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बाँध और विनाश

  • 23 Mar 2021
  • 17 min read

परिचय 

  • बाँध पानी को रोकने के लिये एक नदी या धारा पर निर्मित संरचना है। सदियों से बाँधों का निर्माण विभिन्न सामग्रियों का उपयोग करके किया गया है।
  • प्राचीन बाँध निर्माताओं ने प्राकृतिक सामग्री जैसे- चट्टानों या मिट्टी का इस्तेमाल किया, जबकि आज अधिकांश बाँध कंक्रीट का उपयोग करके बनाए गए हैं।

भारत में बाँध :

  • भारत में 4,407 बड़े बाँध हैं, जो कि चीन (23,841) और संयुक्त राज्य अमेरिका (9,263) के बाद दुनिया में तीसरे नंबर पर है।
  • उत्तराखंड में टिहरी बाँध भारत में भागीरथी नदी पर बना सबसे ऊँचा बाँध है।
  • महानदी पर बना ओडिशा का हीराकुंड बाँध भारत का सबसे लंबा बाँध है।
  • तमिलनाडु में कल्लनई बाँध भारत का सबसे पुराना बाँध है। यह कावेरी नदी पर बना है और लगभग 2000 साल पुराना है।

बाँधों का महत्त्व:

  • स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत: बाँध स्वच्छ ऊर्जा के स्रोत हैं। कई देशों ने महँगे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करने के लिये बाँधों को अपनाया है।
  • सिंचाई: बाँध और जलमार्ग जल को संचित कर सिंचाई के लिये जल प्रदान करते हैं ताकि किसान पानी का उपयोग फसलों को उगाने में कर सकें।
    • उन क्षेत्रों में जहाँ पानी और बारिश प्रचुर मात्रा में नहीं होती है (रेगिस्तान की तरह), नदियों और बाँधों के जल का उपयोग नहरों द्वारा सिंचाई करने के लिये किया जाता है।
  • बाढ़ को रोकने में सहायक: बाँधों को अगर उचित ढंग से योजना के तहत बनाया जाए तो इनसे बाढ़ को रोकने में मदद मिलेगी क्योंकि ये जल को रोकते हैं ताकि जल के बहाव की खतरनाक स्थिति उत्पन्न न होने पाए।
  • पेयजल का स्रोत: बाँधों में जमा जल को पेयजल के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

बाँधों के कारण उत्पन्न जोखिम:

हालाँकि बाँधों के परिणामस्वरूप समाज को कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं, लेकिन उन्हें नदी पारिस्थितिकी, वन्यजीव, मछलियों के आवास और अंततः मनुष्यों के लिये सबसे बड़े खतरे के रूप में देखा जाता है।

