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सामाजिक न्याय

भारतीय अर्थव्यवस्था में देखभाल अर्थव्यवस्था पर पुनर्विचार

  • 06 Jan 2026
  • 164 min read

यह एडिटोरियल 05/01/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “The struggle to count women’s labour” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख महिलाओं के श्रम की अदृश्यता को उजागर करता है, जिसे न तो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में मापा जाता है और न ही राष्ट्रीय लेखांकन या नीतिगत ढाँचों में व्यवस्थित रूप से गिना जाता है।

प्रिलिम्स के लिये: बीजिंग कार्य योजना, ILO, UN वुमन, ICDS, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020, मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम 2017, पालना योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), भारत में दिव्यांगजन

मेन्स के लिये: देखभाल अर्थव्यवस्था, महिलाओं के श्रम को मापने में चुनौतियाँ और व्यावहारिक उपाय 

सदियों से, आर्थिक प्रणालियों ने उस श्रम की उपेक्षा की है, जो परिवारों को संचालित करता है और कार्यबल का पुनः उत्पादन सुनिश्चित करता है। यह ऐतिहासिक उपेक्षा आज भी जारी है, जहाँ वैश्विक स्तर पर महिलाएँ पुरुषों की तुलना में प्रतिदिन 2.8 घंटे अधिक अवैतनिक देखभाल और घरेलू कार्य में व्यतीत करती हैं (संयुक्त राष्ट्र, 2023)। देखभाल अर्थव्यवस्था केवल भौतिक कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक स्थिरता और उत्पादकता के लिये आवश्यक भावनात्मक और मानसिक श्रम भी शामिल है। इसके बावजूद, यह श्रम GDP गणनाओं, श्रम कानूनों और बजटीय प्राथमिकताओं से बाहर रखा गया है। इसलिये समावेशी और सतत आर्थिक विकास प्राप्त करने के लिये देखभाल अर्थव्यवस्था को पहचानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

देखभाल अर्थव्यवस्था क्या है?

  • परिचय: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, देखभाल अर्थव्यवस्था से तात्पर्य "उन वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और प्रावधान से है जो लोगों के शारीरिक, सामाजिक, भावनात्मक और बौद्धिक कल्याण के लिये आवश्यक हैं।" इसमें शामिल हैं:
    • अवैतनिक देखभाल कार्य: खाना बनाना, सफाई करना, पानी या ईंधन लाना, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की देखभाल, बीमारों या दिव्यांगजनों की देखभाल करना और घरेलू दिनचर्या का प्रबंधन करना।
    • भावनात्मक और मानसिक श्रम: भावनात्मक सहारा प्रदान करना, पारिवारिक संबंधों को बनाए रखना, विवादों को सुलझाना, घरेलू जरूरतों की योजना बनाना और परिवार के सदस्यों की भलाई सुनिश्चित करना।
    • सवैतनिक देखभाल कार्य: नर्स, आँगनवाड़ी कार्यकर्त्ता, आशा कार्यकर्त्ता, घरेलू कामगार, शिक्षक, बाल देखभाल कार्यकर्त्ता और बुजुर्गों की देखभाल करने वाले जैसे कार्य।

भारत में देखभाल अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने वाले प्रमुख प्रावधान क्या हैं?

