भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत का विमानन क्षेत्र और सुरक्षा की अनिवार्यता
- 07 Jan 2026
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यह एडिटोरियल 06/01/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “Indian aviation safety, its dangerous credibility deficit” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे भारत की तीव्र विमानन वृद्धि सुरक्षा संबंधी चूक, नियामकीय कमज़ोरियों और दुर्घटना जाँच में विश्वसनीयता की कमी के कारण प्रभावित हो रही है। साथ ही यह पारदर्शी निगरानी और संस्थागत सुधारों की तात्कालिक आवश्यकता पर पुनः ध्यान केंद्रित करता है, ताकि सार्वजनिक तथा वैश्विक विश्वास की पुनर्स्थापना की जा सके।
प्रिलिम्स के लिये: उड़ान, DGCA, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI), विमान वस्तुओं में हित संरक्षण अधिनियम, भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024, अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO)
मेन्स के लिये: भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में वृद्धि, प्रमुख मुद्दे और नीतिगत उपाय
कनेक्टिविटी के विस्तार और बढ़ती यात्री मांग के कारण भारत का नागरिक उड्डयन क्षेत्र विश्व के सबसे तेज़ी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक है। हालाँकि हाल ही में हुई हवाई दुर्घटनाओं (जैसे अहमदाबाद दुर्घटना) और नियामक खामियों ने विमानन सुरक्षा, पारदर्शिता एवं संस्थागत विश्वसनीयता में गंभीर कमियों को उजागर किया है। अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के मानकों पर हस्ताक्षरकर्त्ता होने के नाते, भारत से स्वतंत्र और समयबद्ध सुरक्षा निगरानी सुनिश्चित करने की अपेक्षा की जाती है। जाँच प्रक्रियाओं में निरंतर विलंब और अपारदर्शिता ने जनता के विश्वास एवं वैश्विक भरोसे को कमज़ोर किया है। ऐसे में सतत विकास सुनिश्चित करने और मानव जीवन की रक्षा के लिये सुरक्षा-प्रथम शासन व्यवस्था की पुनर्स्थापना अनिवार्य हो गई है।
भारत में विमानन क्षेत्र की वर्तमान स्थिति क्या है?
- हवाई अड्डों और अवसंरचना का विस्तार: पिछले एक दशक में भारत के हवाई अड्डा अवसंरचना में तीव्र विस्तार हुआ है। वर्ष 2014 में जहाँ संचालनात्मक हवाई अड्डों की संख्या 74 थी, वहीं वर्ष 2025 तक यह बढ़कर लगभग 163 हो चुकी है, जो कनेक्टिविटी-केंद्रित नीतिगत प्राथमिकताओं और आक्रामक अवसंरचना विकास को दर्शाती है।
- सरकार ने वर्ष 2047 तक इस नेटवर्क को 350–400 हवाई अड्डों तक विस्तारित करने का दीर्घकालिक दृष्टिकोण निर्धारित किया है, जिससे भविष्य में यात्री मांग और क्षेत्रीय पहुँच के विस्तार की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
- नवी मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा जैसे ग्रीनफील्ड परियोजनाएँ, जिसने उद्घाटन के तुरंत बाद ही हज़ारों यात्रियों का आवागमन सॅंभालना आरंभ कर दिया, मौजूदा प्रमुख हबों पर दबाव घटाने और क्षमता वृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
- यात्री यातायात और बाज़ार का आकार: भारत ने वैश्विक स्तर पर तीसरे सबसे बड़े घरेलू नागरिक उड्डयन बाज़ार के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली है।
- यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उदाहरण के लिये, दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय (IGI) हवाई अड्डे को वर्ष 2024 में विश्व के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में 9वाँ स्थान दिया गया है, जहाँ 7.78 करोड़ यात्रियों का आवागमन दर्ज किया गया।
- घरेलू यातायात लगातार सशक्त बना हुआ है, विशाखापत्तनम और भोपाल जैसे हवाई अड्डों पर यात्रियों की संख्या तथा क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
- इसके अनुरूप, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर एयरलाइन सीट क्षमता में भी निरंतर वृद्धि हो रही है।
- क्षेत्रीय संपर्क: उड़ान पहल ने क्षेत्रीय हवाई संपर्क को सुदृढ़ करने में परिवर्तनकारी भूमिका निभाई है।
- व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) के माध्यम से मार्गों को वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य बनाते हुए, इस योजना के अंतर्गत अब तक 625 से अधिक क्षेत्रीय मार्ग संचालित किये जा चुके हैं, जो 90 से अधिक हवाई अड्डों और एयरोड्रोमों, जिसमें जल एयरोड्रोम तथा हेलीपोर्ट भी शामिल हैं, को आपस में जोड़ते हैं।
- अब तक यह योजना 1.56 करोड़ से अधिक यात्रियों को सेवा प्रदान कर चुकी है, जिससे छोटे शहरों और टियर-II/III नगरों से हवाई यात्रा की सुलभता में अभूतपूर्व सुधार हुआ है।
- उड़ान 2.0 जैसी विस्तार योजनाओं के तहत 120 अतिरिक्त गंतव्यों को जोड़ने की योजना है, जिससे देश के भीतरी इलाकों में भी कनेक्टिविटी और मज़बूत हो जाएगी।
- विमान क्षमता का विस्तार और आर्थिक योगदान: बढ़ती मांग को पूरा करने के लिये, भारतीय विमानन कंपनियाँ अपने विमान बेड़े का तीव्र विस्तार कर रही हैं।
- उद्योग जगत के अनुमानों के अनुसार, आगामी 15 वर्षों में भारतीय विमानन कंपनियाँ प्रतिवर्ष लगभग 100 नए विमानों को अपने बेड़े में शामिल कर सकती हैं, जो दीर्घकालिक क्षमता विस्तार का आधार बनेगा।
- आर्थिक दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण है; यह प्रत्यक्ष रूप से लगभग 3.69 लाख रोज़गार तथा अप्रत्यक्ष रूप से 77 लाख से अधिक नौकरियों का समर्थन करता है और पर्यटन, व्यापार, लॉजिस्टिक्स एवं विनिर्माण पारितंत्र के लिये उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है।
- अनुमानों के अनुसार, भारत का विमानन बाज़ार वर्ष 2030 तक 26 बिलियन डॉलर से अधिक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
विमानन क्षेत्र के नियामक ढाँचे क्या हैं?
- नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA)- नीति एवं रणनीतिक नियंत्रण:
- भारतीय विमानन क्षेत्र संस्थागत रूप से नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत संचालित होता है, जो संपूर्ण नीति निर्देशन, विधायी पर्यवेक्षण और रणनीतिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।
- MoCA राष्ट्रीय विमानन नीतियाँ जैसे राष्ट्रीय नागरिक विमानन नीति (NCAP) का निर्माण करता है, द्विपक्षीय हवाई सेवा समझौतों (ASAs) की निगरानी करता है और उड़ान एवं हवाईअड्डों के निजीकरण जैसी प्रमुख पहलों का मार्गदर्शन करता है।
- नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) - सुरक्षा और परिचालन नियामक:
- DGCA भारत का मुख्य तकनीकी नियामक है, जो वायु सुरक्षा, लाइसेंसिंग, प्रमाणन और संचालनात्मक पर्यवेक्षण के लिये उत्तरदायी है।
