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प्रिलिम्स फैक्ट्स

प्रारंभिक परीक्षा

गैस की वैश्विक आपूर्ति जोखिमों के आलोक में तापन की वैकल्पिक प्रौद्योगिकियाँ

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

अमेरिका और इज़रायल के ईरान के साथ जारी संघर्ष के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जोखिम की स्थिति बढ़ गई है, जो तेल और गैस के परिवहन का महत्त्वपूर्ण वैश्विक मार्ग है। चूँकि भारत अपनी प्राकृतिक गैस का लगभग आधा हिस्सा आयात करता है इसलिये उद्योगों को गैस की आपूर्ति कम होने से विद्युतीकृत ताप और संकेंद्रित सौर तापीय प्रणालियों जैसी वैकल्पिक तापन तकनीकों की आवश्यकता उजागर हुई है।

औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिये प्रमुख तापन प्रौद्योगिकियाँ कौन-सी हैं?

संकेंद्रित सौर तापीय (CST) प्रौद्योगिकी

  • कार्यप्रणाली: सौर फोटोवोल्टिक (PV) पैनलों के विपरीत, जो सूर्य प्रकाश को विद्युत (इलेक्ट्रॉन) में परिवर्तित करने हेतु अर्द्धचालकों के उपयोग पर आधारित हैं, CST प्रणालियों में सूर्य प्रकाश को एक रिसीवर पर केंद्रित करने के लिये दर्पण या परावर्तक सतहों का उपयोग शामिल है।
    • रिसीवर ऊष्मा को ग्रहण करता है और उसे तेल, गलित लवण या प्रावस्था अंतरण सामग्री जैसे थर्मल एनर्जी स्टोरेज (TES) माध्यम में संगृहीत करता है।
    • संगृहीत ऊष्मा का उपयोग प्रत्यक्ष रूप से औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिये किया जा सकता है, जिससे ऊष्मीय/तापीय ऊर्जा की आवश्यकता वाले क्षेत्रों को कार्बन मुक्त करने में मदद मिलेगी।
  • ऊष्मा उत्पादन: इसके अंतर्गत किसी द्रव (जैसे– जल, थर्मल तेल या गलित लवण) को अत्यधिक तापमान (400 डिग्री सेल्सियस तक) पर तापन किया जाता है, जिससे तीव्र ऊष्मा उत्पन्न होती है।
  • औद्योगिक अनुप्रयोग: यह वस्त्र उद्योग जैसे उद्योगों के लिये अत्यधिक उपयुक्त है, जहाँ सफाई और विरंजन जैसी प्रक्रियाओं के लिये 100°C और 180°C के बीच तापमान पर भाप की आवश्यकता होती है।
  • ग्रिड पर निर्भरता से मुक्ति: CST संबद्ध साइट पर ही ऊष्मीय ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है और इसे इंसुलेटेड टैंकों में संगृहीत कर सकता है। 
    • यह तापीय भंडारण लिथियम-आयन बैटरियों की तुलना में काफी सस्ता होता है और इससे कारखाने राष्ट्रीय ग्रिड से बिजली की आवश्यकता के बिना 24×7 संचालन कर सकते हैं।
  • भारत की क्षमता: नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के अनुसार, भारत में CST की क्षमता 6.4 गीगावाट है।