  • संवैधानिक प्रावधान: 
    • अनुच्छेद 14 – समता का अधिकार: यह सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समानता और विधियों की समान सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
      • कार्यरत महिलाओं के संदर्भ में, यह रोज़गार-संबंधी मामलों में किसी भी मनमाने या असमान व्यवहार की अनुमति नहीं देता।
    • अनुच्छेद 15 – भेदभाव का निषेध: अनुच्छेद 15 अन्य कारकों के साथ-साथ लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
      • रोज़गार के संदर्भ में, यह महिलाओं को लिंग आधारित बहिष्कार से सुरक्षा प्रदान करता है और सार्वजनिक अवसरों तक समान पहुँच सुनिश्चित करता है।
    • अनुच्छेद 16 – लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता: यह प्रावधान सार्वजनिक रोज़गार के मामलों में सभी नागरिकों के लिये समान अवसर सुनिश्चित करता है।
      • यह महिलाओं को केवल लिंग के आधार पर नौकरी, पदोन्नति या सेवा लाभों से वंचित किये जाने से सुरक्षा प्रदान करता है।
    • अनुच्छेद 39 –राज्य द्वारा अनुसरणीय नीति तत्त्व: यह कार्यरत महिलाओं से संबंधित महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक सिद्धांतों को निर्धारित करता है।
      • 39 (a): पुरुषों और महिलाओं को आजीविका के पर्याप्त साधनों का समान अधिकार है।
      • 39(d): पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिये समान कार्य के लिये समान वेतन अनिवार्य करता है।
      • 39 (e): राज्य को श्रमिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करने, बाल श्रम को रोकने और आर्थिक आवश्यकता के कारण नागरिकों को अनुपयुक्त रोज़गार में धकेलने से बचने का निर्देश देता है।
    • अनुच्छेद 42 – न्यायसंगत और मानवीय कार्य परिस्थितियाँ: यह राज्य को मानवीय कार्य परिस्थितियों को सुनिश्चित करने और मातृत्व अवकाश प्रदान करने का निर्देश देता है।
      • यह अनुच्छेद कार्यस्थल सुरक्षा मानकों और मातृत्व-संबंधी संरक्षण के संवैधानिक आधार के रूप में कार्य करता है।
  • वैधानिक श्रम संरक्षण: ये कानून वैतनिक देखभाल कार्यकर्ताओं और औपचारिक क्षेत्र में मातृत्व अधिकारों के लिये कानूनी आधार प्रदान करते हैं।
    • मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017: पहले दो बच्चों के लिये 26 सप्ताह का सवैतनिक मातृत्व अवकाश अनिवार्य करता है।
    • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: इस संहिता का उद्देश्य पहली बार असंगठित श्रमिकों, गिग श्रमिकों और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा (बीमा, मातृत्व लाभ आदि) प्रदान करना है।
      • यह "गृह-आधारित कार्यकर्त्ताओं" को मान्यता देता है, जो घरेलू देखभाल कार्य को औपचारिक बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • संस्थागत ढाँचे और श्रमिक वर्ग: संस्थागत ढाँचे एवं श्रमिक वर्ग: भारतीय देखभाल अर्थव्यवस्था व्यापक स्तर पर “स्वैच्छिक” या “मानद” श्रमिकों पर निर्भर है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों को कार्यान्वित करते हैं।
    • समेकित बाल विकास सेवा (ICDS): यह योजना आँगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं (AWW) और सहायकों के माध्यम से संचालित होती है और भारत में प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं पोषण (ECCE) की मूल संरचना का निर्माण करती है।
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): यह मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं (ASHA) का संचालन करता है। कानूनी रूप से इन्हें "स्वयंसेवक" के रूप में वर्गीकृत किया गया है, लेकिन ये ग्रामीण भारत में मातृ एवं नवजात शिशु देखभाल की प्राथमिक प्रदाता हैं।
    • पालना योजना (राष्ट्रीय क्रेच योजना): यह एक केंद्रीय योजना है जो विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र में कार्यरत माताओं के बच्चों (6 महीने से 6 वर्ष तक) के लिये डे-केयर सुविधाएँ प्रदान करती है।
  • वृद्धजन और दिव्यांगजनों की देखभाल: वृद्ध और दिव्यांग जनों के लिये प्रावधान, भरण-पोषण और स्वास्थ्य अधिकारों पर केंद्रित हैं।
    • माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007: यह अधिनियम बच्चों/वारिसों के लिये वरिष्ठ नागरिकों को भरण-पोषण प्रदान करना कानूनी रूप से अनिवार्य बनाता है। साथ ही, यह प्रत्येक ज़िले में वृद्धाश्रम की स्थापना को भी अनिवार्य करता है।
    • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016: यह अधिनियम समावेशन, गरिमा और स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है तथा 21 मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं के लिये अधिकार-आधारित संरचना प्रदान करता है, जिससे उनके लिए समान अवसर और पहुँच सुनिश्चित होती है।
  • नीति और मान्यता का विकास: हाल के सुधार अदृश्य देखभाल अर्थव्यवस्था को मात्रात्मक रूप देने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं।
  • समय उपयोग सर्वेक्षण (TUS): NSO द्वारा संचालित इस डेटा का उपयोग अब महिलाओं द्वारा किये जाने वाले अवैतनिक कार्यों को राष्ट्रीय GDP में शामिल करने के लिये सुदृढ़ तर्क प्रस्तुत करता है।

