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अर्बन चैलेंज फंड

  • 16 Feb 2026
  • 110 min read

प्रिलिम्स के लिये: अर्बन चैलेंज फंड, केंद्रीय बजट, शहरी स्थानीय निकाय, अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन 2.0 (AMRUT 2.0), स्वच्छ भारत मिशन-शहरी

मेन्स के लिये: भारत की आर्थिक वृद्धि और GDP में शहरों की भूमिका, बाज़ार-आधारित वित्तपोषण और नगरपालिका वित्त सुधार, शहरी शासन की चुनौतियाँ और वित्तीय विकेंद्रीकरण

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अर्बन चैलेंज फंड (UCF) को मंज़ूरी दे दी है, जो अनुदान-आधारित वित्तपोषण से बाज़ार-आधारित शहरी विकास की दिशा में बदलाव को दर्शाता है।

  • यह 2025–26 के केंद्रीय बजट में भारत द्वारा घोषित दृष्टि को कार्यान्वित करता है, जिसमें शहरों को विकास के केंद्र के रूप में विकसित करना, शहरों का रचनात्मक पुनर्विकास और जल एवं स्वच्छता से संबंधित प्रस्तावों को लागू करना शामिल है।

सारांश

  • अर्बन चैलेंज फंड (UCF) भारत की शहरी नीति को अनुदान-आधारित वित्तपोषण से बाज़ार-संबंधित, सुधार-प्रधान विकास की ओर ले जाता है। यह विकास केंद्रों और जल स्थिरता को बढ़ावा देता है, साथ ही नगरपालिका वित्त तथा निजी निवेश को सुदृढ़ करता है।
  • चूँकि शहर GDP का 60–70% उत्पन्न करते हैं, लेकिन उन्हें अवसंरचना की कमी, जलवायु जोखिम और शासन संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, UCF का उद्देश्य टिकाऊ, समावेशी और आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्द्धी शहरीकरण को संभव बनाना है।

अर्बन चैलेंज फंड (UCF) के संबंध में मुख्य तथ्य क्या हैं?