विद्युतचुंबकीय प्रेरण तापन

  • परंपरागत औद्योगिक बॉयलर ईंधन के दहन के साथ एक मध्यवर्ती माध्यम (जैसे– हवा या भाप) का तापन किये जाने पर आधारित हैं, जिसके पश्चात् लक्षित उत्पाद का तापन होता है। इससे भारी मात्रा में ऊष्मा हानि होती है। प्रेरण तापन अथवा इंडक्शन हीटिंग में मध्यवर्ती माध्यम की आवश्यकता नहीं होती, जिससे ऊष्मा प्रत्यक्ष रूप से लक्षित सामग्री के अंदर उत्पन्न होती है।
  • कार्यप्रणाली:
    • विद्युतचुंबकीय क्षेत्र:  तांबे की एक कुंडली से प्रत्यावर्ती विद्युत धारा (AC) प्रवाहित की जाती है, जिससे तेज़ी से परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।
    • भँवर (Eddy) धाराएँ: जब किसी चालक धातु को इस चुंबकीय क्षेत्र के अंदर रखा जाता है, तो यह धातु के भीतर लघु, स्थानस्थ विद्युत धाराएँ उत्पन्न करती है, जिन्हें भँवर धाराएँ कहा जाता है।
    • जूल तापन: जब ये भँवर धाराएँ प्रवाहित होती हैं, तब धातु का प्राकृतिक विद्युत प्रतिरोध विद्यमान होता है। यह प्रतिरोध विद्युत ऊर्जा को प्रत्यक्ष रूप से भीतर से ऊष्मा में परिवर्तित कर देता है। इस प्रक्रिया को जूल तापन कहते हैं।
  • उद्योग के लिये प्रमुख लाभ:
    • अद्वितीय दक्षता: चूँकि निकटवर्ती परिवेश में वायु या निकास चिमनियों में कोई ऊष्मा नष्ट नहीं होती है, इसलिये इसकी तापीय दक्षता 90% से अधिक हो सकती है।
    • तीव्र और सटीक: इसके अंतर्गत सामग्रियों का द्रुत तापन होता है और अत्यधिक स्थानस्थ ताप की सुविधा मिलती है (ऑटोमोटिव और धातु निर्माण उद्योगों में उपयोगी)।
    • शून्य प्रत्यक्ष उत्सर्जन: नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित होने पर यह तापन प्रक्रिया के कार्बन फुटप्रिंट को पूर्ण रूप से समाप्त कर देता है।

प्लाज़्मा टॉर्च 

  • यद्यपि इंडक्शन तकनीक धातुओं के लिये अत्यंत प्रभावी है, किंतु सिरेमिक तथा सीमेंट जैसे भारी उद्योगों में निरंतर अत्यधिक उच्च तापमान (अक्सर 1,000°C से अधिक) की आवश्यकता होती है, जिसे सामान्य विद्युत हीटर  प्राप्त नहीं कर पाते।
  • इन अत्यधिक तापीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये प्लाज़्मा आर्क प्रौद्योगिकी गैस ज्वालाओं के स्थान पर एक स्वच्छ विकल्प प्रदान करती है।
  • तंत्र:
    • विद्युत आर्क का निर्माण: यह प्रक्रिया टॉर्च के भीतर दो इलेक्ट्रोडों के बीच उच्च वोल्टता वाला विद्युत आर्क उत्पन्न करने से प्रारंभ होती है।
    • गैस का आयनीकरण: एक कार्यशील गैस (जैसे-आर्गन या नाइट्रोजन) को इस तीव्र इलेक्ट्रिक आर्क के माध्यम से प्रवाहित किया जाता है।
      • गैस का प्लाज़्मा में रूपांतरण: अत्यधिक ऊर्जा गैस के परमाणुओं से इलेक्ट्रॉनों को अलग कर देती है, जिससे गैस प्लाज़्मा में परिवर्तित हो जाती है, जिसे सामान्यतः पदार्थ की चौथी अवस्था के रूप में जाना जाता है।
      • तापीय ऊर्जा का उत्सर्जन: जब यह अत्यधिक ऊर्जा-संपन्न प्लाज़्मा जेट टॉर्च से बाहर निकलता है, तो यह लक्ष्य पदार्थ पर अत्यधिक मात्रा में तापीय ऊर्जा उत्सर्जित करता है।
  • उद्योगों के लिये प्रमुख लाभ:
    • अत्यधिक उच्च तापमान: प्लाज़्मा टॉर्च आसानी से 5,000°C से 10,000°C से अधिक तक का कोर तापमान उत्पन्न कर सकते हैं (जो सूर्य की सतह से भी अधिक होता है), जो इन्हें स्मेल्टिंग तथा उन्नत सिरेमिक के लिये अत्यंत उपयुक्त बनाता है।
    • नियंत्रित रासायनिक वातावरण: विशिष्ट अक्रिय अथवा अभिक्रियाशील गैसों का उपयोग करके प्लाज़्मा तैयार करने से उद्योग रासायनिक वातावरण को नियंत्रित कर सकते हैं, जिससे ताप प्रक्रिया के दौरान पदार्थों के ऑक्सीकरण अर्थात् ज़ंग लगने से बचाव किया जा सकता है।
    • ईंधन का प्रतिस्थापन: यह भारी विनिर्माण में प्रयुक्त अत्यधिक प्रदूषणकारी कोयला अथवा प्राकृतिक गैस भट्ठियों के स्थान पर प्रत्यक्ष विद्युत-आधारित विकल्प प्रदान करता है।

