जैव विविधता और पर्यावरण
भारत की अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की पुनर्संरचना
- 05 Jan 2026
- 229 min read
यह एडिटोरियल 03/01/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “Transforming a waste-ridden urban India” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख शहरी अपशिष्ट को जलवायु, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शासन संबंधी चुनौती के रूप में प्रस्तुत करता है तथा भारत में बढ़ते अपशिष्ट के बोझ को वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं और चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों से जोड़ता है।
प्रिलिम्स के लिये: मिशन LiFE, विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR), COP 30, ई-अपशिष्ट, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, प्लास्टिक प्रदूषण, अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्र
मेन्स के लिये : भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, अपशिष्ट प्रबंधन में प्रमुख मुद्दे और उपाय।
COP30 में यह उजागर हुआ है कि अपशिष्ट एक प्रमुख जलवायु चुनौती बन चुका है तथा अनियंत्रित शहरी अपशिष्ट से निकलने वाली मीथेन एक गंभीर वैश्विक खतरा उत्पन्न कर रही है। भारत में, तीव्र शहरीकरण के कारण अनुमान है कि वर्ष 2030 तक शहरों में प्रतिवर्ष 16.5 करोड़ टन अपशिष्ट उत्पन्न होगा, जो वर्ष 2050 तक बढ़कर 43.5 करोड़ टन हो जाएगा, साथ ही 41 करोड़ टन से अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी होगा। अपशिष्ट से ग्रस्त शहरों की वास्तविकता अब सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य, वायु गुणवत्ता, जल सुरक्षा और आर्थिक उत्पादकता को प्रभावित करती है। स्वच्छ भारत मिशन और मिशन LiFE जैसी पहलें व्यवहार परिवर्तन एवं व्यवस्थागत सुधार की तात्कालिकता को रेखांकित करती हैं। इसलिये, एक रैखिक ‘एकत्र करो-फेंक दो (Collect–Dump)’ दृष्टिकोण से एक चक्रीय अपशिष्ट प्रबंधन मॉडल की ओर निर्णायक रूप से बढ़ना कोई विकल्प नहीं है, बल्कि भारत के शहरी भविष्य के लिये एक अस्तित्वगत आवश्यकता है।
भारत में अपशिष्ट उत्पादन की वर्तमान स्थिति क्या है?
- कुल अपशिष्ट उत्पादन: भारत में जनसंख्या वृद्धि, शहरों के विस्तार और उपभोग के तरीकों में बदलाव के कारण अपशिष्ट की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। हाल के अनुमानों के अनुसार, देश प्रतिदिन लगभग 170,000 टन नगरपालिका ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है, जो वार्षिक रूप से लगभग 62 मिलियन टन होता है।
- वैश्विक स्तर पर, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा किये गए आकलन इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में अपशिष्ट उत्पादन तीव्रता से बढ़ रहा है, जिससे अपशिष्ट प्रबंधन केवल स्वच्छता संबंधी चिंता का विषय नहीं बल्कि एक महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय और शासन संबंधी मुद्दा बन गया है।
- अपशिष्ट उत्पादन में शहरी-ग्रामीण अंतर: भारत में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच अपशिष्ट उत्पादन के पैटर्न में काफी अंतर है।
- शहरों में प्रति व्यक्ति अपशिष्ट की मात्रा बहुत अधिक होती है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक शहरी केंद्रों में प्रति वर्ष लगभग 16.5 करोड़ टन अपशिष्ट उत्पन्न होगा, जिससे नगरपालिका प्रणालियों पर भारी दबाव पड़ेगा। इसके विपरीत, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति अपशिष्ट की मात्रा कम होती है तथा इसका अधिकांश भाग जैव अपघटनीय होता है।
- हालाँकि, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रायः संगठित संग्रहण और वैज्ञानिक प्रसंस्करण का अभाव होता है, जिससे खुले में अपशिष्ट फेंकने एवं उनके दहन की स्थिति उत्पन्न होती है।
- इस प्रकार, जहाँ शहरी भारत को पैमाने की समस्या का सामना करना पड़ता है, वहीं ग्रामीण भारत अपर्याप्त अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों से जूझ रहा है।
- अपशिष्ट के प्रकार और संरचना:
- जैविक अपशिष्ट: बचा हुआ भोजन, सब्जियों के छिलके, फलों का अपशिष्ट, बाज़ार और बगीचे का अपशिष्ट, अर्थात वह गीला भाग जो जल्दी सड़ जाता है। जब इसे लैंडफिल में छोड़ दिया जाता है या फेंक दिया जाता है, तो यह मीथेन गैस उत्पन्न करता है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है और दुर्गंध, मक्खियों एवं बीमारियों का खतरा उत्पन्न करता है।