देखभाल अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने वाले वैश्विक मानदंड 

  • बीजिंग कार्य योजना (1995): यह पहला वैश्विक ढाँचा था जिसने औपचारिक रूप से अवैतनिक देखभाल और घरेलू कार्य को एक आर्थिक एवं विकास संबंधी मुद्दे के रूप में मान्यता दी। 
    • इसमें समय-उपयोग सर्वेक्षणों और उपग्रह राष्ट्रीय लेखा-जोखाओं के माध्यम से महिलाओं के अवैतनिक श्रम को दृश्यमान बनाने का आह्वान किया गया। 
    • इस मंच ने पुरुषों और महिलाओं के बीच तथा राज्य, बाज़ार एवं घरों में देखभाल संबंधी उत्तरदायित्वों के पुनर्वितरण पर ज़ोर दिया।
      • इन प्रावधानों ने बाद के ढाँचों जैसे SDG 5.4 एवं ILO देखभाल-अर्थव्यवस्था मानकों के लिये मानक आधार निर्मित किये।
  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के प्रावधान: 
    • भविष्य में गरिमापूर्ण कार्य हेतु देखभाल कार्य और देखभाल संबंधी नौकरियाँ (2018): देखभाल कार्य को उत्पादक आर्थिक गतिविधि के रूप में मान्यता देता है, जिसमें सशुल्क एवं अवैतनिक देखभाल दोनों शामिल हैं। 
      • अंतर्राष्ट्रीय संगठन (ILO) का "डिसेंट केयर वर्क के लिये 5R फ्रेमवर्क ": अवैतनिक देखभाल कार्य को पहचानना, कम करना और पुनर्वितरित करना और देखभाल कार्यकर्त्ताओं के लिये गरिमापूर्ण कार्य को बढ़ावा देकर और उनके प्रतिनिधित्व, सामाजिक संवाद और सामूहिक सौदेबाज़ी की गारंटी देकर सवैतनिक देखभाल कार्य को पुरस्कृत करना और उसका प्रतिनिधित्व करना।
    • अंतर्राष्ट्रीय संगठन संगठन (ILO) सम्मेलन संख्या 156 - पारिवारिक ज़िम्मेदारियों वाले श्रमिक: यह अनिवार्य करता है कि देखभाल की ज़िम्मेदारी वाले श्रमिकों को भेदभाव का सामना नहीं करना चाहिये।
      • ऐसी नीतियों को प्रोत्साहित करता है जो पुरुषों और महिलाओं को सवैतनिक कार्य और देखभाल संबंधी कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाने में सक्षम बनाती हैं।
    • अंतर्राष्ट्रीय महिला संगठन (ILO) सम्मेलन संख्या 183 - मातृत्व संरक्षण: कामकाजी महिलाओं के लिये मातृत्व अवकाश, स्वास्थ्य सुरक्षा और आय सुरक्षा की गारंटी देता है। देखभाल संबंधी ज़िम्मेदारियों को एक साझा सामाजिक दायित्व के रूप में स्थापित करता है, न कि व्यक्तिगत बोझ के रूप में।
  • संयुक्त राष्ट्र (UN) की पहल: 
  • सतत विकास लक्ष्य (SDG)
    • SDG 5.4: सार्वजनिक सेवाओं, बुनियादी ढाँचे और सामाजिक सुरक्षा के माध्यम से अवैतनिक देखभाल और घरेलू कार्य को स्पष्ट रूप से मान्यता देता है।
    • SDG 8: देखभाल क्षेत्र में रोज़गार सहित गरिमापूर्ण कार्य को बढ़ावा देता है।
    • SDG 10: अवैतनिक और अनौपचारिक देखभाल के बोझ से उत्पन्न असमानताओं को संबोधित करता है।
  • महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण पर संयुक्त राष्ट्र के उच्च स्तरीय पैनल ने अवैतनिक देखभाल कार्य को महिलाओं की श्रमशक्ति में भागीदारी के लिये एक संरचनात्मक बाधा के रूप में पहचाना है।
    • आर्थिक विकास की रणनीति के रूप में स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश की सिफारिश करता है।
  • UN वीमेन: देखभाल अर्थव्यवस्था को मानव कल्याण और आर्थिक स्थिरता की नींव के रूप में परिभाषित करती है।
  • यह समय-उपयोग सर्वेक्षणों, देखभाल-संवेदनशील बजट और सार्वजनिक देखभाल संबंधी अवसंरचना के विस्तार की वकालत करता है।
  • यह राज्य, बाज़ार, समुदाय और परिवारों के बीच देखभाल के पुनर्वितरण पर ज़ोर देता है।