सौर-आधारित औद्योगिक ताप प्रणाली में वैश्विक श्रेष्ठ प्रथाएँ

  • ओमान – मीराह परियोजना: यह एक बड़े संकेंद्रित सौर तापीय (CST) प्रौद्योगिकी संयंत्र को गैस-आधारित संचालन के साथ एकीकृत करती है। दिन के समय सौर-आधारित भाप उत्पादन के माध्यम से प्राकृतिक गैस के उपयोग में लगभग 80% तक कमी आई है।
  • स्पेन – औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिये सौर ताप: स्पेन ने प्लग-एंड-प्ले सोलर थर्मल इकाइयाँ विकसित की हैं, जिन्हें आसानी से स्थापित कर मौजूदा औद्योगिक भाप प्रणालियों से जोड़ा जा सकता है।
  • डेनमार्क – हीट परचेज़ एग्रीमेंट्स: यहाँ उद्योग बाहरी प्रदाताओं से ताप का क्रय करते हैं, जो संकेंद्रित सौर तापीय (CST) प्रौद्योगिकी या इंडक्शन प्रणालियों का संचालन करते हैं। इस व्यवस्था को बड़े पैमाने की तापीय भंडारण प्रणालियों का समर्थन प्राप्त है, जिनके माध्यम से अतिरिक्त ताप को संगृहीत किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. संकेंद्रित सौर तापीय (CST) प्रौद्योगिकी क्या है?
संकेंद्रित सौर तापीय (CST) प्रौद्योगिकी में दर्पणों की सहायता से सूर्य के प्रकाश को एक रिसीवर पर केंद्रित किया जाता है, जिससे उच्च तापमान वाली ऊष्मा उत्पन्न होती है। इस ऊष्मा को थर्मल एनर्जी स्टोरेज (TES) प्रणालियों में संगृहीत कर औद्योगिक अनुप्रयोगों में उपयोग किया जा सकता है।

2. भारत में CST की अनुमानित क्षमता कितनी है?
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के अनुसार भारत में CST की अनुमानित क्षमता लगभग 6.4 गीगावाट (GW) है।

3. इंडक्शन हीटिंग कैसे कार्य करती है?
इंडक्शन हीटिंग में प्रत्यावर्ती धारा (AC) के माध्यम से एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न किया जाता है, जिससे चालक पदार्थों में एडी करंट प्रेरित होते हैं। ये करंट जूल हीटिंग के माध्यम से ऊष्मा उत्पन्न करते हैं।

4. उद्योगों में प्लाज़्मा टॉर्च का उपयोग किसलिये किया जाता है?
प्लाज़्मा टॉर्च अत्यधिक उच्च तापमान (5,000–10,000°C) उत्पन्न कर सकते हैं, इसलिये इनका उपयोग स्मेल्टिंग (smelting), सिरेमिक निर्माण तथा अन्य उच्च तापमान वाली औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।

5. भारत के लिये औद्योगिक ऊष्मा का विद्युतीकरण क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इससे आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होती है, ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ होती है तथा औद्योगिक डीकार्बोनाइज़ेशन और जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता मिलती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स

Q. 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' के बारे में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये :

I. इसका लक्ष्य आवासीय सेक्टर में एक करोड़ घरों की छतों पर सौर पैनल लगाना है।

II. नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय का लक्ष्य छतों पर सौर पैनल लगाने, उनके प्रचालन, अनुरक्षण और मरम्मत करने के विषय में आधार-स्तर पर प्रशिक्षण प्रदान करना है।

III. इसका लक्ष्य, क्षमता निर्माण के स्कीम घटक के अंतर्गत, नए कौशल सिखाकर और कौशल का उन्नयन कर तीन लाख से अधिक कुशल जनशक्ति सृजित करना है।

उपर्युक्त कथनों में कौन-कौन से सही हैं?