- भारत के कई शहरों में नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट का आधे से अधिक हिस्सा जैविक होता है। इसी वजह से यह सबसे बड़ा एकल अपशिष्ट स्रोत है तथा इसका प्रबंधन करना सबसे महत्त्वपूर्ण है।
- सूखा अपशिष्ट: कागज़ और गत्ता, काँच की बोतलें, धातु के डिब्बे, कपड़ा, रबड़, ऐसी वस्तुएँ जिन्हें अलग से एकत्र करने पर प्रायः पुनर्चक्रण योग्य माना जा सकता है।
- सरकारी आकलन और अपशिष्ट वर्गीकरण अध्ययनों के अनुसार, भारत में नगरपालिका ठोस अपशिष्ट का लगभग एक तिहाई (आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार 35%) शुष्क अपशिष्ट होता है।
- प्लास्टिक अपशिष्ट: इसमें सभी प्रकार की प्लास्टिक पैकेजिंग, एकल-उपयोग वाली वस्तुएँ, मल्टी लेयर्ड पाउच, PET बोतलें, फिल्म और प्लास्टिक के टुकड़े शामिल हैं।
- भारत में प्रतिवर्ष लगभग 56 लाख टन प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न होता है।
- इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (ई-अपशिष्ट): भारत विश्व में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के सबसे तीव्रता से बढ़ते उत्पादकों में से एक है।
- तीव्रता से हो रहे डिजिटलीकरण, गैजेट्स के बार-बार प्रतिस्थापन और स्मार्टफोन, लैपटॉप एवं घरेलू उपकरणों के बढ़ते उपयोग के साथ।
- भारत में ई-अपशिष्ट उत्पादन में 5 वर्षों में 73% की वृद्धि हुई, जो सत्र 2023-24 में 1.751 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच गया।
- इसके अलावा, वित्त वर्ष 2023 तक, भारत ने लगभग 100 किलोटन (kt) संचयी सौर अपशिष्ट उत्पन्न किया है, जो वर्ष 2030 तक बढ़कर 340 kt हो जाएगा।
- तीव्रता से हो रहे डिजिटलीकरण, गैजेट्स के बार-बार प्रतिस्थापन और स्मार्टफोन, लैपटॉप एवं घरेलू उपकरणों के बढ़ते उपयोग के साथ।
- जैवचिकित्सा अपशिष्ट: जैवचिकित्सा अपशिष्ट अस्पतालों, क्लीनिकों, प्रयोगशालाओं और स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं से उत्पन्न होता है।
- दिल्ली जैसे प्रमुख शहरी केंद्रों में प्रतिदिन लगभग 40 टन जैव-चिकित्सा अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जो अपशिष्ट उपचार अवसंरचना पर दबाव को दर्शाता है।
- इस प्रकार के अपशिष्ट का अनुचित प्रबंधन संक्रमण फैला सकता है तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है। हालाँकि राष्ट्रीय आँकड़े भिन्न-भिन्न हैं, लेकिन शहरी स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियाँ जैव चिकित्सा अपशिष्ट उत्पादन में एक बड़ा हिस्सा योगदान करती हैं।
- खतरनाक अपशिष्ट: इसमें विषैले, ज्वलनशील, संक्षारक या प्रतिक्रियाशील अपशिष्ट शामिल हैं जो मुख्य रूप से रसायन, फार्मास्यूटिकल्स और धातु विज्ञान जैसे उद्योगों द्वारा उत्पन्न होते हैं।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 7.9 मिलियन टन खतरनाक औद्योगिक अपशिष्ट उत्पन्न होता है।
- सुरक्षित भंडारण, परिवहन और निपटान प्रमुख चुनौतियाँ बनी हुई हैं, विशेषकर औद्योगिक समूहों में।
- निर्माण एवं विध्वंस (C&D) अपशिष्ट: निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट भवन निर्माण, नवीनीकरण और विध्वंस जैसी गतिविधियों से उत्पन्न होता है, और इसमें मुख्य रूप से ईंटें, कंक्रीट, टाइलें, मिट्टी, प्लास्टर, लकड़ी एवं मलबा शामिल होता है।
- तीव्रता से हो रहे शहरीकरण और अधोसंरचना के विस्तार के साथ, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 10-12 मिलियन टन निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट उत्पन्न होता है।
- इस भारी मात्रा में अपशिष्ट का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा सड़कों के किनारे, खुले भूखंडों और जल निकायों में अवैध रूप से फेंक दिया जाता है, जिससे शहरी बाढ़, धूल प्रदूषण एवं भूमि क्षरण होता है।
- जैविक अपशिष्ट: बचा हुआ भोजन, सब्जियों के छिलके, फलों का अपशिष्ट, बाज़ार और बगीचे का अपशिष्ट, अर्थात वह गीला भाग जो जल्दी सड़ जाता है। जब इसे लैंडफिल में छोड़ दिया जाता है या फेंक दिया जाता है, तो यह मीथेन गैस उत्पन्न करता है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है और दुर्गंध, मक्खियों एवं बीमारियों का खतरा उत्पन्न करता है।
भारत में अपशिष्ट प्रबंधन को नियंत्रित करने वाला नियामक कार्यढाँचा क्या है?