- यह विमान संचालन, पायलट ड्यूटी-समय सीमाएँ, रखरखाव मानक और एयरलाइन अनुपालन को नियंत्रित करने वाले नागरिक उड्डयन आवश्यकताओं (CARs) को निर्धारित करता है।
- DGCA एयर ऑपरेटर सर्टिफिकेट (AOCs) जारी करता है, विमान सम्मिलन को मंज़ूरी देता है और सुरक्षा ऑडिट संचालित करता है।
- विमान दुर्घटना जाँच ब्यूरो (AAIB) - दुर्घटना जाँच प्राधिकरण
- विमान दुर्घटना जाँच ब्यूरो को ICAO अनुलग्नक 13 के अनुरूप विमान दुर्घटनाओं और गंभीर घटनाओं की जाँच करने का अधिकार दिया गया है।
- इसकी भूमिका पूरी तरह से तकनीकी है, जिसका उद्देश्य कारणों की पहचान करना और सुरक्षा संबंधी सिफारिशें जारी करना है।
- भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI)- अवसंरचना एवं हवाई नौवहन सेवाएँ
- भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण एक वैधानिक निकाय है, जो भारत के अधिकांश हवाई अड्डों पर हवाई अड्डे के बुनियादी ढाँचे के विकास और हवाई नेविगेशन सेवाओं (ANS) के लिये उत्तरदायी है।
- AAI रनवे, टर्मिनल सुविधाएँ, एयर ट्रैफिक कंट्रोल और कम्युनिकेशन–नेविगेशन–सर्विलांस (CNS) सिस्टम का प्रबंधन करता है।
- यह उड़ान योजना के तहत छोटे हवाई अड्डों का उन्नयन करके क्षेत्रीय संपर्क स्थापित करने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
- नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो (BCAS)- विमानन सुरक्षा नियामक
- यह विमानन सुरक्षा की निगरानी के लिये उत्तरदायी है, जिसमें यात्रियों की जाँच, प्रवेश नियंत्रण, माल सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी मानदंडों का अनुपालन शामिल है।
- यह एयरलाइंस, हवाई अड्डों और ग्राउंड हैंडलर्स को सुरक्षा निर्देश जारी करता है तथा खुफिया एवं कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर कार्य करता है।
- सांविधिक प्रावधान
- भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024: यह एयरक्राफ्ट अधिनियम, 1934 का स्थान लेता है और DGCA के तहत विनियमन को सुव्यवस्थित करके, सुरक्षा निरीक्षण को सशक्त करके एवं दंड प्रावधानों को अद्यतन करके भारत के नागरिक उड्डयन ढाँचे का आधुनिकीकरण करता है।
- यह भारत के विमानन कानूनों को ICAO मानकों के अनुरूप बनाता है ताकि सुरक्षित, कुशल और विश्व स्तर पर विश्वसनीय विमानन विकास को समर्थन मिल सके।
- विमान वस्तुओं में हितों की सुरक्षा अधिनियम, 2025: केपटाउन कन्वेंशन में प्रवर्तन संबंधी कमियों को दूर करके भारत के विमानन नियामक ढाँचे को मज़बूत करता है, जिससे विमान पट्टे और वित्तपोषण को कानूनी निश्चितता मिलती है।
- यह लेनदारों के अधिकारों, संपत्ति की पुनः प्राप्ति और पंजीकरण रद्द करने की प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करता है, जिससे कानूनी जोखिम कम होता है तथा अनुपालन स्कोर में सुधार होता है।
- भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024: यह एयरक्राफ्ट अधिनियम, 1934 का स्थान लेता है और DGCA के तहत विनियमन को सुव्यवस्थित करके, सुरक्षा निरीक्षण को सशक्त करके एवं दंड प्रावधानों को अद्यतन करके भारत के नागरिक उड्डयन ढाँचे का आधुनिकीकरण करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय ढाँचा-ICAO और वैश्विक दायित्व
