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विकसित भारत और नेट ज़ीरो की ओर परिदृश्य

  • 14 Feb 2026
  • 129 min read

प्रिलिम्स के लिये: NITI आयोग, मिशन LiFE, कार्बन प्रग्रहण, उपयोग और भंडारण, लघु मॉड्यूलर नाभिकीय रिएक्टर, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व

मेन्स के लिये: भारत का नेट ज़ीरो लक्ष्य और विकासात्मक निहितार्थ, जलवायु और आर्थिक नियोजन में नीति आयोग की भूमिका

स्रोत: पी.आई.बी.

चर्चा में क्यों?

NITI आयोग ने ‘विकसित भारत एवं नेट ज़ीरो की ओर परिदृश्य’ विषयक 11 व्यापक रिपोर्टों का प्रकाशन किया है, जिन्हें दस अंतर-मंत्रालयी कार्य समूहों द्वारा तैयार किया गया है।

  • इन रिपोर्टों में एक समेकित आकलन प्रस्तुत किया गया है, जिसके माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि भारत वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनते हुए विकसित भारत’ का लक्ष्य किस प्रकार प्राप्त कर सकता है, साथ ही वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन की अपनी प्रतिबद्धता का समानांतर रूप से निर्वहन कर सकता है।

सारांश

  • नीति आयोग की रिपोर्टों में यह प्रस्तुत किया गया है कि भारत विद्युतीकरण, नवीकरणीय और नाभिकीय ऊर्जा के व्यापक विस्तार, हरित रोज़गार एवं सतत् शहरीकरण के माध्यम से वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था कैसे बन सकता है और वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य कैसे प्राप्त कर सकता है।
  • इस परिवर्तन में वित्तपोषण अभाव, क्रिटिकल खनिजों पर निर्भरता, प्रौद्योगिकी की सीमाएँ और न्यायसंगत परिवर्तन की आवश्यकताएँ जैसी बाधाएँ हैं; समाधानों में जलवायु वित्त सुधार, हरित औद्योगिक नीतियाँ, अनुकूलनशील आपूर्ति शृंखलाएँ, संधारणीय बुनियादी ढाँचा और मिशन LiFE द्वारा संचालित व्यवहार परिवर्तन शामिल हैं।

नीति आयोग की ‘विकसित भारत और नेट ज़ीरो की ओर परिदृश्य’ संबंधी रिपोर्टों के मुख्य बिंदु क्या हैं?

व्यापक आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव

  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की संरचना: अर्थव्यवस्था ‘उपभोग-प्रधान’ मॉडल से ‘निवेश-प्रधान’ मॉडल की ओर संक्रमण करेगी। निजी उपभोग का अनुपात घटेगा, जबकि निवेश का अनुपात बढ़ेगा।
    • GDP वर्ष 2025 के 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है।
  • व्यापार संतुलन: हालाँकि क्रिटिकल खनिजों का आयात बढ़ेगा, लेकिन अनुमान है कि वर्ष 2070 तक जीवाश्म ईंधन के आयात में 9 ट्रिलियन रुपये की बचत होगी, जिससे आर्थिक अनुकूलनशीलता का सुदृढ़ीकरण होगा।
  • रोज़गार:
    • हरित रोज़गार: ऊर्जा क्षेत्र वर्ष 2050 तक 7 मिलियन रोज़गार सृजित करेगा।
    • न्यायसंगत परिवर्तन: जीवाश्म ईंधन पर निर्भर ज़िलों (150 से अधिक) को पुनर्गठन का सामना करना पड़ेगा, जिसके लिये श्रमिकों हेतु व्यापक स्तर पर कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता होगी।
  • भूमि संबंधी संघर्ष: नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के लिये व्यापक स्तर पर भूमि की आवश्यकता होती है, जो संभावित रूप से कृषि और पारिस्थितिकी के साथ संघर्षरत हो सकती है।
  • व्यवहार की भूमिका: मिशन LiFE जैसी पहलें जीवन-शैली में बदलाव (जैसे- सार्वजनिक परिवहन, कुशल शीतलन) के माध्यम से मांग को नियंत्रित करने के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
  • शहरीकरण: शहरी आबादी वर्ष 2023 के 37% से बढ़कर वर्ष 2047 तक 51% और वर्ष 2070 तक 65% हो जाएगी।
  • अवसंरचना विस्तार: 
    • आवासन: वर्ष 2070 तक आवश्यक कुल भवन फ्लोर क्षेत्र का 86% हिस्सा अभी बनाया जाना शेष है।
    • कूलिंग: भारत में एयर कंडीशनर (AC) की आज के 10% से बढ़कर वर्ष 2070 तक 80% होने का अनुमान है, जिससे ऊर्जा की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
    • व्हीकल ओनरशिप: प्रति 1,000 व्यक्तियों पर कार की ओनरशिप 32 से बढ़कर वर्ष 2070 तक 200–250 के स्तर तक पहुँच जाएगी।