(a) केवल I और II

(b) केवल I और III

(c) केवल II और III

(d) I, II और III

उत्तर: (d) 


प्रश्न. “सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिये सस्ती, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच अनिवार्य है।” इस संबंध में भारत में हुई प्रगति पर टिप्पणी कीजिये। (2018)


रैपिड फायर

अमेरिका ने भारत में सेक्शन 301 जाँच शुरू की

स्रोत: इकॉनोमिक्स टाइम्स 

अमेरिका ने ट्रेड एक्ट, 1974 के तहत भारत सहित 16 प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में विनिर्माण क्षेत्रों में कथित संरचनात्मक अधिशेष क्षमता को लेकर सेक्शन 301 जाँच शुरू की है।

  • जाँच की प्रेरणा: यह कदम उस समय उठाया गया जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आपातकालीन अधिकारों के तहत लगाए गए शुल्कों को रद्द कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप प्रशासन ने व्यापार पर दबाव बनाए रखने के लिये सेक्शन 301 का उपयोग करने का निर्णय लिया।
  • कानूनी आधार: यह जाँच US ट्रेड एक्ट, 1974 के सेक्शन 301 के अंतर्गत शुरू की गई है, जो अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) को विदेशी व्यापार प्रथाओं की जाँच करने का अधिकार देती है, जिन्हें ‘अनुचित’ या अमेरिकी वाणिज्य के लिये बोझिल माना जाता है।
  • जाँच का तर्क: USTR यह जाँच करेगा कि क्या ये देश विनिर्माण में ‘संरचनात्मक अधिशेष क्षमता’ बनाए रखते हैं, जैसे– सरकारी सब्सिडी, सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों की गतिविधियाँ, सब्सिडीयुक्त ऋण, मुद्रा नीतियाँ, कम वेतन या ढीले श्रम और पर्यावरण मानक। ऐसी नीतियाँ व्यापार को प्रभावित कर सकती हैं और अमेरिकी उद्योगों को हानि पहुँचा सकती हैं।
    • अमेरिका के 2025 के एक आधिकारिक आदेश में भारत के साथ अमेरिकी द्विपक्षीय व्यापार में 58 अरब डॉलर के अधिशेष को नोट किया गया, जिसमें टेक्सटाइल और ऑटोमोटिव जैसे अधिशेष वाले क्षेत्र प्रमुख रूप से उभारे गए।
    • इसमें सोलर मॉड्यूल निर्माण जैसे उद्योगों में संरचनात्मक अधिशेष क्षमता देखी गई, जो लगभग वार्षिक घरेलू मांग का तीन गुना है, साथ ही पेट्रोकेमिकल और स्टील में भी महत्त्वपूर्ण अधिशेष पाया गया।
  • संभावित परिणाम: यदि उल्लंघन पाए जाते हैं, तो अमेरिका शुल्क (टैरिफ), आयात प्रतिबंध या व्यापार रियायतें निलंबित कर सकता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 में अमेरिका ने तकनीकी हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा (IP) से संबंधित चिंताओं के कारण लगभग 370 अरब डॉलर के चीनी आयात पर 25% तक के टैरिफ लगाने के लिये सेक्शन 301 का उपयोग किया था।
  • WTO अनुकूलता पर चर्चा: सेक्शन 301 की वैधता पर विवाद है। 1998 में, यूरोपीय संघ (EU) ने इसे WTO में चुनौती दी, जिसमें भारत, ब्राज़ील, चीन और अन्य ने तीसरे पक्ष के रूप में भाग लिया। एक WTO पैनल ने निष्कर्ष निकाला कि इस कानून के प्रमुख प्रावधान वैश्विक व्यापार प्रतिबद्धताओं के साथ विरोधाभास नहीं करते।