- भारत अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) का एक अनुबंधित राज्य है और इसके मानकों तथा अनुशंसित प्रथाओं (SARP) से बाध्य है।
- इनमें विमान प्रमाणीकरण, उड़ान योग्यता, सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली, दुर्घटना जाँच और पर्यावरणीय मानदंड शामिल हैं।
- भारत के विमानन कानूनों, दुर्घटना नियंत्रण नियमों और जाँच प्रक्रियाओं का ICAO के अनुलग्नकों, विशेष रूप से दुर्घटना जाँच संबंधी अनुलग्नक 13 के अनुरूप होने की संभावना है।
- शिकागो कन्वेंशन का अनुपालन भारत की वैश्विक विमानन प्रतिष्ठा, बीमा प्रीमियम, विमान पट्टे की लागत और अंतर्राष्ट्रीय हवाई संचालन में अन्य देशों द्वारा प्रदत्त विश्वास तथा सहयोग को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
- इनमें विमान प्रमाणीकरण, उड़ान योग्यता, सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली, दुर्घटना जाँच और पर्यावरणीय मानदंड शामिल हैं।
- भारत अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) का एक अनुबंधित राज्य है और इसके मानकों तथा अनुशंसित प्रथाओं (SARP) से बाध्य है।
भारत के विमानन क्षेत्र में प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- विमानन सुरक्षा और विश्वसनीयता संबंधी चिंताएँ: अंतर्राष्ट्रीय नागरिक विमानन संगठन का सदस्य होने के बावजूद, भारत समयबद्ध, पारदर्शी तथा तकनीकी रूप से सुदृढ़ जाँच करने में विफल रहा है, जिससे घरेलू और वैश्विक स्तर पर विश्वास कम हो रहा है। अंतिम रिपोर्टों में विलंब और अस्पष्ट प्रारंभिक निष्कर्ष अटकलों तथा गलत सूचनाओं को बढ़ावा देते हैं, जबकि ICAO के USOAP ऑडिट ने निरीक्षण और प्रवर्तन में कमियों को उजागर किया है।
- जून 2025 में अहमदाबाद दुर्घटना के संदर्भ में AAIB की प्रारंभिक रिपोर्ट में देरी और अंतिम निष्कर्षों के धीमे खुलासे ने उद्योग तथा पायलट निकायों में भारत की विमानन सुरक्षा निगरानी की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर चिंता बढ़ा दी है।
- अवसंरचना क्षमता और परिचालन संबंधी दबाव: हालाँकि भारत ने अपने हवाई अड्डों के नेटवर्क का काफी विस्तार किया है, फिर भी दिल्ली तथा मुंबई जैसे प्रमुख केंद्रों पर क्षमता संबंधी बाधाएँ बनी हुई हैं।
- हवाई क्षेत्र में भीड़भाड़, सीमित रनवे उपलब्धता और हवाई यातायात नियंत्रण प्रणालियों पर बढ़ते दबाव से परिचालन संबंधी जोखिम तथा विलंब बढ़ जाता है।
- उदाहरण के लिये, भारतीय विमानन प्राधिकरण (AAI) को मुंबई हवाई अड्डे पर रनवे संचालन को सीमित करना पड़ा है क्योंकि इसका एकमात्र रनवे निर्धारित क्षमता के बराबर या उससे अधिक पर काम कर रहा है, जिससे विमानों को भीड़भाड़ वाले हवाई क्षेत्र में चक्कर लगाने पड़ रहे थे और ईंधन की खपत तथा विलंब बढ़ रहा था।
- उड़ान के अंतर्गत आने वाले कई क्षेत्रीय हवाई अड्डों को कम यात्री मांग, अपर्याप्त अग्निशमन सेवाओं और मौसम संबंधी परिचालन चुनौतियों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी दीर्घकालिक आर्थिक तथा परिचालन व्यवहार्यता पर प्रश्न चिह्न खड़ा हो जाता है।
- हवाई क्षेत्र में भीड़भाड़, सीमित रनवे उपलब्धता और हवाई यातायात नियंत्रण प्रणालियों पर बढ़ते दबाव से परिचालन संबंधी जोखिम तथा विलंब बढ़ जाता है।