- वैधानिक और नियम-आधारित कार्यढाँचा: भारत में कोई एक एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन अधिनियम लागू नहीं है। इसके बजाय, अपशिष्ट प्रबंधन को विभिन्न प्रकार के नियमों के माध्यम से विनियमित किया जाता है, जिन्हें समय-समय पर संशोधित किया जाता है, ताकि विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) जैसे तंत्रों को शामिल किया जा सके।
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अपशिष्ट धारा |
शासी विनियमन |
मुख्य फोकस |
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नगरपालिक का ठोस अपशिष्ट |
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 (कई बार संशोधित) |
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प्लास्टिक अपशिष्ट |
प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 (कई बार संशोधित) |
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ई-अपशिष्ट |
ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2022 (वर्ष 2024 में अद्यतन) |
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निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट |
C&D अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 (नए नियम 2025 में अधिसूचित, अप्रैल 2026 से प्रभावी) |
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खतरनाक अपशिष्ट |
खतरनाक और अन्य अपशिष्ट नियम, 2016 (अंतिम अद्यतन वर्ष 2024 में) |
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जैव-चिकित्सा अपशिष्ट |
जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 (अंतिम अद्यतन 2018 में) |
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- संस्थागत संरचना: भारत में अपशिष्ट प्रबंधन प्रवर्तन एक बहुस्तरीय नियामक संरचना का अनुसरण करता है:
- पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC): राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माण और नियम अधिसूचना के लिये जिम्मेदार सर्वोच्च निकाय।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB): तकनीकी मानक निर्धारित करता है, राज्यों के साथ समन्वय करता है तथा EPR अनुपालन एवं निगरानी के लिये केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रबंधन करता है।
- राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) / प्रदूषण नियंत्रण समितियाँ (PCC): स्थापना/संचालन की सहमति प्रदान करने तथा अनुपालन की निगरानी करने वाली प्राथमिक प्रवर्तन एजेंसियाँ।
- शहरी स्थानीय निकाय (ULB): नगरपालिका ठोस अपशिष्ट के संग्रह, परिवहन और वैज्ञानिक प्रसंस्करण के लिये जिम्मेदार अग्रणी एजेंसियाँ।
- समकालीन नियामकीय परिवर्तन: भारत का अपशिष्ट प्रबंधन कार्यढाँचा तीन प्रमुख आधुनिक स्तंभों के इर्द-गिर्द विकसित हुआ है:
- विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR): निर्माता प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी जैसे उत्पादों के जीवन चक्र के अंत में प्रबंधन के लिये विधिक रूप से जवाबदेह होते हैं, जिसमें वार्षिक पुनर्चक्रण लक्ष्य व अनुपालन न करने पर वित्तीय दंड का प्रावधान होता है।
- डिजिटल अनुपालन और निगरानी: EPR दायित्वों को CPCB द्वारा प्रबंधित डिजिटल पोर्टलों के माध्यम से ट्रैक किया जाता है, जहाँ उत्पादक और पुनर्चक्रणकर्त्ता सत्यापित EPR प्रमाणपत्रों का आदान-प्रदान करते हैं।
- विस्तारित थोक अपशिष्ट उत्पादक उत्तरदायित्व (EBWGR): हाल ही में सरकार द्वारा की गई पहलों के तहत मॉल, अस्पताल और आवासीय परिसरों जैसे बड़े प्रतिष्ठानों पर जैव अपघटनीय अपशिष्ट को परिसर में ही संसाधित करने की अधिक जिम्मेदारी डाली गई है, अन्यथा उन्हें अधिक उपयोगकर्त्ता शुल्क देना होगा।
भारत की अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली में प्रमुख कमियाँ क्या हैं?
- स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण की विफलता: अधिकांश शहरों में अपशिष्ट को गीले, सूखे और खतरनाक श्रेणियों में अलग करने की व्यवस्था कमज़ोर बनी हुई है। स्रोत पर पृथक्करण अनिवार्य करने वाले नियमों के बावजूद, दिल्ली और मुंबई जैसे शहर कुल अपशिष्ट के 50 प्रतिशत से भी कम का पृथक्करण कर रहे हैं।
- जब मिश्रित अपशिष्ट संग्रहण वाहनों या प्रसंस्करण संयंत्रों तक पहुँचता है, तो पुनर्चक्रण योग्य पदार्थ दूषित हो जाते हैं और जैविक अपशिष्ट को कुशलतापूर्वक खाद या बायो-मीथेन में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।
