रैपिड फायर
सुबनसिरी लोअर जलविद्युत परियोजना
असम और मेघालय ने सुबनसिरी लोअर जलविद्युत परियोजना (SLHEP) के अवितरित केंद्रीय पूल से अतिरिक्त बिजली खरीदने से मना कर दिया है, जिसका कारण उच्च बिजली खरीद लागत तथा सस्ते वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की उपलब्धता बताया गया है।
- दीर्घकालिक निर्माण विलंब (वर्ष 2011-2019 के बीच कार्य निलंबित रहने) के कारण अनुमानित टैरिफ ₹2 प्रति यूनिट से बढ़कर ₹7.70 प्रति यूनिट से अधिक हो गया है, जो कि राष्ट्रीय औसत जलविद्युत टैरिफ ₹3.15 प्रति यूनिट से काफी अधिक है।
सुबनसिरी लोअर जलविद्युत परियोजना
- परिचय: SLHEP एक रन-ऑफ-द-रिवर (Run-of-the-River) परियोजना है, जिसे वर्ष 2003 में स्वीकृति प्रदान की गई थी। यह असम और अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित सुबनसिरी नदी पर विकसित की जा रही है। इसे 2000 मेगावाट की कुल क्षमता के साथ भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना के रूप में परिकल्पित किया गया है।
- वर्तमान में, कुल आठ 250 मेगावाट इकाइयों में से केवल तीन ने ही वाणिज्यिक संचालन प्रारंभ किया है।
- अवसंरचना का पैमाना एवं महत्त्व: इस परियोजना में 116 मीटर ऊँचा कंक्रीट ग्रैविटी बाँध शामिल है, जो पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा बाँध है। यह पूर्वोत्तर क्षेत्र में जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण तथा ऊर्जा सुरक्षा के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
सुबनसिरी नदी
- परिचय: सुबनसिरी नदी, जिसे प्रायः ‘स्वर्ण नदी’ (स्थानीय शब्द सुबर्णशिरी से व्युत्पन्न) कहा जाता है, एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय (सीमापार) नदी है, जो तिब्बत और भारत से होकर बहती है। यह ब्रह्मपुत्र नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
- ऐतिहासिक रूप से, इस नदी के तल में पाए जाने वाले स्वर्ण कणों (Gold Dust) के कारण यह प्रसिद्ध रही, जिससे इसका यह नाम पड़ा।
- पथ एवं भौगोलिक स्थिति: यह नदी चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में उद्गमित होती है और अरुणाचल प्रदेश में मिरी पहाड़ियों के माध्यम से भारत में प्रवेश करती है।
- यह नदी अरुणाचल प्रदेश और असम से होकर प्रवाहित होती है तथा अंततः जामुरीघाट (असम) पर ब्रह्मपुत्र नदी में मिल जाती है।
- रणनीतिक एवं पारिस्थितिक महत्त्व: हिमालय से तीव्र ढाल के साथ प्रवाहित होने के कारण इस नदी में जलविद्युत उत्पादन की प्रचुर एवं अपार संभावनाएँ निहित हैं।
- यह नदी बेसिन इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है। यह विभिन्न प्रकार के जलीय जीवों का पोषण करता है, जिनमें संकटग्रस्त गंगा नदी डॉल्फिन तथा अनेक पहाड़ी धाराओं में पाई जाने वाली मछली प्रजातियाँ शामिल हैं।
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वित्तीय अपराधों पर FIU-IND और I4C के बीच MoU
फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट-इंडिया (FIU-IND) और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने खुफिया जानकारी साझा करने के लिये एक समन्वित ढाँचा स्थापित करने हेतु एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये हैं, जिसका उद्देश्य भारत के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को सुरक्षित करना और साइबर-सक्षम वित्तीय अपराधों का सामना करना है।
- उद्देश्य: यह साझेदारी धोखाधड़ी का पता लगाने, वित्तीय अपराधों को रोकने और संपत्ति की वसूली की सुविधा के लिये ‘संपूर्ण सरकार’ के दृष्टिकोण अपनाती है।