- वित्तीय दबाव और एयरलाइन स्थिरता की समस्या: भारतीय एयरलाइनें उच्च लागत तथा कम लाभ वाले वातावरण में संचालन करती हैं, जिन पर उच्च एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) कर, हवाई अड्डे के शुल्क और पट्टे की लागत का भारी बोझ है।
- उदाहरण के लिये, भारत में किसी एयरलाइन के परिचालन व्यय का लगभग 40-45% हिस्सा एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) होता है और राज्यों द्वारा इस पर 30% तक की दर से कर लगाया जाता है, जिससे वैश्विक समकक्षों की तुलना में लागत का बोझ बढ़ जाता है।
- 2023 में गो फर्स्ट के दिवालिया होने और उसके पूरे बेड़े के ठप हो जाने से यह बात उजागर होती है कि वित्तीय दबाव कितनी शीघ्र परिचालन में व्यवधान उत्पन्न कर सकता है, जिससे कर्मचारियों, पट्टेदारों और उपभोक्ता विश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- पर्यावरण स्थिरता और जलवायु दबाव: विमानन कार्बन उत्सर्जन और ध्वनि प्रदूषण में एक वृद्धिशील योगदानकर्त्ता है। भारत ने वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की है, फिर भी सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF), कार्बन ऑफसेट तंत्र तथा हरित हवाई अड्डे के डिज़ाइन को अपनाना सीमित बना हुआ है।
- उदाहरण के लिये, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिये सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के मिश्रण के लिये औपचारिक लक्ष्य निर्धारित किये हैं- वर्ष 2027 तक 1%, वर्ष 2028 तक 2% और वर्ष 2030 तक 5%, जो ICAO के CORSIA जैसे उत्सर्जन ढाँचों के तहत वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप है।
- फिर भी, वास्तविक SAF उपयोग अभी भी बहुत सीमित है, उत्पादन अवसंरचना अभी विकासशील है और लागत पारंपरिक जेट ईंधन की तुलना में काफी अधिक है, जो प्रतिबद्धताओं तथा वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अंतर को उजागर करता है।
- उदाहरण के लिये, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिये सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के मिश्रण के लिये औपचारिक लक्ष्य निर्धारित किये हैं- वर्ष 2027 तक 1%, वर्ष 2028 तक 2% और वर्ष 2030 तक 5%, जो ICAO के CORSIA जैसे उत्सर्जन ढाँचों के तहत वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप है।
- यात्री अधिकार, सेवा गुणवत्ता और उपभोक्ता विश्वास: यद्यपि DGCA यात्री चार्टर में विलंब तथा रद्द होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति, भोजन, आवास, धन वापसी एवं वैकल्पिक यात्रा व्यवस्था अनिवार्य है, फिर भी अनेक यात्री अपने अधिकारों से अनभिज्ञ रहते हैं और नियमों के असमान प्रवर्तन के कारण एयरलाइन अनुपालन एवं उपभोक्ता संतुष्टि अक्सर नियामक उद्देश्यों से कम रह जाती है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2025 में इंडिगो द्वारा हाल ही में बड़े स्तर पर उड़ानें रद्द करने की घटनाओं ने, जिसके कारण चालक दल और परिचालन संबंधी बाधाओं के चलते हज़ारों यात्री प्रमुख हवाई अड्डों पर फँस गए, आकस्मिक योजना तथा यात्री देखभाल में लगातार मौजूद कमियों को उजागर किया।
- विभेदक शासन और कमज़ोर समन्वय: भारत के विमानन तंत्र में नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA), DGCA, AAI, BCAS तथा AAIB जैसे अनेक निकाय शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक के अलग-अलग कार्य क्षेत्र हैं, लेकिन समन्वय की कमी बार-बार संसद समीक्षा में उजागर हुई है, जो प्रभावी निरीक्षण एवं प्रतिक्रिया को कमज़ोर करती है।