  • जलीय जीवन पर प्रभाव : बाँध मछलियों के प्रवास में बाधा उत्पन्न करते हैं और मत्स्य अण्ड समूह के निवास स्थान तक पहुँचने, खाद्य संसाधनों की तलाश करने और शिकार से बचने की उनकी क्षमता को सीमित करते हैं।
    • जलीय जीव स्थिर प्रवाह पर सक्रिय रहते हुए उत्पादकता बनाए रखते हैं, जबकि स्थिर जलाशय मछलियों को भटकाते हैं और उनके प्रवास की अवधि को काफी बढ़ा सकते हैं।
  • नदियों के मार्ग में बाधा : बाँध और जलाशय जल निकायों के प्रवाह के लिये भौतिक बाधाएँ उत्पन्न करते हैं क्योंकि ये जल निकायों को खंडित करते हैं, जिससे उनका मौसमी प्रवाह प्रभावित होता है ।
    • वे नदियों के कार्य करने के तरीके और जाल तलछट को बदलते हुए रॉक रिवरबेड्स को भी काटते हैं जहाँ मत्स्य अण्ड समूह होते हैं।
    • बजरी, लॉग तथा अन्य महत्त्वपूर्ण भोजन और निवास सुविधा भी बाँधों के कारण बाधित हो सकती है। यह अधिक जटिल आवासों के निर्माण और रख-रखाव को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
  • एक खतरनाक बुनियादी ढाँचा : बड़े बाँधों को मानव जीवन, बड़े पैमाने पर आजीविका के नुकसान और विफलता की स्थिति में विनाश की आशंका के कारण "उच्च खतरे वाला" बुनियादी ढाँचा माना जाता है।
    • कुछ वर्ष पहले उत्तराखंड में आई बाढ़ के बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव के चलते ग्लेशियरों के पिघलने के कारण उत्पन्न हुई थी, लेकिन बुनियादी ढाँचे (हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट्स- HEPs) के निर्माण ने इसे भयानक बना दिया था।
      • HEPs, जो बड़े पैमाने पर ब्लास्टिंग, पेड़ों का कटान और टनलिंग का उपयोग करते हैं, में निश्चित रूप से इनका प्रभाव एक अनुपात में जुड़ जाता है और इस तरह ये विनाश में एक बल गुणक बन जाते हैं।
    • यह निर्माण, चोपड़ा समिति की सिफारिश के खिलाफ था, जिसने चेतावनी के साथ एक विस्तृत रिपोर्ट दी थी कि उत्तराखंड राज्य में हिमनद निवर्तन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जो पनबिजली उत्पादन और बाँधों के लिये निर्मित संरचनाओं के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर आपदाओं का कारण बन सकता है।
  • जलाशय प्रेरित भूकंपीयता: भूकंप व बाँध में पानी जमा होने और उसे छोड़ने के बीच एक मज़बूत संबंध होता है। कोयना और वार्ना क्षेत्र संभवतः जलाशय-प्रेरित-भूकंपीयता (आरआईएस) का सबसे अच्छा उदाहरण है।
    • कोयना और वार्ना जलाशय दक्षिण महाराष्ट्र क्षेत्र में भूकंप के लिये ज़िम्मेदार हैं जिन्होंने पाँच दशकों में कई भूकंपों का अनुभव किया है।
      • भूकंपों की यह शृंखला इस क्षेत्र में बाँधों के निर्माण के बाद देखी गई है।
  • लोगों का विस्थापन: बड़े बाँधों के निर्माण के कारण भूमि का जलमग्न होना और बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन एक प्रचलित मुद्दा है, जिसकी अक्सर अधिकारियों द्वारा अनदेखी की जाती है।
    • हीराकुंड, भाखड़ा नांगल और टिहरी जैसे बाँधों के निर्माण ने कई परिवारों को विस्थापित कर दिया था जिनमें से कई का पुनर्वास नहीं किया गया।
      • पुनर्वास के बाद भी आजीविका के अवसरों की कमी और रहने की खराब स्थिति देखी जाती है।
    • नर्मदा नदी की सबसे बड़ी संरचना सरदार सरोवर बाँध 3 लाख से अधिक परिवारों को विस्थापित कर चुका है।
  • पुराने बाँध अधिक खतरनाक: पुराने बाँध अधिक सुरक्षा जोखिम वाले होते हैं, इनके रख-रखाव की लागत अधिक होती है और अवसादन के कारण कार्यक्षमता में गिरावट देखि जाती है, इस संदर्भ में दिये गए कुछ आँकड़े निम्नलिखित हैं -
    • विश्व स्तर पर वर्ष 2025 तक 1,115 से अधिक बड़े बाँध लगभग 50 साल पुराने हो जाएंगे।
    • चीन, अमेरिका और भारत ऐसे देशों की सूची में शीर्ष पर हैं जिनके पास बड़े बाँध अधिक संख्या में है।
      • चीन अकेले ही विश्व के बड़े बाँधों (संख्या 23,841) का 40% भाग रखता है, इनकी औसत आयु 45 वर्ष है।
    • एक नए अध्ययन से पता चला है कि भारत में 4,407 बड़े बाँध हैं, जिनमें से 1,000 से अधिक बाँध वर्ष 2025 तक 50 वर्ष तथा इससे अधिक के हो जाएंगे ।
      • भारत में 209 बाँध 100 साल से अधिक पुराने हैं, इनका निर्माण तब किया गया था जब डिज़ाइन और सुरक्षा मानदंड मौजूदा स्तर से काफी नीचे थे ।
    • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन: विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में जल-विद्युत जलाशय ग्रीनहाउस गैसों की महत्त्वपूर्ण मात्रा का उत्सर्जन करते हैं।
      • बाँध के पीछे इकट्ठा पानी एक अप्राकृतिक, स्थिर झील का निर्माण करता है जो अक्सर वहाँ के पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुँचाता है। पानी में मौजूद बैक्टीरिया इन पौधों को विघटित करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड एवं मीथेन (शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस) उत्पन्न करते हैं।
      • जलाशय से उत्पन्न मीथेन, विमानन क्षेत्र के जलवायु प्रभाव की तुलना में जलवायु परिवर्तन के सभी मानवीय कारणों के 4% से अधिक के लिये ज़िम्मेदार है।
      • कुछ मामलों में समान बिजली उत्पादन की स्थिति में जल-विद्युत परियोजनाएँ कोयले द्वारा उत्पादित बिजली की तुलना में अधिक उत्सर्जन कर रही हैं।