  • परिचय: अर्बन चैलेंज फंड (UCF) आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) की एक केंद्र  प्रायोजित योजना है, जिसके लिये वित्तीय वर्ष 2025–26 से 2030–31 तक ₹1,00,000 करोड़ की केंद्रीय सहायता निर्धारित की गई है और इसे लागू करने की अवधि वित्तीय वर्ष 2033–34 तक बढ़ाई जा सकती है।
    • इसका उद्देश्य चैलेंज-आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से बैंकेबल (Bankable) शहरी अवसंरचना परियोजनाओं का समर्थन करना है, जिससे पाँच वर्षों में लगभग ₹4 लाख करोड़ के निवेश को उत्प्रेरित किया जा सके।
    • यह योजना अनुदान-आधारित वित्तपोषण से बाज़ार-संबंधित, सुधार-प्रधान और परिणाम-केंद्रित शहरी विकास की ओर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है, यह स्वीकार करते हुए कि केवल सार्वजनिक वित्त शहरी अवसंरचना की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता।
  • वित्तपोषण पैटर्न और वित्त मॉडल:
    • केंद्रीय सहायता: केंद्र सरकार परियोजना की लागत का 25% वहन करेगी।
    • बाज़ार लाभ: फंडिंग (वित्तपोषण) के लिये एक पूर्व शर्त यह है कि शहरों को परियोजना लागत का कम-से-कम 50% बाज़ार स्रोतों से जुटाना होगा, जिसमें नगर निगम बॉण्ड, बैंक ऋण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPPs) शामिल हैं।
    • शेष हिस्सा: अंतिम 25% का योगदान राज्य, केंद्रशासित प्रदेश, शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) या अतिरिक्त बाज़ार वित्तपोषण द्वारा किया जा सकता है।
      • यह संरचना निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करती है, जिससे शहरी अवसंरचना के निर्माण और प्रबंधन में वित्तीय तथा प्रबंधकीय साझेदारी दोनों संभव हो सकें।
  • तीन रणनीतिक स्तंभ: UCF के तहत परियोजनाओं को इन तीन मुख्य स्तंभों में से किसी एक के अनुरूप होना चाहिये:
    • विकास केंद्र के रूप में शहर: यह ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD), ग्रीनफील्ड टाउनशिप और आर्थिक गलियारों पर केंद्रित है, ताकि प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाई जा सके।
    • सृजनात्मक पुनर्विकास: इसमें भीड़भाड़ वाले शहर के केंद्र, सांस्कृतिक धरोहर स्थल और ब्राउनफील्ड पुनरुज्जीवन यानी परित्यक्त औद्योगिक भूमि का पुन: उपयोग शामिल है।
    • जल और स्वच्छता: इसमें पेयजल आपूर्ति में सेवा पूर्णता हासिल करना तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का आधुनिकीकरण, साथ ही पुराने अपशिष्ट का निवारण शामिल है।
  • छोटे शहरों के लिये क्रेडिट पुनर्भुगतान गारंटी: छोटे शहरों हेतु बाज़ार तक पहुँच सुगम बनाने के लिये ₹5,000 करोड़ का कोष तैयार किया गया है, जो ऋण पुनर्भुगतान गारंटी योजना उपलब्ध कराएगा।
    • पात्रता: उत्तरपूर्वी/पहाड़ी राज्यों के शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) और 1 लाख से कम आबादी वाले नगर इस योजना के लिये पात्र हैं।
    • गारंटी: यह योजना पहली बार ऋण लेने वालों के लिये केंद्र सरकार द्वारा ₹7 करोड़ तक या ऋण राशि का 70% (जो भी कम हो) की गारंटी प्रदान करती है। वहीं बाद में लिये जाने वाले ऋण हेतु यह ₹7 करोड़ तक या ऋण राशि का 50% तक की गारंटी देती है।
      • यह छोटे शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को प्रारंभ में ₹20 करोड़ और बाद के चरणों में ₹28 करोड़ की परियोजनाओं को लागू करने में सक्षम बनाता है, जिससे ऋणदाताओं का भरोसा बढ़ता है तथा बाज़ार वित्त तक पहुँच का विस्तार होता है।
  • कवरेज: यह निधि सभी ऐसे शहरों को कवर करेगी जिनकी जनसंख्या 10 लाख या उससे अधिक है (2025 के अनुमान के अनुसार), सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की राजधानियाँ जो इस श्रेणी में शामिल नहीं हैं और प्रमुख औद्योगिक शहर जिनकी जनसंख्या 1 लाख या उससे अधिक है।
    • परियोजनाएँ बैंक योग्य, परिवर्तनकारी और तीन वर्टिकल्स के अनुरूप होनी चाहिये, जिनमें स्पष्ट परिणाम और विश्वसनीय बाज़ार वित्त पोषण योजनाएँ हों।
    • अटल कायाकल्प और शहरी परिवर्तन मिशन (AMRUT) 2.0, स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (SBM-U 2.0) या अन्य केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं के तहत पहले से वित्तपोषित परियोजनाएँ पात्र नहीं हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि UCF नई और नवोन्मेषी पहलों का समर्थन करना।
  • सुधार-संबंधित चयन (चैलेंज मोड): पिछली योजनाओं के विपरीत, जहाँ फंड जनसंख्या के आधार पर आवंटित होते थे, UCF एक प्रतिस्पर्द्धात्मक चैलेंज मोड का उपयोग करता है।
    • निधि तभी जारी की जाती है जब शहर अर्बन गवर्नेंस, डिजिटल सिस्टम और वित्तीय पारदर्शिता में विशिष्ट सुधार लागू करते हैं।
    • परियोजनाओं का मूल्यांकन प्रदर्शन संकेतकों (KPI), जैसे– रोज़गार सृजन, राजस्व संग्रहण और जलवायु सहनशीलता के आधार पर किया जाता है।

भारत के आर्थिक भविष्य के लिये शहर क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?