- उदाहरण के लिये, नागरिक उड्डयन सुरक्षा पर विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति की 380वीं रिपोर्ट में संस्थागत विखंडन और इन एजेंसियों में ज़िम्मेदारियों की स्पष्टता की कमी से जुड़ी नियामक निगरानी तथा प्रवर्तन में कमियों को स्पष्ट रूप से उजागर किया गया था।
- DGCA को सीमित स्वायत्तता, गंभीर मानव संसाधन कमी और अत्यधिक कार्यकारी नियंत्रण का सामना करना पड़ता है, जिससे इसकी प्रभावशीलता कमज़ोर होती है।
- अगस्त 2025 तक 50% मानव संसाधन कमी ने निरीक्षण, ऑडिट और प्रवर्तन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
- हैंगर और MRO की कमी: भारत में हैंगरों और मेंटेनेंस, रिपेयर तथा ओवरहाल (MRO) सुविधाओं की अत्यधिक कमी है, विशेषकर बड़े आकार के विमानों के लिये। परिणामस्वरूप, घरेलू क्षमता सीमित होने के कारण एयरलाइनों को भारी रखरखाव का कार्य विदेशों में करवाना पड़ता है।
- यह निर्भरता एयरलाइनों की संचालन लागत और टर्नअराउंड समय को काफी बढ़ा देती है।
- इसके कारण प्रतिवर्ष लगभग 1.5 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा बहिर्वाह भी होता है, जिससे विमानन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को नुकसान पहुँचता है।
भारत के विमानन क्षेत्र को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- एक स्वतंत्र एवं सशक्त विमानन सुरक्षा नियामक की स्थाना: भारत को राजनीतिक और व्यावसायिक दबावों से मुक्त, कार्यात्मक रूप से स्वायत्त विमानन सुरक्षा नियामक की दिशा में आगे बढ़ना चाहिये। संसदीय स्थायी समितियों द्वारा बार-बार नीति निर्माण को सुरक्षा निरीक्षण से पृथक रखने की सिफारिश की है।
- इससे प्रवर्तन की विश्वसनीयता में सुधार होगा, नियामकीय हेर-फेर कम होगा और सुनिश्चित होगा कि सुरक्षा मानदंडों को चयनात्मक रूप से लागू करने के बजाय समान रूप से लागू किया जाए।
- दुर्घटना जाँच में पारदर्शिता और विश्वास हेतु सुधार: अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के परिशिष्ट 13 के अनुरूप विमान दुर्घटना जाँच ब्यूरो को सुदृढ़ किया जाना चाहिये।
- इन उपायों में प्रारंभिक और अंतिम रिपोर्टों के लिये निश्चित समयसीमा, आधुनिक फोरेंसिक प्रयोगशालाएँ, जाँचकर्त्ताओं के लिये संरक्षित कार्यकाल तथा अनिवार्य रूप से सार्वजनिक वार्ता शामिल हैं।
- पारदर्शी जाँच जन-विश्वास को पुनर्स्थापित करती हैं, गलत सूचना का मुकाबला करती हैं, जिससे वैश्विक विश्वसनीयता में सुधार होता है, जिसका सीधा प्रभाव पट्टे की लागत और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर पड़ता है।
- सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए हवाई अड्डे के बुनियादी ढाँचे का उन्नयन करना: हवाई अड्डे के विस्तार में संख्यात्मक वृद्धि की तुलना में परिचालन तत्परता को प्राथमिकता दी जानी चाहिये। इसमें पर्याप्त रनवे सुरक्षा क्षेत्र, चौबीसों घंटे बचाव और अग्निशमन सेवाएँ, आधुनिक नौवहन सहायता प्रणालियाँ तथा मौसमीय प्रतिरोधक क्षमता सुनिश्चित करना शामिल है।
- UDAN के तहत क्षेत्रीय हवाई अड्डों के लिये यथार्थवादी यात्री यातायात आकलन, बेहतर लास्ट-माइल कनेक्टिविटी तथा चरणबद्ध संचालन की आवश्यकता है।