भारत की देखभाल अर्थव्यवस्था से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • देखभाल संबंधी कार्यों की अनदेखी एवं अवमूल्यन: खाना पकाना, सफाई करना, बच्चों की देखभाल, बुज़ुर्गों की देखभाल और भावनात्मक सहारा जैसे अधिकांश देखभाल संबंधी कार्यों को "कार्य" नहीं माना जाता है, क्योंकि इनसे प्रत्यक्ष आय उत्पन्न नहीं होती है। 
  • उदाहरण के लिये, एक गृहिणी जो प्रतिदिन 10-12 घंटे कार्य करती है, परिवार के स्वास्थ्य, उत्पादकता और स्थिरता में योगदान देती है, फिर भी उसका श्रम GDP गणना में शामिल नहीं होता है।
  • इस अदृश्यता के कारण नीति निर्माता देखभाल अर्थव्यवस्था के वास्तविक आकार और महत्त्व को कम आँकते हैं।
  • अवैतनिक देखभाल संबंधी उत्तरदायित्वों में लैंगिक अंतराल: अवैतनिक देखभाल कार्यों में महिलाओं का भार अनुपातहीन रूप से अधिक है। भारत में, एक दिन के कुल समय में से, महिलाएँ अपने समय का 16.4% अवैतनिक घरेलू कार्यों पर व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष ऐसे कार्यों पर केवल 1.7% समय व्यतीत करते हैं। 
    • घरेलू कार्यों के अतिरिक्त, भारत में महिलाएँ बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल जैसी गतिविधियों में प्रतिदिन 137 मिनट व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष 75 मिनट व्यतीत करते हैं। 
    • यहाँ तक कि कार्यरत महिलाएँ भी प्रायः सवैतनिक रोज़गार और अवैतनिक घरेलू ज़िम्मेदारियों दोनों को संभालती हैं, जिससे समय की कमी, तनाव और सीमित करियर प्रगति होती है।
  • आँकड़ें एवं मापन संबंधी कमियाँ: भारत का समय उपयोग सर्वेक्षण (2019) अवैतनिक कार्य को प्रलेखित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था, लेकिन इस तरह के आँकड़ों का संग्रह अनियमित और अपूर्ण बना हुआ है। 
    • अवैतनिक एवं भावनात्मक श्रम अभी भी राष्ट्रीय आय लेखांकन और नीति निर्माण में अनुपस्थित है। 
      • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का कहना है कि नियमित माप के अभाव में, आर्थिक नियोजन और संसाधन आवंटन में देखभाल संबंधी कार्यों की अनदेखी जारी है।
  • व्यापक कानूनी ढाँचे का अभाव: भारत में अवैतनिक देखभाल और भावनात्मक श्रम को मान्यता देने वाला  कोई समर्पित कानूनी अथवा नीतिगत ढाँचा मौजूद नहीं है।
    • गौरतलब है कि मद्रास उच्च न्यायालय एवं दिल्ली उच्च न्यायालय ने गृहणियों के गैर-वित्तीय योगदान (घरेलू कार्य, बच्चों की देखभाल) को पारिवारिक संपत्ति के निर्माण के लिये महत्त्वपूर्ण माना है।
      • उदाहरण के लिये, कन्नायन नायडू बनाम कमसला अम्माल (2023) मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने माना कि महिलाओं का घरेलू और देखभाल संबंधी श्रम अप्रत्यक्ष रूप से संपत्ति सृजन में योगदान देता है, जिससे वे संपत्ति में समान हिस्सेदारी की अधिकारी होती हैं।
    • हालाँकि, विधायी समर्थन के अभाव में, अवैतनिक देखभालकर्त्ता सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और श्रम सुरक्षा से वंचित रहते हैं।
  • अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना: किफायती बाल देखभाल, वृद्धावस्था देखभाल और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता एवं असमान गुणवत्ता के कारण देखभाल की प्राथमिक ज़िम्मेदारी परिवारों पर ही बनी हुई है, जिसमें महिलाओं को असमान रूप से अधिक बोझ उठाना पड़ता है। 
    • अपर्याप्त शिशुगृह और अत्यधिक दबाव वाले आंगनवाड़ी केंद्र प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल को कमज़ोर करते हैं और महिलाओं को औपचारिक रोज़गार छोड़ने के लिये विवश करते हैं, जबकि मानसिक स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे में गंभीर रूप से कम निवेश कार्यबल उत्पादकता और सामाजिक अनुकूलन को कमज़ोर करता है।