चोपड़ा समिति

  • सर्वोच्च न्यायालय के 13 अगस्त, 2013 के स्वत: संज्ञान के आदेश के बाद अक्तूबर 2013 में पर्यावरण और वन मंत्रालय (अब पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, MoEFCC) द्वारा समिति का गठन किया गया था।
    • समिति ने सुझाव दिया कि किसी भी पनबिजली परियोजना (HEPs) को पराहिमनद क्षेत्र में नहीं बनाया जाना चाहिये क्योंकि इसमें शिथिल हिमनद मलबा पाया जाता है जो  नीचे की ओर जाने पर विनाशकारी हो सकता है।
    • इस समिति ने समुद्र तल से 2200-2500 मीटर की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पनबिजली परियोजना के निर्माण पर भी आपत्ति जताई।

आगे की राह

  • व्यवहार्य विकल्प: सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं को प्राथमिकता देना जल-विद्युत परियोजनाओं के लिये व्यवहार्य और टिकाऊ विकल्प है।
    • हालाँकि बाँध के संचालन में सुधार और इस तरह के बुनियादी ढाँचे के लिये अधिक उपयुक्त स्थानों का पता लगाना भी समाधान का हिस्सा होना चाहिये।
    • साथ ही भारत को ग्रिड को संतुलित करने के लिये ऊर्जा संग्रहण, बैटरी और हाइड्रोजन जैसी तकनीकों पर ध्यान देना चाहिये। चूँकि ये प्रौद्योगिकियाँ आर्थिक रूप से व्यवहार्य (वहनीय) हैं, इसलिये ये बड़े बाँधों की स्थिति को और कमज़ोर कर देंगी।
  • बाँधों का समय पर निरीक्षण: यह स्पष्ट है कि नए बाँधों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, मौजूदा परियोजनाओं के बेहतर प्रदर्शन किये जाने की ज़रूरत है।
    • भारत को अपने वृद्ध बाँधों का लागत-लाभ विश्लेषण कर उनकी परिचालन और पारिस्थितिकी सुरक्षा के लिये समयबद्ध समीक्षा करनी चाहिये, साथ ही उन लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी चाहिये जो निचले इलाकों में निवास करते हैं।
    • पचास साल सभी बाँधों के लिये एक परिभाषित उम्र नहीं है क्योंकि यह डिज़ाइन निर्माण और रख-रखाव जैसे कारकों पर भी निर्भर करता है।
      • एक अच्छी तरह से निर्मित और बेहतर रख-रखाव वाले बाँध का जीवनकाल 100 वर्षों का हो सकता है।
      • हालाँकि 50 साल वह उम्र होती है जब एक बाँध पर उम्र बढ़ने के लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं।
      • कुछ मामलों में गेट और मोटर्स जैसे बाँध घटकों को 30-50 साल के बाद बदलना पड़ सकता है।
  • WCD द्वारा अनुशंसित कदम: 
    • विश्व बाँध आयोग (World Commission on Dams-WCD) बाँधों से उत्पन्न मुद्दों के समाधान के उपाय के लिये सात चरणों को सूचीबद्ध करता है। इसमें शामिल हैं:
    • किसी भी बाँध के निर्माण के लिये व्यापक सार्वजनिक स्वीकृति प्राप्त करना।
    • बाँधों के विकल्पों की खोज।
    • मौजूदा संरचनाओं का इष्टतम उपयोग।
    • नदी बेसिन स्तर पर पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और बहाली।
    • प्रभावित लोगों के हक को मान्यता देना।
    • लागू नियमों का अनुपालन।
    • सीमा पार नदियों पर क्षेत्रीय सहयोग।