- इस एक विफलता से लैंडफिल का भार बढ़ जाता है और हर चरण में उपचार लागत में वृद्धि होती है।
- जब मिश्रित अपशिष्ट संग्रहण वाहनों या प्रसंस्करण संयंत्रों तक पहुँचता है, तो पुनर्चक्रण योग्य पदार्थ दूषित हो जाते हैं और जैविक अपशिष्ट को कुशलतापूर्वक खाद या बायो-मीथेन में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।
- लैंडफिल और डंपसाइट पर निरंतर निर्भरता: भारत अभी भी अपशिष्ट के निपटान के डिफ़ॉल्ट तरीके के रूप में लैंडफिलिंग पर बहुत अधिक निर्भर है।
- अनुमानों से पता चलता है कि नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट का आधे से अधिक हिस्सा डंपसाइटों में चला जाता है, जिनमें से कई खुले एवं अवैज्ञानिक हैं।
- दिल्ली (गाज़ीपुर) व अन्य महानगरों के आसपास स्थित बड़े-बड़े पुराने अपशिष्ट डंप मीथेन का उत्सर्जन करते रहते हैं, जहरीले तरल पदार्थों को भूजल में रिसने देते हैं तथा आग के माध्यम से वायु प्रदूषण का कारण बनते हैं।
- लैंडफिल के सुधार में सीमित प्रगति का मतलब है कि शहरों में अपशिष्ट निपटान के लिये ज़मीन की कमी हो रही है।
- अनुमानों से पता चलता है कि नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट का आधे से अधिक हिस्सा डंपसाइटों में चला जाता है, जिनमें से कई खुले एवं अवैज्ञानिक हैं।
- अपर्याप्त प्रसंस्करण एवं उपचार अवसंरचना: अपशिष्ट उत्पादन में तीव्रता से वृद्धि हो रही है, लेकिन प्रसंस्करण क्षमता उस गति से नहीं बढ़ पाई है। कम्पोस्टिंग संयंत्र, बायोमेथेनेशन इकाइयाँ, सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाएँ और कार्बन एवं विध्वंस पुनर्चक्रण संयंत्र असमान रूप से वितरित हैं तथा प्रायः इनका पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है।
- इसी वजह से 30% से भी कम अपशिष्ट का शोधन हो पाता है। खराब गुणवत्ता वाले कच्चे माल, परिचालन संबंधी समस्याओं या खाद या अपशिष्ट से बने ईंधन जैसे उत्पादों की बाज़ार में मांग न होने के कारण संयंत्र प्रायः बंद हो जाते हैं।
- उदाहरण के लिये, बंगलुरु में बिदावाड़ी WTE संयंत्र का प्रदर्शन खराब रहा है तथा प्रायः मिश्रित अपशिष्ट के कारण मशीनरी को नुकसान पहुँचने की वजह से इसे बंद करना पड़ता है।
- इसी वजह से 30% से भी कम अपशिष्ट का शोधन हो पाता है। खराब गुणवत्ता वाले कच्चे माल, परिचालन संबंधी समस्याओं या खाद या अपशिष्ट से बने ईंधन जैसे उत्पादों की बाज़ार में मांग न होने के कारण संयंत्र प्रायः बंद हो जाते हैं।
- शहरी स्थानीय निकायों (ULB) की सीमित क्षमता: शहरी स्थानीय निकाय अपशिष्ट प्रबंधन की रीढ़ हैं, लेकिन उनमें से कई में तकनीकी विशेषज्ञता, जनशक्ति और प्रशासनिक क्षमता की कमी है। छोटे नगर पालिकाएँ और कस्बे प्रायः पुराने उपकरणों एवं अल्पकालिक अनुबंधों पर निर्भर रहते हैं।
- वित्तीय दृष्टि से, शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) सीमित संसाधनों से ग्रस्त हैं, क्योंकि उपयोगकर्त्ता शुल्क अपशिष्ट प्रबंधन लागत का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही वसूल कर पाते हैं, जिससे दीर्घकालिक योजना एवं नवाचार मुश्किल हो जाते हैं। इस क्षमता की कमी के कारण अपशिष्ट प्रबंधन निवारक के बजाय प्रतिक्रियात्मक हो जाता है।
- एसबीएम-यू 2.0 जैसी केंद्रीय अनुदान योजनाओं पर निर्भरता प्रायः घोस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति उत्पन्न करती है, जहाँ संयंत्र तो बनाए जाते हैं लेकिन परिचालन निधि की कमी के कारण निष्क्रिय पड़े रहते हैं।
- विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) का कमज़ोर कार्यान्वयन: हालाँकि प्लास्टिक और ई-अपशिष्ट के लिये EPR लागू किया गया है, लेकिन इसका कवरेज और प्रवर्तन असमान बना हुआ है। निगरानी, सत्यापन एवं जवाबदेही में कमियों के कारण कम रिपोर्टिंग और केवल कागज़ी अनुपालन ही संभव है।
- इससे ग्रीनवॉशिंग और भौतिक सामग्री की पुनर्प्राप्ति के बिना फर्ज़ी रीसाइक्लिंग प्रमाणपत्रों की बिक्री को बढ़ावा मिलता है।
- कई प्रकार के अपशिष्ट, जैसे कि बहुस्तरीय प्लास्टिक और मिश्रित पैकेजिंग, में अभी भी प्रभावी वापसी प्रणाली का अभाव है।
- इससे अपशिष्ट प्रबंधन का बोझ उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बजाय नगरपालिकाओं पर असमान रूप से स्थानांतरित हो जाता है।
- अनौपचारिक क्षेत्र को एकीकृत करने में चुनौतियाँ: भारत में, प्लास्टिक अपशिष्ट के संग्रहण का लगभग 80% कार्य अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा किया जाता है।
- अनौपचारिक अपशिष्ट क्षेत्र में अनुमानित 15 लाख से 40 लाख लोग काम करते हैं; उनमें से 70% से अधिक महिलाएँ हैं।