  • उत्पादकता केंद्र: शहर बड़े इंजन के रूप में कार्य करते हैं जो आर्थिक गतिविधियों को छोटे, प्रभावी भौगोलिक क्षेत्रों में संकुचित करते हैं।
    • जबकि केवल 3% भूमि शहरी है, शहर भारत की GDP में लगभग 60% से 70% का योगदान देते हैं।
    • केवल 15 शहर (जिनमें मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद शामिल हैं) राष्ट्रीय GDP का 30% हिस्सा बनाते हैं। इन हब्स से 2047 तक वार्षिक GDP वृद्धि में अतिरिक्त 1.5% योगदान की आशा है।
  • खपत और बढ़ता मध्यम वर्ग: शहर भारत को विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनने में केंद्र भूमिका निभा रहा है।
    • वर्ष 2030 तक भारत की कुल उपभोक्ता खपत लगभग दोगुनी होकर 3.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होने की संभावना है, जिसमें शहरी मध्यम वर्ग इस वृद्धि का लगभग 60% हिस्सा देगा।
    • शहरी आय ग्रामीण आय से चार गुना तक अधिक है, जो इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर प्रीमियम सेवाओं तक की मांग को बढ़ावा देती है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा और FDI: भारत में लगभग 90% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रमुख शहरी क्षेत्रों में केंद्रित होता है।
    • मेट्रो नेटवर्क, हाई-स्पीड इंटरनेट और स्थिर विद्युत जैसी प्रभावी शहरी अवसंरचना भारत के 2026 तक 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर और 2047 तक 40 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य के लिये आवश्यक है।
  • सामाजिक और आर्थिक अवसर: शहरीकरण गरीबी उन्मूलन और सामाजिक गतिशीलता के लिये एक प्रमुख माध्यम है।
    • शहर स्वास्थ्य सेवाओं, विशेष शिक्षा और डिजिटल अवसंरचना तक बेहतर पहुँच प्रदान करते हैं, जिससे आर्थिक विकास और जीवन स्तर में सुधार होता है।

भारतीय शहरों के सतत विकास में क्या चुनौतियाँ हैं?