    • साथ ही, भारत में तीव्रता से बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी की समस्या है, जिसके चलते वरिष्ठ नागरिकों के रहने और उनकी देखभाल संबंधी बुनियादी ढाँचे की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिये वर्ष 2030 तक अनुमानित 4.8 से 8.4 बिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी।
      • ये सभी कमियाँ मिलकर देखभाल अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक उपेक्षा को उजागर करती हैं, जिसके लैंगिक समानता, मानव पूंजी निर्माण और समावेशी आर्थिक विकास पर दीर्घकालिक प्रभाव प्रदर्शित होते हैं।
  • वेतनभोगी देखभाल कर्मियों की अनिश्चित परिस्थितियाँ: घरेलू कामगारों, आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं, आशा कार्यकर्त्ताओं और देखभाल करने वालों जैसे वेतनभोगी देखभाल कर्मियों को प्रायः कम वेतन, अनौपचारिक रोज़गार एवं सामाजिक सुरक्षा संबंधी आभाव का सामना करना पड़ता है। 
    • कोविड-19 महामारी ने इस विरोधाभास को उजागर किया, जहाँ देखभाल कर्मियों को "आवश्यक" करार दिया गया था, लेकिन वे पर्याप्त वेतन, बीमा या नौकरी की सुरक्षा के बिना कार्य करते रहे, जिससे देखभाल क्षेत्र के भीतर संरचनात्मक असमानता और अधिक मज़बूत हुई।
    • आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं को "स्वयंसेवकों " की श्रेणी में रखा गया है, जिससे उन्हें "श्रमिकों" का कानूनी दर्ज़ा और उससे संबंधित न्यूनतम वेतन सुरक्षा से वंचित कर दिया गया है। 
      • वर्ष 2024-25 के प्रमुख विरोध प्रदर्शनों ने इस बात को उजागर किया कि आशा कार्यकर्त्ता प्रायः मासिक रूप से केवल ₹2,000-₹3500 का निश्चित प्रोत्साहन प्राप्त करती हैं।
  • देखभाल के लिये कमज़ोर राजकोषीय एवं नीतिगत प्राथमिकता:  भारत में "पर्पल इकोनॉमी" के लिये एक समर्पित राष्ट्रीय नीति का अभाव है, जिसके कारण लगातार अपर्याप्त वित्त पोषण और खंडित हस्तक्षेप होते हैं जो देखभाल को एक सार्वजनिक हित के रूप में मानने में विफल रहते हैं।
    • भारत में सार्वजनिक व्यय अभी भी काफी हद तक लैंगिक भेदभाव से मुक्त है और देखभाल संबंधी बुनियादी ढाँचे को एक प्रमुख आर्थिक निवेश के रूप में नहीं देखता है। परिणामस्वरूप, देखभाल सेवाओं पर होने वाला व्यय विभिन्न मंत्रालयों में बहुत कम मात्रा में वितरित है और उनमें समन्वय की कमी है। 
    • हालाँकि वित्त वर्ष 2025-26 में लैंगिक बजट का हिस्सा बढ़कर 8.86% हो गया है, लेकिन कई आलोचकों का कहना है कि यह वृद्धि मुख्य रूप से महिलाओं को लक्षित करके किये गए नए व्ययों के स्थान पर मौजूदा योजनाओं के बेहतर वर्गीकरण के कारण है।
      • व्यवहार में, विशेष रूप से महिलाओं के लिये बनाई गई योजनाओं में सीमित वास्तविक वृद्धि ही देखी गई है। इसके परिणामस्वरूप "पर्पल इकोनॉमी" को निरंतर सार्वजनिक निवेश प्राप्त नहीं हो रहा है।
  • गहरी जड़ें जमा चुकी लैंगिक मान्यताएँ एवं सामाजिक अपेक्षाएँ: देखभाल संबंधी कार्य को व्यापक रूप से महिलाओं की स्वाभाविक ज़िम्मेदारी के रूप में देखा जाता है, न कि कुशल श्रम के रूप में। यहाँ तक कि जब पुरुष इसमें भाग लेते हैं, तब भी इसे प्रायः साझा ज़िम्मेदारी के स्थान पर  "सहायता" के रूप में देखा जाता है।
    • ये स्थापित मान्यताएँ लैंगिक रूप से देखभाल संबंधी पुनर्वितरण में बाधा उत्पन्न करती हैं और घरेलू श्रम में समानता प्राप्त करने के उद्देश्य से किये गए नीतिगत प्रयासों का विरोध करती हैं।