नेट ज़ीरो सिनेरियो के तहत ऊर्जा संक्रमण

  • विद्युतीकरण ही कुंजी है: 'नेट ज़ीरो' (शुद्ध शून्य) परिदृश्य के तहत, अंतिम ऊर्जा मांग में विद्युत् की हिस्सेदारी तीन गुना हो जाएगी, जो वर्ष 2025 के 21% से बढ़कर वर्ष 2070 तक 60% हो जाएगी।
  • विद्युत उत्पादन में बदलाव:
    • नवीकरणीय ऊर्जा: सौर एवं पवन ऊर्जा क्षमता वर्ष 2025 के ~164 GW से बढ़कर वर्ष 2070 तक 6,000 GW से अधिक हो जाएगी।
    • परमाणु ऊर्जा: इसे एक रणनीतिक स्तंभ के रूप में परिकल्पित किया गया है, जो निरंतर 'बेसलोड पावर' प्रदान करने के लिये 8 GW से बढ़कर 2070 तक 300 GW से अधिक हो जाएगी।
    • जीवाश्म ईंधन: प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण में जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी वर्ष 2025 के 87% से गिरकर वर्ष 2070 तक 14% रह जाएगी।
  • ग्रिड उत्सर्जन: ग्रिड उत्सर्जन कारक वर्ष 2070 तक गिरकर शून्य होने का अनुमान है।

वित्तीय निहितार्थ और निवेश अंतराल

  • निवेश की आवश्यकता: 'नेट ज़ीरो' (शुद्ध शून्य) परिदृश्य के लिये वर्ष 2070 तक कुल 22.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के संचयी निवेश की आवश्यकता है।
    • यह 500 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष के निवेश के बराबर है, हालाँकि वर्तमान वार्षिक निवेश केवल 135 बिलियन डॉलर है।
  • वित्तपोषण अंतराल: घरेलू सुधारों के बावज़ूद, अभी भी 6.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का वित्तपोषण अंतराल बना हुआ है।
  • विदेशी पूंजी पर निर्भरता: इस अंतराल को समाप्त करने के लिये, अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के स्रोतों (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश - FDI, रियायती वित्त) की हिस्सेदारी वर्ष 2070 तक 17% से बढ़कर 42% करने की आवश्यकता हो सकती है।