- हालाँकि, यह क्षेत्र औपचारिक मान्यता, सामाजिक सुरक्षा या सुरक्षा मानकों के बिना संचालित होता है। नगरपालिका प्रणालियों के साथ एकीकरण की कमी से अक्षमताएँ एवं शोषण होता है।
- जब औपचारिक अपशिष्ट अनुबंध अनौपचारिक श्रमिकों की अनदेखी करते हैं, तो पुनर्चक्रण की दरें सुधरने के बजाय गिर सकती हैं, क्योंकि व्यवहार्य विकल्पों के अभाव में अनौपचारिक नेटवर्क बाधित हो जाते हैं।
- खराब निगरानी, आँकड़ों की कमी और जवाबदेही संबंधी मुद्दे: अपशिष्ट उत्पादन, संरचना, प्रसंस्करण एवं निपटान से संबंधित सटीक आँकड़े प्रायः शहरों और राज्यों में अनुपलब्ध या असंगत होते हैं।
- उदाहरण के लिये, अधिकांश राज्य केवल समेकित डेटा और सीमित यूएलबी-वार जानकारी ही रिपोर्ट करते हैं (CPCB, 2021)।
- वर्ष 2024 तक, भारत के दैनिक अपशिष्ट का लगभग 22% हिस्सा या तो पूरी तरह से अज्ञात रहता है या पर्यावरण में रिस जाता है।
- अपर्याप्त स्थल-स्तरीय निगरानी (विशेष रूप से भूजल की) और निम्न गुणवत्ता वाले डेटा लक्षित हस्तक्षेपों में बाधा डालते हैं।
- खराब ट्रैकिंग तंत्र के कारण प्रशासनिक देरी ने एनजीटी के निर्देशों के अनुपालन को भी कमज़ोर कर दिया है।
- व्यवहारिक कमियाँ और जन उदासीनता: जनभागीदारी व्यवस्था की सबसे कमज़ोर कड़ियों में से एक बनी हुई है। कई नागरिक अपशिष्ट को केवल नगरपालिका की जिम्मेदारी मानते हैं तथा पृथक्करण, खाद बनाने या उपयोगकर्त्ता शुल्क का भुगतान करने जैसे व्यवहारिक परिवर्तनों का विरोध करते हैं।
- उदाहरण के लिये, बंगलुरु में एक मेट्रो स्टेशन के पास रहने वाले निवासियों को एक दशक पुराने अवैध अपशिष्ट स्थल (अवैध कूड़ा फेंकने की जगह) की सफाई खुद करनी पड़ी। औपचारिक संग्रहण प्रणाली मौजूद होने के बावजूद, बाज़ार के विक्रेता और राहगीर दस वर्षों से अधिक समय तक वहाँ कूड़ा फेंकते रहे, जो सेवाओं की उपलब्धता के बावजूद नागरिक जिम्मेदारी की निरंतर कमी को दर्शाता है।
- सुविधा के लिये की जाने वाली खपत, अत्यधिक पैकेजिंग और कूड़ा-करकट फैलाना इस समस्या को और भी बदतर बना देता है।
अपशिष्ट प्रबंधन में खामियों के क्या परिणाम होते हैं?
- पर्यावरण प्रदूषण को और बढ़ाना: अपशिष्ट का अनुचित प्रबंधन सीधे तौर पर पर्यावरण को प्रदूषित करता है। अपशिष्ट को खुले में फेंकने और जलाने से कणिका पदार्थ, डाइऑक्सिन और फ्यूरॉन जैसी जहरीली गैसें निकलती हैं, जिससे शहरों में वायु गुणवत्ता खराब होती है।
- गाज़ीपुर (दिल्ली) और देवनार (मुंबई) जैसे बड़े लैंडफिल स्थलों के आसपास देखा गया है कि डंपसाइटों से निकलने वाला रिसाव भूजल एवं आसपास की नदियों को दूषित करता है।
- प्लास्टिक अपशिष्ट दशकों तक मृदा और जल में बना रहता है, खाद्य शृंखलाओं में प्रवेश करता है तथा पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुँचाता है। यह व्यापक प्रदूषण पर्यावरण की गुणवत्ता को कम करता है और जैवविविधता को क्षति पहुँचाता है।
- जलवायु परिवर्तन में योगदान: अपशिष्ट जलवायु परिवर्तन में एक महत्त्वपूर्ण योगदानकर्त्ता है, लेकिन प्रायः इसे कम करके आँका जाता है। लैंडफिल में फेंका गया जैविक अपशिष्ट अवायवीय रूप से विघटित होता है और मीथेन उत्सर्जित करता है, जो अल्पावधि में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
- भारत में वर्ष 2018 में कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अपशिष्ट क्षेत्र का योगदान लगभग 4% था।
- दिल्ली के अपशिष्ट स्थलों में लगने वाली आग जैसी लगातार होने वाली लैंडफिल आग से कार्बन डाइऑक्साइड एवं ब्लैक कार्बन का उत्सर्जन और बढ़ जाता है, जिससे जलवायु संबंधी प्रभाव और स्थानीय वायु प्रदूषण दोनों ही एक साथ बिगड़ते हैं।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम: अव्यवस्थित अपशिष्ट रोग फैलने के लिये आदर्श परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। खुले अपशिष्ट के ढेर मक्खियों, मच्छरों, चूहों और आवारा पशुओं को आकर्षित करते हैं, जिससे डेंगू, मलेरिया, हैजा एवं दस्त जैसी वेक्टर जनित तथा जल जनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
- अपशिष्ट बीनने वाले और सफाईकर्मी निरंतर, प्रायः बिना सुरक्षात्मक उपकरणों के नुकीली वस्तुओं, जहरीले पदार्थों और जैव-चिकित्सा अपशिष्ट के संपर्क में आते हैं।
- कोविड-19 के दौरान, जैव चिकित्सा अपशिष्ट के अनुचित प्रबंधन ने इस बात को उजागर किया कि अपशिष्ट कुप्रबंधन स्वास्थ्य संकटों को किस प्रकार बढ़ा सकता है।
- अपशिष्ट बीनने वाले और सफाईकर्मी निरंतर, प्रायः बिना सुरक्षात्मक उपकरणों के नुकीली वस्तुओं, जहरीले पदार्थों और जैव-चिकित्सा अपशिष्ट के संपर्क में आते हैं।