और पढ़ें: अमेरिका की प्रायोरिटी वॉच लिस्ट, भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026


रैपिड फायर

भारत में साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की कमी

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स

भारत का उद्यम क्षेत्र अभूतपूर्व सुरक्षा संकट का सामना कर रहा है क्योंकि कुशल साइबर सुरक्षा पेशेवरों की भारी कमी के कारण महत्त्वपूर्ण डिजिटल संपत्तियाँ तेज़ी से परिष्कृत साइबर हमलों के प्रति असुरक्षित हो गई हैं।

  • प्रतिभा की कमी: भारत में साइबर सुरक्षा पेशेवरों की कमी एक गंभीर चुनौती है। वर्तमान में, जहाँ लगभग 3,80,000 पेशेवर कार्यरत हैं, वहीं उद्यमों में इनकी मांग 12 लाख से अधिक है। विशेष रूप से, क्लाउड, प्लेटफॉर्म और उद्यम जोखिम के गहन अनुभव की आवश्यकता वाले पदों में 30-40% तक की भारी कमी का अनुमान है, जिससे यह 'प्रतिभा की कमी' और भी अधिक गंभीर हो जाती है।
    • यह कमी उन विशिष्ट क्षेत्रों में विशेष रूप से अधिक है, जो आधुनिक उद्यम की सुरक्षा के लिये अपरिहार्य हैं। इन क्षेत्रों में पहचान और पहुँच वास्तुकला, खतरे की खुफिया जानकारी, प्लेटफॉर्म सुरक्षा, विशेषाधिकार प्राप्त पहुँच प्रबंधन, डिजिटल फोरेंसिक्स और क्लाउड-नेटिव सुरक्षा सम्मिलित हैं।
  • भर्ती प्रक्रिया में विस्तार: साइबर सुरक्षा क्षेत्र में अब भर्ती प्रक्रिया सबसे लंबी हो गई है, जिसमें औसतन 90 दिनों से अधिक का समय लगता है। इसके परिणामस्वरूप, नौकरी के प्रस्ताव स्वीकार करने की दर भी घट गई है, जो पहले के 80-85% से कम होकर लगभग 70% रह गई है।
  • नेतृत्व का अभाव: नेतृत्व का अभाव एक ‘रणनीतिक शून्यता’ को जन्म देता है। लंबी अवधि तक पद रिक्त रहने के कारण खतरों की पहचान में देरी होती है, घटनाओं पर प्रतिक्रिया खंडित हो जाती है, निवारण की लागत बढ़ जाती है तथा अनुपालन में विलंब होता है।
  • खतरों का बढ़ता दायरा: वर्ष 2025 की पहली छमाही में स्पाइवेयर हमलों में 273% की भारी वृद्धि देखी गई है। इन हमलों का मुख्य निशाना कॉर्पोरेट जगत के संवेदनशील सौदे, वित्तीय प्रवाह और बौद्धिक संपदा के ‘डेटा गोल्डमाइन’ हैं। इसके अतिरिक्त, पासवर्ड चुराने वाले मैलवेयर की संख्या में लगभग 18% की वृद्धि हुई, जो बढ़कर 111,281 तक पहुँच गई।
    • डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (DSCI) की एक रिपोर्ट के अनुसार अक्तूबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच उद्यम एंडपॉइंट्स पर 265.52 मिलियन मैलवेयर डिटेक्शन दर्ज किये गए, जो लगभग 505 डिटेक्शन प्रति मिनट के बराबर है।
  • संगठनात्मक अनुकूलन रणनीतियाँ: शोध से पता चलता है कि भारत में 92% वरिष्ठ आईटी सुरक्षा पेशेवर विशेषज्ञता और चौबीसों घंटे निगरानी के लिये सुरक्षा कार्यों की आउटसोर्सिंग करने या 'सिक्योरिटी ऑपरेशंस सेंटर एज़ अ सर्विस' (SOCaaS) मॉडल को अपनाने को प्राथमिकता देते हैं।