- परिचालन तालमेल: MoU वित्तीय संस्थानों के लिये संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की सक्रिय रूप से पहचान करने हेतु रेड फ्लैग इंडिकेटर और दिशा-निर्देश विकसित करने में सक्षम बनाता है।
- रणनीतिक प्रभाव: इस सहयोग का उद्देश्य दूरसंचार और बैंकिंग संसाधनों के दुरुपयोग को कम करना है, जो भारत की तेज़ी से बदलती डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिये मज़बूत सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करता है।
FIU-IND
- मनी लॉन्ड्रिंग एवं आतंकवाद के वित्तपोषण का मुकाबला करने वाली यह एक केंद्रीय राष्ट्रीय एजेंसी है। यह संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के विश्लेषण, प्रसंस्करण और जानकारी साझा करने के लिये मुख्य रूप से उत्तरदायी है।
I4C:
- यह गृह मंत्रालय (MHA) के अधीन एक संबद्ध कार्यालय है, जो कानून प्रवर्तन एजेंसियों (LEAs) को साइबर अपराध की चुनौतियों से निपटने हेतु एक प्रभावी पारिस्थितिक तंत्र उपलब्ध कराता है।
- I4C द्वारा नेशनल साइबरक्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP), सस्पेक्ट रजिस्ट्री और साइबर-पुलिस जैसे सुरक्षित प्लेटफॉर्म विकसित किये गए हैं। ये तंत्र वित्तीय एवं दूरसंचार संसाधनों के दुरुपयोग को रोककर ऑनलाइन धोखाधड़ी के विरुद्ध सक्रिय कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं तथा बैंकों व अन्य हितधारकों के मध्य समन्वय स्थापित करते हैं।
- ये प्लेटफॉर्म दूरसंचार, बैंकिंग और अन्य संबंधित संसाधनों के दुरुपयोग के खिलाफ सक्रिय कार्रवाई को सक्षम बनाकर ऑनलाइन वित्तीय अपराधों सहित साइबर अपराधों से निपटने में मदद करते हैं ।
| और पढ़ें: भारत में साइबर धोखाधड़ी |
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क्वांटम क्लोनिंग
शोधकर्त्ताओं ने क्वांटम स्टेट की परिपूर्ण प्रतिलिपि बनाने की एक विधि का प्रायोगिक प्रदर्शन किया है, जिसमें क्वांटम भौतिकी की मूलभूत नो-क्लोनिंग थ्योरम में एक संभावित कमी का उपयोग किया गया है। यह उपलब्धि क्वांटम कंप्यूटिंग और क्लाउड स्टोरेज अवसंरचना के लिये परिवर्तनकारी संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
- नो-क्लोनिंग थ्योरम: यह क्वांटम भौतिकी का एक मूलभूत सिद्धांत है, जो अज्ञात क्वांटम स्टेट की पूर्ण प्रतिलिपि बनाने को अस्वीकार करता है। यह सिद्धांत अपनी शुरुआत से ही क्वांटम क्रिप्टोग्राफी और क्वांटम कंप्यूटिंग की आधारशिला रहा है।
- पारंपरिक कंप्यूटिंग (जहाँ फाइलों की कॉपी करना सरल होता है) के विपरीत, क्वांटम कंप्यूटर डेटा की स्वतंत्र रूप से प्रतिलिपि नहीं बना सकते हैं, जिससे नो-क्लोनिंग थ्योरम प्रभावी क्वांटम प्रणालियों के निर्माण में प्रमुख बाधक है।
- क्वांटम सूचना मापन के दौरान नष्ट हो जाती है, इसलिये पारंपरिक तरीके से उसकी कॉपी बनाना संभव नहीं होता है। यही कारण है कि यह थ्योरम क्वांटम क्रिप्टोग्राफी और क्वांटम कंप्यूटिंग की आधारशिला रही है।
- कमियाँ: शोधकर्त्ताओं ने यह स्थापित किया है कि क्वांटम स्टेट की ‘परिपूर्ण प्रतिलिपि’ बनाई जा सकती है, बशर्ते प्रत्येक प्रतिलिपि को क्वांटम नॉइज़ के माध्यम से अलग-अलग एन्क्रिप्ट किया जाए और इसे संबंधित डिक्रिप्शन कुंजी के बिना अभिगम्य नहीं बनाया जा सकता है।
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कुंजी के बिना, यह प्रतिलिपि किसी भी व्यक्ति, यहाँ तक कि हमलावर के लिये भी अर्थहीन यादृच्छिक डेटा के रूप में दिखाई देती है।
यह एन्क्रिप्शन विशेष ‘नॉइज़ क्यूबिट्स’ का उपयोग करके किया जाता है, जो लॉकिंग पैटर्न को संग्रहित करते हैं और डिक्रिप्शन कुंजी के रूप में कार्य करते हैं।