- शहरी बाढ़ और जल निकासी व्यवस्था की विफलता: ठोस अपशिष्ट भारतीय शहरों में शहरी बाढ़ का एक प्रमुख कारण है। प्लास्टिक बैग, खाद्य अपशिष्ट और निर्माण मलबा बरसाती जल निकासी नालियों को अवरुद्ध कर देते हैं, जिससे बारिश के जल का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होता है।
- मुंबई, चेन्नई और बंगलुरु जैसे शहरों में मानसून के दौरान प्रायः बाढ़ आती है, जिसका एक कारण अपशिष्ट से अवरुद्ध जल निकासी व्यवस्था है। इन बाढ़ों से घरों को नुकसान पहुँचता है, परिवहन बाधित होता है, पेय जल दूषित होता है तथा परिवारों एवं नगर प्रशासन को बार-बार आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
- इंदौर के भागीरथपुरा में पीने के जल की आपूर्ति में सीवेज के रिसाव के बाद जलजनित बीमारी का एक गंभीर प्रकोप फैल गया, जिससे दर्जनों लोगों की मौत हो गई तथा सैकड़ों लोग दूषित जल के कारण दस्त व उल्टी जैसे लक्षणों से बीमार पड़ गए।
- मुंबई, चेन्नई और बंगलुरु जैसे शहरों में मानसून के दौरान प्रायः बाढ़ आती है, जिसका एक कारण अपशिष्ट से अवरुद्ध जल निकासी व्यवस्था है। इन बाढ़ों से घरों को नुकसान पहुँचता है, परिवहन बाधित होता है, पेय जल दूषित होता है तथा परिवारों एवं नगर प्रशासन को बार-बार आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
- बहुमूल्य संसाधनों की हानि: जब अपशिष्ट को फेंका या जलाया जाता है, तो बहुमूल्य सामग्रियाँ हमेशा के लिये नष्ट हो जाती हैं। जैविक अपशिष्ट को खाद या बायोगैस में परिवर्तित किया जा सकता है; प्लास्टिक व धातुओं को पुनर्चक्रित किया जा सकता है तथा निर्माण अपशिष्ट का उपयोग प्राकृतिक सामग्रियों के स्थान पर किया जा सकता है। इसके विपरीत, भारत नए कच्चे माल का दोहन जारी रखता है जबकि पुनर्प्राप्त करने योग्य संसाधनों को नष्ट कर देता है।
- यह रैखिक ‘एकत्र करो-फेंक दो (Collect–Dump)’ दृष्टिकोण भूमि, जंगलों, खनिजों एवं जल पर दबाव बढ़ाता है, जिससे विकास अधिक संसाधन-गहन और पर्यावरणीय रूप से महंगा हो जाता है।
- आर्थिक अक्षमताएँ और बढ़ती सार्वजनिक लागतें: अपशिष्ट प्रबंधन की अक्षमता सरकारों और समाज पर भारी आर्थिक बोझ डालती है। मिश्रित अपशिष्ट का उपचार पृथक अपशिष्ट के प्रबंधन की तुलना में कहीं अधिक महंगा है, जिससे नगरपालिका का व्यय बढ़ जाता है।
- प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के कारण स्वास्थ्य देखभाल की लागत बढ़ जाती है, वहीं बीमारी और बाढ़ से होने वाली बाधाओं के कारण उत्पादकता में कमी आती है।
- साथ ही, पुनर्चक्रण, खाद बनाने और अपशिष्ट-से-ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में चूके हुए अवसरों का तात्पर्य है नौकरियों एवं राजस्व का नुकसान, जो अन्यथा स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सुदृढ़ कर सकता था।
- शहरी जीवन की गुणवत्ता और स्थिरता में गिरावट: अपशिष्ट के ढेर, दुर्गंध, प्रदूषित जल निकाय और बार-बार लगने वाली आग शहरी जीवन की समग्र गुणवत्ता को कम कर देते हैं।
- अपशिष्ट से ग्रस्त इलाकों में संपत्ति के मूल्य कम होते हैं और सामाजिक तनाव बढ़ता है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव प्रायः गरीब समुदायों पर पड़ता है।
- वैश्विक आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र बनने की आकांक्षा रखने वाले शहर बुनियादी स्वच्छता और पर्यावरणीय सुरक्षा से समझौता किये जाने पर निवेश एवं पर्यटन को आकर्षित करने के लिये संघर्ष करते हैं।
भारत में अपशिष्ट प्रबंधन में मौजूद कमियों को दूर करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- नीति और नियामक सुधारों को सुदृढ़ बनाना: अपशिष्ट को संसाधन में परिणत करने के लिये स्पष्ट और लागू करने योग्य नीतियाँ आधारशिला हैं। ठोस अपशिष्ट, प्लास्टिक अपशिष्ट, ई-अपशिष्ट, जैव-चिकित्सा अपशिष्ट और निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट से संबंधित अपशिष्ट प्रबंधन नियम पहले से मौजूद हैं, लेकिन उनके कार्यान्वयन को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
- अपशिष्ट पदार्थों को स्रोत पर ही अलग करने के सख्त नियम लागू करने, अवैध रूप से अपशिष्ट फेंकने पर जुर्माना लगाने तथा भारी मात्रा में अपशिष्ट उत्पन्न करने वालों की जवाबदेही तय करने से लैंडफिल पर निर्भरता को बहुत हद तक कम किया जा सकता है।