  • अवसंरचना और आवास की कमी: भारतीय शहर अपनी निर्माण क्षमता से तेज़ी से बढ़ रहे हैं। वर्ष 2031 तक शहरी जनसंख्या 600 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है, जिससे एक विशाल ‘स्केल’ समस्या उत्पन्न होगी।
    • भारत को शहरी अवसंरचना के लिये वार्षिक ₹4.6 लाख करोड़ का निवेश आवश्यक है, जबकि वर्तमान वित्तपोषण लगभग ₹1.3 लाख करोड़ के आसपास है, जिससे 70% का बड़ा घाटा उत्पन्न होता है।
    • किफायती आवासों की कमी 1 करोड़ है और यह संख्या 2030 तक तीन गुना होने की संभावना है। इसके परिणामस्वरूप 6.5 करोड़ लोग मलिन बस्तियों में आवास कर रहे हैं।
  • पूर्णता में देरी: PMAY जैसी योजनाओं के तहत, जबकि स्वीकृतियों की संख्या अधिक है (1.08 करोड़), भूमि की बढ़ती लागत और नियामक बाधाओं के कारण परियोजनाओं की पूर्णता दर अक्सर लक्ष्यों से पीछे रहती है।
  • पर्यावरणीय और संसाधन संबंधी दबाव: तीव्र शहरीकरण ने शहरी ‘कॉमंस’- वायु, जल और मृदा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
    • वर्ष 2024 में, भारत विश्व का पाँचवा सबसे प्रदूषित देश था। वर्ष 2026 तक, ‘प्रदूषण अर्थव्यवस्था’ में तेज़ी आई है, जिसमें सार्वजनिक प्रणालियाँ स्वच्छ वायु प्रदान करने में विफल रहीं और घरों ने निजी वायु तथा जल शोधक उपकरणों पर अरबों रुपये खर्च किये।
    • वर्ष 2030 तक, जल की मांग उपलब्ध आपूर्ति का दोगुना हो जाएगी। बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहर पहले ही गंभीर मौसमी संकटों का सामना कर रहे हैं, जहाँ पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसाव के कारण पाइप के माध्यम से पहुँचाया गया जल का 40-50% नुकसान हो जाता है।
    • शहर प्रतिदिन 1,50,000 टन से अधिक अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं। गाज़ीपुर (दिल्ली) जैसे प्रमुख लैंडफिल भरे हुए हैं, फिर भी अपशिष्ट का केवल एक छोटा हिस्सा वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्कृत किया जाता है।
  • गतिशीलता और जलवायु संवेदनशीलता: शहरों का भौतिक ‘प्रवाह’ दृढ़ होता जा रहा है, जबकि भौतिक ‘आकार’ असुरक्षित होता जा रहा है।
    • मुंबई और बेंगलुरु  जैसे शहरों में यातायात संकट का स्तर प्रायः 50% से अधिक हो जाता है, जिससे उत्पादकता में कमी के कारण अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष 22 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान होता है।
    • शहरी केंद्र अब आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 3-4°C अधिक गर्म हो गए हैं, जिससे मृत्यु दर का जोखिम बढ़ता है तथा शीतलन हेतु विद्युत ग्रिड पर दबाव पड़ता है।
  • शहरी बाढ़: तूफानी जल निकासी प्रणालियों के अतिक्रमण और "कंक्रीट-हेवी" योजना ने चेन्नई और मुंबई जैसे शहरों को अत्यधिक वर्षा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है। अब 85% भारतीय ज़िले चरम जलवायु घटनाओं की चपेट में हैं।
  • शासन एवं राजकोषीय कमज़ोरी: यद्यपि शहर सकल घरेलू उत्पाद का दो-तिहाई हिस्सा योगदान करते हैं, फिर भी नगर निगम राष्ट्रीय कर राजस्व का 1% से भी कम नियंत्रित करते हैं।
    • खराब GIS मैपिंग और दरों को संशोधित करने में राजनीतिक सुभेद्यता के कारण, भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 0.2% से भी कम भाग संपत्ति करों के माध्यम से एकत्रित किया जाता है, जबकि OECD देशों में यह 1.1% है।
    • मुंबई मेट्रो विस्तार जैसी परियोजनाओं में "बहु-स्तरीय शासन" के कारण विलंब होता है, जहाँ कई एजेंसियाँ (राज्य, केंद्र और स्थानीय) प्रायः विपरीत उद्देश्यों से कार्य करती हैं।

भारतीय शहरों के सतत विकास के लिये क्या उपाय अपनाए जा सकते हैं?