और पढ़ें: ग्लोबल साइबर सुरक्षा आउटलुक 2025


रैपिड फायर

किसान क्रेडिट कार्ड योजना

स्रोत: पीआईबी

किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना को संशोधित ब्याज सब्सिडी योजना (MISS) का समर्थन प्राप्त है, जिसका लक्ष्य किसानों और संबंधित क्षेत्रों को समय पर सस्ती दरों पर और बिना किसी गारंटी के संस्थागत ऋण उपलब्ध कराना है। इस पहल से कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देने और किसानों की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलती है।

  • KCC की शुरुआत: वर्ष 1998 में शुरू की गई KCC योजना किसानों को फसल की बुवाई/रुपाई तथा कटाई के बाद की आवश्यकताओं और संबंधित गतिविधियों के लिये अल्पकालिक संस्थागत ऋण प्रदान करती है।
    • ऋण को किफायती बनाने के लिये सरकार ने वर्ष 2006-07 में मॉडिफाइड इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम (MISS) शुरू की, जिसमें रियायती ब्याज दरें और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सहायता प्रदान की जाती है। 
    • संशोधित KCC (2020) योजना वाणिज्यिक, क्षेत्रीय ग्रामीण और सहकारी बैंकों के माध्यम से डिजिटल पेमेंट और फ्लेक्सिबल विड्रॉल के साथ RuPay-सक्षम कार्ड के माध्यम से एकीकृत, सिंगल-विंडो क्रेडिट प्रदान करती है।
  • पात्र लाभार्थी: KCC के अंतर्गत व्यक्तिगत किसान और संयुक्त उधारकर्त्ता जो मालिक-कृषक हैं, किराएदार किसान, मौखिक पट्टेदार और बटाईदार, इसके अतिरिक्त इस योजना में स्वयं सहायता समूह (SHG) और संयुक्त देयता समूह (JLG) भी शामिल हैं, ताकि संस्थागत ऋण तक समावेशी पहुँच को बढ़ावा दिया जा सके।
  • KCC और MISS के तहत ऋण (2025-26): किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) के तहत फसल ऋण की सीमा को 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त, मत्स्य पालन और संबद्ध गतिविधियों के लिये भी ऋण सीमा को 5 लाख रुपये तक बढ़ाया गया है।
    • गैर-गारंटीकृत ऋणों की सीमा बढ़ाकर प्रति उधारकर्त्ता 2 लाख रुपये कर दी गई है। इसके अतिरिक्त, 3 लाख रुपये तक के अल्पकालिक फसल ऋण 7% ब्याज दर पर उपलब्ध हैं, जिसमें 3% की सब्सिडी (MISS के तहत) शामिल है, जिससे प्रभावी ब्याज दर 4% हो जाती है।
    • यह 5 साल तक के लिये रिवॉल्विंग क्रेडिट दान करता है, जिससे किसान आवश्यकतानुसार धनराशि निकाल सकते हैं। साथ ही, प्राकृतिक आपदाओं के दौरान ब्याज में राहत दी जाती है (1 वर्ष तक कोई ब्याज नहीं, जो गंभीर आपदाओं की स्थिति में 5 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है)।
  • किसान ऑनबोर्डिंग और डिजिटल सुधार: पीएम-किसान डेटा और किसान ऋण पोर्टल (2023) के साथ एक सरलीकृत KCC एप्लिकेशन कृषि ऋण वितरण में तेज़ी से ऋण प्रसंस्करण और बेहतर पारदर्शिता को सक्षम बनाती है।
  • KCC का पैमाना और प्रभाव: वर्तमान में 7.72 करोड़ से अधिक KCC सक्रिय हैं, जिनके तहत 10.2 लाख करोड़ रुपये का ऋण बकाया है। 457 बैंकों के सहयोग से संचालित यह योजना व्यापक संस्थागत पहुँच और कृषि के साथ-साथ पशुपालन व मत्स्य पालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों तक ऋण की उपलब्धता के विस्तार को दर्शाती है।
  • सरकारी पहल: सरकार ने विभिन्न पहलों के माध्यम से किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) की पहुँच को बढ़ाया है। इन पहलों में जागरूकता अभियान, आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत राष्ट्रीय स्तर पर चलाया गया 'KCC सैचुरेशन ड्राइव' और RuPay-सक्षम KCC कार्ड की शुरुआत शामिल हैं। ये सभी कदम डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने, वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करने और किसानों तक संस्थागत कृषि ऋण की व्यापक पहुँच को मज़बूत करने में सहायक हैं।