- वैश्विक स्तर पर, जापान जैसे देश घरों में अपशिष्ट पृथक्करण करने के सख्त कानून लागू करते हैं, जिनका पालन न करने पर जुर्माना लगाया जा सकता है, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले पुनर्चक्रण योग्य अपशिष्ट का उत्पादन सुनिश्चित होता है तथा लैंडफिल पर निर्भरता कम से कम होती है।
- नियमित ऑडिट, पारदर्शी रिपोर्टिंग तथा शहरी, पर्यावरण और निर्माण विभागों के बीच समन्वय ज़मीनी स्तर पर नियमों को प्रभावी बनाने के लिये आवश्यक हैं।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल की ओर संक्रमण: रैखिक ‘एकत्र करो-फेंक दो (Collect–Dump)’ दृष्टिकोण से चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण दीर्घकालिक अपशिष्ट समाधानों की कुंजी है। एक चक्रीय प्रणाली में, अपशिष्ट को एक संसाधन के रूप में माना जाता है, जिसका पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण या ऊर्जा में रूपांतरण किया जा सकता है।
- एम्स्टर्डम का चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल उत्पादों को पुन: उपयोग और पुनर्चक्रण के लिये डिज़ाइन करने, कच्चे माल के निष्कर्षण को कम करने,साथ ही हरित रोज़गार सृजित करने पर केंद्रित है।
- इससे पता चलता है कि चक्रीयता से पर्यावरणीय और आर्थिक दोनों तरह के परिणाम बेहतर होते हैं।
- प्रौद्योगिकी और नवाचार का उपयोग: प्रौद्योगिकी अपशिष्ट प्रबंधन में दक्षता, पारदर्शिता और व्यापकता को बढ़ाती है। भारतीय शहर GPS-सक्षम संग्रहण वाहनों, स्वचालित सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं एवं गीले अपशिष्ट को ऊर्जा में परिवर्तित करने के लिये जैव-मेथेनेशन संयंत्रों का तीव्रता से उपयोग कर रहे हैं।
- उदाहरण के लिये, स्वीडन में उन्नत अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्र गैर-पुनर्चक्रणीय अपशिष्ट को बिजली और ज़िला तापन में परिवर्तित करते हैं, जिससे लैंडफिल का उपयोग लगभग शून्य हो जाता है।
- इस प्रकार के नवाचार यह दर्शाते हैं कि प्रौद्योगिकी किस प्रकार अपशिष्ट को उत्पादक संसाधन में बदल सकती है।
- उदाहरण के लिये, स्वीडन में उन्नत अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्र गैर-पुनर्चक्रणीय अपशिष्ट को बिजली और ज़िला तापन में परिवर्तित करते हैं, जिससे लैंडफिल का उपयोग लगभग शून्य हो जाता है।
- विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) और बाज़ार विकास: EPR यह सुनिश्चित करता है कि उत्पादक अपने उत्पादों से उत्पन्न अपशिष्ट की जिम्मेदारी साझा करें। प्लास्टिक और ई-अपशिष्ट के लिये भारत का EPR कार्यढाँचा एक सकारात्मक कदम है, लेकिन सुदृढ़ निगरानी और प्रवर्तन की आवश्यकता है।
- उदाहरण के लिये, पैकेजिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिये यूरोपीय संघ की EPR प्रणालियों ने उत्पादकों को जीवन-चक्र समाप्ति प्रबंधन के लिये आर्थिक रूप से जिम्मेदार बनाकर पुनर्चक्रण दरों में उल्लेखनीय सुधार किया है।
- विश्वसनीय पुनर्चक्रण बाज़ारों द्वारा समर्थित होने पर, EPR नगरपालिकाओं पर बोझ कम करता है तथा संधारणीय उत्पाद डिज़ाइन को प्रोत्साहित करता है।
- अनौपचारिक क्षेत्र का एकीकरण और सशक्तीकरण: भारत में अनौपचारिक अपशिष्ट बीनने वाले पुनर्चक्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन प्रायः वे सुरक्षा व मान्यता के अभाव में काम करते हैं। जिन शहरों में पहचान पत्र, सुरक्षा उपकरण और सहकारी मॉडल के माध्यम से अपशिष्ट बीनने वालों को औपचारिक रूप से एकीकृत किया जाता है, वहाँ पुनर्चक्रण दक्षता एवं सामाजिक समावेशन में वृद्धि होती है।
- उदाहरण के लिये, ब्राज़ील का सहकारी-आधारित अपशिष्ट बीनने वाला मॉडल एक वैश्विक उदाहरण प्रस्तुत करता है जहाँ अनौपचारिक श्रमिकों को पर्यावरण सेवा प्रदाताओं के रूप में मान्यता दी जाती है, जिससे आजीविका सुनिश्चित होती है, साथ ही पुनर्चक्रण प्रणालियों को सुदृढ़ किया जाता है।
- वित्तपोषण, क्षमता निर्माण और संस्थागत सुदृढ़ीकरण: 15 वें वित्त आयोग ने शहरी स्थानीय निकायों के लिये पर्याप्त अनुदान आवंटित किये, जिसमें एक बड़ा हिस्सा स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एवं प्रदर्शन-आधारित परिणामों से जुड़ा हुआ है।
- ये अनुदान शहरों को केवल अधोसंरचना बनाने के बजाय स्रोत पृथक्करण, प्रसंस्करण क्षमता और सेवा वितरण में सुधार करने के लिये प्रोत्साहित करते हैं।
- इंदौर मॉडल एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ निरंतर वित्त पोषण, सुदृढ़ नगरपालिका नेतृत्व, नागरिक भागीदारी एवं परिणाम-आधारित निगरानी ने उच्च स्तर के पृथक्करण, विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण और खुले में अपशिष्ट फेंकने के उन्मूलन को संभव बनाया।