  • पारगमन-उन्मुख विकास (TOD): शहरी विकास निधि के तहत, पारगमन गलियारों के साथ उच्च-घनत्व, मिश्रित-उपयोग विकास को बढ़ावा देना ताकि आवागमन समय न्यूनतम हो और निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो।
  • बिना मोटर वाले परिवहन (NMT): पैदल यात्री-अनुकूल पथ और साइकिल ट्रैक के माध्यम से समर्पित "लास्ट-माइल" कनेक्टिविटी स्थापित करना, ताकि यातायात अक्षमताओं के कारण होने वाले नुकसान में कमी लाई जा सके।
  • डिजिटल अवसंरचना (गति शक्ति): जल, विद्युत और परिवहन नेटवर्क की एकीकृत योजना हेतु पीएम गति शक्ति भू-स्थानिक प्लेटफॉर्म का उपयोग करना, जिससे बार-बार सड़क खुदाई और संसाधनों की बर्बादी से बचा जा सके।
  • "स्पंज सिटी" की अवधारणा: शहरी बाढ़ के प्रबंधन हेतु "स्पंज सिटी" मॉडल (चीन और सिंगापुर में प्रयुक्त) का कार्यान्वयन, जिसमें पारगम्य सतहों, शहरी आर्द्रभूमियों और तूफानी जल को सोखने के लिये "वर्षा उद्यान" का निर्माण शामिल है।
  • शहरी ताप द्वीपों (UHI) का न्यूनीकरण: "हरित-नीली" अवसंरचना (पार्क और जल निकाय) में वृद्धि तथा कूल रूफ की नीतियों को लागू करके शहरों का तापमान 2-3°C तक कम करना।
  • अपशिष्ट में चक्रीय अर्थव्यवस्था: 100% अपशिष्ट पृथक्करण को अनिवार्य करके तथा गैर-पुनर्चक्रणीय पुराने अपशिष्ट (जैसे– गाज़ीपुर या ओखला जैसे स्थलों पर) के लिये अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्रों का उपयोग करके शून्य-अपशिष्ट शहरों की ओर अग्रसर होना।
  • जल की तटस्थता: बड़े आवासीय परिसरों में विकेंद्रित सीवेज उपचार संयंत्र (STP) अनिवार्य करना, ताकि बागवानी और फ्लशिंग हेतु 100% "ग्रे वाटर" का उपचार और पुनः उपयोग किया जा सके।

निष्कर्ष

अर्बन चैलेंज फंड भारत में आर्थिक रूप से सतत शहरीकरण की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम है। बाज़ार पहुँच को सक्षम करके, शहरी शासन को सुदृढ़ करके, निजी भागीदारी को बढ़ावा देकर और छोटे शहरों का समर्थन करके इसका उद्देश्य भविष्य की विकास आवश्यकताओं के अनुरूप सुदृढ़, समावेशी और आर्थिक रूप से गतिशील शहरी केंद्रों का निर्माण करना है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  भारत में शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग को बदलने में अर्बन चैलेंज फंड के महत्त्व पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. अर्बन चैलेंज फंड (UCF) क्या है?
यह आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) की एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जो बाज़ार-आधारित वित्तपोषण और सुधार-आधारित चयन के माध्यम से शहरी परियोजनाओं को बढ़ावा देती है।

2. UCF के तहत वित्तपोषण का पैटर्न क्या है?
केंद्र 25% सहायता प्रदान करता है, जिसमें कम-से-कम 50% बाज़ार स्रोतों से आता है और शेष 25% राज्यों/शहरी स्थानीय निकायों (ULB) या अतिरिक्त वित्त से आता है।

3. UCF के तहत कौन-से शहर पात्र हैं?
10 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले शहर, सभी राज्य/केंद्रशासित प्रदेश की राजधानियाँ और 1 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले प्रमुख औद्योगिक शहर।

4. UCF छोटे शहरों का समर्थन कैसे करता है?
5,000 करोड़ रुपये की ऋण चुकौती गारंटी योजना के माध्यम से, जो छोटे शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को 70% तक सरकारी गारंटी के साथ बाज़ार ऋण प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।

5. भारत के आर्थिक भविष्य के लिये शहर क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
शहर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 60-70% उत्पन्न करते हैं, अधिकांश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित करते हैं तथा उत्पादकता, उपभोग और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

मेन्स 

प्रश्न. कई वर्षों से उच्च तीव्रता की वर्षा के कारण शहरों में बाढ़ की बारंबारता बढ़ रही है। शहरी क्षेत्रों में बाढ़ के कारणों पर चर्चा करते हुए इस प्रकार की घटनाओं के दौरान जोखिम कम करने की तैयारियों की क्रियाविधि पर प्रकाश डालिये। (2016)

प्रश्न. क्या कमज़ोर और पिछड़े समुदायों के लिये आवश्यक सामाजिक संसाधनों को सुरक्षित करने के द्वारा, उनकी उन्नति के लिये सरकारी योजनाएँ, शहरी अर्थव्यवस्थाओं में व्यवसायों की स्थापना करने में उनको बहिष्कृत कर देती हैं? (2014) 

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