महत्त्वपूर्ण खनिज

  • मांग में उछाल: जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ प्रौद्योगिकियों की ओर संक्रमण ऊर्जा सुरक्षा जोखिमों को ‘ईंधन आपूर्ति’ से हटाकर ‘खनिज आपूर्ति’ की ओर ले जा रहा है।
    • ‘नेट ज़ीरो' परिदृश्य में, महत्त्वपूर्ण ऊर्जा संक्रमण खनिजों (CETM) की मांग वर्तमान नीतियों की तुलना में 51% तक बढ़ जाएगी।
  • प्रमुख खनिज:
    • तांबा और ग्रेफाइट: कुल मांग का दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं पदार्थों का है।
    • लिथियम, कोबाल्ट, निकेल: भारत इन खनिजों के लिये लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है।
  • मांग बढ़ाने वाले क्षेत्र: इलेक्ट्रिक व्हीकल की बैटरियाँ (कुल मांग का 55%) एवं सौर प्रौद्योगिकियाँ (30%)।
  • रणनीति: भारत को अन्वेषण बढ़ाने, अंतर्राष्ट्रीय परिसंपत्तियाँ सुरक्षित करने तथा चक्रीयता (पुनर्चक्रण) को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

विकसित भारत और नेट ज़ीरो हासिल करने में भारत की क्या चुनौतियाँ हैं?

  • ‘अभूतपूर्व प्रयोग’ का पैमाना: नीति आयोग ने कहा है कि किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था ने कभी भी एक ही पीढ़ी के भीतर अपने सकल घरेलू उत्पाद को आठ गुना (लगभग 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक) बढ़ाने का प्रयास नहीं किया है, साथ-ही-साथ अपनी ऊर्जा प्रणाली को नेट-ज़ीरो में परिवर्तित भी नहीं किया है।
  • कमज़ोर प्रौद्योगिकी: इस परिवर्तन हेतु आवश्यक प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ, विशेष रूप से CCUS, दीर्घावधि ऊर्जा भंडारण तथा स्मॉल मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर, ‘भारत में कमज़ोर एवं अप्रमाणित’ बनी हुई हैं।
  • वित्तपोषण अंतराल एवं व्यापक आर्थिक परिवर्तन: यह परिवर्तन एक संरचनात्मक परिवर्तन की मांग करता है, जहाँ सकल घरेलू उत्पाद में निजी खपत का हिस्सा घटता है (वर्ष 2025 में 58% से वर्ष 2070 में 52% तक), जबकि निवेश का हिस्सा बढ़ता है। 
    • इसका आशय ‘घरेलू तरलता में संकुचन’ से है, जो यदि विदेशी पूंजी प्रवाह द्वारा संतुलित नहीं किया गया तो खपत को कम कर सकता है।
  • महत्त्वपूर्ण खनिज की सुरक्षा: लिथियम, निकेल, कोबाल्ट एवं दुर्लभ मृदा तत्त्वों के लिये, घरेलू भंडारों की कमी के कारण भारत आयात पर लगभग पूर्ण निर्भरता का सामना कर रहा है। 
    • यहाँ तक कि जहाँ कच्चे माल उपलब्ध भी हो सकते हैं, वहाँ शोधन क्षमता (जैसे- सौर पैनलों के लिये पॉलीसिलिकॉन) में कमियाँ देखने को मिलती हैं।
  • जल-संकट: एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय चुनौती यह है कि भारत की लगभग 75% नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता ऐसे राज्यों में केंद्रित है, जो जल-संकट का सामना कर रहे हैं, जिससे ऊर्जा उत्पादन और जल संरक्षण के बीच संघर्ष उत्पन्न होता है।
  • अवसंरचना ‘लॉक-इन’ जोखिम: नीति आयोग यह इंगित करता है कि वर्ष 2070 में मौजूद होने वाले भवनों के 86% क्षेत्रफल का निर्माण अभी तक नहीं हुआ है।
    • एयर कंडीशनर में स्वामित्व 10% से बढ़कर 80% से अधिक होने की संभावना है, जिससे यदि तात्कालिक रूप से पैसिव डिज़ाइन और सुपर-एफिशिएंट उपकरणों को अनिवार्य नहीं किया गया तो उच्च ऊर्जा मांग ‘लॉक-इन’ होने का बड़ा जोखिम उत्पन्न होगा।
  • सामाजिक एवं क्षेत्रीय असमानताएँ: रिपोर्ट में यह दर्शाया गया है कि 150 से अधिक ज़िले कोयला और थर्मल पावर इकोसिस्टम पर निर्भर हैं।
    • फॉसिल-ईंधन से जुड़ा निर्माण क्षेत्र वर्तमान में लगभग 1.7 करोड़ श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करता है। 
    • इन क्षेत्रों को ‘गहन पुनर्गठन दबाव’ का सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिये क्षेत्रीय आर्थिक पतन को रोकने हेतु बड़े पैमाने पर सामाजिक सुरक्षा और पुन: कौशल विकास की आवश्यकता है।
  • कृषि की द्विगुणित संवेदनशीलता: कृषि विशिष्ट है, क्योंकि यह न केवल उत्सर्जन का स्रोत है, बल्कि जलवायु परिवर्तन का भी शिकार है। 
    • चुनौती यह है कि उत्सर्जन (जो अक्सर ‘अदृश्य’ होते हैं) को कम करते हुए देश के सबसे बड़े नियोक्ता के लिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाए तथा साथ ही कृषकों की आजीविका को प्रभावित न किया जाए।