विश्व बाँधों पर आयोग (WCD)

  • डब्ल्यूसीडी एक वैश्विक बहु-हितधारक निकाय है जिसकी स्थापना दुनिया भर के बड़े बाँधों की प्रभावशीलता और प्रदर्शन की जाँच करने के लिये विश्व बैंक और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) द्वारा 1998 में की गई।
  • डब्ल्यूसीडी ने नवंबर 2000 में भारी वित्तीय, पर्यावरण और मानव लागत तथा बड़े बाँधों के निराशाजनक प्रदर्शन पर अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट जारी की।
    • यह पाया गया कि बड़े बाँधों के निर्माण के कुछ आर्थिक लाभ प्राप्त हुए थे, वहीं उन्होंने 20वीं शताब्दी में लगभग 40-80 मिलियन लोगों को जबरन विस्थापित किया था।
      • इन लोगों ने अपनी भूमि और घरों को अक्सर बिना किसी मुआवज़े के बाँधों के कारण खो दिया। 

मुल्लापेरियार बाँध का मामला

  • संदर्भ : मुल्लापेरियार बाँध, केरल का एक गुरुत्वाकर्षण बाँध है जो 126 साल पुराना बैराज है, इसने अपने 50 साल के जीवन को खतरनाक स्तर पर समाप्त कर दिया है।
    • यह बाँध पश्चिमी घाट में स्थित है, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान निर्मित पेरियार वन्यजीव अभयारण्य के निकट है।
      • एक गुरुत्व बाँध वह होता है जो अपने वज़न और प्रतिरोध द्वारा पानी का सामना करने के लिये बनाया जाता है।
      • जब रोके गए पानी द्वारा बल लगाया जाता है तो बाँध के आधार का वज़न और चौड़ाई, बाँध को नष्ट होने से रोकते हैं। 
    • किसी बाँध को न केवल इसकी उम्र के कारण, बल्कि एक स्वीकृत भूकंपीय क्षेत्र (जोन-III) में स्थापित होने लिये भी खतरनाक माना जाता है।
  • बाँध का क्षय : केरल सरकार ने 2006 और 2011 के बीच हाइड्रोलॉजिकल समीक्षा अध्ययन किया, जिससे यह निष्कर्ष निकला कि मुल्लापेरियार बाँध अनुमानित अधिकतम बाढ़ सीमा को पार करने के लिये सुरक्षित नहीं है।
    • आईआईटी रुड़की और आईआईटी दिल्ली दोनों ने इस बाँध को क्षय होने लायक माना है।
      • हालाँकि मुल्लापेरियार बाँध जो त्रावणकोर की पूर्व रियासत (अब केरल) और ब्रिटिश सरकार के बीच एक पट्टा समझौता द्वारा विरासत में मिला था, को सेवा मुक्त करने का तमिलनाडु राज्य ने कड़ा विरोध किया है। 
      • इस पट्टे से तमिलनाडु को बाँध का संचालन करने और प्रतिवर्ष सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिये 640 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी पश्चिमी घाट के पहाड़ों में सुरंग के माध्यम से प्राप्त होता है, जो दोनों राज्यों के बीच एक दीवार का निर्माण करती है।
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