज़ोर करता है और वेबरियन प्रशासनिक तटस्थता को कमज़ोर करता है, जहाँ अधिकार पद से प्राप्त होता है, न कि व्यक्तित्व से।
- प्रक्रियात्मक निष्पक्षता बनाम जनमानस: भले ही विधिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया हो, न्याय का दिखना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। उच्चाधिकारपूर्ण व्यवहार की धारणा प्रशासन के प्रति जनविश्वास को क्षीण करती है।
2. क्या SDM का सोशल मीडिया उपयोग यद्यपि विधिक है, फिर भी इससे नैतिक चिंताएँ उत्पन्न होती हैं? लोक सेवा, मर्यादा तथा व्यक्तियों की गरिमा के सिद्धांतों के आधार पर अपने उत्तर की पुष्टि कीजिये।
SDM का आचरण विधिक रूप से अनुमेय होने के बावजूद नैतिक चिंताएँ उत्पन्न करता है।
लोक सेवा नैतिकता के परिप्रेक्ष्य से:
- मर्यादा: प्रवर्तन कार्रवाइयों का उत्सवपूर्ण या आक्रामक प्रस्तुतीकरण सार्वजनिक पद से अपेक्षित संयम का उल्लंघन करता है।
- गरिमा: नागरिक और कर्मचारी अधिकार-संपन्न व्यक्तियों के बजाय सत्ता के अधीन व्यक्तियों के रूप में दिखाई देते हैं।
- वस्तुनिष्ठता: कार्रवाइयों का चयनात्मक प्रस्तुतीकरण वास्तविकता को विकृत कर सकता है और भय-आधारित अनुपालन को बढ़ावा दे सकता है।
- करुणा: नागरिक SDM के कार्यालय जाने में हिचकिचाते हैं, जिससे विश्वास और अभिगम्यता में बाधा आती है।
नोलन के ‘सत्यनिष्ठा सिद्धांत’ के अनुसार, सार्वजनिक शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत प्रसिद्धि के लिये नहीं किया जाना चाहिये। गांधीजी के आदर्श वाक्य के अनुसार, यदि सबसे कमज़ोर नागरिक सशक्त महसूस करने के बजाय भयभीत महसूस करता है, तो यह आचरण नैतिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इस प्रकार, यह आचरण विधिक होते हुए भी नैतिक रूप से समस्याग्रस्त है।
3. ज़िलाधिकारी के रूप में आप इस स्थिति को निष्पक्ष, संतुलित तथा रचनात्मक ढंग से निपटने के लिये क्या कदम उठाएँगे? इस दिशा में अल्पकालिक और दीर्घकालिक उपाय सुझाइये।
अल्पकालिक उपाय
- गोपनीय परामर्श
- SDM के साथ व्यक्तिगत रूप से संवाद करना चाहिये, उनकी उत्सुकता की सराहना करते हुए उन्हें भय-आधारित दृश्यता के अनपेक्षित परिणामों के प्रति संवेदनशील बनाना चाहिये। यह भावनात्मक बुद्धिमत्ता और नैतिक नेतृत्व को दर्शाता है।
- सोशल मीडिया के उपयोग पर तत्काल सलाह
- SDM को निर्देश दिया जाना चाहिये कि वे दंडात्मक कार्रवाइयों, अधीनस्थों या नागरिकों की तस्वीरें एवं आपत्तिजनक कैप्शन पोस्ट करने से बचें; इसके बजाय सूचनात्मक और सेवा-उन्मुख संचार को प्रोत्साहित करें।
- प्रक्रियात्मक पारदर्शिता को सुदृढ़ करना
- भविष्य की सभी प्रवर्तन कार्रवाइयों में नोटिस, सुनवाई और अनुपालन प्रक्रियाओं का स्पष्ट अभिलेखीकरण सुनिश्चित किया जाना चाहिये, जिससे प्राकृतिक न्याय एवं जनविश्वास सुदृढ़ हो।
दीर्घकालिक उपाय
- ज़िला स्तरीय सोशल मीडिया दिशानिर्देश:
- आधिकारिक सोशल मीडिया उपयोग हेतु स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOP) तैयार की जानी चाहिये तथा प्रवर्तन संचार के लिये पर्सनल हैंडल के स्थान पर संस्थागत खातों को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
- क्षमता निर्माण और मार्गदर्शन:
- विशेषतः युवा अधिकारियों के लिये नैतिक संप्रेषण, शक्ति-संयम और नागरिक-केंद्रित शासन पर कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिये।