भारत को विकसित भारत और नेट-ज़ीरो की ओर अग्रसर करने हेतु कौन-से उपाय अपनाए जा सकते हैं?

  • व्यवहार परिवर्तन: सतत उपभोग को प्रोत्साहित करने के लिये मिशन LiFE को व्यवस्थित रूप से शामिल किया जाए।
  • शहरी गतिशीलता को पुनर्निर्देशित करना: केवल निजी वाहनों को EV में बदलने की बजाय रेल, मेट्रो और गैर-मोटर चालित परिवहन को समेकित करने पर ध्यान दिया जाए।
    • ट्रांज़िट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) विकसित करना, ताकि यात्रा की आवश्यकता को कम किया जा सके और भूमि उपयोग व परिवहन योजना को समेकित किया जा सके। माल ढुलाई को रेल और जलमार्ग जैसे कुशल माध्यमों पर स्थानांतरित करना।
  • भवनों को भविष्य के अनुकूल बनाना: चूँकि 2070 में मौजूद भवनों का 80% हिस्सा अभी निर्माणाधीन है, इसलिये सख्त नियम अनिवार्य हैं।
    • बेंचमार्किंग, प्रकटीकरण और ग्रीन प्रोक्योरमेंट का उपयोग करना, ताकि ‘नेट ज़ीरो रेडी’ भवनों को सामान्य बनाया जा सके।
  • हरित विश्व में औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता: ग्रीन हाइड्रोजन, CCUS और लो-कार्बन सीमेंट में जोखिम कम करने के लिये ब्लेंडेड फाइनेंस और सार्वजनिक खरीद का उपयोग करना।
    • कार्बन मापन और प्रमाणन प्रणालियों को सुदृढ़ करना, ताकि वैश्विक कार्बन सीमा करों के लिये तैयारी की जा सके।
  • सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाएँ: जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को खनिज निर्भरता से बदलने से बचना। घरेलू खोज और परिष्करण को तेज़ करना। विदेशी संपत्ति अधिग्रहण के लिये KABIL जैसे संस्थानों को सशक्त बनाना।
  • समेकित भूमि और जल योजना: एग्रीवोल्टाइक, फ्लोटिंग सोलर और क्षतिग्रस्त/खनन किये गए भूमि क्षेत्रों का पुन: उपयोग प्रोत्साहित करना।
    • जल-सघन तकनीकों के लिये जलाशय-आधारित रणनीतियाँ अपनाएँ, जैसे कि ग्रीन हाइड्रोजन।
  • न्यायपूर्ण संक्रमण (लोग, रोज़गार, सुलभता): श्रमिकों के बदलाव को वित्तपोषित करने के लिये ज़िला खनिज निधि (DMF) और स्किल इंडिया मिशन का उपयोग करना। फॉसिल ईंधन क्षेत्रों के अनौपचारिक श्रमिकों को नए हरित अवसरों से जोड़ने के लिये ई-श्रम प्लेटफॉर्म को उन्नत करना।
  • अनुकूलन और दृढ़ता: अनुकूलन को उत्सर्जन न्यूनीकरण के समान महत्त्व देना। विकासगत उपलब्धियों को बढ़ते जलवायु जोखिम से सुरक्षित रखने के लिये संवेदनशीलता मानचित्रण करना और महत्त्वपूर्ण अवसंरचना को ‘क्लाइमेट-प्रूफ’ बनाना।
  • जलवायु वित्त: वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करने के लिये भारत को प्रतिवर्ष 500 अरब अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता है (वर्तमान में लगभग 135 अरब अमेरिकी डॉलर)।
    • राष्ट्रीय ग्रीन फाइनेंस संस्थान स्थापित करना, ताकि ब्लेंडेड फाइनेंस को सुदृढ़ आधार मिले।
    • एकीकृत जलवायु वित्त वर्गीकरण (Climate Finance Taxonomy) विकसित करना, ताकि बाज़ार में विश्वास बढ़े।
    • GIFT सिटी प्लेटफॉर्म का विस्तार करना, ताकि संप्रभु धन कोष और विदेशी पूंजी को आकर्षित किया जा सके।
  • डेटा को मुख्य अवसंरचना के रूप में मानना: विश्वसनीय मॉनिटरिंग, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) प्रणाली स्थापित करना।
    • EV चार्जिंग के लिये एक इंटरऑपरेबल डिजिटल लेयर बनाना (यूनिफाइड एनर्जी इंटरफेस – UEI), जो ऊर्जा सेवाओं हेतु भुगतान प्रणाली प्रदान करना, ठीक वैसे ही जैसे UPI डिजिटल भुगतान के लिये कार्य करता है।
  • मज़बूत संस्थागत ढाँचा: केंद्र और राज्य के कार्यों में सामंजस्य स्थापित करने के लिये जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री परिषद के अंतर्गत एक निम्न कार्बन विकास प्रकोष्ठ की स्थापना की जाए।
    • भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (NDC) चक्र के साथ पंचवर्षीय क्षेत्रीय और राज्य बजटों को संरेखित करना।