- एन्क्रिप्शन प्रक्रिया: यह एन्क्रिप्शन विशेष 'नॉइज़ क्विबिट्स' का उपयोग करके किया जाता है, जो लॉकिंग पैटर्न को स्टोर करते हैं तथा डिक्रिप्शन की (decryption key) के रूप में कार्य करते हैं।
- डाटा की स्वाभाविक सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु मूल क्वांटम सूचना को अनेक क्विबिट्स में वितरित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में प्रत्येक क्विबिट व्यक्तिगत रूप से अर्थहीन शोर (रैंडम नॉइज़) जैसा प्रतीत होता है।
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- वन-टाइम यूज़ रूल: एक बार जब एक सटीक प्रतिलिपि प्राप्त करने के लिये डिक्रिप्शन की (key) का उपयोग किया जाता है, तो वह की (key) स्थायी रूप से नष्ट हो जाती है।
- शेष सभी प्रतियाँ अपरिवर्तनीय रूप से अपठनीय हो जाती हैं। इसका अर्थ है कि केवल एक ही सटीक रिकवरी संभव है, जो नो-क्लोनिंग थ्योरम की मूल भावना के अनुरूप है, बस इसे अलग तरह से व्याख्यायित किया गया है।
- रणनीतिक अनुप्रयोग: इस सफलता के रिडंडेंट क्वांटम क्लाउड स्टोरेज और विश्वसनीय क्वांटम मेमोरी के विकास के लिये गहरे निहितार्थ हैं, जिससे क्लाइंट तब तक सटीक डेटा रिकवर कर सकते हैं, जब तक कम-से-कम एक सर्वर सुरक्षित रहता है।
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मधुमेह और मोटापा
मधुमेह और मोटापा गंभीर गैर-संक्रामक रोगों (NCD) के रूप में उभरे हैं, जो इंसुलिन (जो रक्त शर्करा को कम करता है) और ग्लूकागन (जो इसे बढ़ाता है) के बीच हॉर्मोनल असंतुलन के कारण उत्पन्न होते हैं, जिससे दीर्घकालिक प्रणालीगत जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं।
- कार्यप्रणाली: अधिक वज़न वाले लोग, मधुमेह से ग्रस्त परिवार तथा आहार में अत्यधिक चीनी का सेवन करने वाले व्यक्तियों में टाइप 2 मधुमेह होने का उच्च जोखिम होता है।
- टाइप 2 मधुमेह में शरीर में इंसुलिन के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न हो जाता है या इंसुलिन का उत्पादन अपर्याप्त होता है। जबकि टाइप 1 मधुमेह में इंसुलिन उत्पादन की पूर्ण रूप से कमी हो जाती है, जिसके कारण जीवन भर बाहरी रूप से इंसुलिन लेने की आवश्यकता होती है।

- GLP-1: GLP-1 दवाएँ (ग्लूकागन-लाइक पेप्टाइड-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट) भूख और ब्लड शुगर को नियंत्रित करने वाले प्राकृतिक हॉर्मोन की नकल करती हैं। इनका मुख्य उपयोग मोटापे एवं टाइप 2 मधुमेह के उपचार में किया जाता है।

- प्रमुख औषधियाँ: इस वर्ग की मुख्य दवाओं में तिरजेपाटाइड, लिराग्लूटाइड, डुलाग्लूटाइड तथा सेमाग्लूटाइड (मौखिक एवं इंजेक्शन) सम्मिलित हैं। इन्हें सामान्यतः प्री-फिल्ड पेन के ज़रिये शरीर में पहुँचाया जाता है।
- भारत का विनियामक ढाँचा: दवाओं के गलत इस्तेमाल को रोकने के उद्देश्य से ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने इनके प्रिस्क्रिप्शन को केवल कार्डियोलॉजिस्ट, एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञों तक ही सीमित रखने के निर्देश दिये हैं।
- मार्च 2026 में, DCGI ने भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ सलाह जारी की और अनधिकृत बिक्री पर अंकुश लगाने के लिये ऑनलाइन फार्मेसियों और वेलनेस क्लीनिकों का राष्ट्रव्यापी ऑडिट किया।
- बचाव के उपाय: रोग प्रबंधन के लिये साप्ताहिक 150 मिनट का मध्यम शारीरिक व्यायाम, खान-पान में सुधार (चीनी और संतृप्त वसा की कटौती) तथा तंबाकू के त्याग को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है।
| और पढ़ें: भारत में मधुमेह |