भारत की देखभाल अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • देखभाल कार्य को आर्थिक कार्य के रूप में मान्यता प्रदान करना : सरकारें अवैतनिक देखभाल और घरेलू कार्य को एक मूल्यवान आर्थिक योगदान के रूप में औपचारिक रूप से स्वीकार करके एक महत्त्वपूर्ण कदम उठा सकती हैं। 
    • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा अनुशंसित दिशा-निर्देशों के अनुरूप,  देखभाल संबंधी कार्यों को धीरे-धीरे नीतिगत चर्चाओं, विकास नियोजन एवं श्रम ढाँचों में एकीकृत करके, देखभाल संबंधी गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझा, मापा और समर्थन प्रदान किया जा सकता है।
      • मान्यता प्राप्त करना दृश्यता, मूल्यांकन और सुधार की दिशा में पहला कदम है।
  • अवैतनिक देखभाल कार्य का मापन एवं मूल्यांकन: अवैतनिक देखभाल कार्य के आर्थिक मूल्य का अनुमान लगाने के लिये नियमित समय उपयोग सर्वेक्षण, लिंग-आधारित आँकड़े और उपग्रह राष्ट्रीय खातों को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिये।
    • जैसा कि बीजिंग कार्य योजना में ज़ोर दिया गया है, जो कुछ भी मापा नहीं जाता है, वह बजट निर्धारण और नीति प्राथमिकताओं में लगातार नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है।
  • सामाजिक अवसंरचना के रूप में देखभाल में निवेश करना: बाल देखभाल केंद्र, बुज़ुर्गों की देखभाल संबंधी सेवाएँ, विकलांगता सहायता और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सड़कों या बिजली की तरह ही  मुख्य सार्वजनिक अवसंरचना के रूप में मानकीकृत किया जाना चाहिये।
    • देखभाल संबंधी सेवाओं में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने से महिलाओं का अवैतनिक कार्यभार कम होता है और साथ ही साथ रोज़गार के अवसर भी सृजित होते हैं, यह रणनीति UN वीमेन द्वारा समर्थित है।
  • देखभाल संबंधी ज़िम्मेदारियों का पुनर्वितरण: देखभाल संबंधी कार्य को महिलाओं और पुरुषों के बीच और घरों, राज्य, बाज़ार और समुदायों के बीच अधिक समान रूप से साझा किया जाना चाहिये। 
    • माता-पिता दोनों के लिये सवैतनिक पैतृक अवकाश, अनुकूल कार्य व्यवस्था एवं जागरूकता अभियान जैसी नीतियाँ देखभाल को केवल महिलाओं की ज़िम्मेदारी होने से एक साझा सामाजिक दायित्व में बदलने में सहायता प्रदान कर सकती हैं।
  • वेतनभोगी देखभाल कर्मियों को पुरस्कृत और संरक्षित करना: घरेलू कामगारों, आशा कार्यकर्त्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं, नर्सों एवं देखभाल करने वालों जैसे वेतनभोगी देखभाल कर्मियों को औपचारिक श्रम सुरक्षा के दायरे में समाहित किया जाना चाहिये। 
    • इसमें न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा और कैरियर में प्रगति शामिल है, जो देखभाल संबंधी कार्यक्षेत्र में गरिमापूर्ण कार्य हेतु ILO मानकों के अनुरूप है।
  • देखभाल के प्रति संवेदनशील बजट को अपनाना: सार्वजनिक बजट में देखभाल संबंधी व्यय और इसके लैंगिक प्रभाव को स्पष्ट रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिये। 
    • लैंगिक-संवेदनशील एवं देखभाल-संवेदी बजटिंग सुनिश्चित करती है, कि बाल-देखभाल, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक सुरक्षा हेतु किये गए आवंटनों को कल्याणकारी व्यय के स्थान पर आर्थिक उत्पादकता में निवेश के रूप में देखा जाए।
  • महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी का समर्थन : सुलभ देखभाल सेवाओं का विस्तार महिलाओं को वेतनभोगी रोज़गार में प्रवेश करने, उसमें बने रहने तथा आगे बढ़ने में सक्षम बनाता है। 
    • यह आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन और जनसांख्यिकीय लाभांश प्राप्ति में प्रत्यक्ष रूप से योगदान देता है, जो सतत विकास लक्ष्यों, विशेष रूप से SDG 5.4 और SDG 8 के अनुरूप है।
  • संकट एवं जलवायु तनाव के दौरान देखभाल संबंधी मुद्दों को संबोधित करना: आपदा प्रतिक्रिया, महामारी योजना और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों में देखभाल संबंधी आयामों को शामिल किया जाना चाहिये। 
    • संकट के समय अवैतनिक देखभाल का बोझ तीव्रता से बढ़ता है; सार्वजनिक देखभाल प्रणालियों को सुदृढ़ करने से सामाजिक अनुकूलन बढ़ाता है और साथ ही यह महिलाओं पर असमान रूप से पड़ने वाले प्रभावों को प्रतिबंधित करता है।