- CAG की रिपोर्टों में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि अवसंरचना का विकास वास्तविक परिचालन मांग के अनुरूप होना चाहिये।
- मानव पूंजी और सुरक्षा संस्कृति को सुदृढ़ करना: भारत को पायलटों, इंजीनियरों, वायु यातायात नियंत्रकों तथा सुरक्षा निरीक्षकों के प्रशिक्षण में बड़े पैमाने पर निवेश करने की आवश्यकता है।
- ICAO और DGCA के अनुसार, ड्यूटी-टाइम नियमों में थकान, सर्कैडियन रिदम में व्यवधान तथा मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाना चाहिये।
- एक ऐसी सुरक्षा रिपोर्टिंग संस्कृति को बढ़ावा देना आवश्यक है जहाँ चालक दल बिना किसी डर के त्रुटियों की रिपोर्ट कर सकें और दंडात्मक कार्रवाई न हो। विश्व स्तर पर विमानन सुरक्षा में सबसे कमज़ोर कड़ी केवल प्रौद्योगिकी ही नहीं, बल्कि मानवीय भी कारक हैं।
- एयरलाइन की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना: विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) पर लगने वाले उच्च कर, हवाई अड्डे के शुल्क के साथ-साथ लीजिंग लागत की वित्तीय स्थिति को कमज़ोर करते हैं। जीएसटी के अंर्तगत एटीएफ कराधान को युक्तिसंगत बनाना, घरेलू विमान लीजिंग केंद्रों (जैसे गिफ्ट सिटी) को बढ़ावा देना और रखरखाव, मरम्मत तथा ओवरहाल (MRO) प्रणालियों को प्रोत्साहित करना लागत को कम कर सकता है।
- आर्थिक रूप से स्थिर एयरलाइंस अल्पकालिक लागत में कटौती करने के बजाय प्रशिक्षण, रखरखाव और सुरक्षा में निवेश करने की अधिक संभावना रखती हैं।
- हवाई क्षेत्र प्रबंधन तथा ATC क्षमता में सुधार: प्रमुख विमानन केंद्रों के आसपास भीड़भाड़ वाला हवाई क्षेत्र देरी और परिचालन जोखिम को बढ़ाता है। भारत को उपग्रह-आधारित नेविगेशन, लचीले हवाई क्षेत्र उपयोग तथा नागरिक–सैन्य समन्वय के माध्यम से वायु यातायात प्रबंधन का आधुनिकीकरण करना चाहिये।
- हवाई गतिविधियों में लगातार हो रही तीव्र वृद्धि को देखते हुए ATC कर्मचारियों की संख्या बढ़ाना तथा संचार, नेविगेशन एवं निगरानी (CNS) प्रणालियों को उन्नत करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- पर्यावरणीय सततता को विकास के साथ एकीकृत करना: भारत के विमानन विकास को जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप होना चाहिये। सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF), ऊर्जा-कुशल हवाई अड्डे के डिज़ाइन एवं ICAO के CORSIA फ्रेमवर्क को बढ़ावा देने से उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।
- हरित हवाई अड्डों एवं कार्बन रिपोर्टिंग तंत्रों के लिये प्रोत्साहन यह सुनिश्चित करेंगे कि विकास दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति की कीमत पर न हो।
- यात्री अधिकारों एवं सेवा गुणवत्ता को मज़बूत करना: जन विश्वास बनाए रखने के लिये यात्री चार्टर का सुदृढ़ प्रवर्तन, पारदर्शी किराया नियम और प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र आवश्यक हैं।
- शिकायतों की रीयल-टाइम ट्रैकिंग तथा बार-बार उल्लंघन करने पर ज़ुर्माने के लिये डिजिटल प्लेटफॉर्म, नियमों और यात्रियों के अनुभव के बीच के अंतराल को समाप्त कर सकते हैं। एक परिपक्व विमानन बाज़ार को विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ उपभोक्ताओं की सुरक्षा भी करनी चाहिये।