निष्कर्ष

नीति आयोग का यह निष्कर्ष है कि भारत का ‘नेट ज़ीरो’ संक्रमण केवल जलवायु अनिवार्यता मात्र नहीं है, बल्कि यह एक महत्त्वपूर्ण विकासात्मक अवसर भी है।

  • जिस प्रकार भाप इंजन ने औद्योगिक क्रांति को परिभाषित किया, उसी प्रकार भारत का यह संक्रमण एक नए ‘भारतीय विकास मॉडल’ की रचना कर सकता है—ऐसा मॉडल, जो आर्थिक सजीवता को सततता के साथ समन्वित करते हुए वैश्विक दक्षिण के लिये प्रकाश-स्तंभ का कार्य करे।
  • जबकि वैश्विक जलवायु वित्त की उपलब्धता अभी भी अनिश्चित बनी हुई है, भारत की विकास-पथ रूपरेखा को न्यायसंगतता एवं जलवायु न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिये, ताकि यह संक्रमण आर्थिक समावेशन तथा लचीलापन के साथ पूर्णतः संगत बना रहे।

दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न:

प्रश्न. “भारत का नेट ज़ीरो संक्रमण एक प्रतिबंध नहीं, बल्कि एक विकासात्मक अवसर है।” विवेचना कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. नीति आयोग की ‘नेट ज़ीरो’ रिपोर्ट का उद्देश्य क्या है?
इस रिपोर्ट का उद्देश्य वर्ष 2047 तक भारत को 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित करने की रूपरेखा प्रस्तुत करना है, साथ ही वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य (Net Zero) उत्सर्जन प्राप्त करने हेतु ऊर्जा संक्रमण, विद्युतीकरण तथा हरित विकास आधारित रणनीतियों को स्पष्ट करना है।