- इस तरह के दृष्टिकोण को अपनाना, जिसमें पूर्वानुमानित वित्त को संस्थागत क्षमता और जवाबदेही के साथ जोड़ा जाता है, अन्य भारतीय शहरों को संधारणीय एवं कुशल अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों के निर्माण में सहायता कर सकता है।
- व्यवहार परिवर्तन और नागरिक भागीदारी: किसी भी अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की सफलता नागरिकों के व्यवहार पर निर्भर करती है। निरंतर जागरूकता अभियान, घर-घर जाकर लोगों से संवाद और अपशिष्ट पृथक्करण के लिये प्रोत्साहन प्रदान करने वाले भारतीय शहरों में अनुपालन का स्तर उच्च रहा है।
- उदाहरण के लिये, सैन फ्रांसिस्को ने सख्त पृथक्करण कानूनों, स्पष्ट लेबलिंग और निरंतर जन शिक्षा के माध्यम से 80% से अधिक लैंडफिल डायवर्जन दर हासिल की।
- इन अनुभवों से पता चलता है कि दीर्घकालिक व्यवहार परिवर्तन के लिये निरंतर संदेश और स्पष्ट परिणाम आवश्यक हैं।
निष्कर्ष:
अपशिष्ट को संसाधन में परिवर्तित करना सतत विकास लक्ष्यों, विशेष रूप से SDG 11, SDG 12, SDG 13 और SDG 6 को प्राप्त करने के लिये आवश्यक है, साथ ही इससे जन स्वास्थ्य एवं शहरी जीवन स्तर में सुधार भी होगा। भारत के लिये, प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन स्वच्छ भारत मिशन, मिशन LiFE और वर्ष 2047 तक विकसित भारत विज़न जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का आधार है। सुदृढ़ शासन, चक्रीय अर्थव्यवस्था की कार्यप्रणाली एवं जिम्मेदार नागरिक व्यवहार मिलकर भारत के शहरों को स्वच्छ, अधिक समुत्थानशील और संसाधन-कुशल बना सकते हैं।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न. “अपशिष्ट को बोझ से संसाधन में बदलना भारत के शहरी सतत विकास लक्ष्यों का मुख्य आधार है।” स्वच्छ भारत मिशन और मिशन LiFE के उद्देश्यों को प्राप्त करने में नीतिगत सुधारों, वित्तपोषण तंत्रों एवं नागरिक भागीदारी की भूमिका का विश्लेषण कीजिये। |
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. भारत में अपशिष्ट प्रबंधन एक प्रमुख मुद्दा क्यों है?
क्योंकि बढ़ते शहरीकरण और उपभोग के कारण शहरों द्वारा सुरक्षित रूप से अपशिष्ट का निपटान करने की तुलना में अपशिष्ट तीव्रता से उत्पन्न हो रहा है।
प्रश्न 2. भारत के नगरपालिका अपशिष्ट प्रवाह में किस प्रकार का अपशिष्ट प्रमुख है?
जैविक (गीला) अपशिष्ट, जो नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट के आधे से अधिक हिस्से का निर्माण करता है।
प्रश्न 3. अपशिष्ट प्रबंधन की अकुशल कार्यप्रणाली जलवायु परिवर्तन को किस प्रकार प्रभावित करती है?
जैविक अपशिष्ट को फेंकने से मीथेन गैस निकलती है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
प्रश्न 4. भारत के अपशिष्ट प्रबंधन दृष्टिकोण में कौन-सा प्रमुख परिवर्तन आवश्यक है?
एक रैखिक ‘एकत्र करो-फेंक दो (Collect–Dump)’ प्रणाली से चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल की ओर संक्रमण।
प्रश्न 5. सतत अपशिष्ट प्रबंधन का समर्थन करने वाली राष्ट्रीय पहलें कौन-कौन सी हैं?
स्वच्छ भारत मिशन और मिशन LiFE
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत में निम्नलिखित में से किसमें एक महत्त्वपूर्ण विशेषता के रूप में ‘विस्तारित उत्पादक दायित्व’ आरंभ किया गया था? (2019)
(a) जैव चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 1998
(b) पुनर्चक्रित प्लास्टिक (निर्माण और उपयोग) नियम, 1999
(c) ई-अपशिष्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 2011
(d) खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2011
उत्तर: (c)
प्रश्न 2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन.जी.टी.) किस प्रकार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सी.पी.सी.बी.) से भिन्न है? (2018)
- एन.जी.टी. का गठन एक अधिनियम द्वारा किया गया है जबकि सी.पी.सी.बी. का गठन सरकार के कार्यपालक आदेश से किया गया है।
- एन.जी.टी. पर्यावरणीय न्याय उपलब्ध कराता है और उच्चतर न्यायालयाें में मुकदमाें के भार को कम करने में सहायता करता है जबकि सी.पी.सी.बी. झरनाें और कुँओं की सफाई को प्रोत्साहित करता है, तथा देश में वायु की गुणवत्ता में सुधार लाने का लक्ष्य रखता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न 1.निरंतर उत्पन्न किये जा रहे फेंके गए ठोस कचरे की विशाल मात्राओं का निस्तारण करने में क्या-क्या बाधाएँ हैं? हम अपने रहने योग्य परिवेश में जमा होते जा रहे जहरीले अपशिष्टों को सुरक्षित रूप से किस प्रकार हटा सकते हैं? (2018)