- मौन प्रभावशीलता की संस्कृति को प्रोत्साहन:
- संस्थागत विश्वसनीयता को सुदृढ़ करने के लिये दिखावे या लोकप्रियता के बजाय परिणामों और सेवा वितरण को पुरस्कृत किया जाना चाहिये।
4. सोशल मीडिया के प्रयोग के लिये ऐसे दिशा-निर्देश या आचार-संहिता प्रस्तावित कीजिये जो पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिक संयम तीनों के बीच संतुलन बनाये रखें।
मूलभूत सिद्धांत
- जनसेवा सर्वोपरि: आधिकारिक सोशल मीडिया के उपयोग में जनहित और जनसेवा को प्राथमिकता दी जानी चाहिये तथा इसका उपयोग व्यक्तिगत लोकप्रियता, ब्रांडिंग या आत्म-प्रचार के लिये नहीं किया जाना चाहिये।
- गरिमा और सम्मान: यह सलाह दी जाती है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल सभी नागरिकों, अधीनस्थों और हितधारकों के साथ कथित उल्लंघनों की परवाह किये बिना गरिमा एवं सम्मान के साथ व्यवहार किया जाए।
- व्यक्तिगत दृश्यता पर संस्थागत सर्वोच्चता: प्रशासनिक कार्यों को व्यक्तिगत अधिकारियों के बजाय संस्था के कार्यों के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिये, क्योंकि अत्यधिक व्यक्तिगत दृश्यता संस्थागत विश्वास को कम कर सकती है।
आधिकारिक सोशल मीडिया उपयोग के सुझाए गए उद्देश्य
- सूचनात्मक, न कि प्रदर्शनात्मक: सोशल मीडिया संचार को आदर्श रूप से नीतिगत जागरूकता, सेवा वितरण संबंधी अपडेट, नागरिक सुविधा तंत्र और परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये, न कि प्रदर्शनात्मक या बल-केंद्रित कार्यों पर।
- परिणाम-आधारित संचार: अधिकारियों को दंडात्मक क्षणों या अचानक की गई कार्रवाइयों को उजागर करने के बजाय, प्राप्त अनुपालन, सार्वजनिक लाभों और उठाए गए सुधारात्मक उपायों पर ज़ोर देने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
विषयवस्तु पर सुझाए गए प्रतिबंध
- प्रत्यक्ष या सनसनीखेज प्रवर्तन से परहेज़: यह सलाह दी जाती है कि औचक निरीक्षण, छापेमारी, तोड़फोड़ या सीलिंग अभियान का सीधा प्रसारण या नाटकीय प्रस्तुति नहीं किया जाना चाहिये। यदि कार्रवाई से संबंधित दृश्य साझा किये जाते हैं, तो उन्हें घटना के बाद का, गुमनाम और उचित संदर्भ के साथ साझा किया जाना चाहिये।
- पहचान की सुरक्षा और निर्दोषता का सिद्धांत: जब तक विधिक रूप से अनिवार्य न हो, चेहरे, नाम, दुकान के बोर्ड या अन्य पहचान चिह्नों को प्रकट करने से बचना चाहिये। उचित विधिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले प्रयुक्त भाषा से अपराध का संकेत नहीं मिलना चाहिये।
- अधीनस्थों के भय-प्रदर्शन से परहेज़: ऐसे कंटेंट के प्रस्तुतीकरण से परहेज़ करना चाहिये, जिसमें कनिष्ठ कर्मचारी भय, मौन या अपमान की स्थिति में दिखें। नेतृत्व के संचार से व्यावसायिकता और आत्मविश्वास झलकना चाहिये, न कि दबाव।
निष्कर्ष:
डिजिटल युग में संयम के बिना प्रवर्धित अधिकार अनजाने में भय का रूप ले सकता है। नैतिक शासन के लिये पारदर्शिता और करुणा तथा दृश्यता और विनम्रता के बीच संतुलन आवश्यक है। ज़िला कलेक्टर, दंडात्मक कार्रवाई के बजाय रचनात्मक मार्गदर्शन द्वारा संस्थागत अखंडता को बनाए रखते हुए एक होनहार अधिकारी का विकास करते हैं। वास्तविक लोक सेवा ऑनलाइन प्रशंसा में नहीं बल्कि सतत जनविश्वास में निहित होती है।
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