2. नेट ज़ीरो परिदृश्य के अंतर्गत भारत की ऊर्जा संरचना में क्या परिवर्तन होंगे?
नेट ज़ीरो परिदृश्य में वर्ष 2070 तक विद्युत की हिस्सेदारी लगभग 60% तक बढ़ने की संभावना है। नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 6,000 गीगावाट से अधिक हो सकती है, परमाणु ऊर्जा 300 गीगावाट से अधिक तक विस्तारित हो सकती है, जबकि जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी घटकर लगभग 14% रह जाएगी, जिसे कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) प्रौद्योगिकी का समर्थन प्राप्त होगा।

3. भारत के नेट ज़ीरो संक्रमण हेतु निवेश की आवश्यकता कितनी है?
वर्ष 2070 तक भारत को लगभग 22.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (औसतन लगभग 500 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष) के निवेश की आवश्यकता होगी। इसमें लगभग 6.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का वित्तीय अंतराल अनुमानित है, जिसकी पूर्ति हेतु विदेशी पूंजी निवेश में वृद्धि आवश्यक होगी।

4. भारत की नेट ज़ीरो रणनीति में महत्त्वपूर्ण खनिजों का क्या महत्त्व है?
स्वच्छ प्रौद्योगिकियाँ लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, तांबा एवं ग्रेफाइट जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भर करती हैं। विद्युत वाहनों (EV) की बैटरियाँ तथा सौर ऊर्जा उपकरण इनकी मांग के प्रमुख प्रेरक हैं, जिससे आयात निर्भरता और आपूर्ति शृंखला जोखिम की आशंका उत्पन्न होती है।

5. भारत के संदर्भ में ‘न्यायसंगत संक्रमण’ से क्या अभिप्राय है?
न्यायसंगत संक्रमण से तात्पर्य है—कौशल पुनर्संवर्द्धन (Reskilling), सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों की उपलब्धता तथा जीवाश्म ईंधन-निर्भर 150 से अधिक ज़िलों को संरचनात्मक समर्थन प्रदान करना, ताकि डीकार्बोनाइजेशन की प्रक्रिया के दौरान आर्थिक एवं सामाजिक व्यवधान को न्यूनतम किया जा सके।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स

 प्रश्न: ‘इच्छित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान' शब्द कभी-कभी समाचारों में देखा जाता है, इसके संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

(a) युद्धग्रस्त मध्य पूर्व से आए शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये यूरोपीय देशों द्वारा की गई प्रतिज्ञाएँ

(b) जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये विश्व के देशों द्वारा निर्धारित कार्य योजना

(c) एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक की स्थापना में सदस्य देशों द्वारा योगदान की गई पूंजी

(d) सतत विकास लक्ष्यों के संबंध में विश्व के देशों द्वारा निर्धारित कार्य योजना

उत्तर: (b)

व्याख्या:

संयुक्त राष्ट्र वित्तीय परिषद (UNFCCC) के तहत इच्छित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान शब्द का प्रयोग उन सभी देशों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी के लिये किया जाता है, जिन्होंने पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं।

COP 21 में विश्व भर के 21 देशों ने अंतर्राष्ट्रीय समझौते के तहत उठाए जाने वाले अपने कदमों की सार्वजनिक रूपरेखा प्रस्तुत की। ये योगदान पेरिस समझौते के दीर्घकालिक लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में हैं; "वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 2°C से काफी नीचे रखना, वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने के प्रयासों को जारी रखना और इस सदी के उत्तरार्द्ध में शुद्ध शून्य उत्सर्जन प्राप्त करना।" अतः विकल्प (b) सही उत्तर है।


मेन्स

प्रश्न: संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के पक्षकारों के सम्मेलन (COP) के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिये। इस सम्मेलन में भारत ने क्या प्रतिबद्धताएँ कीं हैं? (2021)

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