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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • “आर्थिक प्रदर्शन के लिये संस्थागत गुणवत्ता एक निर्णायक चालक है।” इस संदर्भ में लोकतंत्र को सुदृढ़ करने के लिये सिविल सेवा में सुधारों के सुझाव दीजियेl

    19 Jan, 2021 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • लोकतंत्र में सिविल सेवा की उपयोगिता बताते हुए उत्तर की शुरुआत करें।
    • भारत में सिविल सेवकों के सामने आने वाली कठिनाइयों एवं संभावित सुधारों के बारे में बताएँ।
    • उचित निष्कर्ष दें।

    लोकतंत्र में संस्थागत गुणवत्ता यह निर्धारित करती है कि सरकारी तंत्र सार्वजनिक सेवा, कानून के शासन और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के पालन में कितना सफल होता है। ऐसी ही एक संस्था है सिविल सेवा, जो सरकार और नागरिकों के बीच कड़ी के रूप में कार्य करती है तथा लोकतंत्र को मजबूत करती है।

    हालाँकि सिविल सेवकों के सामने कई चुनौतियाँ हैं, जो लोकतंत्र के मार्ग में अवरोधक का काम करती हैं।

    भारत में सिविल सेवकों के लिये चुनौतियाँ यथास्थितिवाद: सार्वजनिक सेवा के अंग के रूप में सिविल सेवकों को बदलाव के लिये तैयार रहना चाहिये। हालाँकि सामान्यत: यह देखा जाता है कि वे बदलावों का विरोध करते हैं क्योंकि वे अपने विशेषाधिकार और संभावनाओं से घिरे होते हैं और इस तरह यथास्थितिवादी हो जाते हैं।

    उदाहरण के लिये संविधान के 73वें और 74वें संशोधन में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की परिकल्पना की गई है। लेकिन नियंत्रण और जवाबदेही में परिवर्तन को स्वीकार करने के लिये सिविल सेवकों की इच्छाशक्ति के अभाव के कारण इच्छित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाया है।

    नियमों का अतिपालन करने वाली नौकरशाही: यह मुख्य रूप से लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं का ध्यान रखे बिना नियमों और कानूनों का पालन करती है।

    नियमों का अतिपालन करने वाली नौकरशाही के कारण कुछ सिविल सेवकों में नौकरशाही व्यवहार देखा जाता है, जिससे लालफीताशाही, प्रक्रियाओं में जटिलता और नौकरशाह संगठनों की लोगों की ज़रूरतों को नज़रअंदाज करने वाली विकृत प्रतिक्रियाओं जैसे मुद्दे सामने आते हैं।

    राजनीतिक हस्तक्षेप: लोकलुभावन मांग को पूरा करने के लिये राजनीतिक प्रतिनिधि प्रशासनिक अधिकारियों के कामकाज को प्रभावित करते हैं। एक प्रशासनिक अधिकारी को राजनीतिक प्रमुख की इच्छा का पालन करना पड़ता है। इस हस्तक्षेप के कारण कभी-कभी भ्रष्टाचार, ईमानदार सिविल सेवकों के मनमाना हस्तांतरण जैसे मुद्दे सामने आते हैं।

    इसके कारण महत्त्वपूर्ण पदों पर सर्वश्रेष्ठ अधिकारियों को नियुक्त नहीं किया जाता है और संस्थान की अक्षमता के चलते अंततः यह संस्थागत गिरावट का कारण बन सकता है।

    संभावित सुधार

    सेवाओं का शीघ्र वितरण: प्रत्येक विभाग को प्रशासनिक कार्यों में होने वाली देरी में कमी करने और सेवाओं के समान वितरण हेतु भागीदारी प्रतिक्रिया तंत्र सुनिश्चित कर प्रक्रियाओं को सरल बनाने की कोशिश करनी चाहिये।

    जवाबदेही को बढ़ाना: प्रमुख ज़िम्मेदारी/फोकस के क्षेत्रों को निर्धारित करने और सिविल सेवकों के मूल्यांकन के लिये विवेकाधीन पहलुओं को उत्तरोत्तर कम करने की आवश्यकता है।

    सभी केंद्रीय और राज्य संवर्गों में स्मार्ट प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट रिकॉर्डिंग ऑनलाइन विंडो (Smart Performance Appraisal Report Recording Online Window- SPARROW) स्थापित किया जाना चाहिये।

    साथ ही कई समितियों द्वारा दिये गए सुझावों के अनुसार, अधिकारियों के प्रदर्शन का आकलन करने और मानदंडों को पूरा करने में असमर्थ लोगों को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने के लिये मानक विकसित करने की आवश्यकता है।

    आचार संहिता: जैसा कि द्वितीय एआरसी द्वारा सुझाया गया है, आचार संहिता के नियमों को सुव्यवस्थित करने के साथ ही आचार संहिता को लागू कर सिविल सेवकों में नैतिक आधार को विकसित करने की आवश्यकता है।

    यह सिविल सेवकों को लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाएगा और उन नैतिक दुविधाओं के समाधान में मदद करेगा, जो अक्सर सार्वजनिक क्षेत्र में उभर कर आते हैं।

    निष्कर्ष

    सरदार पटेल ने सिविल सेवा को "सरकारी मशीनरी का स्टील फ्रेम" माना। हालाँकि पर्याप्त सुधारों के बिना इस स्टील फ्रेम में जंग लग सकता है और यह ढह सकता है। इसलिये वर्तमान चुनौतियों से निपटने और लोकतंत्र को समग्र रूप से मज़बूत करने के लिये सिविल सेवा में सुधार किये जाने की आवश्यकता है।

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