- संस्थागत समन्वय एवं संकट प्रबंधन में सुधार: MoCA, DGCA, AAI, AAIB और राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय के लिये स्पष्ट प्रोटोकॉल आवश्यक हैं, विशेष रूप से दुर्घटनाओं या बड़ी बाधाओं के दौरान।
- नियमित मॉक ड्रिल, संकट संचार ढाँचे तथा स्पष्ट रूप से परिभाषित कमान शृंखलाएँ अव्यवस्था को रोक सकती हैं और साक्ष्यों की क्षति से बचाव कर सकती हैं।
- विमानन के लिये दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना : भारत को विजन 2047 के अनुरूप एक दीर्घकालिक विमानन रोडमैप की आवश्यकता है जो बुनियादी ढाँचे, सुरक्षा, स्थिरता, मानव संसाधन और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा को एकीकृत करता हो।
- प्रणालीगत तनाव से बचने के लिये विकास लक्ष्यों को नियामक क्षमता और संस्थागत तत्परता के अनुरूप होना चाहिये।
निष्कर्ष:
भारत का विमानन क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ तीव्र विस्तार के साथ-साथ सशक्त शासन और संस्थागत क्षमता का होना भी आवश्यक है। सतत विकास स्वतंत्र विनियमन, पारदर्शी सुरक्षा निगरानी और मानव एवं तकनीकी क्षमताओं में निवेश पर निर्भर करेगा। अवसंरचना विकास को पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी और यात्री कल्याण के साथ जोड़ना दीर्घकालिक स्थिरता के लिये अनिवार्य है। सुरक्षा-प्रथम और विश्वसनीयता-आधारित विमानन पारिस्थितिकी तंत्र जनता के विश्वास तथा भारत की वैश्विक स्थिति सुनिश्चित करने के लिये अत्यावश्यक है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न. भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में तीव्र वृद्धि ने नियामक और संस्थागत क्षमता को कमज़ोर कर दिया है। विमानन सुरक्षा, शासन और स्थिरता के लिये इससे उत्पन्न प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये इसके समाधान हेतु उपयुक्त सुधारों का सुझाव दीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. भारत में विमानन सुरक्षा चिंता का विषय क्यों है?
क्योंकि तीव्र विकास ने नियामक क्षमता को कमज़ोर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप जाँच प्रक्रिया में विलंब और कमज़ोर प्रवर्तन होता है।
प्रश्न 2. वैश्विक अनुपालन भारत के विमानन क्षेत्र को कैसे प्रभावित करता है?
यह अंतर्राष्ट्रीय विश्वास, बीमा प्रीमियम, विमान पट्टे की लागत और सहयोग को प्रभावित करता है।
प्रश्न 3. विमान वस्तुओं में हितों के संरक्षण अधिनियम, 2025 से एयरलाइंस को किस प्रकार लाभ होता है?
यह लेनदारों और संपत्ति पुनः प्राप्त करने के अधिकारों को सुदृढ़ करके पट्टे के जोखिम और लागत को कम करता है।
प्रश्न 4. उड़ान योजना के बावजूद क्षेत्रीय संपर्क पर दबाव क्यों है?
कम मांग, परिचालन संबंधी चुनौतियाँ और हवाई अड्डों की अल्प तैयारियाँ इस मार्ग की निरंतरता को प्रभावित करती हैं।
प्रश्न 5. भारत के विमानन क्षेत्र के लिये कौन-से प्रमुख सुधार आवश्यक हैं?
प्रभावी सुरक्षा, पारदर्शिता और संस्थागत क्षमता के साथ स्वतंत्र विनियमन।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. सार्वजनिक-निज़ी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत संयुक्त उद्यमों के माध्यम से भारत में हवाई अड्डों के विकास की जाँच कीजिये। इस संबंध में अधिकारियों के सामने क्या चुनौतियाँ हैं? (2017)