निष्कर्ष: 

समावेशी विकास और लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिये देखभाल अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना आवश्यक है। देखभाल कार्य को मान्यता देना, कम करना और उसका पुनर्वितरण करना सतत विकास लक्ष्यों, विशेष रूप से अवैतनिक देखभाल पर SDG 5.4 और उत्कृष्ट कार्य पर SDG 8 को सीधे आगे बढ़ाता है। सामाजिक अवसंरचना के रूप में देखभाल में निवेश करने से मानव पूंजी, श्रम उत्पादकता और सामाजिक समुत्थानशीलता में वृद्धि होती है। इसलिये, देखभाल-केंद्रित विकास दृष्टिकोण कल्याण-प्रेरित नहीं है, बल्कि विकास को सक्षम बनाने वाला और भविष्य के लिये तैयार है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

“अवैतनिक देखभाल और घरेलू कार्य भारतीय अर्थव्यवस्था की एक अदृश्य आधारशिला है।” इसके अदृश्य होने के संरचनात्मक कारणों का विश्लेषण कीजिये तथा भारत में देखभाल अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के उपाय सुझाइये।

 

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. देखभाल अर्थव्यवस्था क्या है?
इसमें सशुल्क और अवैतनिक कार्य शामिल हैं जो व्यक्तियों और परिवारों की देखभाल, कल्याण और दैनिक कार्यों में सहायता करते हैं।

प्रश्न 2. देखभाल कार्य को “अदृश्य श्रम” क्यों कहा जाता है?
क्योंकि अधिकांश देखभाल कार्य अवैतनिक होते हैं और उन्हें GDP और औपचारिक श्रम आँकड़ों से बाहर रखा जाता है।

प्रश्न 3. भारत में सबसे अधिक अवैतनिक देखभाल कार्य कौन करता है?
महिलाएँ पुरुषों की तुलना में घरेलू और देखभाल संबंधी गतिविधियों में अधिक अधिक समय व्यतीत करती हैं।

प्रश्न 4. कौन-सा सतत विकास लक्ष्य अवैतनिक देखभाल कार्य को मान्यता देता है?
SDG 5.4 विशेष रूप से अवैतनिक देखभाल और घरेलू कार्य के पुनर्वितरण की आवश्यकता को मान्यता देता है।

प्रश्न 5. देखभाल अर्थव्यवस्था में निवेश करना क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इससे महिलाओं के रोज़गार, मानव पूंजी और समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

मेन्स

प्रश्न 1. ‘देखभाल अर्थव्यवस्था’ और ‘मुद्रीकृत अर्थव्यवस्था’ के बीच अंतर कीजिये। महिला सशक्तीकरण के द्वारा देखभाल अर्थव्यवस्था को मुद्रीकृत अर्थव्यवस्था में कैसे लाया जा सकता है? ( 2023)

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