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और पढ़ें:  किसान क्रेडिट कार्ड (KCC)


रैपिड फायर

वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह: भारत का पहला डिजिटल ट्विन बंदरगाह

स्रोत: पी.आई.बी.

वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह (तमिलनाडु) भारत का पहला बंदरगाह बन गया, जिसने बंदरगाह प्रबंधन के लिये डिजिटल ट्विन पहल शुरू की, जो मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 और अमृत काल विज़न 2047 के अनुरूप है।

  • डिजिटल ट्विन प्लेटफॉर्म: यह बंदरगाह की अवसंरचना, संचालनात्मक संसाधनों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का वास्तविक समय में आभासी प्रतिरूप (Virtual Replica) तैयार करता है, जिसे IoT सेंसर, GPS ट्रैकिंग, LiDAR मैपिंग, ड्रोन इमेजिंग और CCTV नेटवर्क जैसी उन्नत तकनीकों के समाकलन द्वारा संचालित किया जाता है।
  • मुख्य तकनीकी विशेषताएँ: यह बर्थ की उपलब्धता, जहाजों की गतिविधियों, क्रेन उपयोग और यार्ड क्षमता की वास्तविक समय में संचालनात्मक निगरानी को सक्षम बनाता है। यह AI-आधारित संपत्ति निगरानी के माध्यम से माल परिवहन उपकरण के पूर्वानुमानात्मक रखरखाव का समर्थन करता है, जिससे डाउनटाइम कम होता है और विश्वसनीयता में सुधार होता है।
  • अपेक्षित परिणाम और लाभ: जहाजों के टर्नअराउंड समय में 25% तक कमी
    • उपकरण की उपलब्धता और परिचालनात्मक विश्वसनीयता में सुधार
    • पूर्वानुमानात्मक चेतावनी के माध्यम से सुरक्षा में वृद्धि
    • ऊर्जा उपयोग का अनुकूलन, जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी

वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह

  • परिचय: वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह (पूर्व में तूतुकुड़ी बंदरगाह) भारत के 13 प्रमुख बंदरगाहों में से एक है, जो कोरोमंडल तट पर एक कृत्रिम, सभी मौसमों में काम करने वाला गहरे समुद्री बंदरगाह के रूप में कार्य करता है।
  • तिहासिक महत्त्व: मूलरूप से तूतुकुड़ी बंदरगाह के रूप में स्थापित। इसे जुलाई 1974 में प्रमुख बंदरगाह घोषित किया गया और वर्ष 2011 में इसे वी.ओ. चिदंबरम पिल्लै (V.O.C.) के सम्मान में पुनर्नामित किया गया, जो स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी की स्थापना (वर्ष 1906 में) करके ब्रिटिश समुद्री एकाधिकार को चुनौती देने वाले स्वतंत्रता सेनानी और उद्यमी थे।
  • रणनीतिक भौगोलिक स्थिति: तमिलनाडु के तूतुकुड़ी में, मन्नार की खाड़ी में स्थित, यह बंदरगाह पूर्व-पश्चिम अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों के निकट सामरिक स्थिति से लाभान्वित है।
  • परिचालन महत्त्व और रैंकिंग: यह तमिलनाडु का दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह (चेन्नई बंदरगाह के बाद) और भारत का तीसरा सबसे बड़ा कंटेनर टर्मिनल है, जो भूमध्यसागर, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ व्यापार के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्रवेशद्वार के रूप में कार्य करता है तथा कंटेनर, कोयला, नमक और उर्वरक सहित विविध पण्य को प्रबंधित करता है।

और पढ़ें: भारत 2047 तक छह मेगा पोर्ट विकसित करेगा


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